गुरु गोविन्द सिंह जी ने सिखों को एक ज़बरदस्त सक्रिय और लड़ाका बल में तब्दील कर दिया। वो पूछा करते थे, कहते थे, ‘अगर तुमको सचमुच अमृत समझ में आया है, तो तुम मेरे साथ क्यों नहीं हो? और अगर मेरे साथ हो, तो बड़ी-से-बड़ी क़ुर्बानी तुमको देनी पड़ेगी।’ पंच प्यारों से उन्होंने ये नहीं कहा था, ‘बताओ कितने श्लोक याद हैं; नहीं, श्लोक नहीं।’ बोले, ‘क़ुर्बानी दे सकते हो? दे सकते हो तो मेरे साथ हो, नहीं तो कुछ नहीं।’ तो आज सूरमा चाहिए, जो अपनी क़ुर्बानी दे सके।
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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, कल गुरु गोविन्द सिंह जी की जयंती है, तो हम उन्हें आदर्श रूप में कैसे स्थित करके अपने जीवन को बेहतर बना सकते हैं? जैसा कि आपने भी बोला है कि युवा के पास ऊर्जा तो है लेकिन सही आदर्श नहीं हैं, हमने आदर्श गलत लोगों को बना रखा है जो कि लगातार भोगवाद को प्रेरित करते हैं। तो हम अपने जीवन को बेहतर और ऊँचा कैसे कर सकते हैं, उत्कृष्टता कैसे पा सकते हैं जीवन में?
आचार्य प्रशांत: देखो, आंतरिक जगत में ज्ञान और प्रेम से शुरुआत होती है। ठीक है? तो शुरुआत हम पाते हैं गुरु नानक देव जी के साथ, वहाँ हमको ज्ञान और प्रेम का बड़ा एक सुंदर प्राकट्य देखने को मिलता है। पर ज्ञान और प्रेम, और निष्ठा और भक्ति, ये तो आंतरिक होते हैं न। और यही तत्त्व जो आंतरिक जगत में ज्ञान और प्रेम का नाम रखता है, ये बाहरी जगत में विद्रोह बनकर सामने आता है।
तत्त्व एक ही है। एक ही तत्त्व है, जब वो भीतर होता है तो हम उसे कभी बोध कह देते हैं और कभी प्रेम कह देते हैं। और जो भीतर बोध है, प्रेम है, वही जगत में, समाज में अन्याय-अनाचार के विरुद्ध विद्रोह बनकर सामने आता है।
तो वही तत्त्व आप पाते हो गुरु नानक देव जी में एक प्रकार से अभिव्यक्त होता हुआ और गुरु गोविन्द सिंह में बिल्कुल दूसरे तरीके से अभिव्यक्त होता हुआ। तत्त्व एक ही है और इसमें बड़ी गहरी सीख छुपी है; तुम्हारा ज्ञान, तुम्हारा प्रेम सब शून्य है, ढकोसला है, पाखंड है अगर वो विद्रोह नहीं कर सकता, अगर वो लड़ नहीं सकता।




