
प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, अभी भारत की जो स्थिति है लद्दाख को लेकर, उसके बारे में मैंने कुछ पंक्तियाँ लिखी हैं; पहले मैं वो सुनाना चाहती हूँ आपको, और फिर उसी से रिलेटेड मेरा क्वेश्चन भी है।
आगे को तुम पछताओगे तुम कैसे बच पाओगे सिर पर ही जब तुम वार करोगे पूरे देह का कैसे संचार करोगे मस्तक को ही जब ध्वस्त करोगे खून की नदियों से त्रस्त रहोगे ऐसा कि तैर न पाओगे।
इससे रिलेटेड मेरा प्रश्न ये है, कि भारत की ऐसी परिस्थितियाँ देखकर मैं बहुत ज़्यादा विचलित हो जाती हूँ, आचार्य जी। और अपने विचारों में खो जाती हूँ, बिल्कुल पढ़ाई वग़ैरह में मन नहीं लगता। तो आप ज़्यादा इन चीज़ों को देख पा रहे हैं, इन चीज़ों को फेस कर रहे हैं। तो मेरा प्रश्न उसी से है और मैं जो हूँ उससे बिल्कुल खो जाती हूँ विचारों में, तो मैं ऐसी कौन-सी गलती कर रही हूँ? और आप ऐसा क्या अलग करते हैं जिससे आप अपना काम कर रहे हैं पर मैं नहीं कर पाती?
आचार्य प्रशांत: तो क्या करें, और क्या करें?
प्रश्नकर्ता: तो मेरा प्रश्न ये है आपसे, कि आप ऐसा क्या अलग करते हो?
आचार्य प्रशांत: नहीं, कुछ अलग नहीं करता। मैं वही करता हूँ जो करा जा सकता है। आग लगी है, तो उसमें पानी डालने के अलावा और क्या करें? या विचारों में खो जाएँ?
प्रश्नकर्ता: पर मैं बिल्कुल नहीं वो कर पाती।
आचार्य प्रशांत: तो ठीक है, हम पानी डालते रहेंगे। आप कविता सुनाना हमें। अरे, आग लगी है तो क्या करें? जो हम कर सकते हैं, वो करते हैं। जितना अपने बूते में है, उससे दस प्रतिशत ज़्यादा इंसान और क्या करे, वो कर रहे हैं, सब कुछ कर रहे हैं। और जितना करते जाओ, उससे करने की सामर्थ्य और बढ़ती है, कर-कर के ही बूता बढ़ेगा। एक्शन इज़ द एंटीडोट टू डिस्पेयर। हालत जितनी खराब होगी, कर्म उतना और सघन, प्रगाढ़ करना पड़ेगा। और क्या करें?
रोना भी एक तरह से दुख के प्रति घात है। दुख के साथ भी आपने अन्याय करा है, नाइंसाफी करी है, अगर आप रो रहे हो बैठकर। दुख है तो रोएँ या समाधान करें?
श्रोता: समाधान।
आचार्य प्रशांत: और समाधान जब करोगे, तो रोना तो भूलोगे। तो कोई बिल्कुल कह सकता है, इनको दुख नहीं है एकदम। दुख है, तभी रो नहीं रहे। दुख कम होता है तो आदमी रोने बैठ जाता है; दुख जब तीव्र होता है तो आदमी कहता है, रोना भी द्रोह हो गया। स्थिति अभी ऐसी है कि रोने का भी मौका, फ़ुर्सत, अवसर होना नहीं चाहिए। हालत खराब है, कोई बैठा आँसू बहा रहा है, मैं पूछूँगा, तुम्हें टाइम कहाँ से मिला? तुझे रोने का वक़्त कैसे मिला? ये भी काल-द्रोह है।
काल-धर्म कह रहा है, कि बन जा अर्जुन और अपनी ओर से जो कर सकता है कर। अब उसमें जीएगा कि मरेगा, हारेगा; जो भी होगा देखा जाएगा। और अर्जुन क्या कर रहा है? वो बैठ के रो रहा है, हाय! हाय! तो ऐसे अर्जुन को शाबाशी दें?
मैं कविताएँ लिखा करता था, खूब लिखता था, इक्कीस की उम्र तक। इक्कीस के बाद मेरा कविता लिखना छूट गया। फिर मैं चार साल में, पाँच साल में एक लिखता था। मैंने कहा, ये बात कहने की है नहीं, करके दिखाने की है। ये तो कब तक मैं अपना क्षोभ ही व्यक्त करता रहूँ? अगर वो सब कुछ, जिसके प्रति क्षोभ है, वो इंसान से आ रहा है तो उसको इंसान के भीतर समाप्त करना पड़ेगा न। तो युध्यस्व। आँसू बहाने से लड़ाइयाँ नहीं जीती जातीं। आप बिल्कुल कह सकते हो, हालत बहुत खराब है। हालत ठीक करो। वो हालत ठीक करने की कोशिश कर रहे हैं। क्योंकि सारे हालात खराब होते हैं खराब आदमी से।
हम खराब आदमी को ही अच्छा बनाने की कोशिश कर रहे हैं, वहीं से सब कुछ ठीक होना है। या तो कविता कहते रहो, या अपनी कविता बन जाओ। जीवन को काव्य बना लो। कविता से कोई समस्या नहीं है, ये न करना कि कविता लिखना छोड़ दिया, अच्छी बात है लिखो, और लिखो; पर बता रहा हूँ कि कविता के आगे भी कुछ होता है। छंद के आगे द्वंद होता है, तो द्वंद में उतरना पड़ता है। समझो इस बात को।
इस समय पर सारी समस्या ये है कि लोगों के पास न तथ्य है, न सत्य।
एक ज़माना रहा होगा राजशाही का, जब समस्या ये थी कि सैनिकों के द्वारा लोगों को कुचला जाता था। अभी वो बात नहीं है, अभी लोग कुचले जाते हैं पूँजी की ताक़त के द्वारा, दुष्प्रचार की ताक़त के द्वारा; जो स्क्रीन के माध्यम से होता है, विकृत धर्म की ताक़त के द्वारा, लालच की ताक़त के द्वारा और ये सारे काम सूक्ष्मता से होते हैं।
अगर आज हालत ये होती कि लड़ाई तो चल रही है पर लोगों के पास बम-बंदूक नहीं है, तो हम बम-बंदूक का काम करते, ज़रूर करते। पर आज अच्छाई हारी हुई है बम-बंदूक से थोड़ी हारी हुई है, वो तथ्य और सत्य के अभाव से हारी है। उसके पास कमी न बम की है, न बंदूक की, उसके पास कमी है तथ्य की और सत्य की। तो वही काम कर रहे हैं रोज़। भारत को गीता पता होती, तो जिस लद्दाख की आप समस्या की बात कर रहे हो, वो होती क्या? और गीता नहीं भी पता थी, अगर जलवायु परिवर्तन का और इकोलॉजी का, ख़ासकर जो लद्दाख की पूरी इकोलॉजी है, उसका तथ्य पता हो भारत के लोगों को, तो लद्दाख में जो हो रहा है, वो होने दिया जाएगा क्या?
हम कुछ नहीं जानते। हम न तो ये जानते हैं कि ग्लेशियर क्या होता है और क्लाइमेट चेंज क्या होता है, और न हम ये जानते हैं कि हम जो काम करते हैं, जो नीतियाँ बनाते हैं, और जो वोट डालते हैं वो हमारे भीतर के किस केंद्र से आता है; निर्णय। हम कुछ भी नहीं जानते। भारत में बहुत लोगों को तो पूछो, लद्दाख है कहाँ? वो बता न पाएँ ठीक से, उन्हें नहीं पता होगा।
न तो हम शिक्षित हैं, और जैसे शिक्षा नहीं हमारे पास, वैसे ही विद्या भी नहीं हमारे पास। शिक्षा माने, बाहर की चीज़ें। न तो हम लद्दाख के बारे में कुछ जानते हैं, न हमारे पास विद्या है, न अपने बारे में कुछ जानते हैं। तो नतीजा वो होता है जो आप देख रहे हो। बहुत लोगों को तो ये भी न ठीक से पता हो कि गंगा, यमुना और ग्लेशियर का रिश्ता क्या होता है। वो गंगोत्री, गंगोत्री बोलते हैं, उन्हें लगता है गंगोत्री कुछ ऐसा है कि वहाँ पर कुछ पानी भरा हुआ है, वहाँ से गंगा निकल पड़ती है। उन्हें पता भी न हो कि ये ग्लेशियर है, गंगोत्री।
और लद्दाख को ऐसे भी समझा जा सकता है, कि एक बहुत अति विशाल, दुनिया का सबसे ऊँचा ग्लेशियर। ऐसे समझ सकते हो। ज़्यादातर लोगों ने नहीं इतनी शिक्षा ली है, वो कुछ नहीं जानते। किसी से पूछो, “ब्लैक बॉडी रेडिएशन” क्या होता है? वो जानेगा क्या? न्यूटन का नाम लो तो वो कह देगा, “अच्छा वो जो सेब गिरा था?” उन्हें पता ही नहीं होगा कि न्यूटन के नाम के साथ रेडिएशन भी कोई चीज़ जुड़ी। “अच्छा ये क्या होता है, क्या होता है?”
अच्छा, जा रहे हैं क्या कहीं? “लेह-लद्दाख जा रहे हैं।” लेह-लद्दाख क्या होता है? ये क्या है? ये तो ऐसे ही है, जैसे कोई बोले कि हम लखनऊ, यूपी जा रहे हैं। कहाँ जा रहे हो? ये तो वैसे ही है जैसे कई लोगों को लगता है कि गोवा एक शहर का नाम है। तो पूछो, कहाँ? बोलते हैं, “गोवा में।” अरे गोवा में कहाँ पर? उनको समझ में ही नहीं आता। तो तुम चले गए वहाँ पर टूरिज़्म करने, और तुमको पता है कि वो जो तुम्हारे टायर के ज़रा-ज़रा से टुकड़े होते हैं, माइक्रो पार्टिकल्स, वो किस रंग के होते हैं? काले रंग के। और काला रंग क्या करता है?
श्रोता: एब्ज़ॉर्प्शन करता है।
आचार्य प्रशांत: हीट एब्ज़ॉर्ब करता है। जब वो हीट एब्ज़ॉर्ब करता है सफ़ेद बर्फ़ पर पड़कर, तो क्या करेगा? वो बर्फ़ में और अंदर घुस जाता है। अपने आसपास की बर्फ़ को पिघलाकर वो अंदर घुसता चला जाता है। और जितना वो अंदर घुसता जाता है, उतना वो हीट रेज़ को अंदर आने की जगह देता जाता है। और आप कह रहे हो, हमें डेवलपमेंट करना है वहाँ पर। डेवलपमेंट के नाम पर आप जो भी करोगे, उसमें आप वहाँ की बर्फ़ का क्या कर रहे हो? और जो हो चुका है वहाँ, वो भी आपको आँकड़े पता नहीं।
बर्फ़ जब पिघलती है न, तो ऐसा नहीं होता कि सबसे पहले सूखा पड़ता है, पहले बाढ़ आती है। जितना आपने विकास किया होगा, बाढ़ सब बहा ले जाती है, ख़ासकर जहाँ बर्फ़ ही बर्फ़ हो। वहाँ जब वो पिघलेगी तो सोचो क्या होगा, और उसके बाद सूखा पड़ेगा फिर, क्योंकि पानी जितना था…। और वो जो बहता हुआ पानी है, वही कहाँ पहुँचेगा अंत में? समुद्र में। और जब समुद्र में पहुँचता है तो क्या करेगा? तो सिर्फ़ लद्दाख ही नहीं मरेगा, साथ में बंबई मरेगा। पर ये बात हमारी शिक्षा में शामिल ही नहीं है। और न हमें ये पता है कि हम अपना जीवन-स्तर बेहतर करने के लिए, अपने आप को “उन्नत” कहलाने के लिए, “विकसित” कहलाने के लिए, “डेवलप्ड” कहलाने के लिए क्या कर रहे हैं।
लोगों के अभी भी, अभी लद्दाख पर बात करी थी, उस पर लोगों की प्रतिक्रिया आ रही हैं कि “देखिए साहब, बात तो सब ठीक है, लेकिन क्लाइमेट चेंज के कारण डेवलपमेंट तो नहीं रोका जा सकता न, नहीं तो पाकिस्तान और चीन आगे निकल जाएँगे।” ये कौन से लोग हैं? ये कितने अनपढ़ लोग हैं, इन्हें नहीं समझ में आ रहा है कि प्रलय की हालत में न पाकिस्तान, न चीन, न भारत; भाई, पूरी पृथ्वी पर कुछ भी नहीं बचना है। तुम कौन-सी सीमाओं की बात कर रहे हो? इन्हें नहीं समझ में आ रहा है, ये अशिक्षित लोग हैं।
ये ऐसी-सी बात है, जैसे घर में आग लगी हुई हो और घर में दो-चार भाई हैं, वो लड़ रहे हैं कि ये सब जो है नोट पड़ा हुआ है, ये किसके हाथ लगेगा। वो एक-दूसरे को मार रहे हैं, पीट रहे हैं कि ये नोट कौन उठाएगा। और आग बढ़ती जा रही है, घेरती जा रही है, बढ़ती घेरती जा रही है। थोड़ी देर में क्या देखा? ये चारों भाई भी जल गए और वो नोट भी जल गए, कुछ नहीं बचना है। नहीं समझ में आ रही बात। और मूर्खता की हद ये है कि इनको बताओ तो कहते हैं, “हमें मत बताओ, यही बात जाकर चीन को बताओ न।” आबादी के बारे में कुछ बताओ तो कहते हैं, “हमें क्यों बता रहे हो, आपकी बात मुसलमान सुनेंगे क्या?”
ये व्हाट-अबाउटरी कहलाती है। क्या? व्हाट-अबाउटरी? कि कुछ बताओ तो कहेंगे, “व्हाट अबाउट चाइना, व्हाट अबाउट मुस्लिम्स,” व्हाटअबाउटरी। “उसका क्या?” उनके शब्दों में ही, वाक्यों में ही ये होता है, “नहीं पर जो उधर हो रहा है उसका क्या?” जहाँ कहीं भी “उसका क्या” या “व्हाट अबाउट” पढ़ो, जान लो कि ये आदमी अनपढ़ है कुछ नहीं समझ रहा, कुछ नहीं। और उसको सिर्फ़ गाली देने से कुछ नहीं होगा, उसको पढ़ाना पड़ेगा। तो पढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं, एक्शन इज़ द ऐन्टीडोट टू डिस्पेयर।
जो अशिक्षित है उसको बस बार-बार ताना मारोगे कि तू अशिक्षित है, तो क्या मिलेगा? उसको पढ़ाओ, बताओ। और दोनों दिशाओं का ज्ञान दो; संसार का भी और स्वयं का भी। ताकि उसको पता चले कि अपनी छोटी-छोटी कामना की पूर्ति के लिए वो दुनिया का कितना बड़ा नुकसान कर रहा है, और दुनिया माने अपना भी।
अभी तो बात ये है कि लद्दाख की भी आप इसलिए बात कर रहे हो सिर्फ़ क्योंकि वहाँ आंदोलन हो रहा है। उत्तराखंड वालों ने आंदोलन नहीं किया तो आपने कोई बात करी क्या? विनाश तो ज़बरदस्त उत्तराखंड में भी हुआ है, पर वहाँ कोई आंदोलन नहीं खड़ा हुआ तो हमने कुछ किया भी नहीं। एक पूरा शहर ही गायब हो गया नक्शे से, जोशीमठ। आपने तब बात करी क्या? नहीं।
प्रश्नकर्ता: आपकी वीडियोज़ देख के ही मुझे उतना डीप में वहाँ के बारे में पता भी चला।
आचार्य प्रशांत: शिमला की तरफ़ जाइए, शिमला शहर की हालत देखिए। पहाड़ जहाँ पर बरसात सबसे ज़्यादा होती है, शिमला में अभी साल-दो साल पहले का तो था कि वहाँ कार धोने पर मनाही कर दी गई थी, पीने को पानी नहीं था। टूरिस्ट आने कम हो गए, होटलों में पानी नहीं था। पहाड़ों में पानी नहीं! ऐसा कैसे हो सकता है? जहाँ से सब नदियाँ चलती हैं, वहाँ पानी नहीं! ऐसा कैसे हो सकता है?
हो सकता है न। पेनी वाइज़, पाउंड फूलिश, ऐसे हम हैं। कोई टीवी चैनल, कोई अख़बार साफ़-साफ़ नहीं बात कर रहा है, लोगों को सच्चाई नहीं बता रहा। हमारी हालत जानते हो बेटा कैसी है? जैसे कोई हाई-ग्रेड कैंसर की थर्ड स्टेज में हो और ये बात बताई नहीं जा रही है; न मरीज़ को, न मरीज़ के घरवालों को। अगर चार स्टेजेस होती हैं कैंसर की, तो आज हम तीसरी स्टेज में आ चुके हैं। अभी भी उपचार लगभग असंभव हो चुका है, निश्चित हो चुका है कि प्रलय है, महाविनाश है। आने वाले कुछ दशकों के भीतर ही है। पर फिर भी शायद दो-चार प्रतिशत संभावना बची है। बस कुछ साल और बीतेंगे और हम कैंसर की आख़िरी स्टेज में आ जाएँगे। और फिर आप कितनी भी कोशिश कर लो, कुछ कर ही नहीं सकते।
कोई नहीं इसकी बात कर रहा, न किसी पार्टी का इलेक्शन मैनिफेस्टो, न कोई अख़बार, न कोई मैगज़ीन। होती है बात, ऐसे ही खानापूर्ति कर ली जाती है थोड़ी बहुत। ये मानवता के सामने सबसे बड़ी चुनौती है, इतनी बड़ी चुनौती कि मानवता को ही समाप्त कर देगी ये। इसे चुनौती भी नहीं बोल सकते, ये कैंसर है, थर्ड-स्टेज कैंसर।
मेरे पिताजी का देहावसान हुआ पिछले साल, एक साल अभी पूरा हुआ है। उनको फेफड़ों में एक सुपर बग लगा था, और जो सुपर बग था उसका नाम एन.डी. (एन.डी.एम.–1; न्यू दिल्ली मेटालो-बीटा-लैक्टामेज़ 1) से शुरू होता है। एन.डी. माने जानते हो क्या होता है? न्यू दिल्ली। वो ऐसा बैक्टीरिया था जो सिर्फ़ न्यू दिल्ली की आबोहवा में पैदा हो सकता है। वो सुपर बग है, उस पर कोई भी एंटीबायोटिक काम नहीं करती, इसीलिए उनकी मौत हुई। वो एन.डी., समझो बात को।
दुनिया में किसी देश में उतनी खराब जलवायु नहीं है जितनी भारत में है, और भारत में कहीं भी उतनी खराब नहीं जितनी दिल्ली में है।
इस हद तक कि एक विषाणु है जो सिर्फ़ दिल्ली की हवा में हो सकता है। गूगल करके उसका नाम खोज लीजिएगा, और वो सुपर बग है, वो एंटीबायोटिक रेज़िस्टेंट होता है। उस पर कुछ नहीं काम करता। महीने भर वेंटिलेटर पर रहे, पंद्रह दिन बाद तो उसका कल्चर वग़ैरह करके पता चल पाया कि ये एग्ज़ैक्टली कौन-सा बैक्टीरियम है। फिर उसका इलाज किया, सब करा, लेकिन करते-करते...।
आप में से ज़्यादातर दिल्ली के ही लोग हैं। आप हर दिन अपनी उम्र के कुछ घंटे गँवा रहे हैं। जब तक आप अपनी उम्र पूरी करेंगे, आप पंद्रह साल खो चुके होंगे! जिसको सत्तर जीना था, वो पचपन में मरने वाला है! ऐसा थोड़ी है कि अचानक से वो पंद्रह साल कम हो गए आपकी उम्र से, वो रोज़ कम हो रहे हैं। एक दिन जी रहे हो तो उसमें से कुछ घंटे कम होते जा रहे हैं तुम्हारी उम्र से। दुनिया के किसी भी देश में वो बैक्टीरिया हो ही नहीं सकता, भारत में भी और कहीं नहीं हो सकता, सिर्फ़ न्यू दिल्ली में हो सकता है। क्योंकि उसको एक ख़ास तरह की हवा और ज़बरदस्त पॉल्यूशन चाहिए। पॉल्यूशन के बिना वो मर जाता है। और हम देश के हर शहर को न्यू दिल्ली बनाना चाहते हैं।
अपने लिए यहाँ रुकना मुश्किल है। मेरी अपनी जो इम्युनिटी है, वो ओवर-रिएक्टिव है। उसमें इस तरह की जब हवा जाती है, और यहाँ जिस तरह का मौसम है, एक्सट्रीम्स में वो जाता है, मैं बहुत जल्दी-जल्दी बॉडी उसको रिएक्ट करती है। जीना मुश्किल होने वाला है सबका, बस कुछ पर असर आज ही पड़ जाएगा, कुछ पर चार साल बाद पड़ेगा। जब तक आपको पता चलेगा कि ये असर इर्रिवर्सिबल है, तब तक बहुत देर हो चुकी होगी। आप कुछ नहीं कर पाओगे।
किसी का कत्ल कर दो तो लगता है मर्डर हो गया, पर किसी की उम्र से पंद्रह साल छीन लिए तो लगता है नेचुरल डेथ मरा है। वो नेचुरल डेथ है? दिल्ली में आज कोई भी नेचुरल डेथ नहीं मर रहा है, सबका मर्डर हो रहा है। और मर्डरर है हमारी इग्नोरेंस और डेवलपमेंट की हमारी झूठी अवधारणा। एक आदमी की ज़िंदगी से आप दस-पंद्रह साल छीन रहे हो, ये कत्ल कैसे नहीं है? जिसको सत्तर जीना था, पचपन में मार दिया, ये मर्डर नहीं था क्या? लेकिन हमें नहीं समझ में आ रही है बात।
भारत से बाहर जो लोग चले जाते हैं न, ज़रूरी नहीं है कि वो पैसों में ही लोट रहे हों। हो सकता है उन्हें कोई बहुत साधारण काम मिल रहा हो, टैक्सी चलाने जैसा। वो फिर भी लेकिन भारत नहीं लौटना चाहते। एक वजह मजबूरी की भी है, यहाँ साँस नहीं ली जाती। यहाँ का पानी गंदा है, टॉक्सिक है, लेड, मर्करी सब मिले हुए हैं पानी में। यहाँ की दीवारें हैं, उसमें आपको ये सब दिखाई देगा। चलो यहाँ तो ठीक है, ये साउंड-प्रूफिंग के लिए करा है, आप बाहर जाओगे, वहाँ भी टाइल्स लगवानी पड़ी। जानते हो क्यों? पानी इतना खराब है, वो ईंट, सीमेंट, पेंट सब खा जाता है। तो जो ज़मीन पर टाइल्स लगनी चाहिए, वो दीवारों पर लगवाओ। और वही पानी है, वही जा रहा है भीतर। आप समझ रहे हो केमिकल्स आपके के साथ क्या कर रहे हैं भीतर?
जो हमारे यहाँ सब्ज़ियाँ उग रही हैं, वो सब्ज़ियाँ मैलनरिश्ड हैं। इंसान के साथ हमने ये टर्म यूज़ करी है न, मैलनरिशमेंट। हमारी सब्ज़ियाँ मैलनरिश्ड हैं, हमारा गेहूँ, हमारा चावल मैलनरिश्ड है। उसके भीतर जो मिनरल्स और विटामिन्स होते थे वो नहीं हैं अब, बस उसका आकार बढ़ गया उसके भीतर कुछ नहीं है। और ये भारत में ज़्यादा हो रहा है। इन्हीं सब चीज़ों की सामूहिक अभिव्यक्ति लद्दाख के प्रति जो हमारा रुख है, उसमें झलकती है। न हम कुछ जानते हैं, न हमें कुछ जानना है। धीरे-धीरे हम अपने विनाश की ओर बढ़ रहे हैं। धीरे-धीरे कहाँ यार, बहुत तेजी से। हम लुढ़क रहे हैं। मूविंग विद एक्सेलरेशन।
ये शायद अभी जो मार्च बीता है, ये भी पिछले कई सालों में सबसे गर्म मार्च था। अभी पच्चीस अप्रैल से लेकर के जून तक बहुत ज़बरदस्त हीट वेव, लू का अंदेशा है। जान बचाइए! ये जो सत्र होते हैं रविवार वाले, 5:00 बजे वाले, इसको भी करेंगे छह या सात बजे का, वरना आपको घर से निकलना पड़ेगा तीन बजे यहाँ आने के लिए। पता चला कि सत्र की शुरुआत मौन से करनी पड़ रही है, कि वो जो कुछ कुर्सियाँ खाली दिख रही हैं…।
हम नाज़ुक लोग हैं, समझो बात को। हम एक बहुत छोटी-सी टेम्परेचर रेंज में सरवाइव कर सकते हैं। जितने भी ये एलीमेंट्स हैं, ये जो पंचभूत एलीमेंट्स हैं, एटमॉस्फेरिक कंडीशन्स, इकोलॉजिकल कंडीशन्स; हम इनकी एक बहुत नैरो रेंज में सरवाइव कर सकते हैं। मैन इज़ एक्स्ट्रीम्ली डेलिकेट, मैन ऐन्ड द एन्टायर इकॉलॉजी। वो रेंज जैसे ही डिस्टर्ब होगी, हम बचने नहीं वाले हैं बाबा। कितनी दूर तक ये बात जाती है आप समझ ही नहीं रहे हो।
बर्फ़ पिघलेगी तो क्या बनेगी?
श्रोता: पानी।
आचार्य प्रशांत: पानी बनेगी, ठीक है। बर्फ़ ज़्यादा से ज़्यादा कहाँ पर है? पोल्स पर है; नीचे अंटार्कटिक, ऊपर…। पानी जो है वो नीचे की ओर आएगा, सागर की ओर आएगा। अर्थ जब रोटेट करती है न, जैसे ही उसमें उसका सेंटर ऑफ मास शिफ्ट करेगा, उसके रोटेशन की स्पीड कम हो जाएगी, हो चुकी है।
पृथ्वी जैसे घूम रही है, उसके घूमने की गति कम हो जानी है क्योंकि पानी ऊपर था, कोई चीज़ ऊपर बैठी हुई है। एंगुलर वेलोसिटी जानते हो? लॉ ऑफ कंजर्वेशन ऑफ एंगुलर मोमेंटम जानते हो? कोई चीज़ घूम रही हो ऐसे (गोल-गोल) , घूमते-घूमते उसका रेडियस बढ़ जाए तो क्या होता है? क्या होता है? उसकी एंगुलर वेलोसिटी कम हो जाती है। जो पानी जब ऊपर था, पोल पर था, तो उसका रेडियस कितना था, एक्सिस ऑफ रोटेशन से उसका रेडियस कितना था? ज़ीरो।
ये पृथ्वी की धुरी है, यहाँ पोल पर कोई चीज़ थी तो रेडियस कितना हो गया? बहुत कम, थोड़ा सा। अब इक्वेटर पर आ गया वही पानी बहकर के, तो रेडियस कितना हो गया?
श्रोता: ज़्यादा हो गया।
आचार्य प्रशांत: तो वेलोसिटी क्या होगी?
श्रोता: कम।
आचार्य प्रशांत: जब वेलोसिटी कम होगी तो उसके प्रभाव आपने सोचे हैं? पृथ्वी जब रोटेट करती है, उसी रोटेशन से ये आपकी ट्रेड विंड्स चलती हैं, उसी से वेस्ट लीज चलती हैं। जितने भी ये विंड सिस्टम्स होते हैं, वो सब पृथ्वी के रोटेशन पर डिपेंड करते हैं। और जो हीटिंग होती है, डिफरेंशियल हीटिंग लैंड की और सी की, इसी से जो मानसून का सिस्टम है, वो भी चलता है। ये सबका सब अव्यवस्थित हो जाना है। भूल जाओ कि तुमको फिर जून-जुलाई-अगस्त में बरसात देखने को मिलेगी, तुम कर लेना विकास।
हवाएँ क्यों चलती हैं, कभी सोचा है? हवा क्यों चलती है? मानसून सिर्फ़ एक हवा है। जिसको आप कहते हो न, भारत में बारिश हो रही है वो सिर्फ़ हवा है। कौन सी हवा है? नम हवा है, मॉइस्ट हवा है, जो सागर से ऊपर से उठकर लैंड के ऊपर आ जाती है और फिर हिमालय से टकराकर बारिश कर देती है। वो सिर्फ़ हवा है।
हवा बहती ही क्यों है? कोई भी चीज़ बहेगी तो बहने के लिए उसको क्या चाहिए? एनर्जी। वो एनर्जी कहाँ से मिलती है उसको? सूरज से मिलती है। पृथ्वी पर जो भी चीज़ अगर एनर्जी से चल रही है, तो एनर्जी कहाँ से आएगी? सूरज से ही। अगर वो एनर्जी ज़्यादा ट्रैप हो रही है, तो वो जो चीज़ चल रही है उसकी भी एनर्जी बिगड़ गई न, जितनी एनर्जी थी, उससे कम या ज़्यादा होगी। और एक नैरो रेंज में जब तक है तभी वो एक सिस्टम को चलाए रख सकता है। वो रेंज से बढ़ गया, कम हो गया, कुछ हो गया; सब खराब।
हाई बीपी हो जाए, लो बीपी हो जाए, आप तो बीमार ही हो गए। पर आम आदमी को ये सब पता नहीं है, कौन बताएगा? अभी लड़ाई चल रही है न मिडिल ईस्ट में, अब उसमें ज़रा सी आबादी है गाज़ा की, और इसमें ये हो रहा है कि इनके रेफ़्यूजीज़ को क्या करें। इज़िप्ट मना कर रहा है, यूनाइटेड नेशन इज़राइल पर प्रेशर बना रहा है, और ये तब जब महज़ कुछ लाख लोग वहाँ पर।
क्लाइमेट क्राइसिस का सबसे बड़ा असर पड़ने वाला है उन इलाकों पर जिनमें आबादी सबसे घनी है। और घनी आबादी में भी दो वर्ग हैं जिन पर सबसे ज़्यादा असर पड़ेगा; एक ग़रीब और दूसरा महिलाएँ। और इन दोनों से ज़्यादा असर किसी पर पड़ना है तो वो जो सबसे ग़रीब हैं इस पृथ्वी के। कौन? बेचारे जीव-जंतु, वो महाग़रीब हैं वो तो कहीं के नहीं रहेंगे, वो सड़क से चिपक-चिपक के मरेंगे।
सबसे कम असर किस पर पड़ना है, जो सबसे अमीर है।
और ये जो अमीर हैं यही मीडिया का नैरेटिव तय करते हैं, यही पॉलिटिक्स तय करते हैं, यही आपका वोट तय करते हैं। आपको क्या लग रहा है कि आपका ओपिनियन आपका है? नहीं। वो किसी अमीर ने अपने पैसे के द्वारा बनवाया है, आपको एक नैरेटिव बार-बार सुना के। जो लोग कहते हैं न “हम ऐसा सोचते हैं।” तुम कुछ नहीं सोचते; तुम्हें सुचवा दिया गया है, किसी ने अपने पैसे से तुम्हें सोचने पर मजबूर किया है।
एक ही बात तुमको बार-बार दिखाई जाएगी, तुम सोचने लग जाते हो। कोई कुछ बोले कि “ऐसा है” उससे पूछो, तुम्हें कैसे पता? थोड़ा याद करो, तुम्हें कैसे पता, तुम्हें किसने बताई ये सारी बात? वो कहेगा, “ये बात मैंने टीवी पर सुनी।” टीवी किसका है? जिसका टीवी है न, उसने ये बात ठूँस-ठूँस के तुम्हारे मन में भरी है। वो बात तुम्हारी अपनी नहीं है।
दुनिया का पता नहीं साठ है, अस्सी प्रतिशत है, एमिशंस; वो सैंतीस इकाइयों द्वारा किया जा रहा है सिर्फ़। असर पड़ना है ग़रीबों पर, और जबकि ये करतूत है अमीरों की। असर छोटी बात है, असर से तो ऐसा लगता है खुजली हो गई। मौत हो गई! ये वाला असर। और मौत भी एक दिन में नहीं होगी, तिल-तिल के मरना है। और काम करा है ये अमीरों ने, वो अमीर जो सत्ता को कठपुतली की तरह नचाते हैं, मीडिया को कठपुतली की तरह नचाते हैं; अमीर कभी ख़ुद सत्ताधारी नहीं बनता, बस वो सत्ता को नचाता है। अमीर कभी ख़ुद आकर नहीं कहेगा “मैं ऐसा बोल रहा हूँ;” बस वो मीडिया ख़रीद लेता है, वो पॉलिसीज़, पॉलिसी मेकर्स सब ख़रीद लेता है। करतूत उसकी है, भुगतोगे आप, भुगत रहे हो। जो कर सकते हो करो, रोओ मत।