किस-किस की ज़िंदगी से कोई विदा हुआ है, जिसकी विदाई पर रोए थे? वो अभी भी उतना ही याद आता है जितना विदाई के चार महीने तक आता था? शरीर नहीं, तुम्हारी याद भी मिट जाएगी। तुम भी किसी को याद नहीं आने वाले, पागल। यही है भविष्य। खूबसूरत फंदों में फँसना सीखो। बस फंदा इस लायक होना चाहिए कि फँसा जाए। भगत सिंह ने भी फंदा ही तो चुना था, फंदा माने बंधन। पर वैसा बंधन चुनो तो क्या बात है! फिर उसके बाद शिकायत नहीं रह जाएगी कि ज़िंदगी रुखी है, बेरौनक है, ‘जिया नहीं जाता।’
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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, हार्दिक प्रणाम, नमन एवं अभिनंदन। आचार्य जी, “जिए कैसे?” तो मेरे लिए तो सबसे कठिन यही था, क्योंकि जब शुरुआत से यही था कि जिनको अपना समझते हैं, जैसे माँ–बाप, सब लोग, तो उनके साथ तो जीना आसान। फिर धीरे–धीरे ऐसी सिचुएशंस आती हैं कि नए–नए लोग मिलते हैं, तो ऐसा नहीं है कि उनसे कोई डर है, दबाव है या उनके बीच में रह नहीं सकते। एडप्टेबिलिटी नहीं है, बस ये है कि वो अच्छा नहीं लगता। फिर ये नहीं होता कि जीने का मन नहीं होता, कि क्यों इतने लॉन्ग टाइम तक जिएँ।
आचार्य प्रशांत: मैं नहीं समझा, विस्तार से बताइए।
प्रश्नकर्ता: मतलब, आचार्य जी “जिए कैसे?” तो एक किसी का लक्ष्य होता है कि उसको जीवन में बहुत सारा सुख मिल रहा है या बहुत सारी उसकी इच्छाएँ हैं, जिसकी वजह से वो जीना चाह रहा है। या मेरे मन में भी जब तक ऐसी इच्छाएँ रही होंगी। लेकिन मैं जो ऑब्ज़र्वेशन से ये लगता है कि बचपन से ही मेरी कोई बहुत जीने की इच्छा नहीं थी कि मैं जिऊँ या लॉन्ग टाइम तक, या फिर जीवन मिल गया है तो फिर क्यों ही मिल गया है।




