जो जितना ज़्यादा दूसरों की नज़रों में अपनी झूठी छवि बनाकर रखना चाहता है, उस पर तानों का उतना ज़्यादा असर होता है। अगर तानों से बचना है, तो दूसरों की नज़रों में अपनी छवि की परवाह करना छोड़ो। आपको इसलिए बुरा नहीं लगता कि किसी ने आपको कुछ ग़लत बोल दिया, आपको इसलिए बुरा लगता है कि जो सच आपने छुपा रखा था, उसने वह खोल दिया। इतने बेहतर हो जाओ कि छुपाने के लिए कम-से-कम रहे। और बेहतर होने के बाद भी जो कमज़ोरियाँ बची रहें, उनको उद्घाटित रखो, प्रकट रखो।
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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी तानों को कैसे हैंडल करें? जैसे कि कोई परिवार में कहे कि तुम इतना तो हमारे लिए कर ही सकते हो न। अगर ताने क्लेश का कारण बन जाऍं तो क्या एक साधक को उन क्लेशों में पड़ना चाहिए या तानों और क्लेशों की वजह से उसे ऊपरी दिखावा कर लेना चाहिए या कोई अन्य मार्ग भी है?
आचार्य प्रशांत: जिन्होंने पूछा है उनका क्या नाम है लिखा है? मान लो उनका नाम है सुशीला। ठीक है? अब सुशीला जी कहीं चली जा रही हैं, पीछे से कोई बोले, ‘अरे। ये नीला तो बेवकूफ़ है।’ इनको बुरा लगेगा? क्यों नहीं लगेगा? क्यों? क्यों नहीं लगेगा बुरा? क्योंकि इन्हें पूरा विश्वास है कि ये नीला नहीं हैं, पूरा विश्वास है कि ये नीला नहीं है। लेकिन अगर कोई पीछे से बोल दे कि सुशीला बेवकूफ़ है, तो बुरा लग जाता है क्योंकि आपको विश्वास है कि आप सुशीला हो।
आप बात समझ रहे हो कहाँ को जा रहे हैं हम?
आपको जब पक्का ही पता हो कि सामने वाला जो बोल रहा है उसका कोई सम्बन्ध आपसे नहीं है दूर-दूर तक भी, तो आपको बुरा नहीं लगता। आपको बुरा लगता ही तब है जब आपको कहीं-न-कहीं ये पता होता है, या कम-से-कम संदेह होता है कि उसकी बात में थोड़ा-बहुत तो सच है। आपको बुरा ये नहीं लगता कि उसने आपको कुछ ग़लत बोल दिया, आपको बुरा ये लगता है कि जो सच आपने छुपा रखा था उसने वो खोल दिया।




