
प्रश्नकर्ता: नमस्कार आचार्य जी। आचार्य जी, सबसे पहले तो मैं आपको बहुत धन्यवाद देना चाहूँगी, क्योंकि आपकी वजह से बहुत कुछ चेंज हुआ है लाइफ़ में। पहले मैं भी एक नॉर्मल-सी लाइफ़ स्पेन्ड कर रही थी; और जैसे एक पैटर्न, जिसकी आप बात करते हैं कि एक पैटर्न पर ही लड़कियों को चलने के लिए कहा जाता है और सभी को; तो मुझे भी ये था कि हाँ, ऐसे-ऐसे होगा, स्टडी होगी, फिर शादी होगी, उसके बाद सारा कुछ।
पर जब आपको सुनना शुरू किया, चार सालों से सुन रही हूँ आपको और आपकी बातें एकदम दिल को छू जाती थीं, और लगता था कि ऐसा जब हो सकता है तो हम सब एक अलग चाल क्यों चल रहे हैं? आप बोलते हैं कि शादी क्यों करनी है, उसका एक ठोस रीज़न होना चाहिए। तो फिर वो रीज़न थोड़ा तलाशना शुरू किया कि क्यों नहीं करनी मुझे शादी।
मैंने घर में जब बोला कि अभी तो नहीं करनी, क्योंकि घरवाले बहुत ज़्यादा प्रेशर कर रहे थे कुछ टाइम पहले। और उस टाइम थोड़ा-सा माइंड ऐसा हो गया था मेरा। फिर जब धीरे-धीरे आपको सुनना शुरू किया मैंने, तो थोड़ा-सा वो अवलोकन जो रहा, मैं वो शेयर करना चाहूँगी।
पहले तो, जैसे आप कहते हैं कि ‘देह को थोड़ा कम महत्त्व दो।’ तो एक बार अभी थोड़े टाइम पहले थोड़ा फ़ेस पर चोट लगी थी, तो स्टिचेस आए थे। मैंने नोटिस किया कि मुझे इतना दुख नहीं हो रहा है, जितना मेरे घर वालों को हो रहा था। वो बोल रहे कि “अरे, चेहरा बिगड़ गया है लड़की का, उस पर धब्बा लग गया है।” और थोड़ा उनको रहता है कि शादी के बाद है न, शादी कैसे होगी?
तो वहाँ जहाँ पर मैं स्टिचेस कराने जाती थी, ड्रेसिंग करवाई थी, तो वो ख़ुद मुझसे बोल रहे थे कि “तुम्हें बुरा नहीं लग रहा है कि मतलब ऐसा तुम्हारे साथ?” मैंने कहा, अब हो गया है, तो उसको बदल तो नहीं सकते न! ठीक है, अब रहेगा निशान, तो कुछ बड़ी बात नहीं हो गई है। और उसके बाद धीरे-धीरे मैंने फ़ील किया कि जैसे कॉस्मेटिक्स मैं थोड़ा बहुत पहले यूज़ करती थी, पर अब मैंने वो भी बिल्कुल कम कर दिया, बहुत हद तक।
और जैसे घरवाले कुछ बात करते हैं इस तरीके की, जैसे अभी, जैसे मैं आपसे जुड़ चुकी हूँ संस्था से फ़िलहाल, तो ये मेरे लिए बहुत सौभाग्य की बात है। तो अभी आने से पहले भी घर वाले बोल रहे थे। मम्मी को मैंने बताया, कि मेरा सिलेक्शन हो गया है। तो मम्मी बोलीं, कि पहले अपने घर पर पापा से और भाई से पूछो कि वो जाने देंगे या नहीं। तो मैंने उनको बोला, कि मैं आपसे पूछ नहीं रही हूँ, मैं आपको बता रही हूँ। डिसाइड मैंने कर लिया है कि मैं वहाँ जाऊँगी।
तो उसके बाद फिर देखा, कि मतलब घर पर पापा और भाई भी कुछ नहीं बोले उसके बाद ज़्यादा, क्योंकि मम्मी से उनकी बात हुई होगी जो भी। मेरा उनसे सामना नहीं हुआ इस बारे में, इस बात को लेकर कोई चर्चा नहीं हुई। तो ये चीज़ें मैंने नोटिस की अपने बारे में। और बेकार के जो इंसान थे, मेरे माइंड में विचार थे, और जो लाइफ़ में लोग थे बेकार के कुछ, वो ऑटोमैटिकली जाने लगे जब से मैं आपसे जुड़ी हूँ। ठीक है, ये मेरा था।
और अभी मेरा प्रश्न ये है, कि जैसे अभी आपसे जुड़ गई हूँ और मेरा आगे का ये है, कि आप ही के साथ जुड़कर के मुझे आपकी जो मिशन है उसको आगे बढ़ाना है। लेकिन घरवाले वही, उन्होंने मुझे बोला था कि ठीक है, तुम जा रही हो, बट एक साल तुम्हारा ठीक है। उसके बाद फिर शादी करनी है। और मुझे ऐसा फ़ील होता है, जब मैंने वो बातें सुनीं, पहले भी काफ़ी कुछ हुआ था घर पर, तो मुझे ऐसा फ़ील होता है कि मतलब सिर्फ़ एक साल है मेरे लिए। क्योंकि मैंने उनको साफ़ बोला हुआ है, कि मैं नहीं खुश रह पाऊँगी शादी के बाद; तो आप क्यों करवाना चाह रहे हैं?
तो वो बोलते हैं, कि सबकी होती है तो तुम्हारी भी होगी। और मैं जैसे आप, गीता से जुड़ी हूँ, और श्रीकृष्ण को मैं बहुत मानती हूँ, तो वो बोलते हैं कि आप श्रीकृष्ण को इतना मानती हैं, तो उन्होंने भी तो शादियाँ की थीं। शिव ने भी तो शादी की थी, भगवान शिव ने। तो ये तर्क देते हैं फिर मुझे, कि आप ही को क्यों नहीं करनी है? सब करते हैं, भगवान ने भी की है, तो आप क्यों नहीं कर रहे हो?
और उनको मैंने ये तक बोला, कि अगर शादी करूँगी आपके कहने पर, और बाद में मैं अपनी लाइफ़ में फिर कुछ भी करूँ, तो उससे आपको फिर कोई मतलब नहीं होना चाहिए। लेकिन सर, मैं ऐसा करना नहीं चाहती। क्योंकि ऐसा करने से तो फिर दूसरे की भी लाइफ़ ख़राब होगी ना। अब उनको ये चीज़ समझ नहीं आ रही। मुझे पता नहीं मैं कैसे समझाऊँ, समझ में नहीं आ रहा मुझे। थोड़ा सा आप मार्गदर्शन दें।
आचार्य प्रशांत: इससे अच्छा चाय पी लेना है। किन मुद्दों पर बुलवाते हो? क्यों बुलवाते हो? क्या बोलूँ इन मुद्दों पर? इंसान हो ज़िंदगी होश में जीनी है। होश माने, बिल्कुल साफ़-साफ़ समझना, मैं क्या कर रही हूँ, क्यों कर रही हूँ। सब साफ़-साफ़ समझकर के जो ठीक लगे, कर लो बाबा।
कोई श्लोक नहीं आता है ना उपनिषदों में, ना गीता में, जिसमें ‘विवाह’ शब्द एक बार भी उल्लिखित हो। उपनिषदों में महावाक्य छोड़ दो, जो साधारण सूत्र हैं, वो भी विवाह का उल्लेख तक नहीं करते। न ये कहते अच्छी बात है, न ये कहते बुरी बात है। वो कहते हैं, ये सब तुम देख लो। हम क्या बताएँ इसमें? उनका काम है हमें होश दे। बेहोशी में जो भी करोगे, गलत ही होगा। अब ज़्यादातर लोग बेहोश होते हैं, ये हम जानते हैं। वो बेहोशी में फिर ज़िंदगी की गाड़ी खींचे जाते हैं।
आप बेहोश होते हो तो अपने ऊपर तो विश्वास आएगा नहीं। तो जिधर सब दूसरों की गाड़ियाँ जाती दिख रही हैं, उन्हीं के पीछे-पीछे अपनी ज़िंदगी की गाड़ी भी लगा देते हैं। कोहरे में ऐसा होता है न? देखा है? कोहरे में लोग क़ाफ़िले बनाकर चलते हैं। एक-दूसरे को बिल्कुल नहीं जान रहे होते, पर पंद्रह-बीस गाड़ियाँ एक के पीछे एक लग जाती हैं कोहरे में। और सबको क्या भरोसा होता है? आगे वाला चल रहा है तो ठीक ही चल रहा होगा। उसमें सबसे आगे वाला है, निकले वो आगरा को, वो पहुँच दे जयपुर, तो पूरा क़ाफ़िला सीधे जयपुर पहुँचेगा।
हमें कुछ दिख नहीं रहा न, हमें लगता है सामने वाले को दिख रहा होगा। दिख किसी को कुछ नहीं रहा है। सब अँधे हैं। और यही सब अँधे लोग, सामने वाले अँधे को देख करके चल पड़ते हैं। और तर्क ये होता है, “सब चल रहे हैं, तो हम भी चल रहे हैं।” उसी से हम ज़िंदगी के सारे फ़ैसले कर लेते हैं। मात्र विवाह की बात नहीं है भाई, विवाह हमारी ज़िंदगी की पूरी कहानी का एक अध्याय है।
कोई नशे में पूरा उपन्यास लिख रहा हो, तो उसके हर अध्याय में वही बेहोशी होगी। ठीक जिस बेहोशी से हम शिक्षा लेते हैं, जिस बेहोशी से हम संस्कार लेते हैं, जिस बेहोशी से हम नौकरी–करियर लेते हैं, जिस बेहोशी से हम अपनी धार्मिक धारणाएँ लेते हैं, जिस बेहोशी से हम अपने तमाम तरह के मत और पूर्वाग्रह बनाते हैं, उसी बेहोशी से हम विवाह भी कर लेते हैं। ऐसा ही है न? तो मुद्दा विवाह का नहीं है, मुद्दा बेहोशी का है। आपको होश में रहने के बाद किससे क्या संबंध बनाना है, ये आपका व्यक्तिगत मसला है। आप जानिए।
न श्रीकृष्ण, न याज्ञवल्क्य, न अरुणी उद्दालक; ये सब बड़े सज्जन और बड़े विनम्र लोग थे। ये ऐसे नहीं थे कि किसी के सिर पर चढ़कर के उसका जीवन निर्धारित करें, डिक्टेट करें। श्रीकृष्ण को भी अर्जुन को कहना है कि “युद्ध करो,” तो समझा रहे हैं, थप्पड़ थोड़ी मार रहे हैं। बंदिश थोड़ी लगा रहे हैं, अनिवार्य थोड़ी कर रहे हैं। समझा रहे हैं, ज्ञान दे रहे हैं और बड़ी मेहनत कर रहे हैं। 18 अध्याय, 700 श्लोक; बोले, “समझा दिया, अब देखो तुम।”
और ये एक गहरे व्यक्तित्व की पहचान होती है, वो अपने आप को दूसरे के ऊपर कभी थोपेगा नहीं। वो चढ़ के नहीं बैठ जाएगा दूसरे की ज़िंदगी पर कि तुम्हें ऐसा अब करना ही करना है।
प्रेम दूसरे को विवश थोड़ी करता है; प्रेम ज़बरदस्ती थोड़ी करता है, कि करता है? तो जिन्होंने हमें गीता दी और उपनिषद् दिए, वो बड़े प्रेमी लोग थे। उन्होंने हमें समझा दिया, “देखो, ये तुम हो; यह तुम्हारा मन है। मन के केंद्र में ये है जिसे ‘अहम्’ बोलते हैं। अहम् के देखे ये जगत होता है। अहम् जब तक रहेगा, दुख होता है। अहम् इस कारण से बना रहता है। अहम् को ठीक से देखो और देखने में ही समाधान है।” बस इतना, बस। और इतना बोल करके वो विनम्रता-शालीनता के साथ, बिना शोर मचाए, चुपचाप पीछे हट जाते हैं। हस्तक्षेप नहीं करते, दख़ल-अंदाज़ी नहीं करते।
वो कहते हैं, जो चेतना हम में है, वही चेतना तो सुनने वाले में भी है; कोई विशेष तो होता नहीं। हमारा काम है उस चेतना की जागृति का प्रबंध करना, प्रेरणा और सही वातावरण देना। हमने उसको प्रेरित कर दिया कि वो जाने, समझे, देखे, अब इसके आगे हम हस्तक्षेप नहीं करेंगे। वो फिर इंटरफ़ेरेन्स हो जाएगा। हम किसी के जीवन में घुस करके उसकी गाड़ी के चालक नहीं बन जाएँगे।
हम आपको बता सकते हैं, “देखिए, गाड़ी माने ये होता है; गाड़ी का चालक होना ऐसा होता है; ये सड़क है, और सड़क का अर्थ क्या होता है; और मंज़िल माने क्या होता है। इतनी बातें हम आपसे कर सकते हैं। उसके बाद आप जानो, आपका काम जाने, आपका राम जाने। आपका जीवन है।”
अब आप वयस्क हो, एडल्ट हो। और वयस्क वयस्क, सब एक अर्थ में बराबर हो गए अब। किस अर्थ में? कि दोनों में ही पूरी संभावना है उनकी चेतना के खिलने की। एक 45 वर्ष का वयस्क या 50 वर्ष का वयस्क एक 25 साल वाले पर किस अधिकार से चढ़ बैठता है, ये मेरी समझ से बाहर है। चाहे वो उम्र का अधिकार हो, या रिश्ते का अधिकार हो, या लिंग का अधिकार हो। आमतौर पर यही तीन अधिकार बताए जाते हैं; हमारी उम्र तुमसे दूनी है; तुम 25 के हो, हम 50 के हैं; रिश्ते में हम तुम्हारे बाप लगते हैं; और तुम लड़की हो, हम पुरुष हैं। ये तीन अधिकार बताए जाते हैं। इन तीन अधिकारों से हम तुम्हारे जीवन पर चढ़ बैठेंगे!
और वेदांत ने तो हमें बताया है कि अनुभव से बोध तो नहीं आ जाता। पचास साल तो बहुत कम होते हैं, पाँच सौ साल भी आप जी लो, तो बोध थोड़ी आ जाएगा। उम्र और अनुभव का बोध से तो कोई संबंध नहीं। और न हम ये कह रहे हैं कि पच्चीस के होने से बोध पैदा हो जाता है। समझ में आ रही है बात? तो एक वयस्क की तरह आपको देखना है, अपनी ज़िंदगी में किधर को आगे बढ़ना है, कैसे कमाना है, कैसे खाना है, किससे रिश्ता बनाना है, आप जानो।
और इन मुद्दों पर ये तो छोड़ दो कि किसी के निर्देश मानने चाहिए, मैं यहाँ तक कहूँगा: इन मुद्दों पर सलाह भी किसी से भी बहुत सोच-समझकर लेनी चाहिए। उसी से सलाह लो जिसका पता है कि वो सलाह देने लायक है। और हो सके तो किसी सलाह मत लो। ये जो बिल्कुल जीवन के एकदम व्यक्तिगत मुद्दे होते हैं, मुझे याद ही नहीं पड़ता, मैंने किसी से भी इनकी चर्चा भी करी हो; सलाह तो बहुत दूर की बात है। न निर्देश, न सलाह, मैंने चर्चा तक नहीं करी।
मेरे हृदय का प्रश्न है, भाई, मुझे इसमें नहीं आवश्यकता लग रही कि मैं किसी से इसका उल्लेख भी करूँ। मैं देख लूँगा। बात बहुत आंतरिक है, बहुत आत्मिक है। हम तो तन उघाड़ते हुए भी थोड़ा लजाते हैं न? लजाते हैं न? ऐसे ही कहीं चले जाओ और कोई बोले “कपड़े उतार दो।” तो आप कहोगे, “क्या कह रहे हो?” तो मन उघाड़ते हुए लाज क्यों नहीं आती? मन तो और अंदरूनी होता है? बाहर की चीज़ें दिखाते हुए तो शर्म नहीं आती न। कोई आपका कपड़ा देख ले, आपको कोई शर्म आ जाती है उसमें? कपड़े तो आप दिखा ही रहे हो अपने, कोई शर्म आ जाती है उसमें? क्योंकि बहरी है।
फिर आप कहते हो, शरीर इस बाहरी कपड़े की अपेक्षा थोड़ा भीतरी है। तो शरीर दिखाते हुए थोड़ा-सा ठिठकते हो, ठिठकते हो न? कपड़े दिखाते तो नहीं ठिठकते। और कपड़ों में भी कुछ कपड़े बाहर के होते हैं, कुछ कपड़े अंदर के होते हैं। बाहर के कपड़े बिल्कुल आसानी से दिखा देते हो, दिखा ही देते हो, प्रदर्शन ही करते हो, “ये देखो मेरे बाहर के कपड़े, ये देखो, ये देखो।” दिखाते ही हो। भीतर के कपड़े उतनी आसानी से नहीं दिखाओगे। चलो, भीतर के भी दिखा दिए। अब उसके बाद कोई कहे, “शरीर ही दिखा दो।” तो वहाँ और ठिठकोगे, कहोगे, “शरीर ऐसे कैसे दिखा दें!”
पर शरीर से भी और ज़्यादा अंदर का, और ज़्यादा भीतर का क्या होता है? मन। वो कैसे किसी के सामने खोल देते हो? जब तन नहीं खोल सकते, तो मन कैसे खोल देते हो? इतनी गहरी, इतनी भीतरी बात, ये कोई और तय करेगा? क्यों तय करेगा? तुम पागल हो? विक्षिप्त हो? होश में हो? क्या हो? रिटार्डेड हो? क्या हो? कि तुम्हारे ये सारे फैसले कोई और ले तुम्हारे लिए, बोलो। ये लाज की बात होती है, कि इन मुद्दों की चर्चा किसी ने छेड़ भी दी। हाउ डेयर यू?
आपके शरीर के भी मसले होते हैं, कोई उनकी आपसे चर्चा करनी शुरू कर दे, आपको अच्छा लगता है क्या? कोई आपसे पूछे, कि ज़रा अपने शरीर का आकार बताना, आप बताते हो आसानी से? बल्कि तुरंत, ऐसे उसको गुर्रा के देखोगे, क्रोध की आँखों से, “ये क्या सवाल पूछ रहे हो?” और शरीर का कितना भी गुप्त मसला हो, मन का मसला तो उससे ज़्यादा ही गहरा होगा न। तो आपके मन के मसलों पर कोई आपसे कैसे चर्चा करने आ जाता है? चाहे कोई भी हो।
आप सलाह माँगे, बहुत अच्छी बात है। सलाह आपको कोई दे दे, बहुत अच्छी बात है। पर सलाह माँगी नहीं, और मुझसे तो आप अभी सलाह भी माँग रहे हो, तो भी मुझे हिचक हो रही है बोलते हुए। और बार-बार मैं यही दोहरा रहा हूँ, हर दूसरे मिनट में, कि ख़ुद देख लो। इन मुद्दों पर सलाह नहीं माँगी जाती। मत पूछो किसी से भी, कोई ज़रूरत नहीं है। पूछना अपराध है, पाप है पूछना। और अगर पूछो, तो उससे पूछो जो फिर कुछ गीता जैसा ही बता दे। और गीता में ‘विवाह’ शब्द नहीं है।
किसी ऐसे से पूछो जिससे बात करो विवाह की और वो कहे, “विवाह हटाओ, छोटी बात है। आओ, जीवन के बड़े मुद्दों पर बात करते हैं। बड़ी चीज़ें सुलझ जाएँगी, तो छोटी चीज़ अपने आप सुलझ जाएगी। बड़ी बीमारी दूर हो गई, तो छोटी बीमारियाँ पीछे की ओर अपने आप हट जाती हैं।” बड़ी बीमारी क्या है? बेहोशी। बड़ी बीमारी क्या है? झूठी चेतना, फ़ॉल्स कॉन्शसनेस।
फ़ॉल्स कॉन्शसनेस, माने, झूठा ज्ञान जो हमने भर रखा है मन में, फ़ॉल्स नॉलेज। वो बड़ी बीमारी है, वो हटा दो।
ऐसा कुछ नहीं है कि संसार की तरफ़ का नियम है कि विवाह करो और अध्यात्म की तरफ़ का नियम है, विवाह मत करो। ऐसा कोई नियम नहीं है। संसार की तरफ़ का भले ही नियम होगा कि “विवाह करो।” अध्यात्म की तरफ़ का ऐसा कोई नियम नहीं कि विवाह करो या न करो। अध्यात्म इन मुद्दों पर क्या हो जाता है? चुप, मौन। कहता है, बहुत छोटी बात है; इस पर हम कुछ नहीं बोलेंगे। बहुत छोटी बात है। समझो, समझो, बस समझो। समझ गए, तो छोटी बात है। बिना समझे अगर इस चीज़ में कूद पड़े, तो ये बहुत बड़ी बात हो जाएगी। फिर ज़िंदगी तबाह हो जाती है।
आम आदमी की ज़िंदगी दो गलत निर्णयों से तबाह होती है, अच्छे से समझ लो इस बात को; एक नौकरी, एक शादी। यही दो निर्णय होते हैं जो जीवन को बना देते हैं या बिगाड़ देते हैं।
तुम कहाँ काम कर रहे हो, और तुमने किससे गाँठ बाँध ली है; ये दोनों चीज़ें जिसकी ठीक हैं वह जीते-जी स्वर्ग में है। और आम आदमी की ये दोनों ही चीज़ें बिल्कुल बर्बाद होती हैं। वो गलत जगह गलत काम कर रहा होता है, और गलत बंधनों में बँधा बैठा होता है घर में अपने। उसका दफ़्तर भी गलत होता है, उसका घर भी गलत होता है। बताओ बचा क्या? इन दो के अलावा तो कुछ करते नहीं न। दिन भर कहाँ होते हो? या तो काम कर रहे होते हो, या फिर अपने घर में होते हो, खा रहे हो, बना रहे हो, सो रहे हो, कुछ कर रहे हो। किसी के ये दोनों ही ख़राब हों, वो जिएगा कैसे?
हमारे ये दोनों ही ख़राब होते हैं, क्योंकि हममें विवेक नहीं होता। और विवेक, तो देखो उनके ही पास रहने से मिलता है जिन्होंने मेहनत करी है स्वयं को, जीवन को जानने में। इसी को अध्यात्म कहते हैं। अध्यात्म कोई वो थोड़े है कि, हुलूलू, जादू टोना, मंत्र, ये-वो, प्रेत बुला लूँगा, चुड़ैल भगा दूँगा; ये थोड़ी अध्यात्म होता है।
अध्यात्म माने क्या होता है? आत्मज्ञान। अध्यात्म और तो कुछ होता नहीं। ये कान इसलिए नहीं है कि सबकी सुनते फिरो। जहाँ पाओ आत्मज्ञान है, वहाँ सुनो। ये आँख भी इसलिए नहीं है कि जो कुछ मिला, देख लिया, जो मिला सब पढ़ लिया। जिस किताब/ग्रंथ में पाओ कि बात हो रही है ‘अहम्’ की और ‘मुक्ति’ की, बस वही ग्रंथ पढ़ने लायक है। बाकी तो पुस्तकें हैं। उन्हें न ‘ग्रंथ’ बोल सकते, न ‘शास्त्र’ बोल सकते, भले ही उन पर धार्मिक ठप्पा लगा हो।
ये किस्से-कहानियों की बहुत सारी किताबें हैं जो अपने आपको ‘धार्मिक’ बोल देती हैं। वो किताबें नहीं बोल रही हैं, उन किताबों से जिनका स्वार्थ जुड़ गया है, वो बोल देते हैं कि धार्मिक किताब है।
धार्मिक किताब सिर्फ़ वो है जिसमें मात्र इन दो की बात हो, अहम् और मुक्ति। इसके अलावा कोई धार्मिक मुद्दा होता ही नहीं है। तो आँख इसलिए है कि जो वास्तविक किताब है आत्मज्ञान की, वो पढ़ो। कान इसलिए हैं, जो आत्मज्ञानी है उसे सुनो। और जो आत्मज्ञानी है, वो विवाह की बात करेगा नहीं। जो आत्मज्ञान की किताब है, वो भी विवाह की बात करेगी नहीं। तो ये मुद्दा तो साहब ऐसा है कि आपको ख़ुद ही देखना होगा। देख लो।
आप कहोगे, “गीता में मैं खोज रही हूँ कि ब्लैक के साथ वायलेट अच्छा लगता है कि नहीं।” तो मिलेगा क्या? जाकर किसी ज्ञानी से पूछो कि “हाउ डज़ बरगंडी सूट मी?” तो क्या बोलेगा? बोलेगा, “दुर्घटना मेरे साथ हुई कैसे कि आपसे सामना हुआ! क्या पूछ रहे हो देवी?” ये कोई मुद्दे ही नहीं हैं। समझो बात को।
और संसारि में और ज्ञानी में अंतर यही होता है, संसारि के लिए ये बहुत बड़ा मुद्दा होता है, “शादी रे, लड़की जवान हो गई!” लड़की को भी पता नहीं होता वो जवान हो गई है। घर में बाप को ज़्यादा पहले पता चलता है, “जवान हो गई है।” जाने कौन-सी नज़र है बाप की। और पीछे पड़ जाएँगे, और बाप को भी न पता चले तो चाचा को पता चलेगा, पड़ोसी को पता चलेगा। कहेंगे, “आपको एक ख़बर देनी है।” क्या? “लड़की आपकी जवान हो रही है।” हमें तो पता ही नहीं था! जन्म तो तूने दिया है, डेट ऑफ बर्थ तू ज़्यादा जानता है।
संसारी माने, वो जिसके लिए दो कौड़ी के मुद्दे बहुत बड़े हैं, “लड़की जवान हो रही है।” बड़ा मुद्दा हो गया! अरे, सब जवान होते हैं! कोई अनहोनी घट गई क्या? हाँ, हो रही है जवान, क्या करें? यूनाइटेड नेशंस में ख़बर करें? इतनी बड़ी क्या बात हो गई लड़की जवान हो रही है तो? तू भी जवान हुआ, मैं भी जवान हुआ, सब जवान होते हैं। पेड़ पर एक फल भी लगता है तो वो भी पकता है। इसमें ऐसी क्या बात हो गई?
पर देखा है, ऐसे “एक ख़ुफ़िया बात पता चली अभी-अभी।” जैसे बताना चाहते हों कि “चीन ने अपनी न्यूक्लियर मिसाइल…।” एकदम हाँ, वैसे आके बताएँगे, “आपकी लड़की जवान हो रही है” (कान में फुसफुसाते हुए बोलना)।
लड़की जवान हो रही हो न हो रही हो साहब, आप बड़े नहीं हो पाए। आप अभी बालक-बुद्धि ही रह गए, आपको यही बातें बहुत बड़ी लगती हैं कि लड़की जवान हो रही है। अध्यात्म के लिए सारी बातें छोटी हैं। तो ये छोटी-सी बात है, कुछ नहीं रखा इसमें। बड़ा मुद्दा क्या है? बड़ा मुद्दा ज़िंदगी है। तुम पैदा हुए हो कि जानो, समझो, सीखो, जीवन भर। असिन बरस की हो जाओ, तब भी सीखते रहना।
अभी किसने तो भेजा, एक-सौ-एक साल के हैं वो टेनिस खेल रहे हैं। मैंने कहा, ये मुझे भेजते ही रहना, जब तक मर न जाऊँ; छूटना नहीं चाहिए मेरा भी। वैसे ही एक और था, वो पिचानबे साल की दादी, और स्विमिंग में वही नहीं था कि बस वो यहाँ से कूद रही हैं, वो जो ऊपर प्लैंक होता है न, उसको क्या बोलते हैं?वहाँ से कूद रही हैं, वो 92-95 साल की दादी, और वो तैरती जा रही, हैं, तैरती जा रही हैं, एक के बाद एक, तीन उनके रिकॉर्ड! तुम इसलिए पैदा हुए हो।
घूँघट! कर लो शादी मुझे कोई आपत्ति नहीं। किसी को क्यों कोई आपत्ति हो? अर्जुन ने शादी कर रखी थी, तो क्या उन्हें गीता नहीं सुनाई श्रीकृष्ण ने? शादी न अच्छी बात है, न बुरी बात है; छोटी बात है। तुम कर लो, तो भी ठीक। तुम न करो, तो भी ठीक। तुम्हारा मुद्दा, तुम जानो। करनी है कर लो, नहीं करनी मत करो। किसी के साथ रहना है, रहो। किसी के साथ नहीं रहना, मत रहो। सब एक बात है, कुछ नहीं हो गया इससे।
बड़े मुद्दे दूसरे होते हैं। जब अस्सी साल की हो जाओगी तब पूछूँगा। कैसे पूछूँगा मैं तो हूँग़ा नहीं। पर समझ लो कि पूछ रहा हूँ, कि “साइकिल चलाना छोड़ तो नहीं दिया?” ये है बड़ा मुद्दा। नब्बे की हो जाओगी, तब भी पूछूँगा “भजन गाना छोड़ तो नहीं दिया?” ये है बड़ा मुद्दा। ये होते हैं बड़े मुद्दे। अब उसमें तुमने शादी करी कि नहीं करी, बच्चे हुए कि नहीं हुए, हुए तो हुए नहीं हुए तो नहीं हुए, कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। आ रही है बात समझ में?
आँख बिल्कुल एकदम ग़ायब होने लगे, इतना मोटा चश्मा लग जाए, तब भी पढ़ते रहना। इतना अच्छा और इतना विराट साहित्य है दुनिया भर में पढ़ने के लिए। क्यों नहीं पढ़ना है? हम पढ़ेंगे। और जब आँख एकदम ग़ायब हो जाए कि अब कुछ नहीं दिखाई दे रहा, तो कान से सुनो। अब दिखाई नहीं देता, तो हम कान से सुना करते हैं। और जब तक ऐसे ही न हो जाओ कि चले तो गिरने ही लग गए, तब तक घूमते रहना। बहुत न दूर जा पाओ, तो कम से कम जिस क्षेत्र में हो, वहाँ घूमो। और अभी अगर ताक़त बची हो तो पूरा देश घूमो; ताक़त भी बची हो, पैसा भी हो, तो पूरी दुनिया घूमो।
ये बड़ी बातें होती हैं, कि जा रहे हो और फ़्लाइट पर बैठ रहे हो, तो वहाँ पर वो पचीस साल की एयर-होस्टेज़ है; वो भी तुम्हें देखे और कहे, कि “ये है! असली यह है! मैं 28 की हूँगी, लेकिन दम तो इस 75 साल वाली में है!” ये होती हैं बड़ी बातें ज़िंदगी में।
आ रही बात समझ?