ईर्ष्या का आख़िरी इलाज

Acharya Prashant

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ईर्ष्या का आख़िरी इलाज
जब अपनी ज़िंदगी का पता होता है तो दूसरों से ईर्ष्या नहीं होती। दूसरों से आप बहुत तुलना करना ही नहीं चाहते क्योंकि अब ‘me versus you’ नहीं होता, अब ‘me versus me’ होता है। दूसरे को देखकर आप एक प्रेरणा ले सकते हो, लेकिन उसकी जो तरक़्क़ी देखोगे, वो उसकी तुलना में देखोगे। हम गड़बड़ ये कर देते हैं कि उसकी तुलना अपने आप से करने लगते हैं, जबकि हर व्यक्ति की स्थिति और स्थान बिल्कुल विशिष्ट होता है। यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।

प्रश्नकर्ता: नमस्कार आचार्य जी। मेरा नाम ईशा है और मैं सी.ए. स्टूडेंट हूँ। सर, कुछ लाइन्स कोट कर रही हूँ मैं बुक में से: “जेलेसी इज़ बॉर्न फ्रॉम डिपेंडेंस। द वन हु इज़ नॉट डिपेंडेंट इज़ फ़्री ऑफ़ जेलेसी। द वन हु इज़ हिज़ ओन मास्टर कैन नॉट बी जेलेस। इफ़ यू वांट टू बी फ़्री ऑफ़ जेलेसी, सी क्लियरली व्हेयर यू आर लीनिंग ऑन अदर्स टू डिफ़ाइन योरसेल्फ।”

जैसे कि मैं अपनी बात करूँ तो जब भी मैं अपनी एज के विद्यार्थियों से मिलती हूँ तो मेरा क्या रहता है, जब मुझे उनके बारे में पता चलता है कि वो मुझसे किस-किस क्षेत्र में कितना आगे हैं। तो इसमें मेरी उन पर डिपेंडेंस नहीं है किसी चीज़ को लेकर, पर जेलेसी तो तब भी है। तो इस चीज़ को, मतलब समझ नहीं आ रहा कि लाइन्स क्या सजेस्ट कर रही हैं। जेलेसी और डिपेंडेंस का क्या रिलेशन है?

आचार्य प्रशांत: है भाई, डिपेंडेंस है।

प्रश्नकर्ता: मतलब डिपेंडेंस मेरी मेरे घर वालों पर।

आचार्य प्रशांत: आपके घर वालों की भी उन पर डिपेंडेंस है। बताता हूँ कैसे।

आपके 70% मार्क्स आए हैं। हमारी तो सारी जो एजुकेशन है वो तो आउटपुट और रिज़ल्ट सेंट्रिक होती है न। तो पढ़ा क्या, सीखा क्या, उससे भीतर बदला क्या, इस पर तो हमारा ध्यान नहीं है। हमारा तो आउटपुट, पहले मार्क्स और फिर उसमें से प्लेसमेंट, नौकरी वग़ैरह लग जाए। तो आपके 70% मार्क्स आए। आपको और फैमिली मेंबर्स को पता चला कि एवरेज मार्क्स 45% ही हैं। आपका घर में कैसा स्वागत होगा? आपके पूरी यूनिवर्सिटी या कॉलेज में जो एवरेज मार्क्स हैं वो 45% हैं पर आपके 70% आए हैं। तो आपका घर में कैसा स्वागत होगा?

प्रश्नकर्ता: बहुत अच्छे से।

आचार्य प्रशांत: बहुत अच्छे से होगा। आपके 70% मार्क्स आए। घर वालों को पता चला एवरेज मार्क्स ही कॉलेज में 80% है। अब कैसा स्वागत होगा?

प्रश्नकर्ता: सुनाएँगे तो बुरा लगेगा।

आचार्य प्रशांत: तो रिलेटिव हो गया न मामला, दूसरों से। इसी को तो डिपेंडेंस कहते हैं। हाउ यू आर बीइंग रिसीव्ड एट होम इज़ डिपेंडिंग नॉट सो मच ऑन योर मार्क्स बट ऑन द परफ़ॉर्मेंस ऑफ़ अदर्स। तो अब जेलेसी होगी। भले ही डायरेक्ट कम्पैरिजन आप किसी व्यक्ति से न कर रहे हों, लेकिन हम डायरेक्टली ख़ुद को भी तो नहीं देख पा रहे न।

हम जब भी ख़ुद को देखते हैं, दूसरों की तुलना में देखते हैं, इन रिलेशन टू अदर्स, ऐज़ अ फ़्रैक्शन ऑफ़ अदर्स। ख़ुद को सीधे देखना, वो सारी विसडम, सारी स्पिरिचुअलिटी के केंद्र में होता है। सीधे ख़ुद को देख पाना — बिना समाज की आँखों का इस्तेमाल करे, बिना अतीत की आँखों का इस्तेमाल करे, सीधे ख़ुद को देख पाना। ये नहीं कि मेरे सत्तर आए हैं, लेकिन उसके तो चालीस ही हैं, तो मैं तो कूल हो गई। और मैंने बहुत अच्छा किया। लेकिन जिसे हम अध्यात्म, स्पिरिचुअलिटी कहेंगे, उसके केंद्र में क्या आता है? आत्मज्ञान, सेल्फ नॉलेज। और सेल्फ नॉलेज का मतलब ही यही होता है कि दूसरे पर आश्रित नहीं हूँ स्वयं को जानने के लिए।

हम तो पूरी तरह से दूसरों पर आश्रित होते हैं। रिज़ल्ट अच्छा आया या बुरा आया, ये कहाँ आप पर डिपेंड कर रहा है? कहाँ?

बहुत सारे इंस्टीट्यूशन्स में स्टूडेंट्स को जब ऑप्शनल चूज़ करने होते हैं तो वो ये भी देखते हैं कि और कौन से लोग हैं, जो उस ऑप्शनल कोर्स को रजिस्टर कर रहे हैं। बताओ क्यों? क्योंकि जो टॉपर्स हैं अगर सबने वो कोर्स ले रखा है तो उसमें ग्रेड अच्छा नहीं लगेगा, रिलेटिव ग्रेडिंग होती है। तो जहाँ भी वो देखते हैं कि जो कॉलेज का क्रीम क्राउड है वो आ रहा है, वो उसको अवॉइड करेंगे। वो कहेंगे, “भाई इसमें ग्रेड अच्छा नहीं लगेगा।” वो ये बाद में देखते हैं कि उस कोर्स में कंटेंट क्या है, और प्रोफेसर की कैपेबिलिटी, क्वालिफ़िकेशन क्या है। ये चीज़ बाद में देखते हैं वो, वो पहले ये देखते हैं कि इसमें कम्पटीशन कैसी है।

जब मैंने स्क्वॉश सीखना शुरू करा था तो जो मेरे कोच थे, उन्होंने कहा कि इंडिया में बहुत हैवी एनरोलमेंट रहता है। स्क्वॉश में 11 से 15 साल ये जो ऐज ग्रुप है इसके बीच में, और ये परफ़ॉर्म भी अच्छा करते हैं। मैंने कहा फिर क्या हो जाता है? बोले, फिर वही हो जाता है जो होने के लिए इनके पेरेंट्स ने इनको स्क्वॉश दिलवाया था। मैंने पूछा, मतलब क्या? बोले, इंडिया में स्क्वॉश अभी बहुत पॉपुलर नहीं है।

पेरेंट्स स्क्वॉश में बच्चों को इसलिए भेजते हैं कि इसमें कम्पटीशन कम है। जब कम्पटीशन कम है तो कुछ नेशनल रैंकिंग आ जाएगी। जब नेशनल रैंकिंग आ जाएगी तो उस नेशनल रैंकिंग के दम पर किसी कॉलेज में एडमिशन मिल जाएगा। एक बार कॉलेज में एडमिशन मिल गया तो काम पूरा हो गया न। कॉलेज में तो आप प्लेसमेंट के लिए आते हो, स्क्वॉश ख़त्म।

अब सोचो, जो ये सोच कर के हाथ में रैकेट ले रहा है, वो क्या दिल लगाएगा खेलने में? और उसके पेरेंट्स भी उसको किस तरह से इस्तेमाल कर रहे हैं।

जब अपनी ज़िंदगी का पता होता है तो दूसरों से ईर्ष्या नहीं होती।

दूसरों से आप बहुत तुलना करना ही नहीं चाहते क्योंकि अब मी वर्सस यू नहीं होता। अब मी वर्सस मी होता है। जेलेसी का मतलब होता है मी वर्सस यू। और ईमानदारी का मतलब होता है मी वर्सस मी। मी वर्सस मी का तो हमें कोई प्रशिक्षण मिलता नहीं न। और जबकि वही सच्चाई है, इसमें कोई आदर्शवाद नहीं है।

मैं जैसा भी हूँ, वहीं से तो मुझे शुरुआत करनी है। मैं जहाँ पर भी हूँ, वहीं से तो मुझे बेहतर होना है न। तो ये तो एक तथ्यात्मक, फ़ैक्चुअल बात है कि इंप्रूवमेंट तो हमेशा मी वर्सस मी ही होगा। हाँ, दूसरे को देख कर के आप एक इंस्पिरेशन ले सकते हो कि देखो वो कहाँ था, वहाँ से कहाँ पहुँच गया। लेकिन वो भी आप उसकी जो तरक़्क़ी देखोगे, वो उसकी तरक़्क़ी उसकी तुलना में देखोगे। हम गड़बड़ ये कर देते हैं कि उसकी तुलना अपने आप से करने लगते हैं, जबकि हर व्यक्ति की स्थिति और स्थान बिल्कुल विशिष्ट, यूनिक होता है। तो इसमें टेक्निकल प्रॉब्लम आ जाती है। समझ रहे हो न आप?

दूसरे से तुलना करना कोई नैतिक आधार पर, मॉरल आधार पर, किन्हीं आदर्शों के कारण गलत नहीं है। दूसरों से तुलना करने में व्यावहारिक दिक़्क़त है। वो लगभग ऐसी बात है कि आप वहाँ पर हैं, मैं यहाँ पर हूँ और मैं आपसे ये तुलना करूँ कि हम दोनों में से जल्दी से इस दीवार को कौन छू देता है। और मैं पाऊँ कि मैं बार-बार हार रहा हूँ तो मुझे फिर आपसे ईर्ष्या हो जाए, जेलेसी हो जाए।

मुझे ये नहीं देखना है कि आपकी तुलना में मैं इस दीवार को जल्दी छू पाता। आप ही छुओगे, आप प्रिविलेज्ड हो। मुझे ये देखना है कि अभी मैंने अपने पहले प्रयास में कितना समय लगाया इसको छूने में। मैं उठा, मैं गया, कुछ सेकंड, एक-दो सेकंड जो भी है लगे, और फिर मुझे देखना है कि दोबारा जब कोशिश कर रहा हूँ तो बेहतर हो पाया कि नहीं। मी वर्सस मी।

बट दैट्स नॉट हाउ पेरेंट्स ऐंड अदर्स लुक एट इट। आर.जी. (रिलेटिव ग्रेडिंग) बहुत सारे कैंपसेस में चलती है। आप में से कितने लोगों के कैंपसेस में होती है रिलेटिव ग्रेडिंग? हाँ, वो रिलेटिव ग्रेडिंग किस कारण से है, मैं जानता हूँ उससे कुछ लाभ है। पर उससे एक ये बड़ा नुकसान होता है कि आप हर समय दूसरों की ओर देख रहे होते हो और एवरेजेस से अपने आप को कम्पेयर कर रहे होते हो।

प्रश्नकर्ता: सर, फिर मुझे बहुत प्रॉब्लम हो रही है। जैसे क्या है, मैं आपको सुनने लगी हूँ तो मुझे इस चीज़ की क्लैरिटी है कि मुझे मी वर्सस मी देखना है। बट वही पेरेंट्स का वही माइंडसेट है कि बाकियों को देख, वो कितना…।

आचार्य प्रशांत: तो आप पेरेंट्स पर क्यों डिपेंड कर रहे हो अपने असेसमेंट के लिए? पेरेंट्स का माइंडसेट है, उन्होंने आपको असेस करा। ठीक है उन्होंने कर लिया, उनका अपना बैकग्राउंड है, उनकी अपनी कंडीशनिंग है। उनके अपने अनुभव की एक धारा रही है, तो उन्होंने कर लिया। अब उन्होंने कर लिया तो कर लिया। आप क्यों परेशान हो रहे हो? आपकी पॉकेट मनी काटी?

प्रश्नकर्ता: कट जाएगी।

आचार्य प्रशांत: तो ख़ुद कमाना शुरू करो न। यही तो डिपेंडेंस है न। ये भी तो डिपेंडेंस है न, देखा?

प्रश्नकर्ता: थैंक यू सर।

आचार्य प्रशांत: वेलकम।

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
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