
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, ये देखिए एक और आदमी बिना टेल लाइट के।
आचार्य प्रशांत: ये एक और नहीं, ये दसवाँ, बीसवाँ है जो पिछले आधे घंटे में मिल रहा है। और बात सिर्फ़ टेल लाइट की नहीं है; टेल लाइट नहीं है, रात में काले कपड़े पहन रखे हैं, हेलमेट नहीं होता है, या हेलमेट होता भी है तो यहाँ कोहनी में हेलमेट लगा रखा होता है। और चौथी बात, फ़ोन पे बात कर रहे होते हैं। और इतनी ही नहीं है, पाँचवीं बात भी एक और है, इंश्योरेंस नहीं होता है।
ये 100 सीसी की बाइक है, इसमें तो कई बार इनका नंबर भी नहीं दिख रहा है। हेलमेट नहीं है, रात के समय काले कपड़े पहन रखे हैं, कोई टेल लाइट नहीं है। अक्सर उसमें पीछे का इंडिकेटर भी नहीं होता, तो वो बिना इंडिकेटर के मुड़ भी रहे होते हैं। हेलमेट नहीं पहन रखा है। इतने ज़्यादा व्यस्त हैं कि बाइक चलाते-चलाते फ़ोन पर बात कर रहे हैं, इतने व्यस्त हैं!
गरीबी हटे तो हटे कैसे? कैसे हटे गरीबी? जब तक गरीब, गरीब ही रहना चाहता है, तो गरीबी हटे कैसे?
इतने सारे लोग ये कर रहे हैं। इनमें से कुछ का तो एक्सीडेंट होगा न। बहुत प्राकृतिक सी बात है, स्टैटिस्टिक्स की बात है। इतने सारे लोग जब करेंगे, तो उनमें से कुछ का एक्सीडेंट भी होगा। ये तो ख़ुद आफ़त को, दुर्घटना को न्योता दे रहे हैं। और इनका मेडिकल इंश्योरेंस नहीं है, तो क्या होगा? ये गरीब हैं, ये और गरीब हो जाएँगे। गरीब हैं, वो तो इसी से पता चल रहा है कि जो बाइक की दुर्दशा है। और अब जब ये अस्पताल में जाएँगे और लाखों का खर्चा होगा, और उन दिनों में जब इनका खर्चा हो रहा होगा, उन दिनों इनकी आमदनी भी बंद हो जाएगी क्योंकि ये अस्पताल में पड़े हैं। तो ये जितने गरीब हैं, उससे और ज़्यादा…।
अभी तुम मुझे रिकॉर्ड कर रहे हो, इतनी देर में ऐसे चार और निकल गए। चार और निकल गए हैं, और ये सब एक से हैं। तो कैसे बोल दें कि गरीबी सिर्फ़ इसलिए होती है कि, “अरे, संयोग की बात है। कोई इस घर में पैदा हुआ, कोई उस घर में पैदा हुआ।” ये भी कैसे बोल दें कि गरीबी इसलिए होती है कि एक पूँजीवादी साज़िश है, कि पूँजीवादियों ने सारा पैसा अपने पास रख लिया है, तो इसलिए बेचारे गरीबों के लिए कुछ नहीं बचा है? ये भी कैसे बोल दें?
सबसे ज़्यादा दुख की अब बात होती है। बड़ा अफ़सोस होता है देखकर के कि गरीब ख़ुद अपनी गरीबी के कारणों में शामिल है। कि गरीब ख़ुद ऐसे काम कर रहा है जो उसकी गरीबी को और बढ़ाएँगे। और इन कामों का जो संबंध है, उसके मूल्यों से होता है, उसकी वैल्यूज़ से होता है। ये जो लोकधर्मिक मूल्य होते हैं न, ये गरीबी को बढ़ाते हैं। क्योंकि इनमें एक बड़ा मूल्य है भाग्यवादिता, फ़ेटलिज़्म, कि भाई, अगर राम चाहेंगे तो तुम्हारा काम हो जाएगा या तुम्हारी क़िस्मत में लिखा होगा तो तुम्हारा काम हो जाएगा। और नहीं लिखा हुआ तुम्हारे भाग्य में तो तुम कितना भी कर लो तो नहीं होगा।
तो उसका नतीजा ये होता है कि इंसान कभी बहुत जान लगाकर के न तो श्रम करता, न कभी अपनी असफलता के वास्तविक कारणों की जाँच करता, न कभी बहुत बुद्धि लगा पाता है। क्योंकि लोकधर्म में एक बात ये भी है कि बहुत बुद्धि मत लगाओ, तुम तो अंधश्रद्धा और अंधभक्ति करो। लोकधर्म में ज़्यादा जो बुद्धि लगाए न, उसको अच्छा नहीं माना जाता। कहते हैं, “नहीं-नहीं-नहीं, बुद्धि बुरी चीज़ होती है, तुम तो भक्ति करो।” और वो भक्ति जिसमें बुद्धि शामिल नहीं है, फिर तो भक्ति अंधभक्ति बन जाती है न।
तो लोकधर्म जो है, लोकधर्म माने ये जो प्रचलित धर्म है, मासेस का, कॉमंस का, भीड़ का, ये गरीबी के कारणों में से एक है और ये गरीबी को प्रोत्साहित करता है। इतना ही नहीं है, लोकधर्म चलता रहे इसके लिए भी ये ज़रूरी है कि गरीब लोग बने रहें, क्योंकि लोकधर्म की ओर ज़्यादा गरीब लोग ही जाते हैं। लोकधर्म में, उदाहरण के लिए, संस्कारों के लिए तो बहुत महत्त्व है, शिक्षा के लिए महत्व नहीं है। अजीब बात है! “बच्चे को संस्कार दो,” इस बात पर तो बहुत ज़ोर है, पर इतना ही ज़ोर इस पर नहीं है कि बच्चे को शिक्षा दो। ख़ासकर अगर बच्ची है, लड़की है, तब तो उसको संस्कार तो ज़रूर दो, शिक्षा दो या नहीं दो, “ठीक है, देख लेना, बहुत फ़र्क़ नहीं पड़ता।”
तो लोकधर्म ख़ुद गरीबी के बड़े कारणों में से एक है। और गरीब लोग चाहिए लोकधर्म की भीड़ बढ़ाने के लिए भी। और गरीबी, और शिक्षा एक साथ चलते हैं। गरीबी और ग़लत वैल्यू सिस्टम ये एक साथ चलते हैं; रॉन्ग वैल्यूज़, ग़लत मूल्य। इनमें से बहुत सारे ग़लत मूल्य तो ख़ुद लोकधर्म से आते हैं। वास्तव में, लोकधर्म की जिसने सच्चाई देख ली और लोकधर्म को छोड़ करके सच्चे धर्म की ओर आ गया, स्वधर्म की ओर आ गया, उसको एक फ़ायदा ये होगा कि उसकी गरीबी दूर होने लगेगी। और लोकधर्म में फँसे रहने का एक नुकसान ये होता है कि आप गरीब के गरीब बने रहोगे।
तो जिनको अपनी गरीबी भी हटानी हो, भले ही ये कामना की बात हो, ये कामना हो कि गरीबी ही हट जाए, तो उनके लिए भी ज़रूरी है कि वो वास्तविक धर्म की ओर आएँ। वेदान्त धर्म की ओर आएँ, जिसको मैं कई नामों से पुकारता हूँ, वेदान्त धर्म कह लो, वास्तविक धर्म कह लो, गीता धर्म कह लो, स्वधर्म कह लो, श्रुति धर्म कह लो, वो उसकी ओर आएँ।
लोकधर्म में तो फँसे रहने का मतलब ही है कि तुम्हारी गरीबी बनी हुई रहेगी।
भाई, कोई कारण होता है न कि कोई आदमी गरीब होता है, बहुत सारे बाहरी कारण भी होते हैं। बिल्कुल होते हैं बाहरी कारण, मैं उनको अनदेखा नहीं कर रहा। लेकिन कुछ भीतरी कारण भी होते हैं, भीतरी कारण।
जेम्स एलन की किताब है, “ऐज़ अ मैन थिंकथ।” वो कहाँ से आ रहा है? ऐज़ अ मैन थिंकथ, सो डज़ ही बिकमथ। माने, आपके जैसे विचार होते हैं, आपके ऐसे मूल्य होते हैं, उसी के अनुसार फिर आपकी जो बाहरी स्थिति है, वैसी भी हो जाती है।
मिश्रित बात है दोनों चीज़ें होती हैं, बाहरी परिस्थितियाँ भी और अंतःस्थिति भी। लेकिन मैं तो अभी भीतरी जो आपकी व्यवस्था है मूल्यों की, उसकी बात कर रहा हूँ, अंतःस्थिति की बात कर रहा हूँ, जो आपका इनर वैल्यू आर्किटेक्चर है, उसकी बात कर रहा हूँ। वो बहुत बड़ा रोल प्ले करता है इस बात में कि आप कहीं बिल्कुल गरीब ही तो नहीं रह गए। और वो जो इनर आपका वैल्यू सिस्टम है, आंतरिक मूल्य-व्यवस्था, उसको तो ये जो लोकधार्मिक संस्कार हैं, यही बढ़ाते हैं, इन्होंने ही गड़बड़ कर रखी है। बहुत तरह की गड़बड़ियाँ।
अब इतने सारे तो रस्मो-रिवाज़ हैं, जिनमें अंधाधुंध पैसा लगाया जाता है। ये क्या कल्चर का इकोनॉमिक मेल-इफ़ेक्ट नहीं है? आप लड़की के दहेज के लिए पैसा इकट्ठा करते रहते हो, उसकी पढ़ाई में नहीं लगाते। ये एक लोकधार्मिक अपसंस्कृति का आर्थिक परिणाम है।
कितने ही किसान हैं जो सिर्फ़ इसलिए आत्महत्या करते हैं क्योंकि उनके घर में बच्चा पैदा हो गया, या किसी की मौत हो गई, या शादी है, तो इसलिए उन्होंने कर्ज़ा लिया। और कर्ज़ा उन्होंने किससे लिया? वो गाँव के साहूकार से या किसी से ले लिया, और भारी ब्याज पर ले लिया। अब वो कर्ज़ा वो चुका नहीं पाए, उस साल मानसून फ़ेल हो गया या कोई और बात हो गई, दाम नहीं मिले ठीक से, तो अब वो कर्ज़ा चुका नहीं पाए। तो किसान को आत्महत्या करनी पड़ रही है।
आप कहोगे कि ये एग्रेरियन डिस्ट्रेस है। ये एग्रेरियन क्राइसिस है। ये एग्रेरियन क्राइसिस तो है, निश्चित रूप से है, पर ये कल्चरल क्राइसिस भी है। आप ये भी तो देखो कि आम आदमी पैसा खर्च कहाँ पर कर रहा है।
आम आदमी पैसा कमा नहीं पा रहा, इसमें भी जो एक पॉपुलर कल्चर है उसका एक रोल है। और आम आदमी जिन फ़ालतू जगहों पर पैसा खर्च करता है, उसमें भी तो जो ये लोकसंस्कृति है, इसका बहुत बड़ा किरदार है न। अनाप-शनाप ये चल रहा है, वो चल रहा है, उसमें पैसे खर्च किए जा रहे हैं। और उन पैसों का कोई आरओआई नहीं है। वो इन्वेस्टमेंट्स नहीं हैं, वो सिर्फ़ फ़ालतू के एक्सपेंडिचर्स हैं, जिनसे कुछ नहीं मिल व्यक्ति को। ख़ासकर गरीब व्यक्ति को उनसे कुछ नहीं मिलता, पर गरीब ही है जो सबसे ज़्यादा इन बातों में फँसा रहता है। क्योंकि जो गरीब होता है ज़्यादा संभावना है कि वो अशिक्षित भी होगा। गरीबी और अशिक्षा का बड़ा तगड़ा कोरिलेशन होता है।
ये देखो, ये एक सूरमा अभी पीछे छूटा। ये बारिश में हेलमेट उतारकर फ़ोन पर बात कर रहा है। और बारिश में अभी ठीक से कुछ दिखाई दे रहा है? मुझे ही नहीं दिखाई दे रहा, और ये आदमी बारिश में फ़ोन पर बात कर रहा है।
लोग कई बार आते हैं, पूछते हैं, “गरीबों की मदद करें कि नहीं करें?” मैं कहता हूँ, दिलोजान से करो। दिल खोल के मदद करो, लेकिन एक चीज़ जाँच लेना, कहीं वो गरीब अपनी गरीबी का कारण ख़ुद ही तो नहीं है। परख लेना कि वो गरीब अपनी गरीबी हटाना चाहता भी है कि नहीं। नहीं तो तुम्हारी जो मदद है, वो व्यर्थ जाएगी।
प्रश्नकर्ता: आचार्य, आप कह रहे थे कि लोकधर्म से गरीबी बढ़ती है। मतलब?
आचार्य प्रशांत: अरे भाई, जिसे तुम लोकधर्म कहते हो, उसमें बुद्धि-विवेक के लिए बहुत कम जगह होती है। इसमें बस ये होता है कि अगर तुमने फलाने-फलाने रस्मो-रिवाज़ निभा लिए, कर्मकांड कर लिए, इस-इस तरीके से तुम आचरण करते रहे, तो ईश्वर तुम्हारे साथ भला करेगा। “सब कुछ भगवान देख लेगा।”
भाई, देखना ख़ुद ही पड़ता है। भगवान भी तुम्हारी मदद करते हैं तुम्हारे भीतर तुम्हारी बुद्धि बन करके। भगवान बाहर से आकर के किसी की मदद नहीं करते। सुना है न, “जाते हरी विपदा देनी, ताकि मति आगे हर लेनी।” तो भगवान भी तुम्हारी मति के माध्यम से ही तुम्हारा भला या बुरा करते हैं। लोग अपनी मति ही नहीं चलाना चाहते।
अपनी बुद्धि, अपना विवेक नहीं लगाओगे, अपनी ज़िम्मेदारी नहीं उठाओगे, अपना कर्म और कर्मफल ख़ुद नहीं देखोगे, तो कोई ऊपरी ताक़त आकर के तुम्हारा कल्याण नहीं कर सकती।
लेकिन लोकधर्म आपको भाग्यवादी बना देता है और पर-निर्भर बना देता है। आपको लगने लग जाता है, “मैं क्या करूँगा, मेरे हाथ में तो कुछ है ही नहीं, मैं तो कठपुतली हूँ।
प्रश्नकर्ता: या क़िस्मत है।
आचार्य प्रशांत: क़िस्मत है। अपनी ही बहुत सारी मूर्खतापूर्ण कर्मों का फिर जब फल मिलता है, तो कह देते हैं, “वो क़िस्मत है।” वो क़िस्मत तो पता नहीं है कि नहीं, पर वो कर्मफल है और वो बुरा कर्मफल, इतना दुख देने वाला कर्मफल तुमने ख़ुद आमंत्रित किया है। और फिर कह देते हो कभी कि “क़िस्मत है”, कभी कह देते हो “भगवान की मर्ज़ी है।”
भगवान बाहर कहीं नहीं हैं, वो तुम्हारे भीतर बैठे हैं। और ये तुम्हें चुनना है कि तुम अपने अहंकार की सुनोगे या भगवान की सुनोगे। और भगवान अलग से नहीं तुमसे बोलते, भगवान तुमसे तुम्हारे ही विवेक के माध्यम से बोलते हैं। तुम्हारी ही जो सत्यनिष्ठा की आवाज़ है, वही भगवान की आवाज़ है। तुम्हारे ही विवेक की आवाज़ भगवान की आवाज़ है। तुम्हारे ही निर्मल प्रेम की आवाज़ भगवान की आवाज़ है। भगवान की आवाज़ कहीं बाहर से नहीं आएगी। तुम ही जब निश्चल, निष्कपट होकर के दुनिया को देखते हो, समझते हो और फ़ैसले करते हो, तो वो भगवान का फ़ैसला होता है। भगवान कोई बाहर से नहीं फ़ैसला करते। जब निष्काम हो जाते हो तुम, तो समझ लो तुम पर भगवान की कृपा हो गई। इसी को श्रद्धा बोलते हैं।
भगवान तुम्हारी कामना-पूर्ति के लिए थोड़ी होते हैं। कि तुमने कामनाएँ करीं, और कामनाएँ सब ऐसी ही उल जलूल, मूर्खतापूर्ण कामनाएँ। किसी प्रभाव में आकर कोई कामना उठ गई, कुछ हो गया, और फिर तुम उस कामना की पूर्ति के लिए चले जाते हो भगवान के आगे हाथ जोड़ने। ऐसे थोड़ी भगवान काम करते हैं। भगवान तुम्हारी कामना-पूर्ति के लिए नहीं हैं, भगवान तुम्हारी निष्कामना में हैं, निष्कामना।
पर लोकधर्म ने भगवान को क्या करा है?
कामना-पूर्ति का साधन बना दिया है। कि बाहर हैं कहीं भगवान, और उनके पास चले जाओ तो तुम्हारी कामना पूरी कर देंगे। नहीं, भगवान कामना पूरी करने का ज़रिया नहीं होते, भगवान तुम्हारी वो दृष्टि होते हैं जो देख लेती है कि ये सब कामनाओं का स्रोत क्या है, ये कामनाएँ असली हैं, नकली हैं, इन कामनाओं में कितना स्वार्थ भरा हुआ है। भगवान माने वो दृष्टि जो देख ले कि हमने भगवान को भी कामना-पूर्ति का साधन बना दिया। लोकधर्म ने भगवान को वहाँ बैठा दिया बाहर कहीं और तुमसे कह दिया, “तुम जाकर हाथ जोड़ो, मन्नत माँगो, तो तुम्हें लाभ होगा। और अगर तुमने भगवान की पूजा-वग़ैरह कर ली, और तुमने भगवान को प्रसन्न कर लिया तो उसके बाद भगवान तुम्हारी सब मनोकामनाएँ पूरी कर देंगे।”
ये क्या मज़ाक है?
और इन्हीं मज़ाकों से फिर गरीब और पक्की हो जाती है। इन्हीं मज़ाकों से आदमी पुश्त-दर-पुश्त, पीढ़ी-दर-पीढ़ी गरीब बना रहता है। भारत की गरीबी के कई कारण हैं, पर उनमें एक बड़ा कारण वो भी है कि हमने वास्तविक धर्म को बुझे बिना ही संस्कृति चला रखी है। वो भारत की गरीबी का बहुत बड़ा कारण है।
प्रश्नकर्ता: श्रम करते हुए भी वो गरीबी में ही रह जाता है।
आचार्य प्रशांत: हाँ, श्रम करता है, पर वो श्रम वैसा ही होता है जैसे कि बेचारे किसी पशु से श्रम कराया जा रहा है, और जो जानता ही नहीं वो श्रम क्यों कर रहा है। उस श्रम में बुद्धि-विवेक शामिल नहीं होता न। आप पशुओं को भी पकड़ लीजिए, आप उनसे श्रम कराते रहते हैं। इससे उन पशुओं का कल्याण थोड़ी हो जाता है।
बहुत अफ़सोस होता है देखकर, बहुत अफ़सोस होता है। गरीबी देखकर अफ़सोस होता है, और उससे ज़्यादा अफ़सोस होता है ये देखकर कि गरीब, गरीब ही बना रहना चाहता है। ज़्यादा बच्चे गरीब पैदा करता है। अरे भाई, तुम गरीब होक् तुम उतना ही बच्चा पैदा करो जिसको तुम अच्छा पालन-पोषण दे सको। पर गरीब ही होंगे जो उससे ज़्यादा बच्चे पैदा कर रहे होंगे। तुम ख़ुद अपनी गरीबी बढ़ा रहे हो।
और देखो, गरीब को गरीब रखने में न बहुतों का स्वार्थ है। ये सब राजनैतिक दल हैं। बताओ, अगर गरीब गरीब नहीं होगा, गरीब अगर खरीदा नहीं जा सकता तो इनको वोट कैसे मिलेंगे? गरीब गरीब है, तभी तो ₹500 में बिकता है बेचारा। इन्हें लोग गरीब चाहिए, इन्हें लोग अशिक्षित चाहिए, ये लोग अगर अशिक्षित नहीं रहे, समझदार हो गए, तो फिर इन्हें वोट कौन देगा? तो ये तो ख़ुद चाहते हैं कि गरीबी, अशिक्षा, ये सब बनी रहे और गरीब को ये बात समझ में नहीं आती। वो बिकने को तैयार हो जाता है। वो सब तरह के फ़ालतू मंचों के सामने भीड़ लाने को एकदम तैयार हो जाता है। जहाँ कहीं कोई फ़ालतू काम हो रहा होगा, वहाँ पर तुम गरीबों और अशिक्षितों की ही भीड़ देखोगे ज़्यादा।
कितनी अजीब बात है न, बेचारे गरीब, अशिक्षित आदमी को जो लोग अपने तारणहार लगते हैं, जो लोग अपने शुभचिंतक लगते हैं, वही वो लोग हैं जो चाहते हैं कि वो गरीब बना रहे।
क्योंकि जिस दिन वो गरीब नहीं रहा वो बिकेगा नहीं। जिस दिन वो गरीब नहीं रहा, उसका श्रम भी महँगा हो जाएगा। आप उसका श्रम इतनी आसानी से कौड़ियों के भाव खरीद नहीं पाओगे। और जिस दिन उसने सोचना शुरू कर दिया, जिस दिन उसकी विवेक की दृष्टि खुल गई, उस दिन न जाने कितने सिंहासन डोल जाएँगे और कितनी व्यवस्थाएँ चरमरा जाएँगी।
किसी का शोषण करना हो, तो सबसे अच्छा तरीका ये है कि शोषक शुभचिंतक बनकर आ जाए। कि “मैं ही तो तुम्हारा शुभचिंतक हूँ।” अब तुम जिसका शोषण कर रहे हो, वो अपने शोषक को ख़ुद अपने गले लगाएगा और अपना तारणहार मानकर पूजेगा।