
प्रश्नकर्ता: हाय सर। तो सबसे पहले, आपके सेशंस और आपकी शिक्षाओं ने मेरी ज़िंदगी को एकदम बदल दिया है। आपके होने के लिए मैं इस यूनिवर्स का धन्यवाद करती हूँ।
मेरा सवाल है कि समाज के मानदंडों के अनुसार तो यह अधिक पुष्टि पर है। शायद मैं गलत सोच रही हूँ या मेरा अहंकार है। यह सवाल पूछ रही हूँ, लेकिन मैं फिर भी उत्तर चाहती हूँ। मैंने बहुत-से गीता-सत्रों से कुछ बातें सीखी हैं, लेकिन फिर भी मैं इस एक उलझन में हूँ। तो हमारे समाज में सामाजिक मानदंडों के अनुसार बहुत बार अन्याय होता है। अब सोसाइटी के हिसाब से जो लॉज़ और रेगुलेशंस होते हैं, जो सोशल नॉर्म्स होते हैं, उनके पीछे जो रीज़न होता है, वह जस्टिस सर्व करने के लिए होता है। लेकिन जब बात इमोशनल इनजस्टिस की आती है, राइट?
मेरा पर्सनली मानना है कि यह शायद मेरे ईगो से आता है। उस ईगो से कि मैंने ख़ुद बहुत सहा है, कि मैं सही हूँ और मैंने अच्छा किया है। लेकिन फिर मैं भावनात्मक धोखे से गुज़री। मैंने कई चीज़े झेली हैं। जैसा कि आपने कहा कि विषय बदलते हैं, लेकिन हम नहीं बदलते, और इसलिए हमें हर बार वही परिणाम मिलता है। हमारा जो मन है, वह चंचल रहता है।
तो सर, मेरा सवाल है कि जैसे यह यूनिवर्स है और मैं कहीं-न-कहीं मानती हूँ कि ठीक है, न्याय हुआ है, तो हम इस स्थिति को कैसे सही ठहराते हैं? और जो परिणाम मुझे मिल रहा है, क्या मुझे यह सब हटाना होगा? यही कारण है कि मैं इस दर्द और पीड़ा से गुज़र रही हूँ? और यह सब हटाने से क्या मैं इससे मुक्त हो जाऊँगी? और उस दूसरे व्यक्ति या उस सिचुएशन का क्या, जिसने मेरे साथ इनजस्टिस किया है? मेरा मतलब है, क्या आप इस पर कुछ रोशनी डाल सकते हैं? मुझे नहीं पता कि मैं इसे सही तरीके से रख पा रही हूँ या नहीं।
आचार्य प्रशांत: किसी ने चोट दी है?
प्रश्नकर्ता: सर, हमेशा ऐसा लगता है एक ही चोट हर जगह से मिलती है। मतलब, जैसा आपने बोला।
आचार्य प्रशांत: तो आप क्यों जाते हो चोट खाने?
प्रश्नकर्ता: पालन-पोषण, कहानियाँ, फ़िल्में। वो सब जानते हैं कि उन्हें क्या चाहिए। जो भी चोट या दर्द हम महसूस करते हैं तो जस्टिस, इमोशनल जस्टिस कैसे सर्व होगा? मतलब जैसे, अगर किसी ने मेरे साथ गलत किया है, तो क्या उसके साथ भी गलत किया जाएगा?
आचार्य प्रशांत: इमोशनल जस्टिस माने क्या?
प्रश्नकर्ता: मतलब जैसे, अगर किसी ने मेरे साथ गलत किया है।
आचार्य प्रशांत: किसी ने आपकी भावनाएँ आहत की हैं, तो क्या उसकी भी भावनाएँ कभी आहत होंगी?
प्रश्नकर्ता: हाँ, ये उन चीज़ों में से एक है। मेरा मतलब है, इस यूनिवर्स में जस्टिस कैसे होता है?
आचार्य प्रशांत: जस्टिस क्या होता है? यूनिवर्स जस्टिस थोड़ी करता है, यूनिवर्स तो बस है। उसके अपने नियम हैं।
प्रश्नकर्ता: सर, जैसे किसी ने आपको इमोशनली मैनिपुलेट किया, आपकी इनोसेंस का फ़ायदा उठाया। तो हम इमोशनली उसका जस्टिस कैसे लें?
आचार्य प्रशांत: उसको भूल करके। आप तो अभी भी उसको याद रख रहे हो, बहुत ज़्यादा याद रख रहे हो। आप चाह रहे हो कि उसके इमोशंस में भी खलबली मचे।
अब यहाँ पर कुछ गड़बड़ होगी, कुछ होगा, तो मैं वहाँ जाकर अटकूँ; या आप इतने सारे लोग बैठे हो, अच्छे लोग हो, अपना समय निकाल के आए हो, प्यारे लोग हो, मैं जल्दी से दूसरी चीज़ पर जाऊँ, दूसरे व्यक्ति के हाथ माइक पहुँचे? बताइए, क्या करूँ? यह ज़िंदगी है। आप ब्रह्मांड हो मेरे लिए अभी। कोई एक व्यक्ति कुछ कर सकता है, उल्टा-पुल्टा हो सकता है। हो सकता है उससे मैं भावनात्मक कुछ घाव भी खा जाऊँ। तो क्या करूँ, उसी से उलझ जाऊँ और ज़्यादा? या यह कहूँ कि यह इतनी बड़ी ज़िंदगी है, इतने सारे मौके हैं, और समय बहुत ज़्यादा नहीं है जल्दी से आगे बढ़ो?
यह आगे बढ़ने वाला काम क्यों नहीं करते हम जल्दी से?
प्रश्नकर्ता: सर, बीच में इंटरप्ट करने के लिए खेद है। अभी जैसे हमने डिस्कस किया था कि हमारे विषय बदल जाते हैं, लेकिन हमारे अनुभव वही रहते हैं। अब भले ही हम एक व्यक्ति को भूल जाएँ और भूल चुके हों, लेकिन वही चीज़ अनुभव कर रहे हों, तो इसका एकमात्र समाधान ज्ञान है?
आचार्य प्रशांत: देखो, क्या फ़र्क़ पड़ता है कि सामने जलेबी आई या कचौड़ी आई, लार तो वही की वही थी न। तो यह मत देखा करो कि सामने वाला विषय बदल गया। देखो कि भीतर तो मेरी वही प्रतिक्रिया हो रही है न। वैसे ही लार बही थी जलेबी को देख के, और वैसे ही बही है कचौड़ी को देख के। तो मतलब यह है कि वही होगा मेरे साथ जो जलेबी वाले कांड में हुआ था।
प्रश्नकर्ता: मैं जो कर सकती हूँ, वह है आंतरिक रूप से उन्नति करना...
आचार्य प्रशांत: बी ऑनेस्ट टू योर ओन एक्सपीरियंस। जो आपके साथ हो रहा है न, वह सारी कहानी बता रहा है। आपके साथ जो हो रहा है, एक जगह धोखा खाया। अच्छा, वहाँ गए क्यों थे? धोखा खाने तो नहीं गए थे। वहाँ पर कुछ अनुमान था, कुछ आशा थी, है न? कुछ कामना थी, कुछ अच्छा-अच्छा सा लगा होगा, इसलिए तो वहाँ पर गए थे।
प्रश्नकर्ता: पीस, एंड फुलफिलमेंट।
आचार्य प्रशांत: पीस, एंड फुलफिलमेंट, वो बहुत और भी बातें, तो वहाँ इसलिए गए थे। धोखा खा लिया। अब वैसे ही संगीत कहीं और से सुनाई दे रहा है, तो यहाँ भी क्या खाने वाले हो? तो काहे के लिए पहुँच गए?
अरे, संगीत बदल गया है। वहाँ इंडियन क्लासिकल था, यहाँ मोज़ार्ट है। तो जब लगे कि उधर कुछ बदल गया है, तो देखो कि उधर जो बदला, उससे इधर (अपने भीतर की ओर इंगित करते हुए) जो प्रभाव पड़ा है, वो बदला क्या? जलेबी बन गई कचौड़ी, पर सलाइवा तो वैसी की वैसी ही है। कि नहीं है? फिर।
प्रश्नकर्ता: हाँ, ओके।
आचार्य प्रशांत: और ये तो एकदम हटा दीजिए, कि उसको सज़ा मिलनी चाहिए, इमोशनल जस्टिस और क्या है वो? इमोशनल अत्याचार, बेवफ़ा निकली है तू, वो सब। ये न कोई और पूछ रहा होता, आप बहुत हँसते। हँसते कि नहीं हँसते? अभी एकदम भूल जाओ आपने पूछा है, इन्होंने पूछा है, आपके बगल में थे उन्होंने पूछा है। अभी आप पूछ रहे हो, वो हँस रहे हैं। आप भी हँसोगे, क्योंकि आप हो समझदार।
हम सब समझदार होते हैं, दूसरों को लेकर। तो बस जब अपनी बात आती है, तो वही ममत्व आ गया, तादात्म्य आ गया, अहंता खड़ी हो गई।
तो ये सारी समस्या है, नहीं तो ये सब जो बातें हैं ये कोई इतनी कठिन नहीं हैं कि समझी ही न जा सकतीं। मैंने कितनी ही बार बोला है कि अगर सिर्फ़ थ्योरिटिकल आपको अंडरस्टैंडिंग लेनी है, थ्योरिटिकली; तो अगर बहुत शार्प कोई स्टूडेंट हो, तो 8th - 9th के स्टूडेंट को भी समझाया जा सकता है ये। और अगर एवरेज कैलिबर वाला स्टूडेंट हो, तो भी ग्यारहवीं–बारहवीं के स्टूडेंट को तो बिल्कुल ये बातें समझाई जा सकती हैं, कोई भी दर्शन, मात्र वेदान्त नहीं। कोई भी दर्शन हो, भारत का हो, पश्चिम का हो, कोई भी दर्शन, ग्यारहवीं–बारहवीं। माने कितनी उम्र है? पंद्रह-सत्रह साल। बिल्कुल समझाया जा सकता है। क्योंकि उसमें कुछ कठिन है नहीं।
कठिनाई आती है यह चुनने में कि इसको जीना है, क्योंकि ये चीज़ प्यारी है, इसको भीतर लाना है। यह चुनाव कठिन होता है। वरना तो इसमें ऐसा क्या था, बताओ? इससे कहीं ज़्यादा कठिन क्वांटम फ़िज़िक्स होगा। वह मैं आपको समझाने बैठा हूँ। इसमें एक सूत्र है, उसका भी एक सूत्र समझाने बैठूँ, तो शायद हफ़्ता चाहिए। वो ज़्यादा कठिन है।
लेकिन प्रमाणित ये होता है कि यह ज़्यादा कठिन है। क्यों? क्योंकि क्वांटम फ़िज़िक्स ईगो को चैलेंज नहीं करता। तो उसमें हफ़्ता लगेगा, लेकिन बात फिर भी समझ में आ जाएगी। इसमें चीज़ ऐसी है कि समझना चाहो, तो एक घंटे में भी समझ सकते हो। लेकिन चार सौ साल लग जाएँगे, तब भी समझ में नहीं आएगी। क्यों? क्योंकि इसको (मष्तिष्क की ओर इंगित करते हुए) हम बदलना नहीं चाहते। ये बदलना नहीं चाहते।
ये बहुत साधारण-सी बात है। यूनिवर्स क्या जस्टिस करेगा? आप बताओ। यूनिवर्स कैसे जस्टिस करेगा? अच्छा, बताओ। ऐसे मानो कि सवाल किसी और ने पूछा था।
प्रश्नकर्ता: तो फिर यहाँ कर्म का सिद्धांत आता है। तो शायद अगर किसी और ने, जैसे आप जानते हैं हमसे यह सवाल पूछा होता, तो मैंने शायद कहा होता, “ठीक है, शायद वे अपने अनुभवों से सीखते हैं।”
आचार्य प्रशांत: ये सब लोकधर्म है। कुछ नहीं है ये कि आपका किसी ने बुरा करा है, तो उसका कार्मिक बैलेंस ख़राब हो जाएगा। और उसको जाकर के, जो पहली किताब लिखी थी मैंने, वो इन्हीं सब बातों से चिढ़कर लिखी थी। उसमें मेरा मुँह देखा है, कैसा है?
प्रश्नकर्ता: नहीं, सर ये सच है। और सच है, और मैं सहमत हूँ। क्योंकि जब मैंने गीता पढ़ना शुरू किया, तब मैंने भी कई विश्वासों पर सवाल उठाए। और हाँ, यह सच है कि ये सब मूर्खतापूर्ण कहानियाँ ही लगती हैं। लेकिन अब मेरा सवाल है, कि मुझे इस समय ही क्यों गीता से परिचित कराया गया, पहले क्यों नहीं? ताकि मैं अपना समय बचा सकूँ और बेहतर सीख सकूँ।
आचार्य प्रशांत: ये आप यूनिवर्स से नहीं पूछिए। यूनिवर्स ने नहीं कराया, संस्था ने कराया है।
प्रश्नकर्ता: डेफ़िनिटली ग्रेट।
आचार्य प्रशांत: आप जितने भी लोग बैठे हो, आपको यूनिवर्स थोड़ी गीता में लेके आया है। हमने रात-रात भर जागकर घिसाई करी है, तो आपको लाए हैं। और बड़ी मुश्किल से बाँध के रखा हुआ है। आज अट्ठाइस तारीख़ चल रही है। तीस का महीना है। वहाँ दो सौ लोग जान दे रहे हैं रि-एनरोलमेंट कराने के लिए। और आप क्रेडिट यूनिवर्स को दे रहे हो, “यूनिवर्स ने मुझे गीता दी है।” यूनिवर्स ने नहीं दी है। ये जो हार्ड-मास के पुतले हैं न, खाए-पिए बिना, नहाए-पिए बिना, अभी वो रात-रात भर फ़ोन पे लगे रहेंगे आपको, कि हाथ जोड़ रहे हैं, पाँव जोड़ रहे हैं, कर लो एनरोलमेंट, कर लो। ₹100 की जगह ₹50 में कर लो, लेकिन कर लो।
एक चलता है न वो, कि “मैं यहाँ कैसे आ गया?” तो उसका जवाब आता है, “तुम यहाँ आए नहीं हो। तुम यहाँ लाए गए हो।” कोई नहीं आया आप में से यहाँ। और यह बात मैं अपने आपको फुलाने के लिए नहीं, एक तथ्य के तौर पर कह रहा हूँ। बहुत-बहुत मेहनत करके आप लाए गए हैं। और जो लोग समझ नहीं पाते कि वो लाए गए हैं, वो यह नहीं समझ पाते कि यह दुनिया इसकी प्रकृति क्या है।
यह दुनिया ऐसी नहीं है कि यहाँ आप अपने आप आ जाओगे गीता की ओर। आप यह भी नहीं समझ पाते कि जो आपको हंट (शिकार) कर रहे हैं, उनका संकल्प कितना मज़बूत है। बहुत मेहनत लगती है उन हंटर्स से आप में से एक-एक को छुड़ाकर यहाँ पर लाने में। पर अपनी स्थिति से जब आदमी वाक़िफ़ नहीं होता, तो उसे लगता है कि बहुत आसानी से ही मुझे छुड़ा लिया गया होगा। बहुत आसानी से छुड़ा लिया गया होगा।
प्रश्नकर्ता: लेकिन सर, मैंने कुछ चीज़ों का सामना किया और बहुत चोट, बहुत दर्द था। और फिर मैंने ख़ुद को एनरोल किया। मैं आभारी हूँ, लेकिन स्थिति-परिस्थितियों के अनुसार मेरे विश्वास भविष्य में बदल सकते हैं। लेकिन मुझे लगता है कि बहुत खोज करने के बाद मुझे कहीं भी शांति नहीं मिली, और फिर मैंने एनरोल किया और मुझे असली चीज़ें मिलीं।
आचार्य प्रशांत: कुछ ऐसा कोई भी नहीं बैठा हुआ है, जो वहाँ ऊपर बैठ के हमारे साथ मीठे-मीठे, रूमानी खेल खेल रहा हो।
प्रश्नकर्ता: तो जीवन रैंडम है, सर।
आचार्य प्रशांत: बिल्कुल, बाहर जो कुछ हो रहा है, सब रैंडम है।
आपके पास एक ही चीज़ है, जिसको आप कह सकते हो कि आपकी है, जिसमें कोई तर्क चल सकता है, जिसमें आपकी एजेंसी, आपकी सॉवरेन्टी चल सकती है। उसका नाम है, चॉइस।
और चॉइस भी यह नहीं है कि बाहर से कौन-सी चीज़ आपके साथ हो जाएगी, कौन-सी घटना घट जाएगी, उसमें कोई नहीं चॉइस है। योर चॉइस इज़ ओनली इन टर्म्स ऑफ योर रिस्पॉन्स। और रिस्पॉन्स आता है बीइंग से। तो आपके पास जो चॉइस है, वो सिर्फ़ अपनी बीइंग को लेकर के है, मैं कौन हूँ। उसके अलावा मत सोचिए कि कोई पैटर्न है। मत सोचिए कि आसमानों पर कहानियाँ लिखी गई हैं, कि हम जोड़े में पैदा हुए हैं, या कि फ़ोर्थ टाइम लकी हुआ जाता है।
या वो जितना कुछ भी चलता है न, कि मुझे नहीं पता मेरी कहानी का अगला चैप्टर किसने लिखा है, पर जिसने भी लिखा था उसने गुलाबी स्याही से लिखा था। ये सब जो है, ये किसी ने कोई चैप्टर नहीं लिखा है। मिट्टी हैं हम, धूल हैं हम। हमारा कौन-सा चैप्टर होगा?
आज आप ये सवाल पूछ रहे हो, कल आप जल रहे होगे। आपसे पहले मैं जल चुका हूँगा। क्या सवाल? कौन-सी कहानी? इतना बड़ा ब्रह्मांड है। पृथ्वी भी बहुत पुरानी है। उस पर आप जैसे, मुझ जैसे अरबों आए, अरबों गए। हम अपने आप को इतना विशिष्ट समझते हैं क्या, कि कोई बैठकर के हमारे लिए कोई ख़ास किताब लिख रहा है? कुछ नहीं हो रहा है। लॉज़ ऑफ़ फ़िज़िक्स हैं, दैट्स ऑल। एंड दे आर यूनिवर्सल, व्यक्ति-निरपेक्ष। उनके अलावा बस आपके पास यही है, चॉइस।
कोई पूछे क्या है? बोलो, फ़िज़िक्स एंड चॉइस। और कुछ नहीं है, फ़िज़िक्स है और चॉइस है। ठीक है?
कोई जस्टिस-वस्टिस कुछ नहीं होता। कुछ नहीं। जस्टिस क्या है? मैन-मेड कॉन्सेप्ट है। जस्टिस कोई चीज़ थोड़ी होती है। एक ख़्याल है जस्टिस, जो आप जस्टिस सोचते हो, वो अमेरिका में नहीं चलता। अमेरिका में जिसको आज जस्टिस माना जाता है, अमेरिका में ही सौ साल पहले उसको जस्टिस नहीं मानते थे। तो जस्टिस क्या होता है? कुछ नहीं।
प्रश्नकर्ता: ठीक है। बहुत धन्यवाद, सर।