ऐसा कोई नहीं होता, जिसके जीवन में दुख न हो। हम पैदा ही दुख में होते हैं। दुख एक डिफ़ॉल्ट स्टेट है, जो सबकी ज़िंदगी में होगा ही होगा। यह और ज़्यादा ख़तरनाक बात है कि दुख है, लेकिन या तो आपने उसको दबा रखा है, या आप उसके ऑपोज़िट एंड, सुख पर जाकर किसी तरीके से बचने की कोशिश करते रहते हैं। कोई बोले, “मेरे पास दुख नहीं है, तो मैं अध्यात्म में क्यों आऊँ?” तो उसको फिर अपनी ज़िंदगी का पता ही नहीं है कि उसको कितना दुख है।
यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।
प्रश्नकर्ता: नमस्कार आचार्य जी, मैं 2018 से जुड़ा हूँ। आपके सेशन्स में भी दो-तीन बार आ चुका हूँ, आपने मेरे बहुत सारे क्वेश्चन्स भी जवाब दिए हैं। मैं यूएस में रहता हूँ। आपको विश्वास नहीं होगा, आपने हमेशा अनुकंपा और ग्रेस की बात की है, जो को-इंसिडेंटली अध्यात्म की तरफ़ लेकर आ जाता है।
मैं सिर्फ़ दो दिन के लिए आया था, मतलब मेरे पिताजी की तबियत ख़राब है, पर कुछ अर्जेंट काम था। तो मैंने जब देखा दो दिन पहले कि आप ट्वेंटी नाइन को यहाँ आने वाले हैं, मुझे लगा, “अरे, दैट इज़ सो बैड, क्योंकि मैं सत्ताईस को वापस जा रहा हूँ यूएस और आपसे मिल भी नहीं पाऊँगा।” लेकिन आज सुबह ही गॉट चेंज्ड फ्रॉम ट्वेंटी नाइन टू ट्वेंटी फाइव, और मैं इतना खुश हुआ।
पापा हॉस्पिटल में हैं, उनकी तबियत अभी ठीक है, अभी बेटर है।
आचार्य प्रशांत:




