सच्चा जीवन समाज के दबाव या तथाकथित “पैशन” के पीछे चलने से नहीं, बल्कि भीतर और बाहर दोनों प्रकार की गुलामी से मुक्त होने से शुरू होता है। अक्सर जिसे अपनी पसंद या पैशन समझा जाता है, वह भी सामाजिक संस्कारों का परिणाम होता है। जब व्यक्ति स्वयं को गहराई से समझकर स्वतंत्र निर्णय लेता है, तब उसका कर्म स्वाभाविक, सार्थक और समाजोपयोगी बनता है। भय और सुरक्षा की मानसिकता से ऊपर उठकर भी गरिमापूर्ण, संतुलित और आर्थिक रूप से पर्याप्त जीवन जिया जा सकता है।
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प्रश्नकर्ता: गुड इवनिंग आचार्य जी। मेरा नाम गरिमा पाठक है। तो आज का पहला सवाल है। सर, मेरा सवाल ये है कि हम सभी लोग अपने जीवन में बहुत बार ये लाइन सुने हैं, “फॉलो योर पैशन”, बिना किसी लिमिटेशन के, बिना किसी रेस्ट्रिक्शन के। पर सर, जैसा कि हमारा जो देश है, उसमें आप भी जानते हैं कि अधिकतर मिडिल क्लास फ़ैमिली है या लोअर मिडिल क्लास फ़ैमिली। सर, मैं ख़ुद एक मिडिल क्लास फ़ैमिली से हूँ, इसलिए मैं काफ़ी रिलेट कर पा रही हूँ।
तो सर, ये जो किसी भी मिडिल क्लास फ़ैमिली का पहला ऐम यही होता है कि हमारी फ़ाइनैंशियल नीड्स मीट हों। सर, वही बात है कि कोई भूखा पेट क्या पैशन फॉलो करे? तो सर, मुझे ये लगता है, ये मेरा ओपिनियन है कि ये जो लाइन है, क्या ये सिर्फ़ सोसाइटी के कुछ प्रिविलेज्ड सेक्शंस में लागू होती है, जो फ़ाइनैंशियली अच्छे हैं? कि अगर वो कुछ काम करें; क्योंकि सर, इतना कंपटीशन है हम कोई भी काम करें, बहुत ज़्यादा चांस है कि हम फेल




