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विकसित देशों की सफाई का असली हिसाब कौन देगा?
विकसित देशों की सफाई का असली हिसाब कौन देगा?
4 min
विकसित देशों की चमक अक्सर प्रदूषण मिटाने से नहीं, उसे अपनी सीमाओं से बाहर धकेलने से बनी है। कार्बन उत्सर्जन और पर्यावरणीय नुकसान का बड़ा हिस्सा गरीब देशों पर डालकर वे स्वयं को "स्वच्छ" कहते हैं। यदि स्वच्छता का पैमाना कम कार्बन है, तो उसी कसौटी पर कई विकासशील देश उनसे अधिक स्वच्छ सिद्ध होते हैं। वास्तविक स्वच्छता तकनीक या दिखावे से नहीं, बल्कि उस चेतना से आती है जो उपभोग, शोषण और पर्यावरण विनाश की जड़ - अहंकार - को समाप्त करे।
ज्ञान, मस्ती कैसे बन जाता है?
ज्ञान, मस्ती कैसे बन जाता है?
6 min
ज्ञान ही डर को मस्ती में बदलता है। अज्ञान भय पैदा करता है, जबकि सही समझ भय दूर करता है। सच्चे मित्र बनाने की कोशिश करने के बजाय आत्म-अवलोकन अधिक आवश्यक है। कबीर साहब का संदेश है कि केवल किताबें पढ़ने से नहीं, बल्कि ज्ञान के प्रति प्रेम से जीवन बदलता है। मन स्वयं चंचल नहीं होता; हमारी इच्छाएँ और अस्थिरता उसे भटकाती हैं। शिक्षा का उद्देश्य केवल जानकारी जुटाना नहीं, बल्कि अपनी मान्यताओं पर प्रश्न करना और सत्य की खोज करना है।
भारत पीछे क्यों रहा और पश्चिम आगे कैसे बढ़ा?
भारत पीछे क्यों रहा और पश्चिम आगे कैसे बढ़ा?
8 min
किसी प्रदेश की समृद्धि केवल प्राकृतिक संसाधनों से नहीं, बल्कि वहाँ के लोगों की चेतना, शिक्षा और विवेक से तय होती है। खनिज स्वयं विकास नहीं लाते; यदि समाज जागरूक न हो तो वही संसाधन शोषण और भ्रष्टाचार का कारण बन जाते हैं। सच्ची संपदा धरती के नीचे नहीं, मनुष्य के मस्तिष्क में होती है। विद्या और आत्मज्ञान ही किसी राज्य या राष्ट्र को वास्तविक अर्थों में समृद्ध और स्वतंत्र बनाते हैं।
शादी दूसरों की मर्ज़ी से करने का अंजाम
शादी दूसरों की मर्ज़ी से करने का अंजाम
22 min
प्रेम कोई सामाजिक स्वीकृति, विवाह या रोमांटिक आकर्षण नहीं, बल्कि अहंकार के मिटने की प्रक्रिया है। सच्चा प्रेम अनुमति नहीं मांगता और न ही हार्मोन या परंपरा से पैदा होता है; वह सत्य और मुक्ति की ओर भीतर की यात्रा है। इसी तरह अहंकार सफलता पाने के लिए खुद को नहीं मिटा सकता — क्योंकि जब तक "मैं" बना हुआ है, तब तक हर त्याग, चाहे परिवार का हो, मित्रों का हो या स्वास्थ्य का, अहंकार का ही एक रूप रहता है। सही कर्म योजना बनाकर नहीं, बल्कि झूठे प्रभावों और बंधनों से मुक्त होकर स्वतः प्रकट होता है।
रील्स नहीं, वास्तविक विद्रोह चाहिए
रील्स नहीं, वास्तविक विद्रोह चाहिए
21 min
आध्यात्मिकता अहंकार को सांत्वना देने या स्वयं को विद्रोही घोषित करने का माध्यम नहीं, बल्कि अपने भीतर बैठी गहरी गुलामी को पहचानने का साहस है। हमारी अधिकांश इच्छाएँ, मान्यताएँ और पसंद वास्तव में सामाजिक संस्कारों से बनी होती हैं, इसलिए केवल बाहरी विद्रोह स्वतंत्रता नहीं देता। सच्चा धर्म भीतर के अहंकार से संघर्ष कर जीवन में सत्य के पक्ष में खड़े होने का आह्वान करता है, चाहे उसकी कीमत संघर्ष और घाव ही क्यों न हों।
इतनी जल्दी बुरा क्यों मान जाते हो?
इतनी जल्दी बुरा क्यों मान जाते हो?
11 min
लोग अपनी राय की रक्षा इसलिए नहीं करते कि वह सत्य है, बल्कि इसलिए क्योंकि भीतर से उन्हें उसकी कमजोरी का पता होता है। झूठ सबसे जल्दी आहत होता है और सच से डरता है। इसलिए सत्य बोलने पर यदि कोई टूटता है, तो उसके झूठ के लिए स्वयं को दोषी नहीं मानना चाहिए। जहाँ वास्तव में गलती हो, वहाँ विनम्र बनें; लेकिन सत्य के पक्ष में खड़े होने के लिए अपराधबोध या दूसरों की नाराज़गी का बोझ उठाना आवश्यक नहीं है।
किसी लक्ष्य, किसी योजना पर चल नहीं पाते
किसी लक्ष्य, किसी योजना पर चल नहीं पाते
10 min
बार-बार लक्ष्य छोड़ देने का कारण इच्छाशक्ति की कमी नहीं, बल्कि गलत और उधार लिए हुए लक्ष्य हैं। जिन उद्देश्यों का जन्म प्रेम, समझ और आत्मबोध से नहीं होता, वे बोझ बन जाते हैं। सही लक्ष्य भीतर की स्पष्टता से निकलता है और वही व्यक्ति को स्वाभाविक समर्पण देता है। इसलिए प्रेरणा खोजने से पहले स्वयं को जानना, आत्म-अवलोकन करना और यह समझना ज़रूरी है कि वास्तव में हमारे लिए क्या मूल्यवान है।
मन को एकाकी रखने से क्या आशय है?
मन को एकाकी रखने से क्या आशय है?
8 min
मन को संसार, लोगों और वस्तुओं से नहीं, सत्य में स्थिर रखना ही वास्तविक एकांत है। अकेलापन शरीर का नहीं, मन का होता है। जब मन दुनिया से पाने की आशा छोड़ देता है, तभी वह मुक्त होता है। वस्तुओं और रिश्तों का आकर्षण भी अंततः भोग की इच्छा से ही पैदा होता है, जबकि सच्चा प्रेम केवल सत्य, मुक्ति या श्रीकृष्ण के प्रति हो सकता है। संसार से आशा दुःख देती है, इसलिए मन को केवल सत्य की ओर लगाना ही योग है।
⁠भारत में पानी खत्म हो रहा है — और वजह धरती में नहीं है!
⁠भारत में पानी खत्म हो रहा है — और वजह धरती में नहीं है!
22 min
आत्मज्ञान के बिना समाज, पर्यावरण या किसी भी बाहरी समस्या का स्थायी समाधान संभव नहीं, क्योंकि हर संकट की जड़ मनुष्य की चेतना में है। बाहरी सुधार, नीतियाँ या अभियानों की अपनी भूमिका है, लेकिन वे मूल कारण को नहीं बदलते। इसलिए सबसे आवश्यक कार्य है स्वयं को बदलना और सत्य के प्रति गंभीर होना। जो व्यक्ति सत्य के प्रति उदासीन है, उससे स्वीकृति या मान्यता की अपेक्षा करना भी व्यर्थ है।
आचार्य जी, पढ़ना शुरु तो करती हूँ लेकिन...
आचार्य जी, पढ़ना शुरु तो करती हूँ लेकिन...
4 min
पढ़ना केवल पन्ने पूरे करना नहीं, बल्कि समझ विकसित करना है। जब किसी विषय को सचमुच समझा जाता है, तो जिज्ञासा स्वयं आगे पढ़ने के लिए प्रेरित करती है। अधूरी किताबें अक्सर रुचि की कमी नहीं, बल्कि बिना समझे आगे बढ़ने का परिणाम होती हैं। इसलिए गति से अधिक महत्त्वपूर्ण है हर विचार को समझना, क्योंकि वास्तविक सीख वहीं से शुरू होती है।
सहारे की ज़रूरत ही क्यों?
सहारे की ज़रूरत ही क्यों?
9 min
लड़कियों को बचपन से निर्भर बनाना उनकी क्षमता नहीं, उनकी स्वतंत्रता छीनता है। आर्थिक, बौद्धिक और व्यावहारिक आत्मनिर्भरता ही वास्तविक सम्मान और सुरक्षा का आधार है। समाज अक्सर उन्हें रूप, भावनाओं और दूसरों पर आश्रित रहने तक सीमित कर देता है, जबकि उनकी सबसे बड़ी आवश्यकता आज़ादी है। जो भी शिक्षा, कौशल या संघर्ष स्वतंत्रता की ओर ले जाए, उसी पर पूरी ऊर्जा लगानी चाहिए; बाकी सब उसके बाद है।
Ronaldo-Messi को पूजोगे? वजह खेल नहीं है
Ronaldo-Messi को पूजोगे? वजह खेल नहीं है
32 min
सुंदरता शरीर, ग्लैमर या सामाजिक स्वीकृति से नहीं आती। अधिकांश लोग आकर्षण, प्रसिद्धि और बाहरी छवि को सुंदरता समझ लेते हैं, जबकि उनके निर्णयों के पीछे अक्सर प्रतिष्ठा, मान्यता और अहंकार की चाह काम कर रही होती है। वास्तविक सुंदरता स्वाभाविकता, सरलता और अहंकार से मुक्त होने में है। जब व्यक्ति स्वयं को किसी आदर्श छवि में ढालने के बजाय अपनी प्रकृति को स्वीकार करता है, तभी वह दूसरों को भी बिना स्वार्थ और अपेक्षा के देख पाता है।
टीचर ने मौका नहीं दिया… अब क्या करें?
टीचर ने मौका नहीं दिया… अब क्या करें?
6 min
काम का मूल्य जीत, पुरस्कार या दूसरों से आगे निकलने में नहीं, बल्कि उसके प्रति प्रेम और समझ में है। जब कोई कार्य केवल प्रतियोगिता या प्रशंसा के लिए किया जाता है, तो वह बोझ बन जाता है। सच्चा आनंद उसी काम में है जिसे व्यक्ति स्वाभाविक रूप से करना चाहता है। इसी तरह डर कोई समस्या नहीं है; समस्या तब है जब डर हमें सही काम करने से रोक दे। जो सही और आवश्यक है, उसे डर, असफलता या संकोच के बावजूद करते रहना चाहिए।
घरवाले बस शादी-शादी करते रहते हैं!
घरवाले बस शादी-शादी करते रहते हैं!
22 min
जीवन के बड़े निर्णय, जैसे करियर और विवाह, तभी सार्थक होते हैं जब वे समझ और जागरूकता से लिए जाएँ, न कि सामाजिक दबाव या आदत के कारण। अधिकांश लोग बिना स्वयं को समझे जीवन के महत्वपूर्ण चुनाव कर लेते हैं और फिर उनके परिणामों से जूझते हैं। वास्तविक परिपक्वता अपने जीवन की जिम्मेदारी लेने, स्वयं को जानने और बाहरी अपेक्षाओं के बजाय स्पष्टता और विवेक के आधार पर निर्णय लेने में है।
अर्जुन में क्या था जो बाक़ी  में नहीं?
अर्जुन में क्या था जो बाक़ी में नहीं?
7 min
अर्जुन की विशेषता उनकी पूर्णता में नहीं, बल्कि सत्य के प्रति उनकी ईमानदारी में थी। उन्होंने अपने भ्रम, भय, मोह और संदेहों को छिपाया नहीं, बल्कि उनका सामना किया। दूसरों की तरह किसी पक्ष से चिपकने के बजाय उन्होंने निष्पक्ष होकर देखने की इच्छा दिखाई और अपने से ऊँची बुद्धि के मार्गदर्शन को स्वीकार किया। वास्तविक श्रेष्ठता त्रुटिहीन होने में नहीं, बल्कि सीखने, बदलने और सत्य के लिए अपने अहंकार से ऊपर उठने की क्षमता में है।
जलवायु आपदा और मध्यवर्ग का भ्रम
जलवायु आपदा और मध्यवर्ग का भ्रम
44 min
जलवायु संकट केवल किसानों, मज़दूरों या गरीबों की समस्या नहीं है; इसका प्रभाव समाज के हर वर्ग पर पड़ने वाला है। बढ़ती गर्मी, आर्द्रता, बाढ़, सूखा, प्रदूषण, खाद्य संकट, स्वास्थ्य समस्याएँ और सामाजिक अस्थिरता धीरे-धीरे जीवन के हर पहलू को प्रभावित करेंगी। तकनीकी सुविधाएँ और निजी आराम स्थायी सुरक्षा नहीं दे सकते। यह संकट भविष्य का नहीं, वर्तमान का है, और इससे बचाव के लिए सामूहिक जागरूकता व गंभीर कार्रवाई आवश्यक है।
रिश्ते: अरमान, अकेलापन और आज़ादी
रिश्ते: अरमान, अकेलापन और आज़ादी
38 min
हम जिन भावनाओं, इच्छाओं, महत्वाकांक्षाओं और रिश्तों को अपना मानते हैं, उनमें से अधिकांश समाज, परिवार, शिक्षा, मीडिया और वातावरण द्वारा आरोपित होते हैं। व्यक्ति अपनी ही नहीं, उधार ली हुई मान्यताओं के अनुसार जीता है और फिर उसी को अपनी पहचान समझ लेता है। वास्तविक स्वतंत्रता तब शुरू होती है जब हम अपने विचारों, भावनाओं और लक्ष्यों की जाँच करते हैं, झूठे प्रभावों को पहचानते हैं और अपने जीवन को सचेत रूप से जीना शुरू करते हैं।
डरे हुए समाज से जन्मा छात्र तनाव
डरे हुए समाज से जन्मा छात्र तनाव
34 min
उच्च शिक्षा संस्थानों में विद्यार्थियों का तनाव केवल व्यक्तिगत समस्या नहीं, बल्कि इतिहास, सामाजिक भय, आर्थिक असुरक्षा और प्रतिस्पर्धी शिक्षा व्यवस्था का परिणाम है। परिवार, कोचिंग संस्कृति और सफलता की संकीर्ण परिभाषाएँ छात्रों पर भारी दबाव डालती हैं। समाधान केवल काउंसलिंग नहीं, बल्कि ऐसी समग्र शिक्षा है जो रचनात्मकता, खेल, कला, दर्शन, आत्मबोध और स्वतंत्र चुनाव को महत्व दे, ताकि विद्यार्थी केवल करियर नहीं, बल्कि संतुलित और सार्थक जीवन भी जी सकें।
जो सबसे प्यारा है - उसी की बाहों में भी अकेलापन?
जो सबसे प्यारा है - उसी की बाहों में भी अकेलापन?
10 min
अकेलापन बाहर लोगों की कमी से नहीं, भीतर के अधूरेपन की मान्यता से पैदा होता है। जब व्यक्ति मान लेता है कि उसे पूरा होने के लिए किसी व्यक्ति, वस्तु या उपलब्धि की ज़रूरत है, तब वह लगातार खोज और निर्भरता में भटकता है। यह भावना सामाजिक मान्यताओं और बाज़ार द्वारा भी पोषित होती है। समाधान बाहर कुछ जोड़ने में नहीं, बल्कि इस झूठी धारणा को पहचानने में है कि हम मूलतः अधूरे हैं। आत्मज्ञान के साथ यह भ्रम टूटता है और अकेलापन स्वतः समाप्त होने लगता है।
‘अल्लाह में यकीन रखो’ का अर्थ
‘अल्लाह में यकीन रखो’ का अर्थ
11 min
प्रार्थना का अर्थ किसी बाहरी शक्ति से इच्छाएँ माँगना नहीं, बल्कि स्वयं को उसके सामने पूर्णतः समर्पित कर देना है। जब तक अहंकार और व्यक्तिगत कर्तापन बना रहता है, प्रार्थना अधूरी रहती है। सच्ची प्रार्थना में व्यक्ति का सीमित “मैं” मिटता है और उसके कर्म बोध तथा सत्य से संचालित होने लगते हैं। तब जीवन में सही निर्णय स्वाभाविक रूप से होते हैं और बाहरी समस्याओं का समाधान भी उसी जागरूकता से निकलता है।
वंश चलाना चाहते हो - किसके लिए?
वंश चलाना चाहते हो - किसके लिए?
13 min
जीवन सीमित है, इसलिए उसका केंद्र मृत्यु के बाद की कल्पनाएँ नहीं, बल्कि जीवित रहते हुए जागरूकता और मुक्ति होनी चाहिए। रस्में, कर्मकांड और मृत्यु के बाद की कथाएँ अक्सर जीवन की वास्तविक ज़िम्मेदारियों से ध्यान हटाती हैं। जो प्रेम, सहायता और सम्मान देना है, वह जीवित लोगों को देना सार्थक है। मृत्यु की स्मृति समय का मूल्य सिखाती है, अधूरी कहानियों को छोड़ना सिखाती है, और वर्तमान जीवन को पूरी गंभीरता और ईमानदारी से जीने की प्रेरणा देती है।
बागी Gen Z: डेटिंग ऐप्स, कुंडली और इश्क़ वाला लव
बागी Gen Z: डेटिंग ऐप्स, कुंडली और इश्क़ वाला लव
25 min
डेटिंग ऐप, कुंडली मिलान और “मेरी पसंद” जैसी धारणाएँ अक्सर प्रेम नहीं, बल्कि डर, सामाजिक कंडीशनिंग और अहंकार से संचालित होती हैं। परंपरा के दबाव में किया गया चुनाव और केवल व्यक्तिगत पसंद पर आधारित चुनाव, दोनों ही भ्रमित हो सकते हैं। सच्चा प्रेम तब संभव होता है जब व्यक्ति स्वयं को जाने और ऐसा संबंध चुने जो उसके बंधनों, भय और अहंकार को चुनौती देकर उसे भीतर से मुक्त करे।
यारी है ईमान मेरा, यार मेरी ज़िंदगी: बावले यारों की पहचान
यारी है ईमान मेरा, यार मेरी ज़िंदगी: बावले यारों की पहचान
18 min
मित्रता का उद्देश्य एक-दूसरे की सीमाओं को पुष्ट करना नहीं, बल्कि ऊँचाई की ओर बढ़ने में सहयोग देना है। कॉलेज जीवन आत्म-विकास, सीखने और उत्कृष्टता की खोज का दुर्लभ अवसर है। केवल समान सोच वाले समूहों में समय बिताना व्यक्ति को औसत बनाए रख सकता है। सच्चा मित्र स्वयं गुरु बनने का दावा नहीं करता, बल्कि ज्ञान, अनुभव और विकास के बेहतर स्रोतों तक ले जाता है। पढ़ाई, कौशल, खेल, साहित्य और आत्म-विस्तार में लगाया गया समय ही भविष्य को आकार देता है।
पिंजरे में कैद चिड़िया नहीं हो तुम
पिंजरे में कैद चिड़िया नहीं हो तुम
15 min
स्वतंत्रता केवल बाहरी प्रतिबंधों से मुक्त होने का नाम नहीं है, बल्कि आर्थिक, सामाजिक और मानसिक निर्भरता से ऊपर उठने का साहस भी है। दूसरों की राय, सुरक्षा के नाम पर लगाए गए बंधन और सामाजिक भय तभी प्रभावी होते हैं जब व्यक्ति उन पर निर्भर हो। गरिमा और आत्मनिर्भरता व्यक्ति को अपने निर्णय लेने की शक्ति देती हैं। शांति, सम्मान और स्वतंत्र जीवन के लिए कभी-कभी सुविधा, सुरक्षा और सामाजिक स्वीकृति की कीमत भी चुकानी पड़ती है।
क्या दुनिया के संकटों का समाधान वेदांत में है? || Cambridge Union में आचार्य प्रशांत
क्या दुनिया के संकटों का समाधान वेदांत में है? || Cambridge Union में आचार्य प्रशांत
7 min
जीवन की बाहरी समस्याओं का समाधान केवल तकनीक, नीतियों या आर्थिक प्रगति से नहीं हो सकता, क्योंकि उनके पीछे मनुष्य की आंतरिक अवस्था काम करती है। विज्ञान और तकनीक उपयोगी हैं, लेकिन यदि मनुष्य स्वयं को नहीं समझता, तो वही उपलब्धियाँ विनाश का कारण भी बन सकती हैं। जलवायु संकट, अत्यधिक उपभोग और सामाजिक चुनौतियों की जड़ मानव की अतृप्त इच्छाओं और अचेतन जीवन में है। स्थायी परिवर्तन तभी संभव है जब बाहरी प्रगति के साथ आत्मज्ञान, ईमानदारी और आत्मबोध भी विकसित हो।
21 साल की उम्र, फिर भी आज़ादी नहीं?
21 साल की उम्र, फिर भी आज़ादी नहीं?
15 min
व्यक्ति और उसके माता-पिता दोनों अक्सर प्रेम के नाम पर एक-दूसरे पर अधिकार जताते हैं, जबकि संबंधों में निर्णय सम्मान, समझ और स्वतंत्रता पर आधारित होने चाहिए। वयस्क होने के बाद जीवन के महत्वपूर्ण फैसले स्वयं लेने की क्षमता विकसित करना आवश्यक है। सच्ची परवरिश निर्भरता नहीं, आत्मनिर्भरता पैदा करती है। पारिवारिक दबाव का बड़ा हिस्सा प्रेम से नहीं, बल्कि भय, सुविधा, अपेक्षाओं और स्वार्थ से संचालित होता है। स्वस्थ संबंध वहीं संभव हैं जहाँ दोनों पक्ष एक-दूसरे की चेतना, स्वतंत्रता और गरिमा का सम्मान करें।
झुलस तो रहे हो, जगोगे कब?
झुलस तो रहे हो, जगोगे कब?
25 min
जलवायु संकट कोई दूर का खतरा नहीं, बल्कि वर्तमान की वास्तविकता है। इसके बावजूद लोग, मीडिया और राजनीति उन मुद्दों को प्राथमिकता देते हैं जो अहंकार, मनोरंजन, पहचान और तात्कालिक भावनाओं को संतुष्ट करते हैं। पर्यावरण विनाश का मूल कारण बाहरी व्यवस्था से अधिक मानवीय लालच, उपभोग और सामूहिक बेहोशी है। प्रकृति का शोषण विकास नहीं, आत्मविनाश है; और जब तक व्यक्ति स्वयं नहीं बदलेगा, तब तक न राजनीति बदलेगी, न समाज, न पृथ्वी का भविष्य।
Gen Z को बगावत चाहिए — पर भीतर वही पुरानी गुलामी है
Gen Z को बगावत चाहिए — पर भीतर वही पुरानी गुलामी है
9 min
भीड़-आधारित विद्रोह, ऑनलाइन क्रांतियाँ और व्यवस्था-विरोध तब तक सतही बने रहते हैं जब तक व्यक्ति स्वयं को नहीं समझता। समाज की समस्याएँ केवल नेताओं, संस्थाओं या व्यवस्थाओं से नहीं, बल्कि उसी सामूहिक चेतना से पैदा होती हैं जो उन्हें बनाती है। बाहरी बदलाव स्थायी नहीं होते यदि भीतर का दृष्टिकोण वैसा ही रहे। वास्तविक परिवर्तन आत्म-शिक्षा, जिम्मेदारी और स्वयं को देखने के साहस से शुरू होता है, न कि केवल प्रतिक्रियाओं और नारों से।
प्यार नहीं है - बस इतनी सी बात है
प्यार नहीं है - बस इतनी सी बात है
19 min
रिश्तों में प्रेम को अक्सर जन्म, परिवार या सामाजिक भूमिकाओं से जोड़ दिया जाता है, जबकि अधिकांश संबंध अपेक्षाओं, स्वामित्व और तयशुदा व्यवहारों पर टिके होते हैं। केवल माता-पिता या संतान का रिश्ता होने से प्रेम नहीं जन्मता। प्रेम कोई जैविक घटना नहीं, बल्कि सीखने और समझने की प्रक्रिया है। जहाँ “मेरा” और “मेरे लिए” का आग्रह घटता है, वहीं प्रेम सीमाओं को लाँघकर स्वतंत्रता, करुणा और वास्तविक संबंध का रूप लेता है।
प्यार, शादी - और फिर मारपीट?
प्यार, शादी - और फिर मारपीट?
8 min
आर्थिक निर्भरता, भावनात्मक आघात और घरेलू हिंसा के बीच व्यक्ति अक्सर अपनी वास्तविक समस्या को पहचान नहीं पाता। रिश्ते कई बार प्रेम से अधिक मजबूरी और निर्भरता पर टिके होते हैं। आत्मनिर्भरता व्यक्ति को भय और विवशता से मुक्त कर सही निर्णय लेने की शक्ति देती है। दूसरों की सहायता करने से पहले स्वयं को सुरक्षित, स्वतंत्र और सशक्त बनाना आवश्यक है, क्योंकि स्वतंत्रता के बिना न संबंध स्वस्थ हो सकते हैं और न जीवन के महत्वपूर्ण निर्णय।
पढ़े-लिखे लोग भी गंदगी क्यों फैलाते हैं?
पढ़े-लिखे लोग भी गंदगी क्यों फैलाते हैं?
3 min
प्रदूषण केवल जानकारी की कमी से नहीं, बल्कि गलत इरादों, सुविधा-प्रियता और गैर-जिम्मेदारी से पैदा होता है। लोग प्रदूषण के बारे में जानते हुए भी उसे बढ़ाते हैं क्योंकि ज्ञान अपने आप में पर्याप्त नहीं है। नदियों, हवा और पर्यावरण को सचमुच स्वच्छ बनाने के लिए पहले मन और नीयत को स्वच्छ करना आवश्यक है। बाहरी गंदगी अक्सर भीतर की अव्यवस्था और असंवेदनशीलता का ही विस्तार होती है।
यह प्रेम है या समझौता?
यह प्रेम है या समझौता?
19 min
रिश्तों में प्रेम अक्सर मान लिया जाता है, पर अधिकांश संबंध तय भूमिकाओं, अपेक्षाओं और सामाजिक ढाँचों पर चलते हैं। माता-पिता, पति-पत्नी या परिवार के रिश्ते भी कई बार समझ, स्वतंत्रता और संवेदनशीलता से नहीं, बल्कि आदत, अधिकार और “मेरापन” से संचालित होते हैं। सच्चा प्रेम सीमित नहीं होता; वह स्वामित्व नहीं, बल्कि समझ, स्वतंत्रता और विस्तार देता है। प्रेम जन्म से नहीं, जागरूकता से सीखा जाता है।
सही परवरिश का असली मतलब क्या है?
सही परवरिश का असली मतलब क्या है?
12 min
आध्यात्मिकता दुनिया से भागना नहीं, बल्कि उसे गहराई से समझना है। परिवार, बच्चों और समाज से संवाद के लिए उनके रुचि-क्षेत्रों को जानना आवश्यक है। किसी विचार को थोपने के बजाय समझ और निष्पक्षता से बात करनी चाहिए। आत्मज्ञान जीवन के हर क्षेत्र को दिशा देता है। सीखने की प्रक्रिया में जिज्ञासा, अध्ययन और खुला संवाद व्यक्ति को अधिक परिपक्व, प्रभावी और सार्थक बनाते हैं।
AI आधुनिक है और अध्यात्म उससे भी आधुनिक है!
AI आधुनिक है और अध्यात्म उससे भी आधुनिक है!
9 min
अध्यात्म कोई अलग विषय या पुरानी परंपरा नहीं, बल्कि स्वयं को जानने की सतत जागरूकता है। विज्ञान, चिकित्सा या एआई जैसे सभी क्षेत्र बाहरी ज्ञान से जुड़े हैं, जबकि अध्यात्म उस व्यक्ति को समझने की प्रक्रिया है जो इनका उपयोग करता है। यदि इंसान स्वयं को नहीं समझता, तो उसका ज्ञान दिशाहीन हो सकता है। सही समझ ही तकनीक और शक्ति को मानव कल्याण की दिशा देती है।
क्या आपका पैशन सचमुच आपका है?
क्या आपका पैशन सचमुच आपका है?
21 min
सच्चा जीवन समाज के दबाव या तथाकथित “पैशन” के पीछे चलने से नहीं, बल्कि भीतर और बाहर दोनों प्रकार की गुलामी से मुक्त होने से शुरू होता है। अक्सर जिसे अपनी पसंद या पैशन समझा जाता है, वह भी सामाजिक संस्कारों का परिणाम होता है। जब व्यक्ति स्वयं को गहराई से समझकर स्वतंत्र निर्णय लेता है, तब उसका कर्म स्वाभाविक, सार्थक और समाजोपयोगी बनता है। भय और सुरक्षा की मानसिकता से ऊपर उठकर भी गरिमापूर्ण, संतुलित और आर्थिक रूप से पर्याप्त जीवन जिया जा सकता है।
गरीब आखिर गरीब क्यों है?
गरीब आखिर गरीब क्यों है?
15 min
गरीबी केवल बाहरी परिस्थितियों से नहीं, बल्कि गलत सोच, अंधविश्वास, भाग्यवाद और अविवेकपूर्ण आदतों से भी बढ़ती है। शिक्षा, जिम्मेदारी और सही मूल्यों की कमी इंसान को पीढ़ियों तक गरीब बनाए रखती है। कर्मकांड, दिखावा और बिना समझ के खर्च आर्थिक संकट को गहरा करते हैं। बदलाव तभी संभव है जब व्यक्ति अपनी बुद्धि, विवेक और जिम्मेदारी के साथ सही निर्णय लेना शुरू करे।
काम करने का मन क्यों नहीं करता?
काम करने का मन क्यों नहीं करता?
15 min
मुक्त कर्म वही है जिसमें आनंद किसी भविष्य के परिणाम में नहीं, बल्कि कर्म करने में ही होता है। बच्चा खेलते समय किसी पुरस्कार की अपेक्षा नहीं करता; खेल ही उसका सुख है। इसके विपरीत, बंधन और लालच से किए गए कर्म हमेशा हिसाब, मुआवज़े और भविष्य की आशा से भरे होते हैं। निष्काम कर्म वही है जहाँ कर्म स्वयं ही अपना पुरस्कार बन जाता है, और जीवन गणना नहीं बल्कि सहज उल्लास में बदल जाता है।
ऋषिकेश क्यों पसंद है?
ऋषिकेश क्यों पसंद है?
5 min
लोग ऋषिकेश शांति या आत्मबोध के लिए नहीं, बल्कि अपनी वही तनावपूर्ण और भ्रमित जीवनशैली को बनाए रखने के लिए आते हैं। महादेव का अर्थ अंत और अहंकार की समाप्ति है, पर तीर्थ भी मनोरंजन और पलायन का साधन बन गया है। दुख से मुक्त होने के बजाय लोग उसी दुख को बचाए रखने के उपाय खोजते रहते हैं।
NEET घोटाला: छात्रों का भरोसा क्यों टूट रहा है?
NEET घोटाला: छात्रों का भरोसा क्यों टूट रहा है?
9 min
NEET घोटाले केवल परीक्षा की गड़बड़ी नहीं, बल्कि युवाओं की रीढ़ तोड़ने वाली व्यवस्था है। समस्या किसी परीक्षा पद्धति में नहीं, इंसान की बेईमान नीयत में है। तकनीक, फोन या सिस्टम अच्छे-बुरे नहीं होते; असली प्रश्न यह है कि उनका उपयोग करने वाला व्यक्ति भीतर से कितना ईमानदार और जागरूक है।
FOMO सोने नहीं देता, YOLO जीने नहीं देता - क्या करे Gen Z?
FOMO सोने नहीं देता, YOLO जीने नहीं देता - क्या करे Gen Z?
20 min
क्या सचमुच FOMO और YOLO सिर्फ़ Gen Z की समस्या हैं, या ये मनुष्य के पुराने डर के नए नाम हैं? जब भीतर खालीपन हो, तो बाहर की हर चीज़ छूटती हुई लगती है। फिर जीवन एक दौड़ बन जाता है, जहाँ “और चाहिए” कभी ख़त्म नहीं होता। समस्या वस्तुओं की कमी नहीं, उस अहंकार की है जो हमेशा अधूरा महसूस करता है। जब तक स्वयं को नहीं जानोगे, तब तक हर चाह एक नई बेचैनी बनती रहेगी।
बंगाल चुनाव: मार्क्सवाद क्यों टिक नहीं पाया?
बंगाल चुनाव: मार्क्सवाद क्यों टिक नहीं पाया?
28 min
बंगाल चुनाव सिर्फ़ सत्ता का संघर्ष नहीं, एक विचारधारा की थकान का भी संकेत हैं। मार्क्सवाद ने मनुष्य को वर्गों में बाँटकर यह मान लिया कि उसकी चेतना जन्म और परिस्थितियों से तय होती है। लेकिन इतिहास बार-बार दिखाता है कि इंसान कठपुतली नहीं है। अगर चेतना सिर्फ़ वर्ग से तय होती, तो स्वयं मार्क्स, विवेकानंद, कबीर या राजा राममोहन राय जैसे लोग अपने ही वर्ग के विरुद्ध खड़े कैसे होते?
TCS मामला — असली मुद्दा समझते भी हैं हम?
TCS मामला — असली मुद्दा समझते भी हैं हम?
27 min
TCS जैसे मामलों पर पूरा देश कुछ दिनों तक हैरान होता है, लेकिन क्या सच में ये घटनाएँ नई हैं! कार्यस्थलों पर शोषण, करियर के नाम पर चुप्पी, धर्म को पहचान और सत्ता का हथियार बना देना, और भीतर से डरा हुआ इंसान... ये सब उसी समाज से निकलता है जिसे हमने सामान्य मान लिया है। सवाल सिर्फ़ कानून या सिस्टम का नहीं, इंसान की चेतना और परवरिश का है।
दया नहीं, सम्मान चाहिए
दया नहीं, सम्मान चाहिए
8 min
दुनिया अगर आपको शरीर के आधार पर तौलती है, तो वो आपके बारे में नहीं, अपनी सीमित समझ के बारे में बता रही है। मनुष्य की पहली पहचान देह नहीं, चेतना है। जो लोग आपको दया, कमजोरी या “अलग” नज़रों से देखते हैं, उन्होंने खुद को सिर्फ़ शरीर तक सीमित कर रखा है। इसलिए खुद को कभी दूसरों की नज़रों से मत मापिए। आपकी असली कीमत चेतना तय करती है, शरीर नहीं।
सुरक्षित करियर, बेचैन मन
सुरक्षित करियर, बेचैन मन
8 min
आप कहते हैं, “मुझे अपने काम से गिल्ट होता है,” लेकिन साथ ही अपने पुराने चुनावों को भी अटल सच मानकर पकड़े रहते हैं। फिर समाधान कैसे मिलेगा? ज़िंदगी तब बदलती है जब आदमी अपने अतीत, डिग्री, नौकरी और सुरक्षित पहचान को भी चुनौती देने का साहस करे। वरना हम बस दर्द कम करने की गोली माँगते रहते हैं, जबकि भीतर पूरा जीवन बदलने की पुकार चल रही होती है।
आस्था ज़बरदस्ती जगाओगे क्या?
आस्था ज़बरदस्ती जगाओगे क्या?
13 min
आप आस्था खोज रहे हैं, पर क्या आस्था कभी ज़बरदस्ती पैदा होती है? आस्था फूल है, जो सही बीज, सही मिट्टी और सही संगति मिलने पर अपने आप खिलती है। शुरुआत श्रद्धा से नहीं, जिज्ञासा से होती है। सम्मान से नहीं, संदेह से होती है। परखिए, पूछिए, प्रयोग करिए। जहाँ वास्तविक लाभ होगा, वहाँ आस्था अपने आप जन्म लेगी, बनावटी नहीं।
मेरी मर्ज़ी! क्या सच में?
मेरी मर्ज़ी! क्या सच में?
25 min
आप कहते हैं मेरी मर्ज़ी, मेरे फैसले, मेरी दौड़। पर क्या सच में? अगर हर बार वही नौकरी, वही पैसा, वही तुलना, वही बेचैनी चुन रहे हैं, तो यह मर्ज़ी है या पुरानी आदत? हम नई मंज़िल चाहते हैं, पर चलते पुराने रास्तों पर हैं। जो पहले भी चैन न दे पाया, उसी के नए रूप के पीछे भागते रहते हैं। जीवन तब बदलता है, जब आदमी पहली बार पूछता है, मैं सच में चाहता क्या हूँ?
क्या अध्यात्म सिर्फ पढ़े-लिखों के लिए है?
क्या अध्यात्म सिर्फ पढ़े-लिखों के लिए है?
13 min
आप ‘अद्वैत’ को कोई सिद्धांत समझते हैं? जब तक ‘मैं’ है, तब तक दुनिया और दूसरा भी है, यही द्वैत है। अद्वैत तब होता है जब ‘मैं’ ही अपने मिथ्यात्व को देख ले। तब न कहने वाला बचता है, न कहने को कुछ। अद्वैत कोई विचार नहीं, अस्तित्व का अनुभव है। यह अहंकार के समाप्त होने का नाम है, जहाँ सिर्फ़ बोध शेष रह जाता है।
विचारों से मुक्ति कैसे मिले?
विचारों से मुक्ति कैसे मिले?
9 min
क्या आपके विचार भी आपको सच जैसे लगते हैं? यही भ्रम है। विचार कभी सत्य नहीं होते, वे सिर्फ़ मन की गतिविधि हैं। जब तक “मैं हूँ” का भाव है, तब तक वस्तु, व्यक्ति और विचार रहेंगे ही। उनसे भागना नहीं, उन पर विवेक लगाना है। जो अहंकार को पोषित करे उसे छोड़ो, जो उससे टकराए वही सही दिशा है। यही चुनाव जीवन को बंधन या मुक्ति की ओर ले जाता है।
आरक्षण से नहीं आएगा असली बदलाव
आरक्षण से नहीं आएगा असली बदलाव
41 min
आप सोचते हैं कि संसद में 33% महिलाएँ आ जाएँगी तो सशक्तिकरण हो जाएगा, लेकिन जब ज़मीन पर ही लड़कियों को स्वतंत्र होने नहीं दिया जाता, तो संसद तक पहुँचेंगी कौन? वही महिलाएँ जो पहले से सत्ता के सहारे हैं। असली बदलाव आरक्षण से नहीं, घर और समाज में महिला की स्वतंत्रता, शिक्षा और आत्मनिर्भरता से आएगा। वरना यह सिर्फ़ एक सजावटी परिवर्तन रह जाएगा।
11000 लीटर दूध बहाया गया: आस्था या अंधविश्वास?
11000 लीटर दूध बहाया गया: आस्था या अंधविश्वास?
7 min
आस्था और ज़िम्मेदारी अलग नहीं हैं; सच्ची आस्था खुद ज़िम्मेदारी बन जाती है। धर्म के नाम पर प्रकृति का नुकसान और अंधविश्वास, धर्म नहीं बल्कि अज्ञान है। वास्तविक धर्म समझ और सत्य पर आधारित है, न कि परंपराओं की अंधी नकल पर। अंधविश्वास पर प्रश्न उठाना धर्म के खिलाफ नहीं, बल्कि उसे बचाने का काम है।
सपने: शरीर छुट्टी पर, मन ड्यूटी पर
सपने: शरीर छुट्टी पर, मन ड्यूटी पर
7 min
आप सपनों से परेशान होकर जागते हैं, फिर भी उन्हें पूरे दिन ढोते रहते हैं। अगर गड़बड़ी सपने में थी, तो उसे जागृत जीवन में क्यों लाना? वर्तमान जीवन अपने आप में पूर्ण है, पर आप उससे बचने के लिए बीते भ्रमों को पकड़े रहते हैं। सपने कामनाओं से जन्म लेते हैं; जितना उन्हें पकड़ोगे, उतना वे आपको पकड़ेंगे। छोड़ दो, तभी स्पष्टता आएगी।
अहंकार: हर विनाश की जड़
अहंकार: हर विनाश की जड़
24 min
युद्ध, मुनाफाखोरी और हिंसा का मूल कारण अहंकार है, जो अपने स्वार्थ के लिए दूसरों ही नहीं, स्वयं को भी नष्ट कर सकता है। समाज अपनी बुराई को स्वीकार नहीं करता और खुद को अच्छा मानकर धोखे में जीता है। इसी अज्ञान से शोषण, युद्ध और अन्याय चलते रहते हैं। समाधान केवल आत्म-अवलोकन और भीतर की सच्चाई को ईमानदारी से देखने में है।
बच्चों का बचपन साइलेंट मोड पर
बच्चों का बचपन साइलेंट मोड पर
10 min
आज के समय में बच्चों में मोबाइल और गेम का एडिक्शन बढ़ता जा रहा है, जिसका मुख्य कारण खुद माता-पिता की लापरवाही और सुविधा-प्रियता है। समस्या को समझाने से नहीं, बल्कि सीधे नियंत्रित करने से हल किया जा सकता है। इसी तरह सोशल मीडिया तुलना और हीन भावना को बढ़ा रहा है। हर मानसिक समस्या का मूल समाधान आत्म-जागरूकता और सही दिशा में प्रयास है, जिसके लिए व्यक्तिगत पहल जरूरी है।
मजबूरी नहीं, सौदा है यह
मजबूरी नहीं, सौदा है यह
14 min
मजबूरी एक झूठ है जिसे अहंकार स्वार्थ छुपाने के लिए गढ़ता है। जो दबता है वो किसी सौदे में दब रहा है। माँ-बाप की धमकी, समाज का दबाव - ये सब तभी काम करते हैं जब भीतर डर हो और डर तभी होता है जब कोई चीज़ पानी हो। आज़ादी के लिए आखिरी कीमत भी चुकाने की तैयारी ही असली जीवन है।
राष्ट्र क्यों लड़ते हैं?
राष्ट्र क्यों लड़ते हैं?
27 min
राष्ट्रों की लड़ाई असल में अहंकार की लड़ाई है। देश माने वहाँ के लोग, और लोग जैसे हैं वैसे ही उनके नेता। दुनिया में जो गुंडागर्दी दिखती है वो बाहर से नहीं आई, हम ही उसका स्रोत हैं। अंतरराष्ट्रीय संबंध हों या व्यक्तिगत, यहाँ वफ़ा नहीं ताक़त चलती है। अहंकार की भूख अनंत है इसलिए युद्ध रुकता नहीं। समाधान केवल एक है कि जनसंख्या को स्वयं की शिक्षा मिले। जब तक इंसान अपने अहंकार को नहीं पहचानेगा तब तक विनाश जारी रहेगा।
भारतीय दर्शन में युवाओं की भूमिका
भारतीय दर्शन में युवाओं की भूमिका
48 min
आचार्य प्रशांत कलिंग में युवाओं से संवाद करते हैं। वे कहते हैं कि दर्शन सत्य की खोज है, जो आत्म-अनुसंधान से शुरू होती है। परंपरा सदा से चली आ रही है, बस रूप बदल गया है। विकृत धर्म बाजार बन गया है। युवाओं को अपनी बीमारी पहचानी चाहिए। सोशल मीडिया एल्गोरिदम मन को नियंत्रित कर रहा है। सच्चा शिक्षक वह है जो आपकी झूठी धारणाओं को चुनौती दे।
पैसा, प्रमोशन और तरक्की, ज़िंदगी फिर भी खोखली?
पैसा, प्रमोशन और तरक्की, ज़िंदगी फिर भी खोखली?
11 min
क्या आपकी नौकरी आपको मुक्ति की ओर ले जा रही है या बंधन की ओर? मुक्ति की ओर जाना माने बंधनों को कम करना। ऐसे में देखना पड़ता है कि ज़्यादा बड़ा बंधन क्या है। पिताजी का पैसा लेना एक बंधन है और दफ़्तर में काम करके पैसा लेना भी एक बंधन है। जो थोड़ा हल्का बंधन हो, उसे स्वीकार करना पड़ता है। धीरे-धीरे करके एक-एक बंधन काटना पड़ता है।
मुझसे क्या छीनोगे?
मुझसे क्या छीनोगे?
27 min
अहंकार मनुष्य की मूल समस्या है। हम ज्ञान समझते हैं पर उस पर चल नहीं पाते क्योंकि अहंकार को अपनी पहचान के लिए दूसरों की आवश्यकता है। परिवार, समाज, विचारधारा से हम सौदा करते हैं - अपनी स्वतंत्रता बेचते हैं। सच्चा प्रेम स्वयं को और दूसरों को मुक्त करना है, न कि बंधन में रखना। ईमानदारी से अपने झूठ को देखना ही सत्य है।
वासना और डर - समस्या कहाँ है?
वासना और डर - समस्या कहाँ है?
6 min
तुम्हारे घर में कोई चीज़ अँधेरे में रखी थी, कोई आकर उस पर थोड़ी रोशनी डाल सकता है। उस पर थोड़ा प्रयोग करके बता सकता है कि ये चीज़ सड़ी हुई है। उसके आगे का काम तो तुम्हारी नीयत का है। उसको उठा के बाहर तुम्हें ही फेंकना पड़ेगा। नीयत, फ़ैसला, ईमानदारी, इनका कोई विकल्प नहीं होता। डूबे रहो इधर-उधर की चीज़ों में, वासना हो, डर हो। जिस दिन तुम जलोगे, उस दिन डर और वासना भी जल जाएँगे। कहानी कभी न कभी तो ख़त्म होनी है। या तो ख़ुद अभी ख़त्म कर लो, नहीं तो चिता पर ख़त्म हो जाएगी। मर्ज़ी है।
रामकृष्ण परमहंस की एक अनूठी बात
रामकृष्ण परमहंस की एक अनूठी बात
28 min
रामकृष्ण परमहंस ने ख़ूब प्रयोग किए। वे मानने वाले लोगों में नहीं थे। ये होता है आध्यात्मिक चित्त: वो जानने से, प्रयोग करने से नहीं डरता। रामकृष्ण कह रहे हैं, “जो तुम्हारी मान्यता है, उसी का परीक्षण करो। तुम्हारी वर्तमान स्थिति से ही तुम्हारी मुक्ति का मार्ग निकलेगा: यतो मत, ततो पथ।” जंगल से गुज़र कर ही जंगल से बाहर आते हैं न! यही वो कह रहे हैं कि जहाँ फँसे हो, उसी जगह को ठीक से देखो। मुक्त होने के लिए बंधन को ही साफ़-साफ़ देखना पड़ता है। उसको पहचान लिया, तो मुक्त हो जाओगे।
इतनी मेहनत किस लिए?
इतनी मेहनत किस लिए?
5 min
ज़्यादातर लोग बाहर जी-तोड़ मेहनत करते हैं। लेकिन उनकी भीतरी दुनिया खाली, खोखली, कुछ नहीं, क्योंकि वो सारी मेहनत भीतर के केन्द्र को बदलने के लिए नहीं की गई होती है। वो जो आप बाहर खूब सारी मेहनत करके खूब सारे पैसे कमा रहे हैं, वो सिर्फ़ इसलिए कमा रहे हैं, क्योंकि आप अपनी आन्तरिक असुरक्षा को बचाए रखना चाहते हैं। आप भीतरी तौर पर एक डरे हुए आदमी हैं, इसीलिए बाहरी तौर पर आप बहुत मेहनत करते हैं। तो करते रहो बाहर कितनी भी मेहनत, आन्तरिक प्रगति कुछ नहीं होगी।
एपस्टीन फ़ाइल्स: असली दोषी कौन?
एपस्टीन फ़ाइल्स: असली दोषी कौन?
34 min
तुम एक झूठी मान्यता में जीना चाहते हो कि इंसान बाय डिफॉल्ट होता तो अच्छा है, बस वो पावर उसको करप्ट कर देता है। पावर ने इंसान को नहीं करप्ट किया, इंसान पावर को करप्ट करता है। मौका देकर देखो, पूरी दुनिया की आबादी आ जाएगी एप्स्टीन फ़ाइल्स में। पर आप सारा दोष डाल दोगे व्यवस्थाओं पर, कुछ लोगों पर। बात उन व्यक्तियों की नहीं है। हमारी प्रजाति के मैन्युफैक्चरिंग डिफेक्ट की है — अहंकार। उसी डिफेक्ट को ठीक करने के लिए जो होता है, उसको बोलते हैं अध्यात्म, आत्मज्ञान।
निर्वाण षट्कम: शिवत्व का मूल–सूत्र
निर्वाण षट्कम: शिवत्व का मूल–सूत्र
20 min
निर्वाण षट्कम को स्वयं तक पहुँचने का आख़िरी सूत्र भी माना जाता है। निर्वाण षट्कम के सब के सब श्लोक मात्र नकार में हैं। सब बस ये बता रहे हैं कि किसको ज़िंदगी में अहमियत नहीं देनी है। वो सब, जो मैं नहीं हूँ, जो मुझे बाँध कर रखता है, उसका नकार ही शिवत्व है। मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार, इनको बहुत महत्त्व नहीं देना है। इन सबका उपयोग कर लेना, उधर बढ़ने को, जिधर शुद्धता हो। हम में उस शुद्धता से प्रेम रहे। जहाँ कहीं भी कोई व्यक्ति अपनी सीमाओं को चुनौती दे रहा है, शिवत्व वहीं है।
वैलेंटाइन डे: प्रेम का वास्तविक अर्थ
वैलेंटाइन डे: प्रेम का वास्तविक अर्थ
32 min
जिसको तुम कहते हो रोमांटिक लव, इसका बाज़ारवाद से बहुत सीधा ताल्लुक है। अच्छे कपड़े पहन लिए, तोहफ़े दे लिए और मज़े कर लिए, लेकिन कुछ पूरा नहीं पड़ रहा; एक अधूरापन, एक कसक रह जाती है। आपकी बेचैनी वैसी की वैसी है। प्रेम का मतलब है कि जिसके साथ हो, उसकी आँखें खोल दो; वो ख़ुद को जानने लगे, मन को समझने लगे, यही प्रेम है। लेकिन ये करना आसान नहीं होता। ये करने की क़ीमत चुकानी पड़ती है। ये करने के लिए तुम्हें अपना सर्वस्व भी निछावर करना पड़े, तो कर दो। यही है वैलेंटाइन डे।
शादी करें या नहीं?
शादी करें या नहीं?
26 min
जब आप न स्वयं को जानते, न ज़िंदगी को जानते, तो ये आप क्या करने जा रहे हो? आपकी ज़िंदगी में कोई अजनबी आएगा और अब वो उम्र भर आपके साथ रहेगा। ये आपकी ज़िंदगी का सेंटर बन जाना है। ज़िंदगी इसी काम के लिए है? बेहोशी में, अनजाने में रिश्ता बना लो और फिर उम्र भर उसकी खिदमत करो। मैं कह रहा हूँ, इंसान बेहतर हो जाएगा तो उसके सारे कर्म बेहतर हो जाएँगे, सारे संबंध बेहतर हो जाएँगे, जिसमें शादी भी सम्मिलित है। उसके बाद तुम जो भी निर्णय करो, अच्छा है। करनी है शादी, शौक से करो, मौज में करो।
ये आदर्श तुम्हारे हैं भी?
ये आदर्श तुम्हारे हैं भी?
13 min
एक आदर्श रहता है मन में कि ज़िंदगी ऐसी-ऐसी होनी चाहिए। और वो आदर्श लेकर आप पैदा नहीं हुए थे, वो आदर्श इधर-से-उधर-से आपके मन में आ गया। अब आपको ज़िंदगी नहीं चाहिए, अपने आदर्श जैसी ज़िंदगी चाहिए। उसमें ये भी शामिल है कि दोस्त ऐसे हों, पति ऐसा हो, जीवन ऐसा हो। और हमारे सारे आदर्श सामाजिक होते हैं। हमारा प्यार भी प्यार नहीं है, वो समाज का फ़रमान है, संस्कारों का आदेश है। इसके कारण जीवन जैसा सामने खड़ा होता है, वो हमें कभी-कभी दिखाई ही नहीं देता। हमारी ज़िंदगी बस एक तुलना बनकर रह जाती है।
महिला ही महिला की दुश्मन?
महिला ही महिला की दुश्मन?
19 min
महिला का सबसे ज़्यादा अपमान तो खुद महिला करती है। नाम है ‘शक्ति’ और जीवन है पूरा ‘अशक्त’। अगर लड़की इतनी ही बुरी चीज़ है, तो आप क्यों लड़की हो? आप खुद जिस लिंग की हो, आप उस लिंग के प्रति भी अपमान से भरी हुई हो। पाँच करोड़ महिलाएँ भारत की आबादी से गायब हैं। इनकी हत्या करी गयी है। इससे बड़ा नरसंहार कोई होगा। ये सबसे बड़ा मुद्दा होना चाहिए देश में, बहस में, मीडिया में। लेकिन इसकी कोई बात नहीं करना चाहता। क्योंकि ये नारीसंहार है, इसीलिए इसे नरसंहार भी नहीं माना जाता।
काम से बर्नआउट क्यों होता है?
काम से बर्नआउट क्यों होता है?
14 min
मामला ख़तरनाक हो जाता है, अगर कोई कह रहा है कि फलाना काम करते-करते मेरा मन थक गया है। इससे यह पता चलता है कि वो काम आपके लिए हार्दिक था नहीं। दिल से जो काम किया जाता है, उसमें तो आनंद होता है। दिल से मेरा आशय कामना नहीं, बोध है। समझो कि तुम कौन हो, और तुम्हारे लिए ज़िंदगी में ज़रूरी क्या है? सही काम क्या है? उस दिशा में आगे बढ़ो। काम वो चुनना, जिसमें कभी रिटायर न होना पड़े। उसके बाद बर्नआउट नहीं होगा, काम ही मनोरंजन बन जाएगा।
भारत को बदलना चाहते हो?
भारत को बदलना चाहते हो?
7 min
भारत कोई ज़मीन का टुकड़ा तो है नहीं। जैसे भारतवासी आज के हैं, आज का भारत भी वैसा ही होगा। यहाँ हवा गंदी है, क्योंकि भीतर से हम गंदे हैं। सड़कों पर गड्ढे हैं, क्योंकि हम गड्ढे हैं। बाहर जो कुछ होता है, वो आपके भीतरी जगत का प्रतिबिंब होता है, एक अर्थ में। इंसान जगेगा, तो ये नज़ारा बदलेगा। जो तुम्हारी वास्तविक हालत है, उसको आँखें खोल करके देखो। उसको देख लोगे, तो फिर उससे आगे निकलने का रास्ता मिल जाएगा।
लड़का-लड़की का संबंध इतना असहज क्यों?
लड़का-लड़की का संबंध इतना असहज क्यों?
26 min
लड़का–लड़की का मिलन तो बहुत साधारण–सी बात होनी चाहिए; कुछ उसमें इतना विशेष नहीं कि उसका हव्वा बनाया जाए। आदमी है, औरत है, तो उनमें सेक्सुअलिटी भी होगी, वो ठीक है। लेकिन तुम उसको सेंटर बना देते हो कि यही सबसे बड़ी चीज़ है। हमारी परंपरा ने बीच में पर्दे डाल–डाल कर दोनों को इतना दूर कर दिया कि दोनों ने एक–दूसरे के बारे में फ़ैंटेसीज़ बना ली हैं। इंसान को इंसान की तरह देखो। ये सब जो तुमने कहानियाँ पाल ली हैं, ये तुम्हारा नासूर हैं। ये कहानियाँ हटा दो, देखो, जीवन कितना आसान हो जाता है।
पशु प्रेम या सिर्फ दिखावा?
पशु प्रेम या सिर्फ दिखावा?
14 min
हम जो एनिमल लवर भी बनते हैं, तो आमतौर पर क्या करते हैं, मुझे आसपास जो दिख रहा है, मैं उसका ख़्याल कर लूँगा। तो ये तो तुम्हारा बहुत संयोग से रिश्ता बना न, बोध की बात तो ये है कि मैं देखूँ कि पूरी पृथ्वी पर क्या चल रहा है और उसके लिए काम करूँगा। और बिल्कुल ये हो सकता है कि जितना समय आप चार जानवरों की सेवा में लगा रहे हो, उतना समय अगर आप जानवरों के लिए सही तरीक़े से लगा दो, तो आप 4 हज़ार जानवर बचा दो। तो बताओ, फिर ये चार जानवरों की सेवा करना प्रेम हुआ या हिंसा?
बलात्कार और हमारा आक्रोश
बलात्कार और हमारा आक्रोश
10 min
किसी महिला को पढ़ाई, नौकरी, खेल से वंचित कर दिया गया, यह अत्याचार नहीं है क्या? पर इन अत्याचारों को तो हम अत्याचार मानते ही नहीं। चूँकि हमने महिला की पूरी आइडेंटिटी को उसकी सेक्सुअलिटी से ही बाँध दिया है। उसी का नतीजा यह होता है कि कहीं पर भी दंगा-फसाद हो, उसमें महिलाओं का बलात्कार अक्सर देखने को मिलता है। लेकिन महिला सिर्फ अपने जेंडर या सेक्स से तो आइडेंटिफाइड नहीं होती न! हमें उसके व्यक्तित्व के बाकी आयामों को भी सम्मान देना सीखना होगा।
क्या हिन्दू धर्म पिछड़ा हुआ है?
क्या हिन्दू धर्म पिछड़ा हुआ है?
39 min
समसामयिक हिन्दू धर्म पुराणों, स्मृति ग्रंथ और स्थानीय क़िस्म की परंपराओं पर चल रहा है। वो हिन्दू धर्म है ही नहीं। हिन्दू धर्म से अगर हमारा आशय है वेदों के दर्शन पर आधारित धर्म, तो हिन्दू धर्म न अगड़ा है, न पिछड़ा है; हिन्दू धर्म एकमात्र धर्म है। धर्म तो एक ही है, ये जो दुख में बैठा हुआ है, इसका दुख दूर करना। बाक़ी सब कुछ किसी धर्म, पंथ, मज़हब में हो रहा हो, वो सब अंधविश्वास है। हिन्दू धर्म कहता है, “वो है कौन जो दुःखी है? प्रश्न करो, और प्रश्न का जवाब परंपरा नहीं, प्रयोग देगा।”
कर्म और कर्मफल की चिंता?
कर्म और कर्मफल की चिंता?
11 min
गीता का सबसे प्रसिद्ध श्लोक है, “कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।” कर्म पर ही अधिकार है, फल पर कतई नहीं है। एक सच्चे ईमानदार आदमी की स्थिति यह होती है, “सही काम चुनूँगा, और आगे जो कुछ होगा, उससे कोई लेना-देना नहीं। अच्छा हुआ तो अच्छी बात है, और बुरा हो गया तो भी हम पर कोई फ़र्क़ नहीं पड़ेगा।” सफलता तो संयोग होती है। एकदम दो कौड़ी के आदमी को भी आप पाएँगे कि सफलता मिल सकती है। महत्त्व प्रयास का होता है, सफलता का नहीं। सही काम चुनो, अधिकतम प्रयास करो।
माँ-बाप के प्रति कर्तव्य
माँ-बाप के प्रति कर्तव्य
10 min
माता-पिता को, दोस्त-यारों को, परिवार के जो भी लोग हों, इनसे अगर प्रेम है, तो इन्हें जो ऊँची से ऊँची चीज़ है, वही देना चाहोगे न। उच्चतम क्या है? बोध है, चेतना है, ज्ञान है। वो दीजिए न घर वालों को। माँ-बाप ने आपको शारीरिक जन्म दिया। अब आप अपने माँ-बाप को आध्यात्मिक जन्म दीजिए। ये हुई बराबरी। तुम जो मेरे लिए अधिकतम कर सकते थे, तुमने किया। और अपनी चेतना के तल पर, जो मैं तुम्हारे लिए अधिकतम कर सकता हूँ, वो मैं करूँगा।
राजनीति में अध्यात्म क्यों ज़रूरी?
राजनीति में अध्यात्म क्यों ज़रूरी?
9 min
अध्यात्म की रोशनी जीवन के हर क्षेत्र पर पड़ती है, तो राजनीति पर भी पड़ेगी ही पड़ेगी। ऐसा कुछ नहीं है कि आध्यात्मिक आदमी राजनीति के प्रति अंधा हो जाता है। बल्कि हक़ीक़त तो यह है कि राजनीति को आध्यात्मिक लोगों की बहुत सख़्त ज़रूरत है, क्योंकि राजनेता ताक़त की ऐसी गद्दियों पर बैठते हैं, जहाँ से वो आपके जीवन को बहुत तरीके से प्रभावित करते हैं। राजनेता अगर आध्यात्मिक नहीं है, तो देश रसातल में जाएगा। राजनीति त्यागनी नहीं है, सही राजनीति करनी है।
दूसरों के तानों का क्या करें?
दूसरों के तानों का क्या करें?
8 min
जो जितना ज़्यादा दूसरों की नज़रों में अपनी झूठी छवि बनाकर रखना चाहता है, उस पर तानों का उतना ज़्यादा असर होता है। अगर तानों से बचना है, तो दूसरों की नज़रों में अपनी छवि की परवाह करना छोड़ो। आपको इसलिए बुरा नहीं लगता कि किसी ने आपको कुछ ग़लत बोल दिया, आपको इसलिए बुरा लगता है कि जो सच आपने छुपा रखा था, उसने वह खोल दिया। इतने बेहतर हो जाओ कि छुपाने के लिए कम-से-कम रहे। और बेहतर होने के बाद भी जो कमज़ोरियाँ बची रहें, उनको उद्घाटित रखो, प्रकट रखो।
पैसे और भविष्य की चिंता
पैसे और भविष्य की चिंता
10 min
शरीर है, तो उसे रोटी–कपड़ा देना पड़ेगा, वह बंदोबस्त करके अलग रख दो। रुपए–पैसे की बात थोड़ा अलग रखकर देखो कि जीवन जीने का एक सार्थक तरीका क्या है। सही उद्देश्य क्या है, उसको पकड़ो। उसको पकड़ने के बाद फिर विचार करो कि काम तो सही पकड़ लिया, अब इसमें पैसा कैसे बनाया जाए। अध्यात्म और पैसा एक-दूसरे के ख़िलाफ़ नहीं हैं। अध्यात्म बस यह सिखाता है कि पैसा कहीं तुम्हारा मालिक न बन बैठे। पैसा ज़िंदगी के लिए होना चाहिए, ज़िंदगी पैसे के लिए नहीं; ज़िंदगी सच्चाई के लिए होनी चाहिए।
गाँधी: महात्मा, राष्ट्रपिता या शातिर राजनेता
गाँधी: महात्मा, राष्ट्रपिता या शातिर राजनेता
28 min
गाँधी को महात्मा, गाँधी ने स्वयं नहीं बनाया इस देश ने बनाया। लोगों को अच्छा लगता था, एकदम दो हड्डी का आदमी चला आ रहा है, एक गाँव से दूसरे गाँव भाग रहा है, उपदेश-यात्रा करे जा रहा है। दोष देना है तो देशवासियों को दो। एक यदि व्यक्ति थे जिनसे जिन्ना घबराते थे, उसका नाम था गाँधी। अंग्रेज़ों को ज़बरदस्त चोट दी थी गाँधी ने। कौन कह रहा है कि गाँधी को तुम भगवान का दर्जा दे दो, लेकिन इंसान को इंसान की तरह तो देखो। वैसा कोई आदमी आज भी खड़ा हो जाए न, अच्छा लगेगा। आसान नहीं होता गाँधी बनना।
जीडीपी बढ़ी, क्या जीवन सुधरा?
जीडीपी बढ़ी, क्या जीवन सुधरा?
25 min
टोटल जीडीपी हमारा इसलिए हाई नहीं है कि भारत अमीर हो गया है। वह इसलिए हाई है क्योंकि यहाँ जनसंख्या बहुत है और मुट्ठी भर लोग हैं, जिनके पास अंधाधुंध दौलत है। पॉल्यूशन और पॉपुलेशन, इनका चोली-दामन का साथ है। तुम्हें बहुत कम जगह मिलेंगी जहाँ पॉपुलेशन नहीं है, पर पॉल्यूशन है। इतने लोग हो जाएँगे, कैसे उनको गरिमा की ज़िंदगी मिल सकती है? न हमें वह ग़रीबी चाहिए, जिसमें एक ऐसे 8×8 के क्षेत्र में चार लोग रह रहे हों। न वह अमीरी चाहिए कि एक आदमी कार में चल रहा है और दुनिया भर पर धुआँ छोड़ता हुआ चल रहा है। सस्टेनेबिलिटी चाहिए।
स्त्रियों के लिए कमाना ज़रूरी क्यों?
स्त्रियों के लिए कमाना ज़रूरी क्यों?
6 min
आदमी बेरोज़गार हो जाए तो दुनिया लानतें भेजती है। औरत बेरोज़गार घर में पड़ी है, उसे तो कोई कुछ कहता भी नहीं। घर में घुसे-घुसे वो दुनिया से ऐसी कट जाती है कि उसे कोई ख़बर नहीं रहती। उसका व्यक्तित्व कुंठित हो जाता है। ये ख़तरनाक बात है। स्त्रियों के लिए विशेषतया ज़रूरी है कि वो ज़िंदगी के किसी भी मुक़ाम पर आर्थिक रूप से परनिर्भर न हो जाए। हर चीज़ से समझौता कर लेना, कमाने से मत करना। कम कमाओ, लेकिन इतना तो ज़रूर कमाओ कि रोटी अपनी खाओ। बात तुलना की नहीं है, बात आत्मनिर्भरता की है।
मौत याद रखो, मौज साथ रखो
मौत याद रखो, मौज साथ रखो
16 min
दुनिया में मुझे बताना, कौन-सी चीज़ है जो कभी नष्ट नहीं हुई? सभ्यताएँ मिट गईं, संस्कृतियाँ बह गईं, धर्म ख़ाक हो गए; आदमी का बनाया कुछ भी नहीं बचता। जो चीज़ हमें पता है कि मरण-धर्मा है, वह मिट ही जाएगी; उससे पहले उसका उपयोग चेतना को बढ़ाने के लिए कर डालो। हर पल में ऐसे सतर्क रहो, जैसे यही बस एक पल हो। जिसने मृत्यु और मृत्यु की अनिवार्यता को स्वीकार कर लिया, जो मौत के होश में जीने लगा, उससे ज़्यादा मस्त कोई नहीं जीता। मौत को लगातार याद रखो, तब मौज आएगी!
भारत का संविधान क्यों ऊँचा है?
भारत का संविधान क्यों ऊँचा है?
17 min
लोगों को लगता है, संविधान तो हमारा दुनिया के बाकी कॉन्स्टिट्यूशन से इंस्पायर्ड है; नहीं, तुम्हारा संविधान तुम्हारी मिट्टी से उठा है। जिस देश के केंद्र में आत्मा हो, वहाँ लिबर्टी, इक्वलिटी, फ्रेटरनिटी अपने आप आ जाती हैं। फ्रीडम, जो कि उच्चतम आध्यात्मिक बात होती है, देखिए आपका संविधान उसको कितना महत्व देता है। भारत इस अर्थ में थोड़ा-सा विशेष राष्ट्र है। भारत का संविधान उदार है, ऊँचा है। क्योंकि हम आध्यात्मिक लोग थे, इसलिए हम इतना उदार संविधान अपना पाए।
असमानता का वास्तविक कारण
असमानता का वास्तविक कारण
17 min
एक कागज़ पर समानता शब्द लिख भर देने से समानता नहीं आ जाएगी। जो समानता के आदर्श को पसंद करते हों, उनकी बड़ी ज़िम्मेदारी है कि वो समझें, सर्वप्रथम, कि असमानता, भेद कहाँ से आते हैं। वो आते हैं, अहम् से। अहम् विभाजन पर पलता है। उसको जीने के लिए सीमाएँ चाहिए, वर्ग चाहिए, कुछ ऊँचा, कुछ नीचा चाहिए। सिर्फ़ आत्मा वो बिंदु है, जहाँ सब एक और एक समान हैं। इसीलिए, अगर भारत को या दुनिया के किसी भी राष्ट्र को समानता चाहिए, तो उसे आत्मिक होना पड़ेगा।
शिक्षा व्यवस्था की सबसे बड़ी चूक
शिक्षा व्यवस्था की सबसे बड़ी चूक
8 min
दुनिया के बारे में तो तुम्हें वर्तमान शिक्षा व्यवस्था ही खूब पढ़ा देती है। तुम कौन हो, कैसे हो, मन क्या चीज़ है, इसके बारे में कुछ नहीं बताती। तो इसीलिए अपूर्ण है ये व्यवस्था। देखो कि बच्चे को उसका सारा मानसिक भोजन कहाँ से मिल रहा है। तुम्हें बच्चे को कुछ नया सिखाने की ज़रूरत तो है, लेकिन उससे कहीं ज़्यादा बड़ी ज़रूरत है उन सब रास्तों को रोकने की, जिनसे ज़हर बच्चे में प्रवेश करता है। जो-जो कर सकते हो, सब कुछ करिए। यही वास्तविक अध्यात्म है, यही वास्तव में पुण्य का काम है।
वेदांत से उपजा सुभाष चंद्र बोस का संघर्ष
वेदांत से उपजा सुभाष चंद्र बोस का संघर्ष
54 min
सुभाषचन्द्र बोस के जीवन में वेदान्त कितना केंद्रीय था, ये बात आमतौर पर सामने नहीं आती है। उनका मन सदा संघर्ष की ओर था। उपनिषद उनके जीवन में आए, और एकदम एक नई शुरुआत हो गई। वो भयानक विद्रोही हो गए थे, और संघर्ष से नीचे वो कोई चीज मानते नहीं थे। तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा, ऐसे ही कोई ड्रेस पहन के खड़ा हो जाता है, नेताजी कहला जाता है, ऐसा नहीं होता। जान पर खेलना पड़ता है; किसी और से खून मांगने से पहले अपना खून बहाना पड़ता है। इसको साधना बोलते हैं। वेदान्त ये साधना सिखाता है।
अध्यात्म: अपने ही विरुद्ध संघर्ष
अध्यात्म: अपने ही विरुद्ध संघर्ष
11 min
हम आमतौर पर बस ऐसे ही छवि बना लेते हैं कि संघर्ष या दबाव सिर्फ़ व्यवसाय में या सांसारिक मसलों में ही है। ऐसा बिल्कुल नहीं है। दबाव और संघर्ष अध्यात्म में भी उतने ही करने पड़ते हैं, जितने कि संसार में, बस उसकी श्रेणी, उसकी गुणवत्ता अलग है। बाहर तुम दबाव झेलते हो कुछ और अतिरिक्त हासिल कर लेने के लिए, और अध्यात्म में, जिसको तुमने नाहक पा लिया है, वह दबाव बनाता है कि मुझे मत छोड़ो। भीतर वाली लड़ाई जीत लो, बाहर की सब लड़ाइयाँ तुम पाओगे कि तुम्हारे लिए बहुत आसान हो गई हैं।
मोटिवेशन क्यों काम नहीं करता?
मोटिवेशन क्यों काम नहीं करता?
11 min
तुम ट्रेन पकड़ने जा रहे हो और तुम दौड़ रहे हो। बीच-बीच में रुक जाते हो और मोटिवेशनल वीडियो देखते हो? ऐसा होता है क्या? वहाँ तुम्हें मोटिवेशन नहीं चाहिए होता, वहाँ तुम्हें घड़ी चाहिए होती है। तथ्य काफ़ी है। मोटिवेशन उनको चाहिए, जो कोई काम बिल्कुल अंधे होकर कर रहे हैं। भीतर से कोई ललक है ही नहीं, लेकिन डर के मारे वो काम करना भी पड़ रहा है। मोटिवेट होकर भी क्या होगा? तुमने काम ही ग़लत उठा लिया है, क्योंकि काम अगर सही होता है, तो काम ही जान बन जाता है। फिर मोटिवेशन नहीं चाहिए होता।
अपनी क़ाबलियत किसे बेच रहे हो?
अपनी क़ाबलियत किसे बेच रहे हो?
12 min
तुम जिस भी क्षेत्र में उत्कृष्टता हासिल करने जाते हो और कर लेते हो, उस उत्कृष्टता की दुनिया तुरंत बोली लगानी शुरू कर देती है। इसीलिए तो दुनिया के जितने भी कॉम्पिटेंट लोग हैं, वह शैतान की सेवा में लगे हुए हैं। वह बोली ऊँची लगाता है और ढंग के कामों के लिए कॉम्पिटेंट लोग मिलने बहुत मुश्किल है। सारा खेल ही इसी बात का है कि कर क्या रहे हो? कितनी कुशलता से कर रहे हो, ये पीछे की बात है। आदमी ऐसा चाहिए, अर्जुन जैसा, कॉम्पिटेंट भी हो और कृष्ण के साथ भी है। तब फिर गीता बरसती है। तब आता है मज़ा।
दूसरों के सम्मान से पहले अपना सम्मान
दूसरों के सम्मान से पहले अपना सम्मान
4 min
तुम कहीं गए, तुमने किसी की चरण स्पर्श कर लिए। यह कोई सम्मान है? यह आदर है। सम्मान दूसरी बात है। सम्मान का अर्थ होता है, ध्यान से समझना। जो अपने मन की समझ नहीं रख सकता, वह किसी और को कैसे समझ जाएगा? पर दावा हमारा यह है कि हम दूसरे का सम्मान करते हैं। दूसरे का सम्मान तो तब हो जब आत्म-सम्मान हो। आत्म-सम्मान मतलब खुद को समझना। पहले अपना सम्मान कर लो। अपना सम्मान मतलब, आत्म-ज्ञान! आत्म-ज्ञान ही आत्म-सम्मान है।
वासना नहीं सूनापन समस्या है
वासना नहीं सूनापन समस्या है
7 min
जिनके पास कुछ करने को नहीं है, वो कुछ तो करने की कल्पना करेंगे न। अब आदमी को पता नहीं होता कि सूनापन चीज़ क्या है; वो पैदा कहाँ से हो रहा है। तो उसको भरने के लिए फिर तरह-तरह की कोशिशें करता है, अपनी स्थिति अनुसार। आप स्त्री हो, तो डिमांड पुरुष की करोगे; आप पुरुष हो, तो स्त्री की करोगे। आप ग़रीब हो, तो पैसे की करोगे। ऐसा लगेगा कि अलग-अलग चीज़ों की डिमांड हो रही है। पर वो जो आपकी डिमांड है, माने डिज़ायर है, वो वास्तव में आ रही है एक ही जगह से, वह है हमारा अस्तित्वगत अज्ञान, उसी को अहंकार बोलते हैं।
आपका शोषक ही, आपका रोल मॉडल है
आपका शोषक ही, आपका रोल मॉडल है
30 min
आप आज के कैपिटलिस्ट को रोल मॉडल क्यों बोलते हो? अगर यह रोल मॉडल है, तो अंग्रेज़ भी रोल मॉडल हैं। द ब्रिटिश एंपायर वाज़ द बिगेस्ट कैपिटलिस्ट ऑफ़ इट्स टाइम। कैपिटल अपने आप में बुरी नहीं है। पर तुम्हारे भीतर एक बेहूदा अंधकार है, जिसमें तुम पैसा ठुँसे जा रहे हो। तुम दुनिया की आधी प्रजातियाँ ख़त्म करके खा चुके हो। तुम अब पूरी पृथ्वी को खा जाओगे, फिर भी तुम्हारा पेट नहीं भरेगा। आप एक्सप्लॉइटेड हो क्योंकि आप ख़ुद वैसा ही बनना चाहते हो जैसा आपका एक्सप्लॉइटर है। आपका एक्सप्लॉइटर ही आपका रोल मॉडल है।
ईरान विरोध प्रदर्शन: सिस्टम वही, समाधान अलग कैसे?
ईरान विरोध प्रदर्शन: सिस्टम वही, समाधान अलग कैसे?
9 min
दुनिया में जहाँ भी दक्षिणपंथ है, राइट-विंग मूवमेंट्स जहाँ-जहाँ चल रहे हैं, वहाँ-वहाँ लोकतंत्र कमज़ोर पड़ रहा है। ईरान में भी अब यही चल रहा है। यह एक तरह से माया का चक्र है। यह सोचा जा रहा है कि लिबरल-सेकुलर होने से हटकर के हम जब कंज़र्वेटिव, ऑर्थोडॉक्स इस्लामिक हुए, तब समाधान मिल जाएगा; और उससे वापस घूम करके फिर से लिबरल-सेकुलर हो जाएँगे, तब समाधान मिल जाएगा। मनुष्य यह मानने को ही तैयार नहीं है कि व्यवस्था आती रहेगी, जाती रहेगी। उसकी समस्या का मूल कारण उसके भीतर है।
ईश्वर के अस्तित्व पर बहस, क्यों?
ईश्वर के अस्तित्व पर बहस, क्यों?
22 min
मैं हूँ और यह दुनिया है, तो सबको यह सवाल उठेगा कि, “डज़ गॉड एग्ज़िस्ट?” अब इसमें तुमने सवाल लगाया है ‘गॉड’ पर। यह छोड़ो कि गॉड माने क्या, पहले बताओ ‘एग्ज़िस्टेन्स’ माने क्या? इसलिए फ़िलॉसफ़ी ज़रूरी है। उसके बिना ये सारी जो बहसें हैं, ये बस ऐसे ही हैं, बेकार की बात, दोनों तरफ़ से। आस्तिकता बिल्कुल अलग बात है, ईश्वरवादिता बिल्कुल अलग बात है। आस्तिक होने का अर्थ है, सत्य को समर्पण। मेरी निष्ठा सत्य के प्रति है। तुम अगर गॉड, गॉड करोगे भी, तो मैं कहूँगा, सत्य ही गॉड है।
खेती में छुपी हिंसा
खेती में छुपी हिंसा
9 min
खेत खाली जगह नहीं है; खेत एक ह्यूमन कॉलोनी है। खेत का मतलब होता है कि तुमने वहाँ की पूरी प्रकृति नष्ट कर दी है। 80% जो खेती होती है, वो सिर्फ़ इंसान को अन्न खिलाने के लिए नहीं, वो इंसान को मीट खिलाने के लिए होती है। तो जंगल काट के तुमने खेत बनाया, और वो खेती इसलिए कर रहे हो कि अब जानवर काटोगे। अगर हम में थोड़ी चेतना जगेगी, तो जैसे हम मनुष्यों को मारने को अपराध समझते हैं, वैसे ही हम जीवों को मारने को भी अपराध घोषित करेंगे, और पेड़ काटने को भी अपराध घोषित करेंगे।
दार्शनिक बनना है?
दार्शनिक बनना है?
9 min
दार्शनिक बना नहीं जाता। ये कोई कैरियर थोड़ी होता है। ये तो ज़िंदगी बना देती है। पहले ज़िंदगी ऐसे जियो कि उसकी परतें उघड़ें कुछ, उसका नंगापन सामने आए। और उसके लिए ज़िंदगी के बहुत क़रीब आना पड़ता है। ज़िंदगी के क़रीब जाना माने झूठ अब टूटेगा। और झूठ साँस है, झूठ रीढ़ है, झूठ प्राण बन गया है हमारा। सब टूटेगा। ज़िंदगी को देखो। ज़िंदगी से लात खाओ फिर तुमसे जो कुछ भी अभिव्यक्त होगा, वह दर्शन होगा।
एक जवानी ऐसी भी — स्वामी विवेकानंद
एक जवानी ऐसी भी — स्वामी विवेकानंद
10 min
भारत में यह मान्यता रही है कि अध्यात्म बुढ़ापे का काम है। लेकिन जहाँ भी स्वामी विवेकानंद की मूर्ति खड़ी होगी, उस जवान आदमी का तेज गवाही देता होगा कि अध्यात्म बुढ़ापे का नहीं, जवानी का काम है। जवानी अगर, जो सबसे ऊँचा काम हो सकता है, उसको नहीं दी, तो और क्या काम आएगी? उन्होंने युवाओं से कहा, ज़रा चुनौती स्वीकार करना सीखो, प्रतिस्पर्धा करना सीखो। बल ही जीवन है और दुर्बलता ही मृत्यु है। उचित ही है कि युवा दिवस मनाया जाता है उन्हीं के नाम पर।
गुरु को भी बाज़ार बना लिया
गुरु को भी बाज़ार बना लिया
6 min
अगर मैं कोई माल बेच रहा हूँ, तो वही तो बेचूँगा जो आप ख़रीदना चाहते हो। गुरु जी वही करते हैं। आपको वही सुना देते हैं जो आप सुनना चाहते हो, बस थोड़े सोफ़िस्टिकेटेड तरीके से। तो ज़्यादातर जिसको आप स्पिरिचुअलिटी बोलते हो, वो सेंटिमेंटल कंसोलेशन होती है बस। थोड़ी देर के लिए आपको सुकून मिल जाएगा, पर आपकी ज़िंदगी में वास्तव में कुछ नहीं बदलेगा। अपनी कामना पूरी करने के लिए आप जहाँ भी जाओगे, वह बाज़ार ही होगा। गुरु को भी बाज़ार बना लिया, तो अब क्या बचा।
हिंदी की ये हालत किसने की?
हिंदी की ये हालत किसने की?
17 min
भाषा तो उतनी ही सशक्त हो पाएगी, जितने शक्तिशाली उसको बोलने वाले लोग हैं। हिंदी नहीं पीछे हट गई है; हिंदी बोलने वाले सब कायर हैं। इनको अपनी हस्ती पर ही शंका होनी शुरू हो जाती है, जब सामने कोई अंग्रेज़ी बोल देता है। विचार और चेतना के तल पर ऊँचे स्तर की सामग्री सब आपको अंग्रेज़ी में मिलेगी, और हिंदी हमने छोड़ दी है गाली-गलौज करने वालों और रोस्टर्स के हाथों में। ये बीमारी अब छोटे-छोटे कस्बों में, गाँवों में भी पहुँच रही है। अंग्रेज़ी सीखना एक बात है, अंग्रेज बन जाना बिल्कुल दूसरी बात है ना।
बार-बार धोखा मिलता है?
बार-बार धोखा मिलता है?
13 min
एक जगह धोखा खाया। अच्छा, वहाँ गए क्यों थे? धोखा खाने तो नहीं गए थे। वहाँ पर कुछ आशा थी, कुछ कामना थी, कुछ अच्छा-अच्छा सा लगा होगा। क्या फ़र्क़ पड़ता है कि सामने जलेबी आई या कचौड़ी आई; लार तो वही की वही थी न। ये सब लोकधर्म है कि आपका किसी ने बुरा करा है, तो उसका कार्मिक बैलेंस ख़राब हो जाएगा। बाहर जो कुछ हो रहा है, सब रैंडम है। आपके पास एक ही चीज़ है: चॉइस, जिसको आप कह सकते हो कि आपकी है। उसके अलावा मत सोचिए कि आसमानों पर कहानियाँ लिखी गई हैं; मिट्टी हैं हम, धूल हैं हम।
आज़ादी या भीतर की गुलामी?
आज़ादी या भीतर की गुलामी?
11 min
बहुत लोग होते हैं, जिनको दूसरों को तकलीफ़ देने में खुशी मिलती है। बहुत लोग हैं, जिन्हें जानवरों का गला काट करके खाने में खुशी मिलती है। वो कहेंगे, “मैं तो वही करूँगा, जिसमें खुशी मिलती है।” पहले तो यह सीखना पड़ेगा न कि यह जो मेरा खुशी का सिद्धांत है, यह आया कहाँ से? आज की समस्या है, ब्लाइंड फ़्रीडम; जहाँ आदमी बाहर वाली तो किसी ताक़त का ग़ुलाम नहीं है, पर भीतरी ताक़त का ग़ुलाम हो गया है। और वो भीतरी ताक़त क्या है? अहंकार।
माँ बनना ही सबसे बड़ा धर्म है?
माँ बनना ही सबसे बड़ा धर्म है?
12 min
वो सब बातें, कि “माँ से ऊँची जगह तो भगवान की भी नहीं होती,” वग़ैरह-वग़ैरह। सुना है न खूब? न पढ़ी-लिखी हो, न उसमें कोई गुण हो, न संसार को जानती हो, न अध्यात्म को जानती हो; ऐसा इंसान अगर गर्भधारण कर ले, तो क्या वो भगवान के बराबर हो जाएगा? अगर पुरुष का पहला धर्म बाप बनना नहीं है, तो स्त्री के लिए मातृत्व पहली चीज़ कैसे हो गई? आप एक मनुष्य हैं, महिला बाद में हैं। आपका भी अपने प्रति वही कर्तव्य है, जो एक पुरुष का होता है: चेतना को उसकी ऊँचाइयों तक पहुँचाना।
ज़िंदगी ज़ख़्म देती है
ज़िंदगी ज़ख़्म देती है
11 min
"वो मुझे याद आती है। उसकी छुप-छुप के तस्वीरें देखता हूँ।" ये गुलाबी समस्याओं का कोई समाधान नहीं होता है। ज़िंदगी इसलिए नहीं होती है कि आपको बहुत सुख देगी; ज़िंदगी तो ज़ख़्म ही देती है। अच्छे काम में ज़िंदगी में डूबने का यही फ़ायदा होता है। यादें भी आती रहेंगी, जीना दुश्वार होता रहेगा, डट के काम करो, खूब थक जाओ, सो जाओ। और काम के बाद भी ऊर्जा मिली है, तो रैकेट उठा के जाकर के फोड़-फाड़ दो। कोर्ट को भी, नेट को भी, एकदम टूट जाओ, जाकर सो जाओ।
बंधन नहीं छूट रहे?
बंधन नहीं छूट रहे?
10 min
मैंने कहा है कि जिसको छोड़ने में तुम्हें देर लग रही हो, उसको पूरी तरह छूटने का इंतज़ार मत करो। उसको लिए-लिए भागो। यह थोड़ी कहा है कि उसको बाँध कर भागो। आप मान लीजिए, शरीर पर बहुत सारा फैट ढोए हुए हैं, उसको लिए-लिए ही तो भागोगे। लेकिन भागने की प्रक्रिया में क्या होगा? वो गलेगा। मैं तब तक इंतज़ार करूँगी जब तक सब ठीक… नहीं, नहीं, नहीं। जो भी तुम्हारी बुरी हालत है, जैसी भी है, अभी दुर्बल हालत है, शुरू अभी करो। कम ऐज़ यू आर एंड रन ऐज़ यू आर।
बच्चों को सेटल करना है?
बच्चों को सेटल करना है?
7 min
पूरी दुनिया की ओर देखिए सब सेटल्ड-ही-सेटल्ड लोग दिखाई दे रहे हैं। दिल-ही-दिल में हर सेटल आदमी जानता है कि वो ग़लत जगह सेटल हो गया है। जहाँ रुकना नहीं चाहिए वहाँ रुक गया है। अगर अभिभावकों को यह नहीं पता कि उन्होंने जीवन में क्या-क्या ग़लत करा है, तो उन्होंने जो कुछ करा है वही वो अपने बच्चों तक भी पहुँचा देंगे। बच्चे हमारे शब्दों से बहुत कम सीखेंगे, वो हमारे जीवन से सीख लेते हैं। आपका जीवन अगर आज़ादी भरा है, हिम्मत भरा है, तो बच्चों को सीख मिल गई आपसे।
अध्यात्म में पैसा कमाना वर्जित?
अध्यात्म में पैसा कमाना वर्जित?
16 min
आप लोगों ने छवि बना ली है अध्यात्म की कि अध्यात्म का मतलब होता है, एक बंद कमरा, एक सुनसान जगह, और एक ऐसा आदमी, जिसे दुनियादारी की कोई तमीज़ नहीं है। कमाना भी एक युद्ध होता है। कमाने में एक पुरुषार्थ होता है, कर्मठता होती है। मैं दुनिया की दौड़ में फँस जाने को नहीं कह रहा हूँ। लेकिन मैं कह रहा हूँ कि अगर तुम्हारा बंधन ही आर्थिक है, तो उसकी काट भी तो आर्थिक ही रखनी पड़ेगी न। और आर्थिक काट दो तरह से रखी जाती है, एक तो जो फ़ालतू के ख़र्चे हों, वो बंद कर दो; और दूसरी यह कि आमदनी बढ़ा लो।
भारत का दुर्भाग्य
भारत का दुर्भाग्य
7 min
कोई आपसे बोले कि कोई आदमी आपसे मिलने आ रहा है और वो धार्मिक है, तो तत्काल बताइए, आप क्या कल्पना करते हैं? कोई ज्ञानी आ रहा है? कोई विद्वान मिलने आ रहा है? तत्काल मन में क्या छवि आती है? एक भावुक-सा आदमी आएगा। यही हमारे साथ सबसे बड़ी गलत बात हुई, हम भावना का देश बन गए, और उसी भावना को फिर हमने धर्म भी बना लिया। और भावना से जो धर्म चलता है, वो फिर अंधभक्ति का धर्म होता है। यही दुर्भाग्य हो गया भारत का, ज्ञान का कोई सम्मान नहीं। जबकि धर्म का अर्थ ही ज्ञान होता है।
नए साल में उत्सव क्यों?
नए साल में उत्सव क्यों?
8 min
आज जाओ किसी रेस्तरां में खाना खाने के लिए, तो बिना बुकिंग के घुसने को नहीं पाओगे। दुनिया है, दुनिया उत्सव मना रही है। ये जो हमारे भीतर मनोरंजन और उत्सव मनाने की ख़्वाहिश रहती है, वो रहती इसीलिए है कि हम सब भीतर से बड़े सूने और उदास हैं। मनोरंजन से उदासी ख़त्म नहीं होती, सिर्फ़ कुछ समय के लिए छुपती है। पता होना चाहिए कि आपका ‘कर्तव्य’ क्या है, और जब कर्तव्य आपकी अपनी समझ से निकलता है, तो उसका नाम ‘धर्म’ हो जाता है।
पुराने से ऊब जाना ही नयापन है
पुराने से ऊब जाना ही नयापन है
17 min
आपका न्यू ईयर झूठा है। इसकी सबसे बड़ी पहचान यह है कि बाकी सब कुछ तो ओल्ड है, ईयर न्यू कैसे हो गया? कैलेंडर के पन्ने फाड़ने से न्यू ईयर कहाँ से आ गया? जब न्यू आएगा, तो सब कुछ न्यू के ही रंग में नहाएगा। ईयर भी न्यू हो जाएगा, स्माइल भी न्यू हो जाएगी, आई भी न्यू हो जाएगी; जब आप ही न्यू नहीं हुए, तो ईयर कैसे न्यू हो गया? हम नहीं बदल रहे, तो हमारी ज़िंदगी में कुछ नया बदलाव कैसे आ जाएगा? अपने पुरानेपन को त्यागना होता है, यही नए का उत्सव है।
क्या हमारे रिश्ते वाक़ई पवित्र हैं?
क्या हमारे रिश्ते वाक़ई पवित्र हैं?
7 min
पत्नी, बहू घर आई है तो खाना बनाएगी, बर्तन धोएगी, कपड़े साफ़ करेगी, बच्चे पैदा करेगी। इसमें पवित्रता क्या है? क्या बताते हो कि शादी का पवित्र बंधन, अगर यही सब है, तो पवित्र क्या है इसमें फिर? पवित्रता चीज़ क्या होती है; ये जानना है तो ऋषियों के पास जाओ, उपनिषदों के पास जाओ। वो बताएँगे कि पवित्र माने क्या। “न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते।” ज्ञान ही है जो पवित्र करता है। ज्ञान है पवित्र। ये थोड़ी है कि बर्तन माँजना पवित्र हो गया।
मौत से कैसा डर?
मौत से कैसा डर?
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अगर बीमारी वह चीज़ होती है, जिसके बाद मौत आती है, तो ज़िंदगी ही बीमारी है। तो एक तरह से सभी बीमार हैं। और उस बीमारी का नाम ही क्या है? लाइफ़। सबको ही जाना है। प्रश्न मृत्यु का नहीं है, प्रश्न जीवन का है। बात यह है कि जब तक हम जी रहे हैं, तब तक कैसे जी रहे हैं? मरने से आधे घंटे पहले भी जीवन की बात करो। जब मर जाएँगे, उसके बाद हम मौत की बात करेंगे। अध्यात्म सही जीवन जीने की कला है; इतना सही जीना, इतना सही जीना, कि मौत भूल ही जाए। और कोई मौत याद दिलाए, तो मौत चुटकुले जैसी लगे।
किसी को समझाने की ज़िद?
किसी को समझाने की ज़िद?
9 min
आप कोई नहीं हैं, हर इंसान अपनी ही सहमति से सुधरेगा या गिरेगा। अब मेरा भी बीस वर्षों का अनुभव हुआ जा रहा है लोगों को समझाने का। बहुत-बहुत जान लगाई है लोगों पर, और धीरे-धीरे करके ये समझ में आया है कि एक अपराध होता है किसी ऐसे को समझाना, जो समझने के लिए बिल्कुल तैयार नहीं है। भूल नहीं होती, अपराध होता है। और उनसे ये फिर सुनने को मिलता है, 'हमें हमारे हिसाब से जीने क्यों नहीं दे रहे हो?' एक सीमा के बाद, वो गलती मत करिए जो मैंने करी है बहुत; एक सीमा के बाद प्रयास मत करिए।
गुरु गोविन्द सिंह: साधना से संघर्ष तक
गुरु गोविन्द सिंह: साधना से संघर्ष तक
33 min
गुरु गोविन्द सिंह जी ने सिखों को एक ज़बरदस्त सक्रिय और लड़ाका बल में तब्दील कर दिया। वो पूछा करते थे, कहते थे, ‘अगर तुमको सचमुच अमृत समझ में आया है, तो तुम मेरे साथ क्यों नहीं हो? और अगर मेरे साथ हो, तो बड़ी-से-बड़ी क़ुर्बानी तुमको देनी पड़ेगी।’ पंच प्यारों से उन्होंने ये नहीं कहा था, ‘बताओ कितने श्लोक याद हैं; नहीं, श्लोक नहीं।’ बोले, ‘क़ुर्बानी दे सकते हो? दे सकते हो तो मेरे साथ हो, नहीं तो कुछ नहीं।’ तो आज सूरमा चाहिए, जो अपनी क़ुर्बानी दे सके।
अरावली पर ख़तरा
अरावली पर ख़तरा
36 min
यह मामला जो है, अरावली के नाश का नहीं है। यह मामला ग़रीबों के नाश का है। क्या होने वाला है? ड्रिलिंग-ब्लास्टिंग होगी, तो वहाँ पर उड़ेगी ज़बरदस्त क़िस्म की धूल। बिल्डर आएगा और वो वहाँ पर बनाएगा, अरावली ग्रीन्स। महँगी-महँगी रेज़िडेन्शियल प्रॉपर्टीज़ निकलेंगी। और अमीरों को कहा जाएगा, 'आओ, आओ, यहाँ पर इको-टूरिज़्म करो।' नुकसान किनका होने जा रहा है? आम आदमी का। पेड़-पौधों का, जानवरों का। एकदम जो ग़रीब लोग हैं, उनका। उनका, जो अभी पैदा भी नहीं हुए। यह चोरी सिर्फ़ ग़रीबों की जेब से नहीं की जा रही, यह चोरी अजन्मी पीढ़ियों की जेब से भी की जा रही है।
जीसस की अनोखी कहानी
जीसस की अनोखी कहानी
6 min
जीसस धर्म को आमूल-चूल हिला देते हैं। प्रेम के नए अर्थ, सत्य के नए अर्थ, प्रार्थना के नए अर्थ सामने आने लगते हैं। सत्ताधीशों के लिए मुसीबत हो जाती है, साज़िश करी जाती है। ऐसा नहीं था कि वो मरना चाहते थे। पर अब मौत सामने आ ही गई है, तो भागना भी कैसा? जीते रहते तो बढ़िया ही रहता, मौज आ रही थी जीने में। पर मर भी गए तो कोई बुराई नहीं, क्योंकि जितना जिए, पूरा जिए। और हँसते-हँसते जीसस एक दिन सूली चढ़ जाते हैं।
गंदे माहौल के कारण पढ़ नहीं पाते?
गंदे माहौल के कारण पढ़ नहीं पाते?
9 min
तुम जो पढ़ाई करना चाहती हो, अगर वो तुम्हारी नज़रों में सबसे कीमती चीज़ है, तो फिर उसके लिए कुछ भी छोड़ा जा सकता है। कोई तुम्हारा कर्तव्य नहीं है कि तुम वहाँ मौजूद रहो जहाँ तुम्हारे मन को मलिन किया जा रहा हो। लेकिन अगर पूरे तरीके से उस माहौल से दूर न हो पाओ, तो जितना ज़्यादा बाहर शोरगुल बढ़े, उतना ज़्यादा तुम अपने भीतर याद करने लग जाओ कि तुम्हें क्या करना है। जो चीज़ वाक़ई महत्त्वपूर्ण है, उसमें ज़ोर लगाओ तो ज़िंदगी बन जाती है।
वास्तविक ग्लानि हमें कहाँ होती है?
वास्तविक ग्लानि हमें कहाँ होती है?
6 min
आदमी कहता है, “मैं ठीक हूँ। बस हालात कुछ ऐसे बने कि मैं फिसल गया।” ग्लानि सिद्ध करती है कि तुम आदमी बढ़िया हो; बस संयोग से असफल रह गए। तुम्हारी ग्लानि ये थोड़ी है कि तुम आदमी ही गड़बड़ हो। तुम्हारा केंद्र ही गड़बड़ है। तुम्हारी ग्लानि तो धोखे से मिस्टेक वाली होती है। वास्तविक ग्लानि तो अग्नि होती है। तुम बचोगे ही नहीं जैसे हो, अगर ग्लानि हो जाए तो।
अज्ञात भविष्य का डर?
अज्ञात भविष्य का डर?
5 min
अगर एक कमरा खाली है, उसमें मुझे घुसने से डर लग रहा है, तो इसका मतलब ये है कि कमरा अज्ञात नहीं छोड़ा मैंने। मैंने उसके ऊपर अपनी ज्ञात कल्पनाएँ डाल दीं, और अब मैं कह रहा हूँ कि इस कमरे के भीतर शेर है, या चोर है, या भूत है, या कुछ है। अगर आप भविष्य को अज्ञात का अज्ञात ही रहने दें, तो डर कहाँ से आएगा? ये होता है आत्म-अवलोकन, कि पीछे जाकर देखना कि ये जो एंड प्रॉडक्ट निकला है, फियर नाम का, ये किन-किन चीज़ों के कॉम्बिनेशन से आ रहा है। और आप जैसे ही ये देख लेते हो, आज़ाद हो जाते हो।
आस्ट्रेलिया आतंकी हमलाः जब मान्यताएँ टकराती हैं
आस्ट्रेलिया आतंकी हमलाः जब मान्यताएँ टकराती हैं
26 min
इतिहास में जो बड़े-से-बड़े नरसंहार हुए हैं, उनमें से न जाने कितने बस इसी बात पर हुए हैं कि तू अपना धर्म परिवर्तन कर, और मान कि मेरा धर्म सच्चा है। नहीं तो मैं तेरे गाँव में आग लगा दूँगा, तुझे मार दूँगा, महिलाओं का बलात्कार कर दूँगा, सारी संपत्ति लूट लूँगा। ये सब करूँगा। ये सब क्यों? क्योंकि तू मेरी बात नहीं मानता, तू काफ़िर है। क्या है ये? मान्यता का मतलब ही है हिंसा। जहाँ मान्यता होगी, वहाँ हिंसा होगी ही होगी। मान्यता है तो हिंसा है।
चुनौती लिए बिना आदमी आगे नहीं बढ़ता
चुनौती लिए बिना आदमी आगे नहीं बढ़ता
21 min
आपका कहना है कि “सब ठीक है, कुछ भी बदलने की ज़रूरत क्या है?” और मैं कह रहा हूँ, कुछ भी ठीक नहीं है, सब कुछ बदलने की ज़रूरत है। तुम्हें तुम्हारी मंज़िल मिल गई है, और मैं कहता हूँ कि मैं जिस यात्रा पर हूँ, उसमें मंज़िल अनंत है। मुझे पता है, मुझे मरते दम तक मंज़िल नहीं मिलनी। मेरा काम उनके लिए है, जिनकी असंतुष्टि रुकने का नाम नहीं ले रही, जिनके दिल में आग लगी हुई है। मुझे एक पल का चैन नहीं, और तुम्हें कहीं बेचैनी नहीं। तुम मेरे साथ कैसे हो? बताओ।
तुम्हें एक ज़बरदस्त उद्देश्य चाहिए
तुम्हें एक ज़बरदस्त उद्देश्य चाहिए
12 min
यह जो ‘मैं’ है, जिसे सेल्फ कहते हैं, यह अपने आप में बहुत तपती हुई और अशांत चीज़ है। यह निरुद्देश्य हो कैसे सकती है? जैसे किसी आदमी को एक-सौ-चार डिग्री बुखार हो और वो कहे कि मैं डिज़ीज़लेस हूँ। एक-सौ-चार डिग्री बुखार हो तो आपके पास एक धधकता हुआ उद्देश्य होना चाहिए। क्या? बुखार उतारना है भाई! इसी तरह से जब तक ‘मैं’ है, उद्देश्य होना चाहिए। और वो उद्देश्य होगा उस ‘मैं’ की शांति।
विदेशों में भारतीयों से नफ़रत क्यों?
विदेशों में भारतीयों से नफ़रत क्यों?
38 min
अब सोशल मीडिया और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का दौर है; बहुत ही व्यर्थ तरीक़े का राष्ट्रवाद। आज जो जितना ज़्यादा अज्ञानी है, वो उतनी ऐंठ में घूम रहा है। एक बहुत अनपढ़ क़िस्म की भीड़ है, जो भारत के राष्ट्रीय जीवन पर छाती जा रही है। गंदी आदतें जगह बदलने से छूट नहीं जातीं। बाहर हिंदुस्तान को इज़्ज़त भी ख़ूब मिली है, पर बाहर उन भारतीयों को इज़्ज़त मिली है जो इज़्ज़त पाने के लायक़ हैं। जो वहाँ पर जाकर गंदगी मचाएँगे, उनको थोड़ी इज़्ज़त दे देंगे? हमारा फ़र्ज़ बनता है कि हम दोबारा हर क्षेत्र में दुनिया में चमकें। पर वो सब करना ध्यान और श्रम का काम है, नारेबाज़ी का काम नहीं है।
ट्रॉफी जीत ली, पर समाज को मज़ा सिर्फ़ निजी बातों में
ट्रॉफी जीत ली, पर समाज को मज़ा सिर्फ़ निजी बातों में
12 min
आप में से जो लोग टेनिस देखते होंगे, आपसे कहा जाए कि अपनी ज़रा पसंदीदा महिला खिलाड़ियों के नाम बताइए, तो आपको मार्टिना नवरातिलोवा बाद में याद आएँगी; आपको पहले कौन याद आएँगी? एना कोर्निकोवा। ज़बरदस्त पॉपुलैरिटी थी उसकी। हमें कहाँ मतलब है इस बात से कि एक व्यक्ति या एक महिला अपने बंधनों को, अपनी शारीरिक सीमाओं को चुनौती देकर टेनिस के कोर्ट पर कुछ जीत रही है। आपके सामने एक ऊँचा खिलाड़ी भी आ जाए, विशेषकर महिला खिलाड़ी, वो कुछ नहीं है, बस सेक्सुअल ऑब्जेक्ट है। इससे बस यही पता चलता है कि हमारी ज़िंदगी में भी सत्य से कहीं-कहीं ज़्यादा सेक्स है।
विज्ञापन का खेल
विज्ञापन का खेल
12 min
आपको क्या लगता है, यह जो अलग-अलग तरह के स्पोर्ट्स हैं, यह क्यों इतने प्रचलित हो गए? क्योंकि स्पोर्ट्स होगा तभी तो ऐड होगा। वह विज्ञापन बेचने का ज़रिया है और विज्ञापनदाता ऐसे नए-नए ज़रिए खोजते रहेंगे। चाहे वह विज्ञापन हो, चाहे बाबा जी की PR हो, चाहे आपको धार्मिक आधार पर भड़काने वाला कोई WhatsApp फ़ॉरवर्ड हो, वह सब बहुत केयरफुली क्राफ्टेड होते हैं। बहुत सतर्क रहा करिए, बहुत सतर्क; सब कुछ सिर्फ़ इसलिए है ताकि कोई आपसे अपना स्वार्थ सिद्ध कर सके।
गोवा त्रासदी: सेलिब्रेशन माने इंटॉक्सिकेशन?
गोवा त्रासदी: सेलिब्रेशन माने इंटॉक्सिकेशन?
15 min
पहले भी कई बार चेतावनी दी गई थी। इंस्पेक्शन हुआ था गवर्नमेंट एजेंसी से, तो उनको बोला गया था कि भाई, ये सब ठीक करो; उन्होंने ठीक नहीं किया। रेगुलेशंस का उल्लंघन हुआ है, और उसके बाद जो वहाँ चल रहा था, वह बस बेहोशी का समाँ है, उसमें कुछ भी करो। हमारा कोई भी उत्सव हो, समारोह हो, उसका मतलब ही यही होता है कि चेतना को और गिरा दो। हमारे मन में यह बात डाल किसने दी कि सेलिब्रेशन माने इंटॉक्सिकेशन? फिर उसी का एक एक्सट्रीम रूप हमें देखने को मिलता है; ये जो पच्चीस-पचास मौतें हो गईं।
ज़ॉम्बी बनता समाज
ज़ॉम्बी बनता समाज
51 min
‘ज़ॉम्बी’ शब्द का मतलब समझते हैं? चलती-फिरती लाश। हम वो बन चुके हैं, बहुत हद तक। हम वैसे हो गए कि हमारे सामने अब कुछ भी चल रहा है, कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता, तो हम मर गए। और जो मर गया, वो मरने से क्यों डरे? उसको तुम 2000 की AQI में डाल दो, उसे तब भी फ़र्क़ नहीं पड़ेगा; वो तो मर ही चुका है। ये समाज मृत्युधर्मा होता जा रहा है। हमारे भीतर ये मान्यता कूट-कूट कर भर दी गई है कि जो चल रहा है, ठीक ही चल रहा है, क्योंकि किसी और ने चला रखा है।
महिलाओं में गिल्ट की भावना
महिलाओं में गिल्ट की भावना
23 min
‘मुझे किसी की फीलिंग्स नहीं हर्ट करनी है। मुझसे मम्मी-पापा के आँसू नहीं देखे जाते। मैं गिल्टी फील करने लगती हूँ।’ गिल्टी फील करना अपने आप में कोई बुरी बात नहीं है लेकिन सही वजह से गिल्टी फील करो न। असली गलती यह है कि आप अपना जीवन व्यर्थ कर रही हैं। न ज्ञान है, न कला है, न कौशल है, न अनुभव है, कुछ नहीं है, दुनिया देखी नहीं है। महिला वग़ैरह आप बहुत बाद में हैं, सबसे पहले आप इंसान हैं और इंसान होने का मतलब ही होता है कि चेतना होना।
फ्लाइट कैंसल पर हंगामा
फ्लाइट कैंसल पर हंगामा
11 min
60–65% शेयर है इंडिगो का। आप इंडिगो को सज़ा दे दो, आप बोल दो ‘कल से इंडिगो की उड़ानें बंद,’ तो भारत की दो-तिहाई उड़ानें बंद हो जाएँगी। कौन-सी रेगुलेटरी अथॉरिटी अब इंडिगो को सज़ा दे सकती है? फ्लाइट कैंसल हो गई, तो जो पैसेंजर्स थे, उन्होंने क्रांति कर दी; ऐसे होती हैं क्रांतियाँ? जब जीवन में गीता आती है न, तो जीवन में गरिमा आती है। फिर इंसान कहता है कि ‘मैं आकाश हूँ। मुझे धरती पर ये तिलचट्टा और केंचुआ क्यों बनाया जा रहा है? मुझे मिट्टी में क्यों गाड़ा जा रहा है?’ फिर उठती है क्रांति, भीतर से।
आग बुझाने के लिए जीना है
आग बुझाने के लिए जीना है
17 min
रेस्टोरेंट में जाकर बैठो, वहाँ मेन्यू आता है; उसमें लाल निशान वाले इतने सारे होते हैं; क्या बुरा नहीं लगता? सड़क पर गाड़ी लेकर निकलता हूँ, तो वहाँ पर झटका मीट, हलाल मीट। छोटे शहरों की ओर चले जाओ, तो वहाँ तो पूरे के पूरे बकरे लटक रहे हैं। जिस इंसान में थोड़ी भी जागृति है, वह जैसे-जैसे इस दुनिया को देखेगा, वैसे-वैसे बिल्कुल पगलाता जाएगा। कहेगा, "ये दुनिया है? ये जीने की जगह है? यहाँ क्यों जिए?" पर जीना है। दुनिया में आग लगी हुई है, तो आग बुझाने के लिए जीना है।
हम पृथ्वी ही हैं
हम पृथ्वी ही हैं
29 min
मनुष्य के शरीर में 70% पानी है और पृथ्वी की सतह पर भी 70% पानी है। आपको दिखाई नहीं दे रहा कि हम पृथ्वी ही हैं। और आप ऐसी जगह जा रहे हो जहाँ पानी की बूंद भी नहीं है, जहाँ अलग से प्लांट लगाकर बस किसी तरह से इतना पानी दिया जाएगा कि पीकर ज़िंदा रह लो। अगर प्लानेट बदल गया, तो आपने ये जितनी ग़ज़लें लिखी हैं, ये जितनी आर्ट फॉर्म्स हैं; ये सब आपके लिए बेकार हो जाएँगी क्योंकि माइंड बदल जाएगा। आप कुछ और हो जाओगे। किसी और ग्रह पर जाने का मतलब है सामूहिक आत्महत्या की सोचना।
आत्म-अवलोकन कैसे करें?
आत्म-अवलोकन कैसे करें?
7 min
आत्म-अवलोकन बस ये नहीं है कि बैठे-बैठे कह रहे हैं, 'मैं आत्म-अवलोकन कर रहा हूँ।' सक्रिय रूप से जाकर के पूछो। जैसे, आपने एक फ़िल्म देखी किसी के साथ। तो देखने के बाद आधे घंटे कहीं बैठ जाओ, और कहो, 'अच्छा, मैंने क्या देखा?' 'अच्छा, तुमने क्या देखा?' इससे पता चलता है कि कितने हम पक्षपाती हैं। फ़िल्म हो, समाज हो, घटना हो, जीवन हो, कुछ भी। जिन्हें स्वयं को बढ़ाना है, उनके लिए बहुत-बहुत ज़रूरी है कि वो दूसरों से बात ज़रूर करें। अपने पास सिर्फ़ अपना ही पक्ष नहीं, तीन-चार और पक्ष आने दें।
हीन भावना बनाम चुनाव
हीन भावना बनाम चुनाव
4 min
हमारी खाल का रंग क्या है? हमारी हाइट क्या है? हमारा जेंडर क्या है? हम किस घर में पैदा हुए? इनका हम कुछ नहीं कर सकते। तो अगर इसको लेकर आपको तनाव होता है या ईर्ष्या होती है, तो इसका मतलब है कि जो प्राकृतिक चीज़ें हैं, उससे ज़्यादा आइडेंटिफ़ाइड हैं। ऐसी चीज़ से हमें आइडेंटिफ़ाई ही नहीं करना है, जिसमें हमारा कोई रोल ही नहीं है। हमारा बस कहाँ चलता है? हमारे चुनाव में। चेतना का काम है चुनाव करना, आप अपने चुनावों की फ़िक्र करो कि मैं सजग रहूँ और ज़िंदगी में सही चुनाव करती चलूँ।
ज़िंदगी में मुश्किलें रहेंगी, कोई बात नहीं
ज़िंदगी में मुश्किलें रहेंगी, कोई बात नहीं
15 min
इंसान होने का मतलब ही है बहुत कुछ होगा जो तुम्हारे सामर्थ्य से बाहर का होगा। एक चीज़ है तुम्हारे हक़ में। क्या? घटना कुछ भी घट रही हो, उस घटना को उत्तर क्या देना है। तुम्हारा प्रतिसाद, तुम्हारी प्रतिक्रिया, ये तुम्हारे अधिकार में हो सकते हैं। बिल्कुल संभव है कि बाहर बड़ी से बड़ी कठिनाई हो, कष्ट हो; भीतर तुम्हारे एक अस्पर्शित शांति बनी ही रहे। जो ऐसा कर ले गया, वो न सिर्फ़ जी गया, वो जीवन के पार निकल गया। सिर्फ़ उसी का जीवन सार्थक हुआ।
डॉ. अंबेडकर ने बौद्ध धर्म ही क्यों चुना?
डॉ. अंबेडकर ने बौद्ध धर्म ही क्यों चुना?
31 min
डॉक्टर अंबेडकर मृत्यु की रात को भी क्या कर रहे थे? वह धर्म पर ही किताब लिख रहे थे, और उन्हें बड़ी हड़बड़ी थी कि इसको पूरा कर दें। तबीयत बहुत ख़राब थी, दिख रहा था कि जाने वाले हैं। उनकी मृत्यु के बाद वह किताब प्रकाशित हुई, ‘The Buddha and His Dhamma.’ वह कोई पॉलिटिकल या इकोनॉमिक्स की किताब नहीं लिख रहे थे। वह धर्म पर लिख रहे थे। जो भारतीय दर्शन रहा है, उसकी सारी खूबियाँ बौद्ध धर्म में ज़बरदस्त तरीके से मौजूद हैं। बौद्ध धर्म तो पूरा ही जिज्ञासा का धर्म है, रूढ़ियों के लिए वहाँ एकदम ही कोई जगह नहीं है।
बँटी हुई ज़िंदगी
बँटी हुई ज़िंदगी
14 min
जो एक का नहीं होता, उसे सौ का होना पड़ता है। अपने आप को सौ जगह टुकड़ा-टुकड़ा करके उसको बाँटना भी पड़ता है। असली आदमी होता है, वो काम ऐसा चुनता है कि 24 घंटे कम पड़ जाएँ, और साथी भी ऐसा चुनता है कि 24 घंटे कम पड़ जाएँ। तो जब दोनों को ही 24 घंटे कम पड़ रहे हैं, तो वो 48 से ज़्यादा घंटे कहाँ से लाएगा? क्या करेगा फिर वो? वो काम को ही साथी बना लेता है, या साथी को ही काम बना लेता है, या साथी ऐसा बनाता है जो काम में भी साथ हो।
राष्ट्रविकास: क्या सिर्फ़ GDP तक सीमित?
राष्ट्रविकास: क्या सिर्फ़ GDP तक सीमित?
12 min
अर्थशास्त्र का साधारण-सा सिद्धांत है कि ग्रोथ और डेवलपमेंट एक चीज़ नहीं होते। जीडीपी माने बाहरी तरक़्क़ी: सड़क बन गई, फ़ैक्ट्रियाँ ज़्यादा उत्पादन कर रही हैं, इन सब से जीडीपी बढ़ता है। लेकिन यह अपने-आप में अंत नहीं हो सकता, वह सब तभी तक अच्छा है जब तक उससे इंसान को लाभ हो रहा हो। और इंसान को लाभ हो रहा है कि नहीं, यह जानने के लिए इंसान को पहले यह पता करना पड़ेगा कि वह है कौन? ख़ुद को जानना विकास की दिशा में पहला कदम है। राष्ट्र के विकास का सबसे अच्छा तरीका है, राष्ट्र के लोगों को भीतरी तल पर बेहतर बनाना।
दुख के कारण को समझो
दुख के कारण को समझो
21 min
छोटे बच्चे हैं; मिर्ची लग गई। मम्मी भाग के आती है तो क्या करती है उसके मुँह में? ले, चीनी खा। ये सुख है। यह जीवन जीने की हमारी आम विधि रहती है। हमें सुख चाहिए ही इसीलिए होता है क्योंकि हम दुख में हैं। पर हम यह नहीं करते कि दुख के कारणों को ही समझ लें। जब दुख हो तो सुख की तरफ़ भागने की अपेक्षा दुख के कारणों की तरफ़ भागो, दुख के भीतर की ओर भागो। और वहाँ पता चलेगा दुख किसलिए है। पता चलते ही दुख घटना शुरू हो जाएगा। तुमने कुछ करा नहीं; तुमने सिर्फ़ जाना और जानने भर से दुख मिट गया।
जवाब देना होगा
जवाब देना होगा
5 min
धर्म तो सबसे ऊँची बात होनी चाहिए न? तो धर्म के नाम पर ऐसे काम क्यों कर रहे हो, जो एक छोटे बच्चे को भी दिख रहा है कि गलत है? और सबसे खौफ़नाक बात ये है, कि हमारे बच्चों को धीरे-धीरे झटका लगना बंद हो जाता है। वो इसी माहौल के हो जाते हैं, रच-बस जाते हैं। ज़िंदगी हिसाब करेगी, जवाब माँगेगी और तब लज्जित होने के अलावा कुछ नहीं बचेगा।
अंधविश्वास की पहली काट: तथ्य
अंधविश्वास की पहली काट: तथ्य
26 min
बच्चे को स्मॉल पॉक्स हुई है। और आपसे कोई कहेगा ये चेचक नहीं है, माता आई है इसको, और पाँच दिन तक इसको फलाने तालाब की मिट्टी का पानी छानकर पिलाओ। ये बात कौन मान सकता है? सिर्फ ऐसा आदमी जो अपनी ज़िंदगी के किसी भी पहलू में तथ्यों के लिए इज़्ज़त नहीं रखता। आप अगर ऐसे आदमी हो जो एक सच्ची ज़िंदगी जीते हो, तो आप सवाल पूछोगे ना? जो लोग तथ्य से जितना घबराते होंगे, वो उतने ज़्यादा अंधविश्वासी होंगे।
डाइवोर्स केस क्यों बढ़ रहे हैं?
डाइवोर्स केस क्यों बढ़ रहे हैं?
4 min
प्रकृति ने इंसान को ऐसा बनाया नहीं है कि कोई भी दो व्यक्ति ताउम्र एकसाथ चल सकें। पहले रिश्ता चल जाता था, क्योंकि बहुत तरीके के डर होते थे। अब लोगों को हक आ गया है कि वो अलग हो सकते हैं, और जब लोगों को अधिकार रहेगा कि वो अलग हो सकते हैं, तो अलग होंगे। मैं नहीं कह रहा हूँ कि जितने लोग हैं, सब अपने रिश्ते तोड़ लें। गलती हो गई है तो उसका सुधार करो। सुधार पहले तो ऐसे किया जाता है कि बातचीत की, रिश्ता बचाने की कोशिश की, लेकिन अगर वो तरीका नहीं चलता, तो आवश्यक नहीं है कि एक-दूसरे के साथ बंधे रहकर यंत्रणा भोगो जीवनभर।
सुरक्षा नहीं मकान में, लड़की रहो उड़ान में
सुरक्षा नहीं मकान में, लड़की रहो उड़ान में
4 min
तुम बात-बात पर यदि निर्भर रहो, ‘पैसे दे दो, सुरक्षा दे दो,’ तुम्हें क्या लगता है, जो कोई तुम्हें यह सब कुछ देगा, तुमसे इनकी कीमत नहीं वसूलेगा? जिस लड़की के कदम खुले आकाश में नहीं निकले, जिसने दुनिया नहीं नापी, जो शिक्षित नहीं है, जो कमाती नहीं है, जिसका मन खुला हुआ नहीं है, सबसे ज़्यादा संभावना उसी लड़की के शोषण की है। घर के बाहर निःसंदेह खतरा है, पर घर के भीतर और बड़ा खतरा है। सुरक्षा तुम्हें सबसे ज़्यादा पिंजड़ों में मिलती है, पर फिर पिंजड़ों में तुम उड़ भी नहीं सकते। भूलना नहीं इस बात को।
यात्राएँ करिए
यात्राएँ करिए
13 min
हिमालय से ऋषि चलते थे और सीधे दक्षिण भारत तक पहुँच जाते थे। या वो कहते थे कि मैं हिमालय का हूँ, वही रहूँगा? कबीर साहब जीवन भर चलते रहे। नानक साहब अरब तक पहुँच गए, चीन से यात्री चलते थे और ज़्यादातर ज्ञान की खोज में होते थे, वह तिब्बत पार करके हिमालय लाँघ करके भारत आ जाते थे। आपको यात्रा करने से किसने रोका है? यात्रा ही बहुत कुछ सिखा देती है। विदेश न जाओ, भारत तो घूम लो। पृथ्वी पूरी तुम्हारी है, जहाँ जा सकते हो, जाओ।
ज़हर से भरी हवा
ज़हर से भरी हवा
32 min
आप साँस ले-लेके मर रहे हो। साँस लेके जिया जाता है। आपको मजबूर किया गया है कि आप साँस लेके मर जाओ, और आपके भीतर क्रोध नहीं उठ रहा। आप खड़े होकर के गर्जना नहीं कर रहे कि ये कैसे हो रहा है? कौन ज़िम्मेदार है? दुनिया की जो सबसे प्रदूषित राजधानी है, वो दिल्ली है। यह प्रदूषण विकास से नहीं हो रहा है। यह आंतरिक दूषण है, जो बाहरी प्रदूषण के रूप में दिखाई दे रहा है। छोटी सी बात ये है, कि इट ऑल स्टार्ट्स विदइन। और जो चीज भीतर से शुरू होनी है, आप बाहर, बाहर, उसमें लगे हुए हो। उससे क्या हो जाएगा?
संविधान: धर्म का फूल
संविधान: धर्म का फूल
57 min
भारत का संविधान एक बहुत सुंदर फूल है, लेकिन वह जिस पेड़ पर लगा है, वह धर्म का पेड़ है। जो मूल्य भारत के संविधान में निहित है, वह दुनिया के ऊँचे से ऊँचे मूल्यों में है। बाहर की दुनिया में हमें वह सब कुछ चाहिए जो हमें संविधान देता है: सामाजिक न्याय, आर्थिक न्याय; वह सारे अधिकार जो एक मुक्त नागरिक के एक मुक्त समाज में होने चाहिए। लेकिन साथ ही साथ हमें वह सब चाहिए जो हमें भीतर से भी तृप्ति देगा: उपनिषद्, भगवद्गीता। हमें दोनों चाहिए।
लड़ाई आख़िर तक
लड़ाई आख़िर तक
10 min
ये जो विमेन बॉक्सिंग रिंग है, ये सिर्फ़ एक रिंग नहीं है, ये उस संघर्ष की निशानी है, जो महिलाओं ने बहुत शताब्दियों तक किया है। ‘मिलियन डॉलर बेबी’ फ़िल्म है जिसमें एक महिला बॉक्सर चैंपियन कह रही है कि “मुझे मृत्यु तक मंज़ूर है, लेकिन गरिमाहीन जीवन मंज़ूर नहीं है।” महिला की उन्नति पर सिर्फ़ महिला की उन्नति निर्भर नहीं करती; पुरुष, राष्ट्र और पूरा विश्व भी इस बात का इंतज़ार कर रहा है कि महिला अपने आप को महिला से ज़्यादा मनुष्य जानना शुरू करे।
भगवान
भगवान
4 min
जो बाहर रहता है ना भगवान, जो आँखों से दिखाई देता है, जिसको तुम कहते हो, ‘यह जगह है, ये ऐसा-ऐसा;’ वो तो तुम्हारा भगवान है। तुम उस पर अपने सब पसंद–नापसंद आरोपित कर देते हो। उसकी सारी कहानियाँ तुम अपनी सुविधा के हिसाब से बना लेते हो। "हरि मरें तो हम मरें, और हमरी मरे बलाय। साँचे गुरु का बालका, मरे ना मारा जाय, कबीरा।।” यहाँ दिल में बैठा लिया है, यहाँ वाला जो भगवान होता है, वो राजा होता है। उसको तुम अपने हिसाब से नहीं चला सकते। तुम्हें उसके हिसाब से चलना होता है।
लोग हर्ट क्यों करते हैं?
लोग हर्ट क्यों करते हैं?
15 min
तुम और क्या करोगे, भीतर परेशान हो तो दूसरों को परेशान करोगे। ‘आई लव यू’ भी बोलते हो, तो तुम्हारी आँखों में आशा रहती है। और फिर जब वो उम्मीद पूरी नहीं करेगा, तो कहोगे: ‘हर्ट।’ जो भी बात है, उसको थोड़ा खुला रखना सीखिए। देना सीखो और लो भी तो उसी से, जो बिना उम्मीद के दे रहा हो तुमको।
बच्चे को मारिए मत, एंगेज करिए
बच्चे को मारिए मत, एंगेज करिए
15 min
बच्ची कुछ ऐसा कर रही है और आपको गुस्सा आ रहा है, उसको बता दीजिए कि “बेटा, आप जो कर रहे हो, बहुत गुस्सा आ रहा है, मेरा मारने का मन हो रहा है।” बस ये बोलिए, मारिए मत। फिर उसी से पूछिए, “अच्छा बताओ, मुझे गुस्सा क्यों आ रहा है?” उनको एंगेज़ करिए न। नहीं तो एक अजीब-सी बात है, वो कुछ कर रही है, आपने थप्पड़ मार दिया, उसको समझ में भी नहीं आया कि आपने थप्पड़ क्यों मार दिया। उसको ही बताने दीजिए कि “हाँ, मैंने जो किया है, उस पर गुस्सा तो आपको आएगा।” तो अब एक ज़्यादा एंगेजिंग रिलेशनशिप बनी न।
क्रोध नहीं, विवेक
क्रोध नहीं, विवेक
12 min
आपको सचमुच बुरा, लोगों की जान गई इससे लग रहा है; सचमुच? और अगर जानों का जाना ही इतना बुरा लगता है तो जो सबसे बड़ा नरसंहार है, वह तो नारी-संहार है; वहाँ सवाल क्यों नहीं पूछते? या ऐसा है कि एक पक्ष मज़हबी उन्माद फैला रहा है, तो पलट कर हमें भी फैलाना है? उनसे निपटने के लिए हमारे पास पुलिस है, फ़ौज है, पूरी एक सभ्य, सुसंस्कृत व्यवस्था है, जो उनसे निपट लेगी। जो अपराध कर रहे हैं, उनसे निपटने के लिए उन्हीं जैसा मत बन जाना। रावण को हराने के लिए राम, और राम हो गए। रावण को हराने के लिए राम रावण थोड़ी बन गए थे।
प्यार किया नहीं जाता, बस हो जाता है?
प्यार किया नहीं जाता, बस हो जाता है?
20 min
भारत के सारे जवान लोगों का अब यही नारा है: कुछ और न आता हो हमको, हमें प्यार निभाना आता है। प्रेम हल्की बात नहीं होती है, भाई! एक तरीके से प्रेमी बनने का अर्थ होता है चिकित्सक बनना; जिससे प्रेम करते हो, तुम्हारे ऊपर उसके सुधार और स्वास्थ्य की ज़िम्मेदारी आ जाती है। प्यार ऐसी चीज़ है, जिससे बच भी नहीं सकते, लेकिन बिना पात्रता के किया, तो फिर तुम्हें कोई बचा भी नहीं सकता। करना तो पड़ेगा ही, लेकिन बिना समझ-बूझ कर करा, तो फिर वो प्यार नहीं है, वो अत्याचार है।
भारत सबसे धार्मिक और सबसे गंदा देश क्यों?
भारत सबसे धार्मिक और सबसे गंदा देश क्यों?
18 min
मेरे घर का मंदिर साफ़ रहेगा, बाकी मंदिर गंदे हैं तो रहें। क्या फ़र्क़ पड़ता है कि मैं जाकर अपने उद्धार के लिए गंगा में डुबकी मार रहा हूँ और गंगा को गंदा कर रहा हूँ? दुनिया में किसी देश में इतनी गंदी नदियाँ आपको नहीं मिलेंगी। वाराणसी शायद दुनिया का सबसे पुराना नगर है, भोले बाबा की नगरी है, और जाकर देखो गंदगी। ख़ुद साफ़-स्वच्छ होकर रहे आना धर्म नहीं होता। ‘तुझे साफ़ करने की ख़ातिर मुझे ख़ुद मैला होना स्वीकार है,’ यह धर्म होता है।
पैसा कितना ज़रूरी है?
पैसा कितना ज़रूरी है?
7 min
वह अध्यात्म भी बड़ा गड़बड़ है, जो कहता है कि पैसा तो पाप है और हाथ का मैल है। हाथ का मैल-वैल नहीं होता है; मेहनत से कमाया जाता है। खाना चाहिए होता है, कपड़ा चाहिए होता है; उसकी अपनी एक जगह है। इतना कमाओ कि कहीं हाथ न फैलाना पड़े। लेकिन तुम यह सोचो कि पैसे से मानसिक पूर्णता मिल जाएगी, तो यह नहीं होने वाला। और जब ये उम्मीद नहीं रहती कि पैसा पूर्णता दे देगा, तो फिर आदमी अंधों की तरह पैसे के पीछे नहीं भागता।
आख़िर जीवन आया कहाँ से?
आख़िर जीवन आया कहाँ से?
12 min
मिट्टी जीना चाहती है, मिट्टी में ही प्राण है। और मिट्टी की ही जो जीने की इच्छा है, वो समझ लीजिए कि वृक्ष बनकर या जीव बनकर, प्राणी बनकर खड़ी हो जाती है। ये सोचना सबसे बड़ा अज्ञान है कि “मैं और मिट्टी अलग-अलग हैं।” तो कोई बोले कि “मरने के बाद हम कहाँ जाएँगे?” कहीं नहीं जाओगे, तुम राख में ज़िंदा हो अभी। लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि निकलकर इधर-उधर घूमोगे। शरीर से हटकर कोई “जीवात्मा” जैसी चीज़ है: ये फ़िलोसॉफ़िकल एरर है।
जन्मदिन गीत: जन्म लिया तो मरेगा
जन्मदिन गीत: जन्म लिया तो मरेगा
17 min
जन्म लिया तो मरेगा, जन्म लिया तो मरेगा, जन्म लिया तो मरेगा तू, जन्म लिया तो मरेगा। ये मृत्यु का नहीं, अमरता का गीत है। इसका मतलब है: अजन्मे रहो, अमर रहो। देह का ही तो कहते हो कि जन्म हुआ। तो अजन्मे रहने का अर्थ है: देह मत बनना, चेतना बनना, जानना। जानना, नहीं तो एक्शन-रिएक्शन के ही खेल में फँस जाओगे और फिर उसमें दुख आ जाता है ज़िंदगी में। तो दुख से बचने का गीत है ये। ये आशीर्वाद है; अजन्मे रहो, अमर रहो।
आई टेक नथिंग पर्सनली
आई टेक नथिंग पर्सनली
30 min
चार्ली चैप्लिन की कॉमेडी होती है, उसमें वो बेचारे हमेशा गिर रहे होते हैं, पिट रहे होते हैं। मज़ा आता है या नहीं आता है? कितना हँसते हो। और अपने साथ हो जाता है तो? अपने साथ भी जब हो, तो यही मानो, दूसरे के साथ हुआ है। मैं सब कुछ ऐसे ही लेता हूँ, जैसे चार्ली चैप्लिन के साथ हो रहा हो, मेरे साथ नहीं हो रहा। आई टेक नथिंग पर्सनली। जितना दुनिया पर आश्रित रहोगे, दुनिया उतनी चोट मारेगी। और दुनिया पर आश्रित नहीं हो, तो दुनिया के भाँति-भाँति के रंग उल्लास की बात बन जाते हैं।
बच्चे की परवरिश कैसे हो?
बच्चे की परवरिश कैसे हो?
18 min
आप चालीस के हो जाओ, आप सत्तर के हो जाओ, अगर आपने बचपन नहीं जिया है, तो आपके भीतर इतना बड़ा छेद रह जाता है और वो भरता नहीं है। एक स्वस्थ बच्चा बहुत दुर्लभ है। स्कूल अपने तरीक़े चला देता है और माँ-बाप उसमें सहभागी बन जाते हैं। इस पीढ़ी को मिकी माउस बनाए दे रहे हैं, रोबोटिक, असंवेदनशील और बहुत-बहुत भयभीत। बच्चे पर रोज़ सौ तीर लग रहे हैं; इस वक़्त उसको सुरक्षा चाहिए, और अध्यात्म के अलावा कोई दूसरा कवच नहीं है।
जिया नहीं जाता
जिया नहीं जाता
37 min
किस-किस की ज़िंदगी से कोई विदा हुआ है, जिसकी विदाई पर रोए थे? वो अभी भी उतना ही याद आता है जितना विदाई के चार महीने तक आता था? शरीर नहीं, तुम्हारी याद भी मिट जाएगी। तुम भी किसी को याद नहीं आने वाले, पागल। यही है भविष्य। खूबसूरत फंदों में फँसना सीखो। बस फंदा इस लायक होना चाहिए कि फँसा जाए। भगत सिंह ने भी फंदा ही तो चुना था, फंदा माने बंधन। पर वैसा बंधन चुनो तो क्या बात है! फिर उसके बाद शिकायत नहीं रह जाएगी कि ज़िंदगी रुखी है, बेरौनक है, ‘जिया नहीं जाता।’
क्लाइमेट क्राइसिस: थर्ड स्टेज कैंसर
क्लाइमेट क्राइसिस: थर्ड स्टेज कैंसर
23 min
दुनिया में किसी देश में उतनी खराब जलवायु नहीं है, जितनी भारत में है, और भारत में कहीं भी उतनी खराब नहीं, जितनी दिल्ली में है। यहाँ साँस नहीं ली जाती, यहाँ का पानी गंदा है, लेड, मर्करी सब मिले हुए हैं पानी में। जीना मुश्किल होने वाला है सबका, बस कुछ पर असर आज ही पड़ जाएगा, कुछ पर चार साल बाद पड़ेगा। जब तक आपको पता चलेगा कि यह असर इर्रिवर्सिबल है, तब तक बहुत देर हो चुकी होगी, आप कुछ नहीं कर पाओगे।
गंदगी फैला दी है, उसको समेटना है, यही काम है
गंदगी फैला दी है, उसको समेटना है, यही काम है
7 min
काम करना माने ये नहीं होता कि कोई महल बनाना है, कोई साम्राज्य खड़ा करना है, ये करना है, वो करना है। वास्तविक काम हमेशा नकारात्मक होगा। तो इसलिए उसको ढूँढना बहुत आसान है। आसपास अपने देखो, कहाँ कुछ ऐसा है जो नहीं होना चाहिए। सूँघो, कहाँ-कहाँ गंदगी फैली हुई है। हाथ में झाड़ू उठाओ, साफ़ कर दो; यही है काम। काम करके कुछ हासिल नहीं करना है। काम करके जो हासिल कर लिया है, उसको हटाना है।
संघर्ष ही साधना
संघर्ष ही साधना
12 min
दुनिया ऐसी हो जाए और ज़िंदगी ऐसी हो जाए कि किसी विरोध की ज़रूरत ही न पड़े। पर आज ऐसा नहीं है, आज बहुत कुछ ऐसा है जिसे विरोध की ज़रूरत है। तो मैं वो विरोध कर रहा हूँ ताकि जो कुछ हटाया जाना है, मैं उसको हटा दूँ और मेरे बाद, मेरे अलावा कम ज़रूरत पड़े किसी को उतना जूझने की। लेकिन मान लो, मैं काम नहीं कर पाता पूरा, जिसकी बहुत संभावना है, तो जूझने से डरना मत। याद रखना कि संघर्ष इसीलिए है ताकि एक दिन संघर्ष न करना पड़े।
बोध पहले आता है या प्रेम?
बोध पहले आता है या प्रेम?
23 min
प्रेम ऐसी चीज़ है जो बोध के पहले भी चाहिए और बोध के बाद भी आती है। बोध से पहले कौन-सा प्रेम चाहिए? मैं जो उच्चतम और सुंदरतम हो सकता हूँ, वो मुझे होना है; ये है आंतरिक प्रेम, परम प्रेम। परम प्रेम कहता है, बोध होना चाहिए और जब बोध होता है, तो फिर उसके होने से आप जान जाते हो कि दुनिया में आपके प्यार के लायक कौन-सा विषय है। तो सबसे पहले परम प्रेम, फिर बोध और फिर साधारण सांसारिक प्रेम।
कोई भी आपकी उम्मीदों के हिसाब से नहीं चलेगा
कोई भी आपकी उम्मीदों के हिसाब से नहीं चलेगा
20 min
हम सोचते हैं, हमारी जैसी चाहत है, ये सामने वाला व्यक्ति वैसा व्यवहार करे। वो आपकी चाहत के हिसाब से नहीं चलने वाला। आप चाहते रहो कुछ भी, कुछ भी चाहते रहो। एक ही बार में टूट जाने दो न दिल को, जग की मरनी क्यों मरे दिन में सौ-सौ बार। किसी को कुछ देना चाहते हो तो दे दो, उम्मीद क्यों कर रहे हो? और जहाँ आप सचमुच चाहते हो कि बदल जाए बंदा, अब लग गया है दिल, है कोई बात, नहीं छोड़ सकते ये कहकर कि जैसा पहले था, आगे भी वैसा ही रहेगा। जहाँ पर ये आपने रुख ले लिया हो, वहाँ पर साधन बस एक है। क्या? अध्यात्म।
नाज़ुक नहीं, निडर बनो
नाज़ुक नहीं, निडर बनो
13 min
जो हमें कहा जाता है कि "इंडियन वूमन की तो बात ही दूसरी होती है। वह तो होती ही कमज़ोर है, भावुक बहुत होती है।" नहीं, कमज़ोर नहीं होती। और उसका प्रमाण यह है कि उसने गोरी महिलाओं को हराया है। और किस मैदान में? भावना के मैदान में नहीं, खेल के मैदान में। जूझती हुई लड़की ज़्यादातर लोगों को पसंद नहीं आएगी, क्योंकि अगर वो क्रिकेट में या बैडमिंटन में जूझ सकती है, तो फिर वो समाज से भी जूझ सकती है। लड़की को तो जुझारू होना ही पड़ेगा, क्योंकि बहुत-बहुत ज़्यादा संभावना है कि वो जहाँ भी जाएगी, उसको माहौल प्रतिकूल ही मिलेगा।
दलित महिला कब तक अतीत की कैद में रहेगी?
दलित महिला कब तक अतीत की कैद में रहेगी?
23 min
इससे बड़ी विडम्बना नहीं हो सकती कि जिस ज़मीन पर ‘अहम् ब्रह्मास्मि’ उच्चारित हुआ, उस ज़मीन पर जाति और लिंग आधारित इतनी क्रूरता चली। कोई दलित महिला अतीत से बंध कर रहे, इससे ज़्यादा ताज्जुब की बात नहीं हो सकती। आपके लिए अतीत में रूढ़ियों और बंधनों के अलावा है क्या? उनसे आपको कुछ नहीं मिलने वाला। जितना उनका मुँह देखोगे, उतना आपका दिल टूटेगा। अपने आपको सही ज़मीन और सही आसमान दीजिए। अतीत को तोड़कर उड़ जाओ, इसके अलावा कोई रास्ता नहीं है।
सच्चा गुरु मिलता क्यों नहीं?
सच्चा गुरु मिलता क्यों नहीं?
24 min
जो भीतर के अंधेरे को हटा सके उसके लिए नाम दिया गया गुरु। गुरु शब्द का इतना महत्त्व है कि सिखों ने मंदिर को नाम दिया गुरुद्वारा। गुरु नानक साहब उच्चतम कोटि के और असली गुरु हैं, पर कितने लोग हैं जो वास्तव में गुरु नानक साहब के जीवन पर और उनकी सीख पर चल रहे हैं? जो एक से बढ़कर एक अंधविश्वास के विक्रेता हैं, उनको हमने नाम दे दिया गुरु का। आपकी उच्चतम संभावना को जो अभिव्यक्ति देने में मदद कर सके, उसका नाम गुरु है। बहुत खोजें, बहुत संदेह से भरे रहें, परीक्षण करें, यूँ ही किसी को गुरु मत बना लीजिए।
तुमने कप उठाया है, और एक पुराना पर्दा भी
तुमने कप उठाया है, और एक पुराना पर्दा भी
6 min
तुमने विश्वकप उठाया है, और उसके साथ सदियों से झुके हुए करोड़ों सिरों को भी। ऐसी जीतें मैदान की सीमाओं से आगे जाती हैं, वे दिखाती हैं कि जब तुम आदिम भूमिकाएँ लाँघती हो, तो क्या संभव हो जाता है। मैदान पर बना हर रन, उस रण की याद दिलाए जो स्त्री आज भी हार रही है। मैदान पर लगा हर चौका, उस चौके की याद दिलाए जो रसोई से ज़्यादा जेल है। गेंद तो सीमा रेखा पार कर गई, पर याद रखना कोई अभी भी सीमा में ही कैद है।
अतीत की यादें और भविष्य का डर
अतीत की यादें और भविष्य का डर
6 min
ये मत कहिए कि पीछे से कुछ आ जाता है और आपको ले जाता है। जो सामने है, आप अपने आप को उससे बचा लेते हो। अगर आपने अपने आप को पूरा-पूरा जीवन को सौंप दिया होता, तो फिर कुछ बचता ही नहीं, जिसको भूत या भविष्य ले जाए। 'लैक ऑफ इंटरेस्ट' चाहिए और वो तब होता है, जब सामने कुछ होता है जो आपका पूरा अटेंशन ले ले। ज़िंदगी में जो ज़रूरी है, उसको स्वीकार करिए और उसमें कूद जाइए, फिर इधर-उधर की झंझटें ख़ुद ही याद आनी बंद हो जाएँगी।
सब मोह-माया है
सब मोह-माया है
9 min
जब 'मोह-माया' कहते हैं, तो मोह से आशय होता है कि भीतर एकदम कोहरा फैल गया है, और माया से आशय होता है कि बाहर अब कुछ साफ़ दिखाई नहीं दे रहा। मोह माने जादू, जैसे किसी ने आपकी बुद्धि पर पर्दा डाल दिया हो। और जब बाहर सब धुंधला दिखाई देने लगता है, तो उसको कहते हैं — माया। आमतौर पर बाहरी चीज़ों को माया माना गया है, इसीलिए भीतर वाली माया को मोह कह दिया गया; नहीं तो मोह भी माया ही है।
भोग की कीमत
भोग की कीमत
31 min
अगर कोई NCR में रह रहा है लगातार, तो उसकी उम्र से दस–पंद्रह साल गए — निश्चित रूप से गए। हमको सिखाया नहीं गया है कि क्या कीमती है। गुड लाइफ़ इसमें नहीं है कि हवा साफ़ है, पानी साफ़ है, सेहत अच्छी है, लाइब्रेरी में जाकर पढ़ने को मिल रहा है। गुड लाइफ़ इसमें है कि तुम मेरा माल खरीदो। जब तक हम वो सीमा नहीं तय कर देते कि भाई, इससे ज़्यादा कंज़म्प्शन की किसी भी आदमी को ज़रूरत नहीं है, तब तक ये AQI वगैरह बढ़ता ही रहेगा। लोग बस ये कहते हैं कि “मैं तो नहीं मरा न, और अभी तो नहीं मरा न; आगे मरेंगे तो देखा जाएगा।
काम में फ्रस्ट्रेशन?
काम में फ्रस्ट्रेशन?
7 min
काम ज़रूरी होते हैं, रिज़ल्ट पर हमारा हक़ नहीं होता। जब फ्रस्ट्रेशन में समय बीत रहा हो, तो तुरंत याद आना चाहिए कि यार, इतना भी समय कहाँ है कि मैं उदास हो पाऊँ। और अगर मेरे पास ये समय है, तो मैं ये समय अपने असली काम से चुरा रही हूँ। काम ज़रूरी है, तो जो कुछ तुम्हारे पास है, सब दे दो न उसको। इतना थक जाओ कि फ्रस्ट्रेट होने के लिए भी एनर्जी न बचे।
मौत नहीं, अधूरी कहानी डराती है
मौत नहीं, अधूरी कहानी डराती है
21 min
मृत्यु डरावनी होती ही इसीलिए है, क्योंकि वह एक अधूरी कहानी का अंत होती है। जब कोई अपना चला जाता है, तो हम रोते हैं कि अभी सोचा था इनके साथ यह बातें करेंगे, नहीं कर पाए। अभी सोचा था, इनको साथ ले वहाँ घूम आएँगे, नहीं घूम पाए। बहुत कुछ संभव था, जो हो नहीं पाया। मृत्यु का कष्ट है ही अधूरेपन में, तो मरने से पहले ही पूरे हो जाओ। मरो मरो हे जोगी मरो, मरो मरण है मीठा — मुक्त हो जाओ।
बिहार चुनाव: नेता नहीं, शिक्षक
बिहार चुनाव: नेता नहीं, शिक्षक
61 min
ये एक ह्यूमैनिटेरियन क्राइसिस है, हमारा राज्य बिहार। वो बच्चा मर रहा है वहाँ पर, वो औरत मर रही है वहाँ पर, वो युवा बेरोज़गार खड़ा है वहाँ पर; जिस बात का महत्त्व है, वो बात करो ना। आपको बिहार के चुनाव में शिक्षा की बात कितनी दिखाई दे रही है? हमें एक ज़मीनी क्रांति चाहिए, बिहार को नेता से बहुत-बहुत पहले शिक्षक चाहिए। श्रीकृष्ण को नेता बोलोगे क्या? गीता समझा रहे हैं — हज़ार नेता उनके पीछे पैदा हो जाएँगे, और वो सब क़ाबिल निकलेंगे।
क्या रावण सच में ज्ञानी था?
क्या रावण सच में ज्ञानी था?
5 min
उल्टी-पुल्टी मान्यताएँ पकड़े बैठे हो, अपने आप को कुछ मान रहे हो, ‘मैं लंकेश हूँ।’ ज्ञान होता तो अपने आप को कोई लंकेश थोड़ी बोलेगा, स्त्री का अपहरण थोड़ी करेगा। ज्ञान होता रावण को, तो वह अपने आप को और कुछ क्यों मान रहा होता? रावण ने तो ज्ञान को सिर्फ़ सूचना की तरह रखा है। अगर ज्ञानी होता, तो फिर श्रीराम के ख़िलाफ़ युद्ध में थोड़ी खड़ा हो जाता वो।
एडिक्शन छोड़ना मुश्किल क्यों?
एडिक्शन छोड़ना मुश्किल क्यों?
7 min
शराब पीने से, मूवी देखने से, कोई भी एंटरटेनमेंट से क्या होता है? आप थोड़ी देर के लिए सब भूल जाते हो, यही तो होता है। इसका मतलब आपके पास कुछ है भूलने लायक, अपनी ज़िंदगी बर्दाश्त नहीं हो रही। जब तक आप व्यक्तित्व और पूरे माहौल को ही नहीं बदलोगे, तब तक जो भी लत लगी हुई है, वो लगी रहेगी। कोई आपका बहुत-बहुत गहरे आनंद का क्षण हो, उसमें आप बेहोश होना चाहोगे क्या? उसमें तो आप नींद को भी भगा देते हो, भगाते हो कि नहीं?
प्रेमी वही, जो डटा रहे
प्रेमी वही, जो डटा रहे
14 min
हम अपने आप को बहाना दिए रहते हैं कि अगर मेरे जीवन में प्रेम नहीं है, तो इसलिए नहीं है क्योंकि कठिन है। संगति ऐसों की करिए, जिनकी ज़िंदगी में प्रेम हो, वो आपसे आपके बहाने छीन लेंगे। संगति इसीलिए बहुत बड़ी चीज़ होती है। सौ लोग मिलकर जो सिद्ध कर रहे हैं कि प्रेम असंभव है, इन सौ लोगों की बात को एक दूसरा उदाहरण, एक विपरीत उदाहरण काट सकता है, उसकी खोज करनी चाहिए। और ये सौ उस एक से बहुत घबराएँगे, क्योंकि एक करोड़ लोगों के झूठ को एक आदमी का सच काट सकता है।
जीवन में अनुशासन कैसे आए?
जीवन में अनुशासन कैसे आए?
19 min
अगर जीवन में अनुशासन नहीं है, तो मतलब साफ़ है कि तुम जिस विषय के पास हो, उसमें इतनी जान ही नहीं है कि वह तुम्हें अनुशासित कर पाए। अधिकांशतः हमारे जीवन में एकाग्रचित्तता नहीं रहती, उसका कारण यह है कि हमने अपने लिए लक्ष्य ही मूल्यहीन चुन लिए होते हैं। स्वयं को अनुशासित करने की चेष्टा मत करो, उपयुक्त विषय ढूँढो। जब तुम सच के पास होते हो, तो अनुशासन अपने आप हो जाता है। तुम उसके निकट रहो, वो तुम में अनुशासन ला देगा।
सही काम चुनो, डूब के करो
सही काम चुनो, डूब के करो
7 min
कितनी बार सोचा कि ये रील आख़िरी होगी, बस यहीं पर रुक जाना है, और रात के 3:00 बज गए, 4:00 बज गए। क्या करोगे आप बहुत स्क्रॉलिंग करके, या टीवी, या एक-एक घंटा नहाकर, या दो-दो घंटा खाकर? कुछ नहीं है, बैठे हुए हैं; ऐसे ही, ऐसे ही, ऐसे ही — ‘हाँ भाई, दो चाय और ले आओ।’ जब पता चल गया है कि क्या सही है, तब अपने आप को उसको सौंपना पड़ेगा, शत-प्रतिशत। ये आर्किमिडीज़ जैसी हालत है कि कपड़े पहनना भूल गए; दिनभर काम में डूबे रहे, वापस गए, बस चित्त पड़ गए। पर चूँकि वो चीज़ एक कीमत माँगती है, तो वो 1% लोगों को ही मिलती है।
कम्फ़र्ट ज़ोन से बाहर कैसे निकलें?
कम्फ़र्ट ज़ोन से बाहर कैसे निकलें?
6 min
अहंकार पूरी ज़िंदगी आत्मरक्षा के अलावा और कुछ नहीं कर रहा होता। 'मुझे अपने आप को बचाना है,' और अगर उसे अपने आप को बचाना है, तो वो अपने लिए कोई कठिन लक्ष्य चुनेगा क्या? यह मत कहो कि 'मुझे जो पसंद है, मैं वो काम करूँगा,' तुम वो काम करोगे तो फिर कुछ बदलेगा भी नहीं। जहाँ दिख रहा है कि कमज़ोरी है, वहाँ जाओ — भले ही वहाँ कुछ लाभ न हो रहा हो, भले ही वहाँ कोई पूछने वाला न हो। वहाँ पर ठीक है, पोल खुलेगी, थोड़ी बेइज़्ज़ती होगी, लेकिन कमज़ोरी टूटेगी।
आत्मज्ञान ही दीपोत्सव है
आत्मज्ञान ही दीपोत्सव है
17 min
बाहर सौ सूरज भी जगमगा रहे हों, तो उनसे कहीं ज़्यादा कीमत भीतर के एक दीये की होती है। त्योहार का अर्थ ही यही होता है कि भीतर का दीया प्रज्वलित हो जाए। मनुष्य होने के नाते, प्रज्वलन की सामग्री सब में हमेशा से ही उपलब्ध रहती है। दीया भी रहता है, तेल भी रहता है, बाती भी रहती है — लौ नहीं रहती बस; वो भीतर प्रज्वलित हो जाए, यही उत्सव होता है।
जब मन रोशन हुआ, तब दिवाली जानना
जब मन रोशन हुआ, तब दिवाली जानना
6 min
त्योहार का मतलब ही यही है कि सत्य को कीमत दो; पटाखे नहीं फोड़ने होते, झूठ फोड़ना होता है। किसी को आप सच्चाई के अलावा क्या उपहार दोगे? त्योहार कोई एक दिन की बात नहीं है; वह जीवन की बात है — “पूरा जीवन ऐसा हो कि अंधेरा हावी नहीं होने देंगे; लगातार श्रीराम की ओर ही बढ़ते रहेंगे।” राम की कोई घर वापसी नहीं होती, आपकी राम वापसी होती है।
श्रीराम जैसा होकर उत्सव मनाइए
श्रीराम जैसा होकर उत्सव मनाइए
25 min
दिवाली वह दिन है जब हम अपने जीवन को बहुत ध्यान से देखें और पूछें: हम में इतना डर क्यों है? क्योंकि जो एक बात श्रीराम के साथ बिल्कुल सामने आती है, वह है निडरता। उनके पास क्या था, कुछ भी नहीं। निहत्थे, बिना किसी संपदा के नंगे पांव दो राजकुमार जंगल में, और भिड़ किससे गए? दशानन से। दिवाली पर्व है जब हम अपने आप से पूछें कि आज के रावण कौन हैं और हम भिड़ क्यों नहीं पाते? और रावण आवश्यक नहीं है हमेशा कोई व्यक्ति ही हो। रावण एक सोच भी हो सकती है, एक प्रकार का ट्रेंड, कल्चर भी हो सकता है जिसने हमको दबा रखा हो। भीतर अपने थोड़ा रामत्व तो लाइए, वह उत्सव होगा।
ऐसी दिवाली मनाओ
ऐसी दिवाली मनाओ
41 min
राम को सोने से लगाव था? सोने की लंका, दुनिया का जो बड़े से बड़ा सोने का गढ़ हो सकता था, उसको छोड़कर आ गए। अगर अयोध्या छोड़कर चौदह वर्ष तक वन में भटक सकते हैं तो लंका क्या, इसको भी छोड़ देंगे और फिर वापस जाएँगे। ये राम थे। त्याग और राम समानार्थी शब्द हैं। क्यों न अपने घर से वो सब कुछ त्यागें, जिसकी आवश्यकता नहीं है, और फिर अपने मन से वो सब कुछ त्यागें जो व्यर्थ ही बैठा हुआ है? ऐसी दिवाली क्यों न मनाएँ?
सुपरस्टिशंस और तर्क
सुपरस्टिशंस और तर्क
7 min
हम कॉन्शियस बीइंग्स हैं, कॉन्शियसनेस का काम होता है जानना। कोई सुपरस्टिशस काम कर रहा है और कह रहा है, ‘ऐसे कर रहा हूँ, तुम भी करो।’ तर्क आपको नहीं देना है, तर्क उनके पास होने चाहिए जो ये सब कर रहे हैं। वो तर्क दें, फिर उन तर्कों का परीक्षण करा जा सकता है कि वे कितने फैक्चुअल हैं, उनमें हाइपोथेसिस कितना है, सपोज़िशन कितना है। आपके लिए इतना कहना पर्याप्त है कि आई एम अ कॉन्शियस बीइंग, जो तभी कुछ करती है जब वह पहले समझ लेती है।
मेरे पास दुख नहीं है, तो फिर अध्यात्म में क्यों आऊँ?
मेरे पास दुख नहीं है, तो फिर अध्यात्म में क्यों आऊँ?
5 min
ऐसा कोई नहीं होता, जिसके जीवन में दुख न हो। हम पैदा ही दुख में होते हैं। दुख एक डिफ़ॉल्ट स्टेट है, जो सबकी ज़िंदगी में होगा ही होगा। यह और ज़्यादा ख़तरनाक बात है कि दुख है, लेकिन या तो आपने उसको दबा रखा है, या आप उसके ऑपोज़िट एंड, सुख पर जाकर किसी तरीके से बचने की कोशिश करते रहते हैं। कोई बोले, “मेरे पास दुख नहीं है, तो मैं अध्यात्म में क्यों आऊँ?” तो उसको फिर अपनी ज़िंदगी का पता ही नहीं है कि उसको कितना दुख है।
भारतीय चित्त: कामना अपराध है
भारतीय चित्त: कामना अपराध है
26 min
भारतीय चित्त बहुत हद तक ऐसा हो गया कि हमें कुछ नहीं चाहिए, कुछ नहीं करना। नींद आ रही? नहीं आ रही। खाओगे? नहीं खाएँगे। कपड़ा चाहिए? नहीं चाहिए। पैसा चाहिए? नहीं चाहिए। तू जी ही क्यों रहा है फिर, जब तुझे कुछ नहीं चाहिए तो? भीतर कामना भरी हुई है और बाहर से संस्कारी दिखना है। जो खुल के नहीं बता सकता कि उसकी कामना क्या है, उसके पास छुपी हुई बहुत बड़ी कामना है। सरल हो जाओ। प्रकृति ने पैदा किया है। प्रकृति को ही हम महा-माँ बोलते हैं। जैसे भी हो, वैसे हो, पैदा ही ऐसे हुए हो, शर्माने-लजाने की क्या बात है इसमें?
बच्चों में ज़िंदगी होनी चाहिए, अनुशासन नहीं
बच्चों में ज़िंदगी होनी चाहिए, अनुशासन नहीं
8 min
हर बच्चा विद्रोही ही पैदा होता है; ये आदर, सम्मान, संस्कृति, सभ्यता, तमीज़, तहज़ीब — ये सब जो शब्द हैं, बच्चों को बचाकर रखो इनसे। उसके ऊपर नियम-कायदे मत लगाइए — “यहाँ बैठो, ऐसे करो, चलो-चलो, सीधे हाथ से खाना खाया करो।” बच्चों में ज़िंदगी होनी चाहिए, अनुशासन नहीं; प्राण होना चाहिए। बच्चा चाहिए एकदम जिसमें भीतर ज़िंदगी इतनी है कि छलक रही है, बाँधें नहीं बंध रहा, समेटे नहीं सिमट रहा — ऐसा होना चाहिए बच्चा।
ज़िंदगी दो बातों की — एक आग, एक आशिक़ी
ज़िंदगी दो बातों की — एक आग, एक आशिक़ी
21 min
कोई पूछे सुबह-सुबह, “कहाँ जा रहे हो?” बोलो, “मोहब्बत करने।” मैं जी रहा हूँ, और यूँ ही नहीं जी रहा हूँ, मेरी हर धड़कन में आशिक़ी है। ये ज़िंदगी के प्रति प्रेम है — ऐसा प्यार जो परिणाम माँगता ही नहीं। किसके लिए है बात ये सारी? जो कर रहे हैं, उसके लिए है। ये प्रेम यज्ञ की ज्वाला है — काम और आग, जिसमें वो आग हो, वो है योगी। आग का धर्म है हमारा; उपनिषद् कहते हैं, “तुम अमृत की औलाद हो।” मैं और साफ़ करके तुमसे कह रहा हूँ — तुम आग की औलाद हो और आग की औलाद नहीं हो, तो अपने आप को सनातनी मत बोलना।
निकटता को पिंजरा न बनने दें
निकटता को पिंजरा न बनने दें
19 min
किसी भी सफल विवाह में सीमाएँ होंगी, और अगर आप उन सीमाओं का सम्मान करना नहीं जानते तो वह टूट जाएगा। कोई व्यक्ति आपके जीवन का केंद्र बन जाए, यह प्यार नहीं है। दो इंसानों के बीच एकमात्र सच्चा संबंध जो हो सकता है, वह है दोस्ती। एक-दूसरे के साथ गुणवत्तापूर्ण समय बिताइए और फिर एक-दूसरे को शारीरिक और मानसिक रूप से स्वतंत्र छोड़ दीजिए।
स्क्रॉलिंग की आदत से कैसे बचें?
स्क्रॉलिंग की आदत से कैसे बचें?
6 min
सोशल मीडिया एक तल का प्लेज़र देता है, और हम प्लेज़र सीकिंग ही होते हैं। अगर आपका काम ऐसा नहीं है जो पूरी तरह से आपको एब्ज़ॉर्ब कर ले; अगर आपको कहीं और प्लेज़र मिल रहा है, तो आप उधर जाओगे, आप अपने आप को नहीं रोक पाएँगे। काम सही चुनना पड़ेगा, काम को अपने लिए चैलेंजिंग बनाना पड़ेगा ताकि वो आपको पूरा का पूरा सोख ले। ज़िंदगी में कोई अच्छा प्रोजेक्ट चुनिए, जिसको आप दिल दे सकें, तभी आप उसे समय दे पाएँगे। नहीं तो अपने प्रोजेक्ट को छोड़-छोड़ कर आप बार-बार सोशल मीडिया और दूसरे डिस्ट्रैक्शंस की ओर भागेंगे।
श्रीराम: सगुण या निर्गुण
श्रीराम: सगुण या निर्गुण
26 min
हम अपने आराध्यों की कथा, चरित्र, मूर्ति, छवि अपने ही हिसाब से बना देते हैं। हम अपनी सहूलियत, मान्यता और स्वार्थ के अनुसार कालातीत को भी बदल डालते हैं। यह समस्या राम के निर्गुण–निराकार रूप के साथ बिल्कुल नहीं है क्योंकि जो निर्गुण और निराकार है, उसकी कोई मूर्ति ही नहीं, कोई छवि ही नहीं; तुम उसको कैसे ख़राब कर लोगे? इसलिए ज्ञानियों ने कहा कि उनको तो ब्रह्मस्वरूप ही मानना — “राम ब्रह्म परमारथ रूपा, अबिगत अलख अनादि अनूपा।” मात्र वही राम हैं जो कालातीत हैं।
सोशल एंग्ज़ायटी कैसे दूर करें?
सोशल एंग्ज़ायटी कैसे दूर करें?
8 min
सोशल एंग्ज़ायटी इसलिए है क्योंकि तुम्हारे पास जो है, वो बस सोशल ही सोशल है — सोशल मीडिया, सोशल इन्फ्लुएंसर्स, सोशल लाइफ़। ये जितने लोग जो तुम्हारे रोल मॉडल बने हैं, ये सब तुम्हें जीने के गलत तरीकों से लगातार भरे हुए हैं; उनको बर्ख़ास्त करो। अपने सामान्य ज्ञान को गहरा करो। विज़डम लिटरेचर और साधारण आध्यात्मिक कहानियों से होते हुए उपनिषदों तक पहुँचो। वो डर का आख़िरी इलाज है।
दूसरों को माफ़ कैसे करें?
दूसरों को माफ़ कैसे करें?
7 min
फ़ॉरगिवनेस कुछ होता ही नहीं है, फ़ॉरगेटफ़ुलनेस होता है। ये अपना अपमान है कि एक तो दूसरा घाव दे गया और पीछे से हम उसको लगातार याद रख रहे हैं। ज़िंदगी का नियम है कि जो चीज़ याद रखते हो, वही चीज़ कोई और रूप लेकर दोबारा आ जाती है। भूलना सीखो, आगे बढ़ते चलो, और जगह बनाओ ताकि ढंग के लोग ज़िंदगी में आ पाएँ।
ईर्ष्या का आख़िरी इलाज
ईर्ष्या का आख़िरी इलाज
8 min
जब अपनी ज़िंदगी का पता होता है तो दूसरों से ईर्ष्या नहीं होती। दूसरों से आप बहुत तुलना करना ही नहीं चाहते क्योंकि अब ‘me versus you’ नहीं होता, अब ‘me versus me’ होता है। दूसरे को देखकर आप एक प्रेरणा ले सकते हो, लेकिन उसकी जो तरक़्क़ी देखोगे, वो उसकी तुलना में देखोगे। हम गड़बड़ ये कर देते हैं कि उसकी तुलना अपने आप से करने लगते हैं, जबकि हर व्यक्ति की स्थिति और स्थान बिल्कुल विशिष्ट होता है।
क्या अध्यात्म में संकल्प लेना वर्जित है?
क्या अध्यात्म में संकल्प लेना वर्जित है?
8 min
तुमने जब भी कोई संकल्प उठाया है, अपनी इच्छित वस्तु को पाने का ही तो उठाया है न? और तुम उसी वस्तु की इच्छा करोगे जो तुम्हारे ही जैसी होगी। इन संकल्पों को त्यागने की बात करी जा रही है। ये छोटे संकल्प हैं। संकल्प बनाओ, पर सब संकल्पों के केन्द्र में श्रीकृष्ण को बिठाओ। जो कुछ भी करने से श्रीकृष्ण मिलते हों, वो ज़रूर करो और जो करने से तुम संसार के कारागार में ही कैदी रह जाते हो, वो बिल्कुल मत करना।
भावनाओं से कर्मयोग तक
भावनाओं से कर्मयोग तक
19 min
जो रोना-चिल्लाना हो रहा है, देख लो कि सब देह के कारण हैं। शरीर के हॉरमोन करवा रहे हैं। जान लो कि तुम उनके कर्ता नहीं हो — यह कर्मसंन्यास हो गया। दूसरा तरीका यह है कि यह सब किसी ऊँचे उद्देश्य को समर्पित कर दो; हँसेंगे तो उस ध्येय के लिए, रोएँगे तो उस ध्येय के लिए — यह कर्मयोग है। श्रीकृष्ण कहते हैं — इन दोनों में कर्मयोग श्रेष्ठ है। तुम्हारी चित्त की तमाम वृत्तियों के साथ रिश्ता बड़ा गहरा है। तुम्हारे लिए उनसे संबंध तोड़ना मुश्किल हो जाएगा, इसीलिए कर्मयोग ज़्यादा आसान तरीका है।
प्रेम और मृत्यु बहुत भिन्न नहीं
प्रेम और मृत्यु बहुत भिन्न नहीं
12 min
संतों ने गाया है कि इश्क़ और मौत साथ-साथ नहीं चले, तो इश्क़ कैसा? हमारा जीवन अप्रेम का है। जो अपने ही प्रति सहानुभूति नहीं रखता, वो अपने आप को जैसा है, वैसा बचाए रखेगा और प्रेम जब आ गया तो अहम् मिटेगा। प्रेम जो तुम्हें तुम्हारे जैसा छोड़ दे, वो प्रेम तो है ही नहीं।
क़ुर्बानी का क्या अर्थ है?
क़ुर्बानी का क्या अर्थ है?
8 min
क़ुर्बानी का अर्थ यह नहीं होता कि कोई बहुत कीमती चीज़ छोड़ दी। क़ुर्बानी का अर्थ होता है कि कुछ ऐसा छोड़ा जो कीमती लगता था, पर कीमती नहीं था। क़ुर्बानी की पूरी बात यह है — “एक ही है जिससे मोहब्बत की जा सकती है, तुम्हें ख़ुदा के अलावा कोई चीज़ प्यारी हो कैसे गई? इसलिए तुम्हें जो कुछ भी प्यारा हो गया, उसकी क़ुर्बानी दो क्योंकि वो नकली है।” वास्तव में प्रेम सिर्फ़ एक से हो सकता है, बाकियों से सिर्फ़ मोह और आसक्ति होती है।
गाँधी जयंती: किससे लड़ें, कहाँ है दुश्मन?
गाँधी जयंती: किससे लड़ें, कहाँ है दुश्मन?
36 min
गाँधी जी ने वास्तव में अंदर वाले दुश्मन से लोहा लिया था। बहुत साधारण कद-काठी के थे, कोई ऐसा ऐब नहीं जो साधारण आदमी में होता हो और उनमें ना हो, पर ये महात्मा कहलाए, गीता को माँ बोला। एक कमज़ोर मन का व्यक्ति इतना दृढ़ बन गया कि जब वह उपवास करने बैठते थे, तो भारत ही नहीं पूरी दुनिया काँप जाती थी और चर्चिल के पसीने छूट जाते थे। वह उपवास पर बैठ गए तो बैठ गए और लोगों को उनकी बात सुननी पड़ती थी। औसत स्तर से उठकर इतना मजबूत बन जाना, मेरे ख्याल से सबको उनसे प्रेरणा लेनी चाहिए।
जीवन का उद्देश्य: अस्तित्ववाद से अध्यात्म तक
जीवन का उद्देश्य: अस्तित्ववाद से अध्यात्म तक
65 min
"हम बंधन में हैं, बंधन ही दुख है और जिज्ञासा उस दुख के पार जाने का उपाय है। अस्तित्ववादी विचारकों ने कहा था कि वास्तव में एक ही प्रश्न है — “To be, or not to be?” दुख इतना है कि इसके साथ जिएँ भी या न जिएँ? फिर कामू इसका उत्तर देते हैं, “जीना तो ऐसे ही पड़ेगा, बस अपनी हालत पर हँसकर जियो।” जो कुछ भी हो रहा है, उसे समझना तुम्हारा दायित्व है। जब समझकर सहते हो तो मुस्कुराहट आ जाती है। श्रीकृष्ण कहते हैं, “इस जीवन में जो इंसान प्राकृतिक वेगों को तितिक्षा से सहने में सक्षम हो जाता है, वह जीवन-मुक्त है।”
धर्म के नाम पर पशुबलि
धर्म के नाम पर पशुबलि
10 min
जिसकी चेतना पूरे तरीके से उसकी देह से आबद्ध है, वह पशु है। पशुबलि का मतलब जानवर मारना नहीं है, पशुबलि का मतलब अपने भीतर के जानवर को मारना है। बकरे को नहीं मारना है, ये जो भीतर ‘मैं-मैं’ चलता रहता है, इसे मारना है। एक पशु को मारकर खाने से तुम्हें शांति कैसे मिल जाएगी? इससे कौन-सा देवता प्रसन्न हो जाएगा? ये क्रूरता और मूर्खता की बात है। वास्तविक धर्म कहता है — “भीतर वाले पशु को मारो।”
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