

प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी। अभी रिसेंटली एक न्यूज़ आई थी कि क्रिस्टियानो रोनाल्डो जो हैं फुटबॉल प्लेयर, उन्होंने अभी स्टेटमेंट दिया था कि वो 1000 गोल करना चाहते हैं अपने करियर में। अभी तक वो 965 तक पहुँचे हैं और अपने गोल से 35 गोल पीछे हैं। उनका यह स्टेटमेंट था, वो अगस्त 2024 का था। लेकिन फिर भी वह अपने गोल पर कायम रहना चाहते हैं। क्या यह उनका जो गोल है महत्वाकांक्षा से प्रेरित अभिव्यक्ति है, या यह श्रेष्ठता का प्रदर्शन है? इसमें थोड़ा कन्फ्यूज़न मुझे हो रहा है।
आचार्य प्रशांत: तुम बताओ।
प्रश्नकर्ता: जैसे, वो एक उत्कृष्ट खिलाड़ी हैं। यह सब जानते हैं।
आचार्य प्रशांत: इतना बड़ा नाम न हो, इतना प्रचलित खेल न हो, तो कुल मिलाकर वह व्यक्ति जो कह रहा है, वह वैसी सी बात है कि ये कह रहे हैं, “मैं रिटायर होने से पहले 1 करोड़ जमा कर लेना चाहता हूँ।” अब क्या बोलें इसमें? परमार्थ है, यह क्या है? पर वहाँ पर ग्लैमर है, चकाचौंध है, तो तुम्हारे सामने सवाल खड़ा हो जाता है कि यह कुछ अलग बात है क्या? वह वही बात है जो हर बंदे की बात है, हर इंसान ही तो इसी में लगा है न। वह भी कह रहा है, “रिटायर होने से पहले हज़ार गोल करने हैं।” कौन नहीं है जो रिटायरमेंट गोल्स लेकर बैठा हो? सबके हैं न? अब तो 25 साल वाले भी अपने रिटायरमेंट गोल्स लेकर चलते हैं कि 35 में रिटायर हो जाऊँगा और उससे पहले इतना जोड़ लूँगा। तो उसमें और इसमें अलग क्या है? चकाचौंध के अलावा, ग्लैमर के अलावा? क्या है?
चलो, यह तो रिटायरमेंट आगे की बात हो जाती है, 10-20 साल आगे की। एक हमारा साधारण-सा बेचारा ठेले वाला भाई भी होता है, वह मोमोज बेच रहा है, कुछ बेच रहा है। वो भी यह बनाता है कि आज रात से पहले इतनी बिक्री करके जाऊँगा, और जब तक बिक्री नहीं होगी तब तक दुकान खोले रखूँगा। तो अंतर क्या है? कि है? तुम यह सोचो कि सवाल कहाँ से आ रहा है। तुमने यह सवाल उस रेहड़ी वाले , ठेले वाले के बारे में नहीं पूछा, लेकिन एक इंटरनेशनल ग्लैम स्टार के बारे में पूछा। इससे पता चलता है कि? क्या पता चलता है? यह सवाल कहाँ से आ रहा है?
प्रश्नकर्ता: तो क्या ये मतलब मेरी भी चाहत है? जैसे आप बोलते हो कि जो भी आप देख रहे हो, उसके बारे में…
आचार्य प्रशांत: ये सवाल अपने-आप से पूछ लिया करो। मैं तुम्हें भी बोलूँ कि तुम रेहड़ी वाले बन जाओगे, और फिर बोलूँ कि तुम रोनाल्डो बन जाओगे। तुम्हारी प्रतिक्रिया अलग-अलग होगी कि नहीं होगी? तो बस देख लो, तुम्हारी चाहत क्या है।
जबकि मानसिक तौर पर वो दोनों एक ही काम कर रहे हैं। मानसिक तौर पर दोनों एक ही काम कर रहे हैं, लेकिन आर्थिक और सामाजिक तौर पर दोनों बिल्कुल अलग-अलग खड़े हैं। समाज में एक की प्रतिष्ठा है, एक की नहीं है। एक के पास खूब पैसा है, एक के पास नहीं है। काम यद्यपि दोनों एक ही कर रहे हैं, लेकिन तुम एक जैसा बनना चाहोगे, दूसरे जैसा नहीं। काम तो दोनों का एक बराबर था, वह तो कैंसिल आउट हो गया। इसका मतलब तुम मर किस पर रहे हो? वही जो आर्थिक लाभ है और सामाजिक प्रतिष्ठा है, वही तुम्हारा केंद्र है। वहीं से ये सवाल आ रहा है। और कहाँ से आ रहा है?
प्रश्नकर्ता: सर, तो उत्कृष्टता जो होती है, वो…
आचार्य प्रशांत: उत्कृष्टता तो मोमो वाले में भी हो सकती है। उसका सवाल क्यों नहीं पूछा? आओ, मैं तुम्हें उत्कृष्ट मोमोज खिलाता हूँ। फिर तुम उसके फैन बन जाना और उसके जैसा बनने की कोशिश करना। करोगे? नहीं करोगे। मैं तुम्हें आज सबसे श्रेष्ठ और उत्कृष्ट मोमो खिलाऊँगा। बोलो न? उत्कृष्टता तो मालिश करने में भी हो सकती है। बनोगे उत्कृष्टतम मालिशबाज़? नहीं बनना चाहोगे, क्योंकि बात और कुछ नहीं है समाज में उतनी इज़्ज़त नहीं है और उतना पैसा नहीं है। तुम्हें उत्कृष्टता, श्रेष्ठता से कोई लेना-देना नहीं है, तुम्हें प्रतिष्ठा और पैसे से लेना-देना है। उत्कृष्ट तो इतने काम होते हैं पर उनमें पैसा न मिलता हो, तो तुम करोगे क्या?
तो यह क्यों बोल रहे हो कि “मैं तो उसकी एक्सीलेंस पर मरता हूँ”? एक्सीलेंस वाले काम तो न जाने कितने हैं, कभी नहीं करोगे तुम। एक्सीलेंस भी अगर तुम्हें चाहिए, तो उसी काम में जिसमें प्रतिष्ठा, पैसा हो। समाज न जाने कितने कामों को इज़्ज़त नहीं देता है। फ़िल्म आएगी, उसमें तमाम तरह का वीएफएक्स लगाकर के और बदबूदार कहानियाँ होंगी, तुम उनको हिट करा दोगे। स्टेज के एक्टर्स होते हैं उनके पास न उतनी प्रतिष्ठा होती है, न पैसा होता है। तुम नहीं बनना चाहोगे थिएटर आर्टिस्ट, तुम कहोगे, “मुझे फ़िल्म में एक 30 सेकंड का रोल दे दो, चलेगा।”
तुम उत्कृष्टता के दीवाने थोड़ी हो। अहंकार, क्योंकि स्वयं अपूर्ण होता है, तो उसको लगता है कि कोई दूसरा आकर मेरी तारीफ़ कर दे। और चूँकि वह अपूर्ण होता है, तो पैसा चाहता है, ताकि उस पैसे से कुछ ख़रीदकर स्वयं में भर ले। बस इतनी-सी बात है। आप जिन व्यक्ति की बात कर रहे हो, उनसे एक इंटरव्यू में पूछा गया, “आपके पास गाड़ियाँ कितनी हैं?” वो बोले, “मुझे गिनती याद नहीं।” तुम इसलिए फ़िदा हो। और फिर जो इंटरव्यूअर था, उसने ज़ोर डाला कि, “अरे, बताओ तो कौन-कौन सी हैं?” तो जितनी भी टॉप गाड़ियाँ हो सकती हैं दुनिया की, 10 करोड़ से लेकर और जहाँ तक जाती होंगी, 50 करोड़, 100 करोड़ की गाड़ी, वो बताने लगा। और उसने भी, “पता नहीं, मेरे पास ये दो हैं या चार हैं, मुझे यह वाली याद नहीं। अच्छा, वो मॉडल शायद अब मेरे पास तीन है।” ऐसे करके 20 तक पहुँच गए गाड़ियों तक, फिर बोले, “अब आगे की गिनती मुझे याद नहीं।” और तुम बिल्कुल लोट गए, लट्टू हो गए, पागल हो गए।
बेचारा मोमो वाला ये कैसे तुमको बताएगा? उसके पास साइकिलें होंगी और एक सेकंड-हैंड बाइक होगी। हाँ, एक्सीलेंस के साथ वो मोमोज़ बनाता है, क्या फ़र्क़ पड़ता है। ऐसे ही मरते हो क्रिकेटरों पर। एक्सीलेंस तो बहुत स्पोर्ट्स में है। अभी जब यह T20 चल रहा था, उसी समय पर बैडमिंटन वर्ल्ड चैंपियनशिप भी चल रही थी और एक भारतीय सीधे फ़ाइनल तक पहुँच गया था। आधों को नाम न पता हो। और फ़ाइनल भी चोट लगी हुई थी, आंशिक रूप से यह कारण था कि हारा। और दुनिया के टॉप खिलाड़ियों को हराकर फ़ाइनल में पहुँचा था। पर एक्सीलेंस की थोड़ी क़दर है? एक्सीलेंस भी तुम्हें वहाँ चाहिए जहाँ पर चियर गर्ल्स हों, और बहुत सारा पैसा हो, और कंटीन्यूअस टीवी कवरेज हो, ग्लैमर हो, स्पॉटलाइट हो। वहाँ पर तुम्हें एक्सीलेंस अच्छी लगती है। शुद्ध एक्सीलेंस तुम्हें कहाँ अच्छी लगती है?
कम-से-कम अभी 10 ऐसे स्पोर्ट्स हैं, जिनमें इंडियन एथलीट्स दुनिया में टॉप फ़ाइव या टॉप टेन में आते हैं। तुम नाम नहीं बता पाओगे। नहीं पता होगा। क्यों? क्योंकि वहाँ पर पैसा नहीं है। हाँ, कोई बहुत साधारण-सा क्रिकेटर होगा, जिसको टेस्ट क्या, वन-डे टीम में भी जगह नहीं मिल सकती है। वो किसी क्लब के लिए खेलता है। तुम उसके दीवाने रहोगे। क्योंकि तुमको पता है कि वो इतने करोड़ में उसका यह हुआ, और उसकी बीवी है, और बीवी कई बार विदेशी होगी। उसका Instagram पेज होगा, उस पर 100 मिलियन फ़ॉलोवर होंगे और यह होगा, वो होगा। ऑल दैट जैज़। पागल हो रखे होंगे। और फिर कहोगे, “यह तो मैं उसका दीवाना इसलिए हूँ क्योंकि वो क्रिकेट में एक्सीलेंट है।”
तुम्हें क्रिकेट से दो कौड़ी का मतलब नहीं है, तुम्हें किसी स्पोर्ट से कोई मतलब नहीं है। तुम्हारा मतलब सिर्फ़ पैसे से और प्रतिष्ठा से है। वो किसी भी और चीज़ से मिलने लग जाएगी, तुम करने लग जाओगे। और ऊँचे-से-ऊँचे काम में वह चीज़ नहीं मिलेगी, तो तुम नहीं करोगे वह काम। यह सवाल पूछना अपने-आप से कि तुम उन्हीं एक्सीलेंट लोगों पर क्यों मरते हो, जिनके पास खूब?
श्रोता: पैसा होता है।
आचार्य प्रशांत: बिल्कुल उन्हीं के जैसा बनना है, वही सब कुछ करना है जो उन्होंने किया है। एक्सीलेंट तो भगत सिंह भी थे। आओ, उनकी राह चलें। आओ बेटा, “सरफ़रोशी की तमन्ना...” आओ, फंदा उधर है आओ, चलें। आओ न, वो भी एक्सीलेंट थे, वो कहीं ज़्यादा एक्सीलेंट थे। आओ, उनकी राह चलो।
“नहीं-नहीं सर, रोनाल्डो, रोनाल्डो।”
फिर ये एक्सीलेंट प्लेयर्स ही नहीं पता होते, उनसे ज़्यादा उनकी बीवियाँ पता होती हैं। और ये एक्सीलेंट प्लेयर्स भी पूरा ख़याल रखते हैं कि बीवियाँ हॉट होनी चाहिए। और कई बच्चे होंगे उनके, बहुत सारे बच्चे, जैसे कार्स की गिनती नहीं। फ़िदा हो जाते हो, कहते हो, “ये देखो, ये होती है न ज़िंदगी।” और फिर कोई पूछे, तो लाज आती है बताने में कि इसकी बीवियाँ, और इसका पैसा, और इसकी शोहरत देखकर मरे जा रहे हैं। तो बोलेंगे, “वो तो हम इसकी एक्सीलेंस के दीवाने हैं।”
मुंबई के ये होते थे डब्बावाले, उनकी सिक्स सिग्मा परफ़ॉर्मेंस होती थी। सिक्स सिग्मा समझते भी हो, मतलब क्या होता है? कि कभी गलती न करना। व्यवहारिक रूप से गलती की संभावना को शून्य कर देना, इसे बोलते हैं सिक्स सिग्मा परफ़ॉर्मेंस। कि जो पॉसिबल एरर्स का नॉर्मल कर्व होता है, सिग्मा माने स्टैंडर्ड डेविएशन, उसमें मीन से तुम सिक्स सिग्मा दूर निकल गए हो। मतलब गलती की संभावना को तुमने लगभग शून्य कर दिया है। करोड़ों अटेम्प्ट्स में एक बार गलती होगी। इसे बोलते हैं सिक्स सिग्मा। इस एक्सीलेंस का दीवाना होते तो मैंने तुम्हें कभी नहीं देखा।
जिस स्कूल में बस से तुम जाते रहे हो बचपन में स्कूल, बिल्कुल हो सकता है कि उसके जो ड्राइवर हों, वो उसी स्कूल में पिछले 40 साल से काम कर रहे हों। 25 से शुरू करके 65 के हो गए हों, और पता है कि बस में बच्चे रहते हैं तो कभी भी बस पर खरोंच भी न आने दी हो। अगर गिनोगे कि कितने ऐसे *पॉइंट्स” हो सकते थे जहाँ कोलिज़न हो सकता था, पॉसिबली, और कोलिज़न के पॉइंट्स तो हर मिनट में आते हैं, तो पता चलेगा कि तुम्हारे बस वाले भैया भी सिक्स सिग्मा परफ़ॉर्मेंस दे रहे थे। उनकी श्रेष्ठता के कभी दीवाने हुए तुम? हुए क्या?
“रोनाल्डो।”
पास रोनाल्डो भी देता है, पास तो तुम्हारे बस वाले भैया भी देते थे। पर एक पास में ग्लैमर है, और दूसरे पास में कुछ नहीं है। क्या कर रहा है बंदा? बस जॉब कर रहा है अपनी और क्या कर रहा है।
आप अपने जिन आदर्शों को बनाते हो, और फिर उनको जो कारण बताकर घोषित करके पूजते हो, इतना तो पूछ लो कि कारण वही है कि कुछ और है। इतना तो पूछ लो कि कारण वही है कि कुछ और है। आपको पता भी नहीं होता कि आपको जो पसंद आ रहा है, वह किस वजह से पसंद आ रहा है। हॉ! और अगर आपको पता भी होता है, तो समाज के आगे आप इतने शर्मिंदा होते हो कि असली वजह तो कभी बता ही न पाओ, दूसरों को क्या ख़ुद को ही न बता पाओ। तो आप वजह भी वही घोषित करते हो, जो समाज-स्वीकृत होती है।
बताऊँ मैं आपको, कहाँ गया परिणय? यहीं खड़ा था अभी। यह अभी यहाँ पर खड़ा होकर मुझे इशारा कर रहा था। मालूम है क्या इशारा कर रहा था? आप बताओ, क्या इशारा कर रहा था माइक पर? अभी यहीं खड़ा था, देखा था? यह मुझे कुछ इशारा करके गया है। हाँ, बोल, क्या बोलकर गया है?
श्रोता: शर्ट ठीक करने के लिए।
आचार्य प्रशांत: अब यहाँ से मेरी शर्ट फटी नहीं होगी, क्योंकि मुझे नहीं मालूम मेरे सामने आईना नहीं है। ऐसा तो नहीं कि फट गई है, या चाय गिरा दी है, कुछ हो गया है। पर वो मुझे कुछ इशारा कर रहा है। वो शायद यह बोल रहा होगा कि यहाँ सिलवट आ रही है। ऐसा कुछ हो रहा है। क्या हो रहा है भाई? कुछ हो रहा होगा, समथिंग, एनीथिंग। उसको यह क्यों इशारा करना पड़ रहा है? यह कपड़े भी उसी ने चुनकर दिए हैं, वही यह सब करता है। इसलिए करना पड़ रहा है, क्योंकि वह कहता है कि, “आप जैसे हो, वैसे ही इनके सामने आ गए, तो ये आपको सुनेंगे भी नहीं।”
आपको नहीं पता, आप किसी को किस कारण से पसंद करते हो। वह कह रहा है, “रिकॉर्डिंग में अगर यह दिख गई कि यहाँ पर सिलवटें हैं या कुछ है, तो जो लोग आपको देखकर गीता के पास आ सकते थे, वो नहीं आएँगे। वो कहेंगे, ‘अरे, इसके तो सिलवटें पड़ी हुई हैं।’” आप कहोगे, “ऐसा थोड़ी होता है, आचार्य जी! हम तो आपकी वाणी सुनते हैं।” हमें पता है क्या होता है। हम उस युद्ध के बीचोंबीच खड़े हैं। हम बहुत अच्छे तरीके से जानते हैं यहाँ पर क्या चलता है, क्या नहीं चलता है। वार कहाँ से आता है? चोट कहाँ पर लगती है? हम जानते हैं, हमसे पूछो।
वह व्यर्थ ही इशारे नहीं कर रहा। बिल्कुल हो सकता है, आप कहो, “आचार्य जी को सुनते हैं। आचार्य जी को सुनते हैं।” क्यों सुनते हैं? अब यही आचार्य जी ऐसे (मुँह टेढ़ा बनाने का अभिनय करते हुए) हो जाएँ, गायब हो जाओगे। और यही बात जो मैं बोल रहा हूँ, दो उदाहरण दिए देता हूँ। जब स्टेडियम भर जाएगा, इतना ही नहीं रहेगा, या तो बिल्कुल यहाँ पर कोई ग़ज़ब की आकर्षक शख्सियत खड़ी हो जाए, और देवी जी ऐसे आएँ, बिल्कुल सुपर-ग्लैमरस, लेकिन संस्कारी। और फिर देखिए, सबमें ऐसा भक्ति-भाव जगेगा। और सब कहेंगे, “वो तो हम उनकी वाणी सुनने आते हैं।”
तुम वाणी ही सुनने आते हो, हा हा हा? या दूसरा यह है कि यहाँ बाबा जी आ जाएँ, वो बिल्कुल फ़िल्मी रूप धारण करके, हुर्र-हुर्र, लंबा-चौड़ा चोगा। किसी को तो सबसे पहले इसी बात पर ख़ारिज कर दिया करो, रिजेक्ट कर दिया करो कि उसने चोगा डाल रखा है। पूछो, “तुझे चोगा अलग से सिलवाने की, ये डिज़ाइनर चोगा, ज़रूरत क्या पड़ी? और तूने कितनी मेहनत करके तो ये चोगा सिलवाया होगा, बाज़ार में तो मिलता भी नहीं है। माने, तू इतनी मेहनत करता है सिर्फ़ हमको भ्रम में डालने के लिए, अपनी एक छवि प्रोजेक्ट करने के लिए।”
अभी बाबा जी आ जाएँ यहाँ पर, चोगा-वोगा डालकर, ये-वो, भस्म उड़ाते, भभूत मले, या कुछ और जो भी करा जा सकता है पूरा। और आप कहोगे, “हम तो इनकी वाणी के, इनके कथन के, इनके प्रवचन के और इनकी श्रेष्ठता के दीवाने हैं।”
तुम्हें न श्रेष्ठता से मतलब है, न सत्य से मतलब है, न वाणी से, न वचन से। तुम्हें बस ग्लैमर से मतलब है।
और मैं ठीक कर लेता हूँ, भाई। संस्था चलानी है। और भी कुछ हो गया है? अरे, अरे, अरे! बताओ। इस तरीके की समस्याओं से जूझना पड़ता है हमारे मिशन को। आचार्य जी की शर्ट में सिलवट आ गई, मिशन काँप रहा है। करियर अर्निंग्स जाकर देखना, सबसे ज़्यादा ग्रैंड स्लैम किसने जीते हैं टेनिस में, मेंस में?
श्रोता: नोवाक जोकोविच।
आचार्य प्रशांत: उस बेचारे की करियर अर्निंग्स देखना, और फ़ेडरर की और नडाल की देखना। उसकी गलती बस यह है कि उतना गुड-लुकिंग नहीं है। उतनी उसको ब्रांड डील्स ही नहीं मिलीं। उतने एंडोर्समेंट्स ही नहीं मिले। दूसरी बात, वो वेस्टर्न यूरोप से नहीं आता है। यूरोप में भी जो वेस्टर्न यूरोप है न, उसका एक ग्लैमर है, जलवा है। स्पेन भी खिंच जाता है वेस्ट के नाम पर, तो नडाल भी खिंच गया। वरना स्विट्ज़रलैंड है, जर्मनी है, ब्रिटेन है, ये होते हैं द रियल वेस्ट।
जोकोविच बेचारा कहाँ से आता है? कैसे लोग हो, यार? सर्बिया से, अनग्लैमरस। दिखने में भी वह ऐसा कुछ नहीं लगता कि… और आप कहोगे, “नहीं, हम तो श्रेष्ठता के दीवाने हैं।” तो श्रेष्ठता में तो वह GOAT है, ग्रेटेस्ट ऑफ ऑल टाइम। आज भी खेल रहा है, और आज भी जीते जा रहा है। पर जाकर देखना उसकी करियर अर्निंग्स। वैसे ही मारिया शारापोवा, आप अगर शॉर्ट्स वग़ैरह स्क्रॉल करने लगोगे, और अगर आप लेडीज़ टेनिस देखना चाहते हो, तो थोड़ी ही देर में मामला शारापोवा पर आ जाएगा। शारापोवा या और कोई भी ग्लैमरस नाम। वो बहुत अच्छी खिलाड़ी थी, निस्संदेह, वर्ल्ड-बीटर। पर अच्छे खिलाड़ी तो और भी हुए हैं। वो उतनी फ़्रीक्वेंसी से क्यों नहीं आते रील्स में? क्यों नहीं आते? ग्लैमर की कमी है। और ज़्यादातर लोग टेनिस ही क्यों देखते हैं? इतने सारे और भी तो स्पोर्ट्स हैं। क्योंकि वहाँ ग्लैमर नहीं है।
क्यों? कबड्डी में कम स्टैमिना लगता है क्या? या वहाँ एक्सीलेंस नहीं होती? श्रेष्ठता नहीं होती? तो कोई कबड्डी वाला तुम्हारा रोल मॉडल क्यों नहीं है? भारतीय कबड्डी टीम का कप्तान बताओ। अरे, तुम कहाँ पहुँच गए थे? किसी और कॉन्टिनेंट में? एशिया में वापस आओ। फिर स्वदेश में वापस आओ। और भारतीय कबड्डी टीम के कप्तान का नाम बताओ। और इस टीम ने कई गोल्ड मेडल्स जीते हैं भारत के लिए। बताओ। रोनाल्डो याद है, और अपनी ही मेडल-विनिंग टीम के कैप्टन तक का नाम नहीं पता है तुमको। कारण क्या है? एक्सीलेंस की कमी? ग्लैमर की कमी। आ रही है बात समझ में?
किसी और को जब भाग रहा हो अहंकार, जिसको कहते हो आम भाषा में, मन का चंचल होना, मन चला उधर को। तो मन तुम्हें जो कारण बताए न, उस दिशा में जाने का वह कारण कभी मान मत लेना। असली कारण दूसरा होता है। असली कारण हमेशा दूसरा होता है, हमेशा। और वो झूठ हम सिर्फ़ दूसरों से नहीं बोलते, ख़ुद से भी बोलते हैं।
“सत्यम शिवम सुंदरम” मूवी आई थी। उसमें वह गाना गाती है, और वह बिल्कुल ग्लैमर से भरी हुई मूवी थी। ज़ीनत अमान, गीले कपड़े, अंग-प्रदर्शन, सब कुछ बढ़िया। और उसमें जो शशि कपूर का किरदार है, वो बिल्कुल लट्टू हो जाता है, पागल हो जाता है। बोलता है, “तुझे ही ब्याहूँगा। तुझसे शादी करनी है। यह, वो...” बस, वो हर गाने में दिखाते हैं, ऐसे वह अपना चेहरे का एक हिस्सा छुपाकर रखती है। और वह उसके सामने कसमें खा रहा है कि, “मैं तेरे लिए जान दे दूँगा, यह कर दूँगा, वह कर दूँगा।” और शादी होती है, तो दूसरा हिस्सा भी दिख जाता है, यहाँ पर जला हुआ होता है। भद्दा निशान होता है। तो बोलता है, “छोड़ दूँगा।” छोड़ देता है, तो बाढ़ आ जाती है, चमत्कार हो जाता है। ख़ैर, वो अलग बात है। पर समझो कि हमारे प्यार के दावे भी क्या होते हैं। आ रही है बात समझ में?
और वो जो किरदार है, वहाँ वो इंजीनियर है, शशि कपूर। उसको सचमुच लग रहा होगा कि मैं इससे प्यार ही तो करता हूँ, उसको सचमुच लग रहा था कि प्यार करता हूँ। और अब मज़ेदार बात बताता हूँ। वो जो पर्दे पर किरदार दिख रहा था, उसको तो छोड़ दो, जनता भी बिल्कुल शशि कपूर जैसी थी। उस फ़िल्म में ज़ीनत अमान से जमकर एक्सपोज़र करवाना पड़ा। बताओ क्यों? क्योंकि ऑडियंस को तो दिख रहा है न कि यह है, अब ग्लैमर यहाँ तो है नहीं। किसी का चेहरा अगर भद्दा है, तो उसे किसी दूसरे तरीके से अट्रैक्टिव बनाना पड़ेगा न। तो दूसरे अट्रैक्टिव से कराया गया, उसे एक्सपोज़ कराकर। समझ रहे हो?
किसी का चेहरा आपने भद्दा बना दिया। पूरी फ़िल्म में आएगी यहाँ पर इतना बड़ा जला हुआ निशान लेकर के। तो शशि कपूर को तो बुरा लगेगा ही लगेगा, ऑडियंस को भी तो बुरा लगेगा। तो ऑडियंस भाग न जाए, इसलिए जमकर अंग-प्रदर्शन करवाया गया, नहीं तो ऑडियंस ही भाग जाती। फ़िल्म सुपरहिट थी। लोगों ने कहा, “सत्यम शिव सुंदरम, आध्यात्मिक पिक्चर देखकर आए हैं।” क्या सबक मिला? बोले, “सबक यह मिला कि दैहिक सुंदरता पर ध्यान नहीं देना चाहिए। असली सुंदरता तो हृदय की होती है।” हृदय तो उसने दिखाया ही नहीं था पूरी पिक्चर में।
यह जो तुम ख़ुद भी अपने आप को बोलते रहते हो न कि फलाना मुझे पसंद है, या फलानी मुझे पसंद है क्योंकि वो दिल का बड़ा साफ़ है, क्योंकि वो चरित्र की बड़ी सच्ची है, यह तुम झूठ बोल रहे हो अपने आप से। असली वजह कुछ और होती है। लोग माँ की ममता वग़ैरह की बात करते हैं, जो कि पूरे तरीके से शारीरिक ही होती है, रासायनिक ही होती है। मालूम है, बहुत सुंदर बच्चा हो और एकदम ही अजीब-सा दिखने वाला बच्चा हो, माँ तक भेदभाव करती है। जो पाखंडी नहीं होंगे, वह मान लेंगे। बाक़ी असहमति में सारी लाइन कहेंगे, “नहीं, ऐसे नहीं। माँ का प्यार तो निर्मल होता है। सच्चा होता है।” ऐसा कुछ भी नहीं होता है। और बच्चे जब बड़े हो जाते हैं, तो एक कमाऊ पूत होता है और एक नालायक घर में बैठा होता है। वहाँ भी माँ ही भेदभाव कर लेगी।
बच्चा सुंदर हो, क्यूट हो, बच्चा भी ग्लैमरस हो, तो माएँ उसको बड़े शौक़ से ट्रॉफ़ी की तरह बता दें। कई बार तो वहाँ जब बुक-साइनिंग हो रही है, तो “आचार्य जी, इधर देखिए!” और वही वो सुस्का हुआ सा निकल आया हो, चूहे जैसा, तो उसको कोई नहीं प्रदर्शित करता। श्रेष्ठता, श्रेष्ठता! हाँ, ज़रूर। आ रहा है न? बढ़िया मज़ा आ रहा है। बढ़िया है।
प्रश्नकर्ता: नमस्कार आचार्य जी। आपको सुनने से पहले मैं बिल्कुल ऐसी ही थी कि बस ग्लैमरस दिखना, और यह लगा लो, वो लगा लो, पोत के चेहरा। मतलब कोई मेरे सामने भी ऐसे आ जाता था न, सिंपल, तो “इसको तो बाहर आने की तमीज़ नहीं है। यह कैसे, मतलब इसके घर में कोई पैसा कुछ तो होगा कि एक बिंदी, लिपस्टिक ही ख़रीद ले।” ऐसी वाली फ़ीलिंग कि मैं थी। और मुझे आपके पास आकर प्राकृतिक दिखना कैसा हो, उसमें क्या असली सुंदरता है, बहुत ही ज़्यादा...। जैसे आपके पास एक तेज़ाब है, वो डालते हो, सच में कितना हम अहंकार लेकर घूमते हैं कि हमें ऐसा दिखना है।
सर, इतनी कंडीशनिंग होती है हम औरतों की। इधर लंबे इयरिंग्स चाहिए, नेल-पेंट, वो भी कैसा होना चाहिए। मतलब हम लोग सिर्फ़ अपने देह को सजाने की तरफ़ ध्यान देते हैं। कुछ अच्छी खूबियाँ भी होती होंगी, पर उनकी उधर इतना ध्यान ही नहीं देते कि इनको और कैसे निखारें। सर, इतना ज़्यादा हम लोगों को कंडीशन किया जाता है कि जैसे हम मॉडल हैं। मतलब हम इंसान नहीं हैं। हमें एक मॉडल की तरह चलना, बैठना। सर, आप बिल्कुल सही कहते हो, हम लोग ऐसे ही हैं। और मुझे लगता है जितनी औरतें हैं न, उन सबको पहले जितने ये बड़े-बड़े ग्लैमरस चेहरे हैं, उनको सर पहले यहाँ बिठाया जाए, ताकि वो समझें कि हम कहाँ क्या दिखा रहे हैं लोगों को।
हर रील, हर Instagram, बस यह साड़ी पहन के आधा दिखा रहे हैं, आधा कर। सर, यही चल रहा है और यही बिक रहा है। एक्चुअली यही बिक रहा है। सर, मैं ख़ुद ऐसी ही हूँ, थी मतलब अब मुझे इतनी शर्म आती है। नहीं सर, मतलब एक ट्रांसफ़ॉर्मेशन आपके यहाँ आकर अगर शुरू हुआ है, तो मैं इसका सारा श्रेय आपको देना चाहूँगी। थैंक यू सर।
आचार्य प्रशांत: आपने मुझे कब देखना शुरू किया था?
प्रश्नकर्ता: सर, अभी 8-9 महीने ही हुए हैं।
आचार्य प्रशांत: दो-चार साल पहले मैं जैसा दिखता था, मुझे देख लेती तो मुझे देखना ही न शुरू करती।”
प्रश्नकर्ता: सर, बिल्कुल सही।
आचार्य प्रशांत: मुझे तो पकड़-पकड़ के मेरा ट्रांसफ़ॉर्मेशन कराया जा रहा है कि “कर लो, नहीं कोई नहीं देखेगा तुम्हें।” क्या करें, क्या करें।
प्रश्नकर्ता: सर, घर में जो हसबैंड भी होते हैं न, वो यही कहेंगे कि “वो फलानी देख, कितनी ख़ूबसूरत है। कुछ सीख। कैसे होता है।” सर, यह है कंडीशनिंग। हम में भर दी जाती है, हम शुरू से ऐसे नहीं भी होते हैं पर हमारा समाज भी हमें... फिर हम दूसरों को भी उसी नज़र से देखने लग जाते हैं कि वो भी ऐसा ही हो। नहीं तो हमारे पैरामीटर्स पर वो शायद सही नहीं उतरता।
आचार्य प्रशांत: कहीं मैं पढ़ रहा था, इसको सही अर्थ में सुनिएगा, वरना बात भद्दी है। कोई पश्चिमी देश था जहाँ से ब्रेस्ट सर्जरी का डेटा था कि उसके कारण क्या होते हैं और उसमें निर्णायक कौन होता है। तो उसमें, जहाँ शादीशुदा औरतों का डेटा था, उसमें तीन-चौथाई जो कारण था और जो निर्णायक थे, वह था हसबैंड या पार्टनर। दैट्स हाउ द हज़्बैंड वॉन्ट्स इट।
अब इसमें लानत तो उस महिला की ग़ैरत पर है न। और विशेषकर वहाँ बाहर तो ऐसा भी नहीं होता कि घूँघट डाल के अरेंज मैरिज हो गई। तुम्हें पहले से ही एक-दूसरे के बारे में पता था, एक-दूसरे का शरीर भी देखा ही हुआ है। और उसके बाद अब तुम कह रहे हो कि, “तू ब्रेस्ट सर्जरी करा, तभी मैं तुझे पसंद करूँगा।” तो यह क्या है? यह हमारा सेल्फ-कॉन्सेप्ट है। मैं महिलाओं की बात कर रहा हूँ। आपके शरीर का भी आकार क्या होगा, यह कोई और तय करता है। सिर्फ़ ऑब्सीनिटी नहीं है, इसमें एक सच्चाई भी है। और यह बात सिर्फ़ महिला पर ही नहीं लागू होती। पुरुष भी अगर सज-धज रहा है, तो अधिकांशतः वो दूसरों के लिए कर रहा है कि मुझे दूसरों की स्वीकृति मिल जाए।
जैसे वो अपनी ब्रेस्ट सर्जरी कराने गई है कि उससे मेरा हसबैंड खुश हो जाएगा, वैसे ही पुरुष भी सज रहा है, तो इसीलिए तो कर रहा है कि मुझे देखकर कोई खुश हो जाए। कोई खुश हो जाएगा, तो मुझे कुछ लाभ मिल जाएगा। यह सबसे घटिया क़िस्म का रिश्ता है और सबसे गिरी हुई पर-निर्भरता है।
प्रश्नकर्ता: सर, आपने एक लाइन बोली थी इंसान का चेहरा बर्दाश्त नहीं होता क्या? सर, इस लाइन ने जादू कर दिया।
आचार्य प्रशांत: नहीं, हमसे सही में नहीं बर्दाश्त होता इंसान का चेहरा। हमें इंसान नहीं चाहिए, हमें मॉडल चाहिए, हमें छवि चाहिए। आप जिसके साथ हो, उसे आप चाहिए ही नहीं। उसे आपके माध्यम से कोई और चाहिए। और एक बात और बताऊँ? बड़ी घिनौनी है। उसे आपके माध्यम से न लक्ष्मीबाई चाहिए, न सरोजिनी नायडू चाहिए, न मैरी क्यूरी चाहिए। उसे आपके माध्यम से अक्सर कोई पोर्न एक्ट्रेस चाहिए। तो इसीलिए आपको प्रेरित भी करा जाता है उसी तरीके का बनने का, दिखने का, “अब यह कर लो, अब वह कर लो।” और नाम दिया जाता है प्यार का। कि, “वह तो प्यार की बात है न, कि मैं चाहता हूँ कि तुम अपनी बॉडी इस तरह से बना लो।”
आप जो हैं वो आपको ही पता नहीं, उसके लिए कुछ आत्मज्ञान चाहिए होता है। आप क्या हैं आपको ही पता नहीं। तो आप जो हैं, उससे किसी दूसरे को क्या सरोकार होगा? वो आपको देखता है और कहता है, “इसको अपनी फ़ेवरेट पोर्न एक्ट्रेस में कैसे बदल दूँ?” तो उसी हिसाब से आपके लिए कपड़े ले आ देगा। बहुत खुश होते हैं पुरुष इस तरह की शॉपिंग कराकर। “आओ, आज तुम्हें लॉन्जरी दिलवाता हूँ।” बात दोनों तरफ़ की है, महिलाएँ भी यही हैं। वो भी, “तुम जाओ न, ऐसे कर लो न। जाओ न, वैसे कर लो न। यह कर लो, वो कर लो। ऐसे टोनिंग कर लो, ऐसे ट्रिमिंग करा लो।” यातायात दोनों तरफ़ का है। हाँ, एक तरफ़ को ज़्यादा है।
किसी के साथ होना, तो कम-से-कम इतना देख लेना कि वह तुम्हें स्वीकार कर रहा है, या तुम्हारे माध्यम से कोई और हसरत पूरी करना चाहता है। और वो हसरत ज़रूरी नहीं है कि शारीरिक ही हो, मानसिक भी हो सकती है। उदाहरण के लिए, “मैं तुम्हें अपने घर की आदर्श बहू बनाना चाहता हूँ।” तो फिर तू मुझे तो ला ही नहीं रहा, तेरे मन में आदर्श बहू की पहले से एक छवि है। और तू मेरे माध्यम से वह छवि साकार करना चाहता है। तुझे मुझसे कहाँ मतलब है?
माँ-बाप भी यही करते हैं बच्चों के साथ। हॉ! “मैं तुझे बेटा उस ऊँचे आसमान पर, उन महान लोगों जैसा देखना चाहता हूँ।” और वो महान लोग यह नहीं हैं कि भगत सिंह नहीं हैं वो महान लोग, व महान लोग कौन होंगे? हाँ, बिल गेट्स होगा, या रोनाल्डो होगा, या वो मस्क होगा। “तो आपने मस्क ही पैदा कर दिया होता। मुझे काहे को पैदा किया? मैं तो कुछ और हूँ।”
और ये रिश्ता बड़ा भद्दा है, जिसमें मैं जो हूँ, वो आपको पसंद नहीं है। आप मेरे माध्यम से अपनी कोई और हसरत पूरी करना चाहते हो।
आपको मेरा अहंकार न बर्दाश्त हो, बात समझ में आती है। आपको मेरे भ्रम न बर्दाश्त हों, बात समझ में आती है। आपको मेरा अज्ञान बर्दाश्त नहीं है, यह भी समझ में आता है। पर आपको मेरी प्रकृति ही बर्दाश्त नहीं है, यह मुझे नहीं समझ में आता। जो सचमुच तुम्हारा होगा, वो बिल्कुल तुम्हें ठुकराएगा, तुम्हारे अहंकार को ठोकर देकर लेकिन वो तुम्हारी प्रकृति को थोड़ी ठोकर देगा। वो यह थोड़ी बोलेगा, “अपना रंग बदल ले। जो तेरी प्राकृतिक प्रतिभा या रुझान हैं, उनको बदल ले। या अपने होंठ में कुछ घुसवाकर उसको मोटा कर ले। अपनी भौंह नुचवा ले।” वो यह थोड़ी करेगा। हाँ, वो लड़ेगा तुमसे ज़रूर, पर तुम्हारी प्रकृति को लेकर नहीं तुम्हारे अहंकार को लेकर।
और ज़्यादातर रिश्तों में उल्टा होता है, तुम्हारा अहंकार मान्य होता है। तुम्हारे भ्रम चलते हैं। बल्कि भ्रम अगर टूटने लगे, मान लो तुम गीता के पास आ जाओ, तो रिश्ता टूटने लगता है। तो भ्रम तो चलेंगे। “शरीर थोड़ा सेक्सी बनाकर आ। भ्रम जैसे हैं, वैसे ही रहने दे। शरीर बदलकर आ।” शरीर बदल आ, और जितनी चीज़ें हैं, कपड़े बदल आ, विचार बदल आ, मान्यताएँ बदल आ, सब कुछ इस हिसाब से बदला कि मेरे साँचे में फिट हो जाए। सब बदल आ। बस क्या नहीं बदलना है?
श्रोता: अहंकार।
आचार्य प्रशांत: अहंकार बदलना छोड़ दो, अहंकार तो और घना कर। अज्ञान और बढ़ा। आ रही है बात समझ में? दूसरा आपसे यह चाहता हो, चलो दूसरा है, हम ख़ुद भी अपने आप से यही चाहते हैं। और जो आपसे यह चाह रहा होता है आप भी उससे वही चाह रहे होते हो। जैसे मांस की दुकान। दूसरे को कैसे देखना है? “हाँ, मांस है, बढ़िया मांस है। ताज़ा है?” ज़मीनी ज़बान में कहते भी हैं, “गर्म गोश्त।” जब किसी महिला पर हाथ साफ़ करना होता है, तो उसको ऐसे कहा जाता है कि, “आज तो गर्म गोश्त का लुत्फ़ उठाएँगे।”
कोई आपको गोश्त की तरह ही देख रहा है, और आपको यह बात दिखाई नहीं दे रही। गोश्त। और आप भी उसी की नज़रों से अपने आप को देखने लगे, और आप अपनी नज़रों में भी क्या बन गई हो? गोश्त।
“मैं क्या हूँ? मैं गोश्त हूँ।” तो अपना नाम क्यों बताते हो? गोश्त तो किलो के भाव बिकता है, अपने किलो बताया करो। चिकन-विकन का कोई नाम होता है? किलो होते हैं और टाइप होती है। अच्छे से समझो। भीतर जो कीड़ा बैठा है न, जब वो हट जाता है, सब सुंदर हो, सब सुंदर हो। कोई नहीं है जो सुंदर नहीं है। हाँ, ग्लैमरस तुम हो कि नहीं, यह उस समय के समाज के चलन पर निर्भर करता है। एक चेहरा, जो आज ग्लैमरस नहीं कहलाता, बल्कि भद्दा कहलाता है, वो चेहरा किसी और काल में, किसी और जगह पर ग्लैमरस कहलाएगा।
आप ग्रीक गॉड्स और गॉडेसिज़ को देखोगे। उनके सबके यहाँ पर इतना “एब्डॉमिनल फ़ैट* होता है। ऐसे लटक रहा होता है। और यह बात सुंदरता की निशानी मानी जाती है। आप क्लियोपेट्रा की मूर्तियाँ देखिएगा। इसके यहाँ पर इतना मास होगा। आज आप कहोगे, “अरे, इतना फ़ैट है यहाँ पर! ये क्या है?” उस समय पर यही बात सुंदरता की मानी जाती थी। वो सुंदरता नहीं है, वो चलन है। किसने कह दिया कि तुम्हारा चेहरा एक ख़ास तरीके का होना चाहिए? तुम तभी सुंदर हो? चेहरे तो ज्योमेट्री होते हैं। ये क्या बात है कि ट्रायएंगल इज़ मोर ब्यूटीफुल दैन अ सर्कल? ये क्या नॉनसेंस है?
“ओ नो, नो, नो! सिमेट्री इज़ मोर ब्यूटिफुल दैन एसिमेट्री।” हाउ एग्ज़ैक्टली? इसका ब्यूटी से क्या लेना-देना है? ब्यूटी से क्या लेना-देना है? हार्ट एसिमेट्रिकली प्लेस्ट है बॉडी में। तो? आइज़ सिमेट्रिकली प्लेस्ट हैं। आँखें सिमेट्रिक हैं।
आचार्य प्रशांत: हार्ट।
श्रोता: एसिमेट्रिक।
आचार्य प्रशांत: लीवर।
श्रोता: एसिमेट्रिक।
आचार्य प्रशांत: पैंक्रियास।
श्रोता: एसिमेट्रिक।
आचार्य प्रशांत: तो? लंग्स।
श्रोता: सिमेट्रिक।
आचार्य प्रशांत: लंग्स सिमिट्रिक हैं। सिमिट्रिक, एसिमिट्रिक, दोनों चलता है प्रकृति में। किसने कह दिया कि तुमको इस तरह का ही होना है, और उस तरह का ही होना है, और वही ब्यूटी है? वो ब्यूटी नहीं है, वो चाल-चलन है। वह लोकधर्म है। उसको लोक-सौंदर्य बोल लो।
सब सुंदर है, यदि चेहरे पर अहंकार न हो तो। तुम्हें असुंदर, अग्ली, कुरूप सिर्फ़ वह जो भीतर का कीड़ा है, वही बनाता है। वरना सब सुंदर है।
नदी को गहने पहनाते हो, तब कहते हो कि सुंदर है नदी? और पहाड़ को कोट पहनाते हो? पेड़ को टाई लगाते हो? पूछ रहा हूँ। चिड़िया को सुर सिखाते हो? पर हमारी छोटी-सी बच्ची भी पैदा होती है, तो ऐसी-ऐसी माएँ हैं, वो जाकर उसके होंठ रंगने लग जाती हैं। इतनी-सी बच्ची है उसके होंठ रंग दिए। छी! तुम बीमारी में भी सुंदर हो सकते हो, तुम बुढ़ापे में भी सुंदर हो सकते हो। किसी विशिष्ट ज्योमेट्री को तो छोड़ो, किसी विशिष्ट उम्र से भी सुंदरता का कोई लेना-देना नहीं है। तुम बहुत बीमार होकर, शरीर से बहुत बीमार होकर, और बहुत बूढ़े होकर भी बहुत सुंदर हो सकते हो, अगर अहंकार नहीं है। और तुम बहुत आकर्षक होकर भी बड़े भद्दे हो सकते हो, अगर?
श्रोता: अहंकार है।
आचार्य प्रशांत: शूर्पणखा की कथा आती है। आकर्षक खूब रही होगी, निस्संदेह सुंदर नहीं थी वो। सुंदरता तो शिवत्व के साथ आती है। वह सुंदर होती, तो राम उसके साथ दूसरा व्यवहार करते, आकर्षक थी और आकर्षक बनकर आई थी। और जो आप बनकर आते हो, वो सारा प्रसाधन, सारा मेकअप वैसे ही उतर जाता है जैसे शूर्पणखा का उतर गया था कथा में। अब यह मत पूछिएगा कि तथ्य है, इतिहास है। कथा है न? हाँ। जैसे ही उसको चुनौती दी गई और कहा गया, “भाग यहाँ से”, तो कैसी हो गई वो? आ रही है बात समझ में?
और जैसे-जैसे साधारण, सहज, नैसर्गिक, नग्न, प्राकृतिक सौंदर्य का पता लगना शुरू हो जाएगा, वैसे-वैसे इस ओर को चित्त ही नहीं जाएगा। प्रकृति ने सब जीवों को, जिसमें मनुष्य भी है, स्त्री है, पुरुष है; जैसा बनाया है, वो अपने आप में कितना सुंदर है। जब दिखने लगेगा न, तो उसको फिर बहुत ज़्यादा बदलने का मन नहीं करेगा। न उभारने का मन करेगा, न ढकने का मन करेगा। यह सब मन से कौन करवाता है? अहंकार। वही कहता है कि अपना यह हिस्सा ज़्यादा उभार दो, यह चीज़ बदल दो। यह चीज़ ढक दो। यह सब वही करवाता है।
श्रोता: इसी से अगर देखें, तो जो ब्यूटी पार्लर का कॉन्सेप्ट है, या जो उसकी डेफ़िनेशन है, वो भी रिक्लेम होनी चाहिए। जैसे हम सेशंस में आते हैं, यहाँ पर ईगो थिन आउट होता है। तो एक्चुअल ब्यूटी तो यहाँ होती है न? आचार्य जी का जो सेशन है, ये ब्यूटी पार्लर है।”
आचार्य प्रशांत: आचार्य जी ब्यूटी पार्लर! सब खुश हो गए।
श्रोता: सच में।