जिया नहीं जाता

Acharya Prashant

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जिया नहीं जाता
किस-किस की ज़िंदगी से कोई विदा हुआ है, जिसकी विदाई पर रोए थे? वो अभी भी उतना ही याद आता है जितना विदाई के चार महीने तक आता था? शरीर नहीं, तुम्हारी याद भी मिट जाएगी। तुम भी किसी को याद नहीं आने वाले, पागल। यही है भविष्य। खूबसूरत फंदों में फँसना सीखो। बस फंदा इस लायक होना चाहिए कि फँसा जाए। भगत सिंह ने भी फंदा ही तो चुना था, फंदा माने बंधन। पर वैसा बंधन चुनो तो क्या बात है! फिर उसके बाद शिकायत नहीं रह जाएगी कि ज़िंदगी रुखी है, बेरौनक है, ‘जिया नहीं जाता।’ यह सारांश प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन के स्वयंसेवकों द्वारा बनाया गया है

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, हार्दिक प्रणाम, नमन एवं अभिनंदन। आचार्य जी, “जिए कैसे?” तो मेरे लिए तो सबसे कठिन यही था, क्योंकि जब शुरुआत से यही था कि जिनको अपना समझते हैं, जैसे माँ–बाप, सब लोग, तो उनके साथ तो जीना आसान। फिर धीरे–धीरे ऐसी सिचुएशंस आती हैं कि नए–नए लोग मिलते हैं, तो ऐसा नहीं है कि उनसे कोई डर है, दबाव है या उनके बीच में रह नहीं सकते। एडप्टेबिलिटी नहीं है, बस ये है कि वो अच्छा नहीं लगता। फिर ये नहीं होता कि जीने का मन नहीं होता, कि क्यों इतने लॉन्ग टाइम तक जिएँ।

आचार्य प्रशांत: मैं नहीं समझा, विस्तार से बताइए।

प्रश्नकर्ता: मतलब, आचार्य जी “जिए कैसे?” तो एक किसी का लक्ष्य होता है कि उसको जीवन में बहुत सारा सुख मिल रहा है या बहुत सारी उसकी इच्छाएँ हैं, जिसकी वजह से वो जीना चाह रहा है। या मेरे मन में भी जब तक ऐसी इच्छाएँ रही होंगी। लेकिन मैं जो ऑब्ज़र्वेशन से ये लगता है कि बचपन से ही मेरी कोई बहुत जीने की इच्छा नहीं थी कि मैं जिऊँ या लॉन्ग टाइम तक, या फिर जीवन मिल गया है तो फिर क्यों ही मिल गया है।

हाँ, ये था कि अब जैसे मम्मी–पापा हैं, बहन है, सारे लोग हैं, तो उन रिश्तों के बीच में काफ़ी बड़ा परिवार था, संयुक्त परिवार और गाँव में था, तो थोड़ा जीना अच्छा लग रहा था उन लोगों के बीच में। फिर नौकरी के संदर्भ में जब बाहर आना हुआ, नए–नए लोगों से मिलना, तो हॉस्टल में भी रहा, तो दोस्ती हुई, तो फिर वहाँ अच्छा लगने लग गया। लेकिन जब फिर नए–नए लोगों से मिलना होता है, बार–बार वैसी सिचुएशंस बनती हैं, नई जगह, नए लोग, तो उनसे संबंध भी बन जाते हैं। ऐसा नहीं है कि उनके बीच में रहना मुश्किल है, लेकिन एक जो जीने की चाहत है, वो नहीं होती कि कितने लॉन्ग टाइम तक जिएँ।

अभी जैसे जिसको मैं अपना समझता हूँ, कि जैसे, मतलब, पत्नी भी है, बेटा भी है, सब हैं, तो लगता है कि हाँ इनके लिए जिऊँ, स्टैंड करूँ।

आचार्य प्रशांत: यहाँ हैं पत्नी, बेटा?

प्रश्नकर्ता: नहीं आचार्य जी।

आचार्य प्रशांत: जीना भविष्य की बात थोड़ी होती है, कि इच्छा होगी तो जिएँगे, कि लक्ष्य बनाएँगे तो जिएँ। जीने का मतलब है यही है अभी, ये सब सामने है, इससे व्यवहार क्या करना है? संबंध क्या बनाना है?

आपने जो प्रश्न पूछा है, उसमें बहुत सारी मान्यताएँ हैं, वही सामने आएँ, इसलिए मैंने कहा था, उसको विस्तार में बोलिएगा। जीने के लिए कोई लक्ष्य थोड़ी चाहिए, जी तो आप रहे ही हो। जीवन में हर पल सामने कुछ लेकर आता है, कोई विषय है, कोई दृश्य है, और आपको उत्तर देना है एक संबंध बनाना है। भविष्य की बात थोड़ी है, जीवन अभी की बात है।

आपके प्रश्न में निहित है कि “मेरे पास कोई बड़ी–बड़ी कामनाएँ नहीं हैं, तो मैं किसके लिए जिऊँ? मेरे पास कोई बड़े लक्ष्य नहीं हैं, मैं किसके लिए जिऊँ?” बड़े लक्ष्यों के लिए जिया नहीं जाता, उनके लिए जीवन थोड़ी होता है, उनके लिए तो कल्पनाएँ पर्याप्त होती हैं। बड़े लक्ष्य की तो कल्पना हो सकती है, क्योंकि वो तो लक्ष्य है न, उपलब्धि थोड़ी ही है। लक्ष्य माने क्या? जो अभी मिला नहीं। तो उसमें आप जी थोड़े ही रहे हो, उसकी तो अधिक से अधिक क्या कर सकते हो? कल्पना ही तो कर सकते हो।

जिया तो इसी में जाता है, ये जो है अभी सामने। मैं अगले प्रश्न में जिऊँ या आपकी बात में? अभी आप कैसे जी रहे हैं? मैं कुछ कह रहा हूँ, आप सुन रहे हैं। थोड़ी देर पहले मैं कैसे जी रहा था, आप कुछ कह रहे थे, मैं सुन रहा था। यही है जीवन। आपका मुझसे सही संबंध हो, मेरा आपसे सही संबंध हो, वो तभी हो सकता है जब मैं आपको समझ पाऊँ, आप मुझे समझ पाएँ। पर अगर मैंने ठेका ही ले रखा है न समझने का किसी को, तो मैं नहीं समझूँगा।

मान लीजिए, आप हठ बाँध कर बैठे हों या आपने जो भी मान्यता बना रखी है उसको बचाना है, तो मैं जो भी बोलता रहूँ, आप नहीं समझेंगे। ये लीजिए, अब हो गया जीवन ख़राब, जो चीज़ सामने थी आप उससे हाथ धो बैठे। मैं आपके सामने हूँ, इसी पल आपसे कुछ बात कह रहा हूँ। पर आपने अगर आग्रह बना रखा हो कि आपको इसको (अपने भीतर की ओर इंगित करते हुए) बचाना है, जो यहाँ अज्ञान है, और इस कारण आपको नहीं समझनी मेरी बात, तो आप नहीं समझोगे, और हो गया जीवन ख़राब।

जीने के लिए कामना, ऐम्बिशन, लक्ष्य या भविष्य नहीं चाहिए। जीने के लिए जीवन के प्रति एक खुलापन और तत्परता चाहिए, क्योंकि जीवन तो आप चाहो या न चाहो, वो लगातार अपने आप को प्रस्तुत कर ही रहा है न। जीवन माने प्रकृति, आत्मा तो जीती नहीं है। जीना माने प्रकृति। उस छोर पर भी जो स्वयं को जीव कहता है, वो भी प्रकृति है, और वो जीव जिस दुनिया को देखता है, जिस दुनिया में घूमता–फिरता है, व्यवहार करता है, वो सब भी प्रकृति है।

प्रकृति लगातार क्या कर रही है? उसका काम है नाचना, ऐसे होना, फिर ऐसे होना, फिर ऊपर उठना, नीचे गिरना, दाएँ हो जाना, पीला हो जाना, हरा हो जाना, लाल हो जाना, सात रंग ले लेना, ये उसका काम है। और आपका काम है ये सब जो हो रहा है, उसके मध्य में स्थित रहना। इसमें भविष्य से क्या करना है आपको? पर इसको आप आगे बढ़ाइए, अभी आप पूरी तरह शायद न समझे हों।

प्रश्नकर्ता: हाँ आचार्य जी, इसमें मतलब मुझे बड़ा टफ लगता है, कठिन।

आचार्य प्रशांत: क्या चीज़?

प्रश्नकर्ता: यही कि जीना, अभी जैसे यहाँ पर हैं सत्र में।

आचार्य प्रशांत: तो अभी मैं आपसे बात कर रहा था, उसमें आपको क्या कठिन लग रहा था?

प्रश्नकर्ता: ये कठिन नहीं लग रहा है, आचार्य जी।

आचार्य प्रशांत: तो यही तो जीना है, तो जीना कठिन नहीं है इसका मतलब। क्योंकि जीना कठिन होता तो अभी जो मैं आपसे बात कर रहा हूँ, ये भी कठिन लग रहा होता, खड़े रहना, बर्दाश्त करना। कठिनाई फिर कहीं और है। अब कहाँ है कठिनाई, वो बताइए।

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, फिर अभी जैसे यहाँ से फिर वापस जाऊँगा, फिर नया ऑफिस और फिर कल से फिर मतलब वही चीज़ें होने लग जाती हैं।

आचार्य प्रशांत: अच्छी नहीं लगती न?

प्रश्नकर्ता: मतलब एंड हो जाना चाहिए जल्दी, बहुत लॉन्ग।

आचार्य प्रशांत: समझ गया, जो भी ऑफिस में होता है अच्छा नहीं लगता न, कठिन लगता है।

प्रश्नकर्ता: ऑफिस ही बदल जाता है तो, बहुत टाइम तक तो कहीं रहा नहीं हूँ।

आचार्य प्रशांत: जहाँ रहते हैं, वहाँ से क्यों हटना पड़ता है? ऑफिस क्यों बदल जाता है? क्या वहाँ अच्छा नहीं लगता?

प्रश्नकर्ता: ज़्यादातर तो अपने आप ही हो जाता है।

आचार्य प्रशांत: अपने आप हो जाता है, तो आप नई जगह जाते हैं, या पुरानी जगह पर भी थे, वहाँ कठिन क्या लग रहा होता है? कुछ है सामने, मैं कभी आपके सामने हूँ, कभी कोई और आपके सामने है। जीवन माने यही है, आप तो हो ही जीवन के केंद्र में। कभी मैं हूँ सामने, कभी कोई और आ गया आपके सामने। अभी मैं आपके सामने हूँ, आपने कहा, कुछ कठिन नहीं लग रहा। कोई और आपके सामने आ जाता है, तो कठिनाई क्या आ जाती है? ये बताइए।

प्रश्नकर्ता: मतलब, आचार्य जी, जैसे मैंने अपने आप को देखा है, कि मुझे क्या अच्छा लगता है, जो चीज़ें अच्छी लगती हैं, उनमें तो आसान-सा लगता है।

आचार्य प्रशांत: तो जो सामने आ जाता है, अगर वहाँ कुछ ऐसा है जो अच्छा नहीं लग रहा, तो आप क्यों बर्दाश्त करते हो?

प्रश्नकर्ता: लेकिन जो, आचार्य जी, बहुत अच्छी चीज़ें लगी भी तो बहुत दिनों तक रह नहीं पातीं वो कंटिन्यू।

आचार्य प्रशांत: आपने छोड़ना क्यों बर्दाश्त किया? अगर चीज़ें बुरी थीं, तो झेलना क्यों बर्दाश्त किया? और चीज़ें सचमुच अच्छी थीं, तो छोड़ना क्यों बर्दाश्त किया?

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, जो चीज़ें अच्छी लगतीं, बुरी लगतीं, वो काम को लेकर हैं, जैसे कि नौकरी से, पेशे से। लेकिन जो जीने की चाहत है…।

आचार्य प्रशांत: जीना चाहत नहीं होती। अभी आपको उत्तर देने के लिए मुझे चाहना थोड़ी पड़ रहा है। आप में से कितने लोग अभी कामना के वशीभूत हो? यहाँ बैठे हुए हो तो? “जीने की चाहत,” वो शायरी की बात है। उसका अस्तित्व से कोई लेना–देना नहीं। जो “जीने की चाहत” होती है, ये क्या मतलब है? “जीने की चाहत” से क्या मतलब है? जीने की चाहत तो बस कामना होती है। जीने की चाहत से ही मतलब होता है कि कल नया एक भविष्य आएगा, और कुछ नया मक्खन–मलाई मिलेगा। नहीं तो जीने के लिए चाहत थोड़ी चाहिए। जीवन तो है, उसमें चाहत का क्या सवाल है?

दो और तीन पाँच होते हैं, या चाहत होती है? दो और तीन पाँच होते हैं, या दो और तीन पाँच करने की चाहत होती है?

श्रोता: पाँच होते हैं।

आचार्य प्रशांत: तो जीवन तो है, उसमें चाहत कहाँ से आ गई कि जीने की चाहत होनी चाहिए? जीने की चाहत नहीं होनी चाहिए, बिल्कुल नहीं होनी चाहिए। जीवन जब समाप्त हो रहा हो, होने दीजिए समाप्त, चाहत की कोई बात नहीं है। और जीवन जब तक चल रहा है, उसको बेधड़क चलने दीजिए। उसको रोकने की कोई ज़रूरत नहीं है।

न तो ये चाहत होनी चाहिए कि “जीवन को मैं अभी रोक दूँ, समाप्त करो इस जीवन को।” न ये चाहत होनी चाहिए कि “मैं अनंत काल तक जीता रहूँ, कम से कम सौ साल जीना है मुझे।” वो चाहत भी नहीं। चाहत का क्या सवाल है?

कोई क्यों चाहे कि कल कुछ नया होगा और होगा? क्यों चाहे? अगर कुछ नया होना चाहिए, तो उसके लिए मैं कल का इंतज़ार क्यों करूँगा? चाहत की थोड़ी बात है। कुछ अगर सचमुच वांछनीय है, तो उसको मैं कल थोड़ी चाहूँगा, उसे तो मैं आज समर्पित हो जाऊँगा, अभी।

“जीने की चाहत” का मतलब होता है, अच्छे से सुन लीजिए, समझ लीजिए, लिख लीजिए; “जीने की चाहत” का मतलब होता है जीवन को टालना।

सुनने में ऐसा लग रहा है जैसे जीने की चाहत बहुत अच्छी बात है, “जिजीविषा” बोलते हैं उसको। सुनने में ऐसा लग रहा है कि जीने की चाहत बड़ी अच्छी बात है, पर वो अच्छी बात नहीं होती। जीने की चाहत का मतलब होता है जीवन को भविष्य की ओर टाल देना, “कल होगा जीवन।” कल थोड़ी होगा जीवन। कल कभी आता है जीवन? जीवन तो अभी है। तो चाहत का क्या प्रश्न है फिर? कौन-सी चाहत?

रात को सोने जाएँ तो हो गया, सब निपट गया है। कल आँख खुलेगी तो खुलेगी, खुलेगी तो देखेंगे क्या है। नहीं खुली तो नहीं खुली, निपट गए। कोई ये थोड़ी है कि सुलगते अरमानों के साथ सोए हैं। “जीने की बड़ी चाहत है क्योंकि दो साल बहुत…, कुछ नहीं है।” अगर कुछ सचमुच ऐसा था जो मेरी उपस्थिति माँगता है, मेरा कर्म माँगता है, मेरी प्रतिभागिता माँगता है, तो उसमें जाकर डूबना होगा मुझे अभी, मैं चाहत थोड़ी रखूँगा कि “अभी रुक जाओ, छह महीने थोड़ा पैसा जोड़ लूँ फिर जाऊँगा, जीने की चाहत है।”

जो सामने है न उसे जवाब दीजिए। और जवाब से मेरा मतलब बदसलूकी नहीं है, द राइट रिस्पॉन्स। कोई चाहत नहीं बचेगी जीने की। चाहने के लिए समय ही नहीं बचेगा, ऊर्जा ही नहीं बचेगी। सारी ऊर्जा आप फिर कहाँ समर्पित कर रहे होंगे, निवेशित कर रहे होंगे? जो है तत्काल।

मैं आपसे बात कर रहा हूँ। आप मुझको बताओ, मुझे ईमानदारी से देख के बताओ, आपको लग रहा है मैंने थोड़ी-सी भी जगह छोड़ी है अगले सवाल के लिए? मेरे पास जो कुछ था, मैंने आपको दे दिया। मुझे नहीं पता अब कल क्या होने वाला है। इस सवाल के बाद मैं मर जाऊँ, तो मैं तृप्त मरूँगा। और मैंने कोई बहुत बड़ा काम नहीं कर दिया, मैंने ब्रह्माण्ड नहीं पलट दिया, मुझे नोबेल प्राइज़ नहीं मिल गया। पर मेरे पास जो कुछ था, वो तो मैंने आपको दे दिया। तो मेरे पास कुछ शेष नहीं है, तो मैं खाली हूँ। मैं हो गया, समाप्त हो गया, मैं क्या अब चाहत रखूँ? हो गया।

हाँ, अगला कुछ आएगा और अगर पाता है कि मैं तब भी ज़िंदा हूँ, अगला प्रश्न आएगा, और तब तक भी बड़ी माँ की कृपा है, ज़िंदा हूँ। तो फिर अपने आप को मैं पूरा अगले सवाल को सौंप दूँगा, जैसे अभी मैंने अपने आप को पूरा आपको सौंप दिया है। अभी अगले की चाहत नहीं है, तब पिछले की स्मृति नहीं होगी, न भूत, न भविष्य।

छवि है आपके पास, “ज़िंदगी ऐसी होनी चाहिए, वैसी होनी चाहिए।” और छवियाँ तो भविष्य का इंतज़ाम होती हैं बस, क्योंकि कोई भी छवि तथ्य तो होती नहीं, पर छवि ये दिलासा दे देती है और लालच दे देती है कि आगे भविष्य ऐसा बन सकता है। छवि कभी भी वर्तमान से मेल नहीं खाएगी। किसी की जो भी मधुर छवि है, उसने मेल खाया वर्तमान से? किसी का खाया हो तो बता दो। पर छवि हम फिर भी पकड़ते हैं, और वो छवि वही बन जाती है जो आप माँग रहे हैं, “जीने की वजह।” ये मेरे दिमाग में मैंने एक फ़ोटो बना दी है और एक दिन ज़िंदगी ऐसी होगी। कब होगी ऐसी? भविष्य में। तो फिर इस तस्वीर को साकार करने के लिए, सजीव करने के लिए, मैं जिऊँगा।

कोई तस्वीर नहीं चाहिए, तस्वीर अपने आप बनेगी, और आप जैसी बना सकते हो उससे बेहतर बनेगी। आपका क्या काम है? अभी वो सवाल पूछ रहे हैं, आप जवाब दो न! आपका ये काम है। ये ज़िंदगी खड़ी है मेरे सामने। और ज़िंदगी सवाल पूछ रही है, अभी उसको जवाब दो न! तुम कहाँ तस्वीर में खोए हुए हो?

किस-किस के पास तस्वीरें हैं भविष्य की? झूठ मत बोलना, यहीं से मारूँगा। अरे चलो, आँख बंद करो, ऐसे फाड़ो, चलो फाड़ो-फाड़ो! (कागज को फाड़ने का इशारा करते हुए)। अरे रे रे रे! दर्द ही दर्द! छन से टूटा कोई सपना।

आपने तो फाड़ी भी नहीं! (प्रश्नकर्ता को इंगित करते हुए)। एकदम शातिर हैं, सबकी फटवा के ख़ुद मस्त खड़े हो। तस्वीरों की बात कर रहा हूँ। इसी बात में मज़े आते हैं।

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, हॉस्टल लाइफ़ थी तो दो साल बहुत जल्दी बीत गया। एक बार थी तो उसमें सात साल रहा, जवाहर नवोदय विद्यालय में। तो वहाँ तो लड़ाइयाँ हुईं, बहुत सारी चीज़ें हुईं, तो लगा कि एक बार और हॉस्टल लाइफ़ मिलनी चाहिए। दोबारा मिली तो बहुत अच्छी फ्रेंडशिप रही काफ़ी लोग थे, लेकिन समय व्यर्थ ही ज़्यादा था, व्यर्थ के कामों में ही बीता हॉस्टल में। फिर भी वो दो साल लगे, दो मिनट में बीत गया।

लेकिन अब जो आचार्य जी इस समय जो समय चलता है, तो लगता है कि बहुत मतलब जल्दी–जल्दी से नहीं बीतता, फटाफट। और मैं वही था कि मतलब इतना लंबा न हो के वो शॉर्ट में हो जाए बस।

आचार्य प्रशांत: जो समय पर ध्यान देने लगते हैं न, उनके लिए पल सदियों जैसे हो जाते हैं। बिताए नहीं, बीतेंगे। आप घड़ी की ओर देखो, आपकी हालत ख़राब हो जाएगी। आपको दिखाई देगा कि वो जो एक सेकंड होता है, वो भी समय ले रहा है। आप घड़ी को देखो, आप पाओगे कि एक सेकंड में भी आपने बहुत सारी कल्पनाएँ कर लीं। इतना सारा समय हो गया और आप प्रतीक्षा कर रहे हो कि ये ऐसे (घड़ी की सुई आगे बढ़ने का इशारा करते हैं) कब होगा। एक सेकंड भी इतना बड़ा अंतराल हो सकता है, भारी हो जाता है पल।

और समयातीत को सौंप दो अपने आपको, पता भी नहीं चलेगा ज़िंदगी कब बीत गई। पूरी ज़िंदगी बीत जाएगी पलक झपकते, और जीने का इससे प्यारा तरीका नहीं हो सकता। कि माया ने तो आपको काल के सुपुर्द किया था कि “अब अस्सी साल काल के गाल। जा बेटा, अस्सी साल।” जिसको आप जीवन कहते हो, वो काल है। काल ही तो कहते हैं न, जीवनकाल। इनका जीवनकाल अस्सी साल। पैदा होना माने काल का गाल। तो माया ने तो अस्सी साल दिए थे कि अस्सी साल अब तू काल के गाल में रहेगा, और आप कूद गए कालातीत में, और अस्सी साल कैसे बीत गए? पलक झपकते! एक दिन राख हो गए। इससे और क्या प्यारी ज़िंदगी होगी, कि पता भी नहीं चला मर कब गए।

संस्था में जो आते हैं, मैं कहता हूँ, बाक़ी सब तो, तुम्हारी अब यहाँ आए हो तो जो दुर्गति होनी है, सो होगी। लेकिन एक चीज़ का भरोसा दे देता हूँ, “समय कब बीत जाएगा, तुम्हें पता नहीं चलेगा।” और इससे बड़ा वरदान नहीं हो सकता। इससे बड़ा वरदान नहीं हो सकता, क्योंकि समय का अनुभव आपको अगर हो रहा है, तो इसका मतलब नरक भड़क रहा है भीतर।

कोई क्यों देखेगा घड़ी को अगर इंतज़ार न हो किसी का? कोई क्यों करेगा इंतज़ार, अगर सुनापन न रो रहा हो भीतर? बड़ी मौज आती है, लगे हैं, लगे हैं, लगे हैं। फिर ध्यान जाता है वक़्त की ओर, “अरे, आठ घंटे बीत गए, चलो अच्छा है, पता भी नहीं चला और मुसीबत टल गई।” ऐसे ही जितनी ज़िंदगी है, वो सारी टल जाए। ऐसे ही जितनी ज़िंदगी हो सारी टल जाए। ऐसे दो–चार बड़े खूबसूरत गाने भी हैं कि बस “ऐसे ही मौत आ जाए।” यही हो सकता है माया को जवाब, कि तूने तो भेजा था कलपने के लिए, पर हम इश्क़ में ही मर गए, वक़्त का पता ही नहीं लगा, पता ही नहीं लगा। तूने भेजा था कि तड़पो जाकर के जुदाई में, हम महबूब की बाँहों में ही मर गए।

इसके अलावा कोई तरीका नहीं है जीने का। नहीं तो बैठे–बैठे बस टिक–टिक–टिक–टिक सुनो। इंतज़ार, इंतज़ार, इंतज़ार, कभी इंतज़ार कि कुछ मिल जाए, कभी कुछ टल जाए। दो ही तरह के इंतज़ार होते हैं।

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, एक और प्रश्न है, नित्य–अनित्य को लेकर। पूछूँ?

आचार्य प्रशांत: ये निपट गया?

प्रश्नकर्ता: हाँ आचार्य जी।

आचार्य प्रशांत: दो प्रश्न तो होते ही नहीं हैं, पहला निपट जाए तो दूसरा बचेगा नहीं। या पहला निपटाना नहीं है, इसलिए दूसरा पूछना है। ये कोई प्रतियोगिता थोड़ी चल रही है, सवाल–फेंक प्रतियोगिता! हमें सवाल नहीं निपटाने हैं कि कोटा है कोई, हमें स्वयं को निपटाना है। सवाल माध्यम होता है स्वयं को निपटाने का, है न?

आप कहीं से भी कुआँ खोदना शुरू करो, चलो कोई बात नहीं, पर गहरे जाओ। सवाल कहीं से भी शुरू हो, उस पर प्रति–प्रश्न, प्रति–प्रश्न, प्रति–प्रश्न, उसको गहराई दीजिए। ये नहीं करिए कि थोड़ा–सा कुआँ यहाँ खोदा और फिर कूद गए, नहीं अब अगला सवाल पूछना है। अब थोड़ा–सा कुआँ यहाँ खोदा, फिर जैसे ही गहराई आने लगी, फिर वहाँ से कूद गए और कह रहे, “नहीं, अगला सवाल बताओ थोड़ा।” ये भीतरी साज़िश है ताकि किसी भी कुएँ में गहराई न आने पाए।

हाँ, बताइए।

प्रश्नकर्ता: हाँ आचार्य जी, ऐसा मतलब जीवन में भी है, किसी काम को इतनी गहराई से कभी किया ही नहीं।

आचार्य प्रशांत: वो इस लायक भी तो होना चाहिए न कि उसमें गहराई हो। उसको आप क्या गहराई दोगे जहाँ गहराई की संभावना ही नहीं है? आप काम ही यही पकड़ लोगे अगर कि चार फ़ाइलें इस टेबल से उस टेबल पर और उस टेबल से इस टेबल पर रखनी हैं, तो इसमें गहराई क्या लेकर आओगे आप? तभी तो कहा करता हूँ कि

स्वार्थ न हो और हिम्मत हो, तो जहाँ गहराई संभव ही नहीं है वहाँ से फिर आदमी हट भी पाए।

प्रेम के नाम पर या संगति के नाम पर मैं पाल लूँ बिल्ली, और मैं उससे बात करना चाहता हूँ, योगवासिष्ठ सार। कितनी गहराई आ सकती है? जहाँ संभावना ही नहीं है, वहाँ गहराई कहाँ से ले आओगे? आप बिल्ली को बोलो, चूहा, तो क्या बोलेगी? म्याऊँ; और आप बिल्ली को बोलो, “तत् त्वम् असि,” वो तो भी क्या बोलेगी? म्याऊँ। अब गहराई कहाँ से लाऊँ? कहाँ से लाऊँ? पर बिल्ली के साथ तो, “लगी तुमसे दिल की लगन, लगन लगी तुमसे।” आचार्य जी, क्या करें? तत् त्वम् असि” को भी म्याऊँ बनाओगे और क्या करोगे?

मुझे बड़ी सहानुभूति उठती है आप लोगों से। फिर मैं जाकर दो–चार संस्थाओं में जिनको मैंने बचा लिया, उनसे बोलता हूँ कि ये चलो थैंक यू बोलो, थैंक यू बोलो और सुबह शाम पाँच बार बोला करो, “ज़िंदगी बचा दी मैंने तुम्हारी।” नहीं तो यही है, बिलारी पुराण।

कहीं से आपको देख के लग रहा है कि आप कभी किसी हॉस्टल के उपद्रवी तत्व हुआ करते थे। बाल उड़ गए, उम्र मुझसे कम होगी, पर शक्ल देखिए, मोटा चश्मा लगा हुआ है। शालीनता की मूर्ति हैं आप। लग रहा है आपको कोई मारपीट भी जाए तो आप बिल्कुल अहिंसा के आग्रही बनकर ऐसे खड़े रहोगे। कहाँ लग रहा है कि आप छात्र राजनीति में सक्रिय थे कि कुछ करते थे।

और फिर आप कह रहे हैं कि “तेरी दुनिया में दिल लगता नहीं, वापस बुला ले।” ज़िंदगी को कोई यूँ ही नहीं त्याग देता। उल्टे–पुल्टे निर्णय, बिना तुक के समझौते, अज्ञान में कहीं भी झुक जाना, कुछ बेच देना, यही है। लेकिन मज़ेदार बात क्या होती है कि ज़िंदगी का अर्थ है, प्रतिपल चुनाव। नहीं, फ़र्क़ पड़ता, अतीत में आपने क्या किया, हर पल आपके सामने एक नया अवसर बनकर खड़ा होता है। अतीत को कौन बदल सकता है? कोई नहीं। पर वर्तमान देखो, खुला हुआ है, आकाश है; जो चाहिए माँगो। नहीं मिल रहा तो आसानी से तो श्रम करो।

मजबूरियों के आगे इतना मत झुक जाया करो, थोड़ी गुंडई होनी चाहिए ज़िंदगी में। एक तो वो होते हैं वो गुंडे, जो गलियों में पहले घूमते थे; आजकल ट्विटर पर घूमते हैं, दो कौड़ी के। वो एक दूसरी तरह की गुंडई चाहते हैं। कौन सी?

श्रोता: ठसक।

आचार्य प्रशांत: ठसक। वो होनी चाहिए, क्या मुँह से चू रही है लाचारगी। क्यों? हुआ जो हुआ, पीछे हुआ तो स्मृति भर है। ये भी नहीं कह सकते कि कभी हुआ था क्योंकि उपस्थित तो बस तथ्य होता है, तथ्य तो ये है (कप को हाथ में लेते हुए)। एक पल जैसे पहले जैसा था, वो अब तथ्य नहीं रहा। अब तो बस ये है, यही अवसर है, देख लो क्या करना है। अभी जो करना है, भविष्य में नहीं कि इसके साथ योजना बना रहे हो, चाहतें रख रहे हो कि भविष्य में न इसमें अंडे देंगे। ये नहीं होता है। चाय अभी है; अंडे? बोलो? “भविष्य में हैं।” हमने सुड़की की चाय, तुम करो अंडेबाज़ी और करते जाओ। मेरी सहानुभूति तुम्हारे साथ है।

क्या कर लोगे, ये इतना जो भी चाहतों का और सुरक्षा का प्रबंध करते हो, सारा इंतज़ाम करने के बाद भी क्या कर लोगे? अधिक से अधिक थोड़ा जी लोगे ज़्यादा। तुम रोते–रोते, कलपते–कलपते, ढोते–ढोते जी लेना नब्बे साल, सौ साल, हम मौज मार के निकल लेंगे; पचास–साठ में और जाते–जाते बोलेंगे, “बाय बाय तुम मरते रहो, हम चले।” तुम जीने की चाहतें और तरह–तरह के कार्यक्रम, प्रोग्राम बनाते रहना आगे के लिए। हम जी कर विदा भी हो लेंगे।

कितने गंभीर हैं, “ऐसी थोड़ी, लाइफ़ इज़ अ सीरियस अफेयर। यू आर बीइंग टू कैज़ुअल अबाउट इट। दिस इज़ नॉट द वे, यू शुड हैव सम मेनर्स।” नो। “ममा, ही हैज़ नो सीरियसनेस ऐट ऑल।” “बेटा, हमने न बड़े बचा–बचा के कदम रखे हैं ज़िंदगी में।” ए बुढ़ऊ इतना बचा के क्या मिला तुझे? थोड़ा फिसल ही लिया होता। अब मरने ही तो जा रहा है, या बचा–बचा के अमर हो लिया?

जब आप बहुत बचाने–वचाने का कार्यक्रम कर रहे हों न, तो थोड़ा ऐसे कूबड़ निकाल के और ऐसे–ऐसे (एक तरफ़ झुकते हुए) करके और खाँकते-खखारते चल लिया करिए। अपने आप को याद दिला करिए, इसी के लिए बचा रहे हो सब।

जब एक समय पर गाड़ी खूब चलाता था और खूब मेरे लिए ध्यान की विधि हो जाता था, सड़क पर मरे हुए कुत्तों को देखना। ये देखो, अभी इसके अरमान थे, ये स्वान सम्राट था, खानदान थे, और ये अभी ऐसा मरा है कि इसको खुरच–खुरच के सड़क से निकालना पड़ेगा। सारे भूत सचमुच भूतों से एक हो गए। कितना भी खुरच लो, इसका पंचतत्व ऐसा घुस गया है पंचतत्व में कि वो बाहर भी न आए। और ऐसे मिल ही जाते हैं, हर दस–बीस किलोमीटर पे एक पड़ा मिलेगा, कहीं न कहीं। ये ज़िंदगी है, तुम इसके लिए बचा रहे हो? अरे छोड़ो कि शरीर बचेगा; तुम्हारी याद भी नहीं बचेगी। कोई तुम्हें याद भी नहीं करने वाला। हर बीतते क्षण के साथ तुम्हारी याद भी धुंधली पड़ जाएगी तुम्हारे बाद। सोचा है कभी ये?

अब किस–किस को अपने पर-परदादा का नाम याद है? बताओ ज़रा। ले, अरे बाप रे बाप! एहसान फ़रामोशी, कृतघ्नता, परंपरा द्रोहीयों, धर्मद्रोहीयों, देशद्रोहीयों, तुम्हें तुम्हारे पर-परदादा का नाम नहीं पता? अच्छा, परदादा का किस–किस को पता है? ये उठा एक गर्वयुक्त हाथ। ये देखो, ये दो–चार निकले परंपरा के उत्तराधिकारी। ये हमारी औकात है। जिनको नाम पता है, उनसे पूछो, चेहरा बता दो। चेहरा वो भी न जानते हों। ये तो अभी हम थोड़ा रिलैक्स कर दिया है मामला, पर-परदादा से नीचे आ गए हैं।

“भविष्य तो थोड़ा ठीक होना चाहिए न।” किस–किस की ज़िंदगी से कोई विदा हुआ है जिसकी विदाई पर रोए थे? तो अभी भी उतना ही याद आता है जितना विदाई के चार महीने तक आता था? ये होता है। तुम भी किसी को याद न आने वाले, पागल। तुम किसके लिए इतना प्रबंध कर रहे हो? शरीर नहीं, तुम्हारी याद भी मिट जाएगी। किसी को याद भी नहीं होगा कभी इस ज़मीन पर तुम्हारे जैसा कोई था। यही है भविष्य।

पर गंभीरता, तनाव, चिंता, वो बिल्कुल सेचुरेशन पर। “देखा, लाइफ़ इज़ अ सीरियस अफेयर।” थोड़ी गुंडई दिखाइए, मतलब कुछ कांड–वांड करिए, थोड़ा मज़ा आए। क्या? मुस्कुराए कि नहीं अभी आप? सोचिए, कांड का ख़्याल ही इतना रोमांचक है, तो उसको भविष्य में क्यों रखा जाए, वर्तमान को ही कांड बनाइए। बहुत तरीके के कांडों से गुज़र के ही ज्ञान तक पहुँचा जाता है। जो आपको बातें नहीं समझ में आतीं, वो इसलिए हैं क्योंकि आपके पास कांड के नाम पर बस कर्मकांड है। तो ज़िंदगी आपको खुले कैसे? जो जितना कल्पनाओं में जिएगा न, उसको मेरी बातें उतनी ही कम समझ में आएँगी। इसीलिए मैंने देखा है कि पुलिस विभाग के लोग मेरी बातें बहुत आसानी से समझते हैं, क्योंकि सचमुच वो ज़मीन पर ज़िंदगी देख रहे हैं। उन्हें इंसान की हक़ीक़त पता है।

मैं जहाँ भी जाता हूँ, जहाँ कहीं भी पुलिस विभाग के लोग होंगे, 70–80% ऐसे होते हैं जो जानते भी हैं, मिलने भी आते हैं और बड़े प्रेम से मिलते हैं। उनको लगता ही नहीं कि मैं कोई कड़वी बात बोल रहा हूँ, क्योंकि मैं जो बोल रहा हूँ, वो हक़ीक़त है, जिसको वो देख रहे हैं दिन-रात। पर आप सब गृहस्थ हो, सम्माननीय, इज़्ज़तदार, रुई में आपने अपना घोंसला बिल्कुल बचा कर रखा है। तो ज़िंदगी की हक़ीक़तों से बिल्कुल नावाक़िफ़, कुछ पता ही नहीं। वो तो देखते हैं न, ऐसे लाश पड़ी हुई है। वो देखते हैं न कि जिनको अपना बोलते हो, वही लूट गए।

ट्रैफ़िक पुलिस से लेके एयरपोर्ट सिक्योरिटी तक अगर कोई सुरक्षाकर्मी है, चाहे वो बिल्कुल शुरुआती हो, चाहे कि ऊँचा अफ़सर हो, उनको मैंने कभी नहीं बोलते सुना कि ये आचार्य ज़्यादा तीखी, कड़वी और आहत करने वाली बातें बोलते हैं। क्योंकि है ज़िंदगी वैसी ही। मैं आपसे मौत की बात बोल रहा हूँ, आप बिल्कुल सन्नाटे में आ जाते हो “अशुभ बातें कर रहे हैं, मौत-मौत, ऐसे नहीं बोलते।” वहाँ जो फ़ौजी है, जो लाशों के बीच ही जी रहा है, उसको थोड़ी मेरी बातें कड़वी या अशुभ लगेंगी।

क्या बोलूँ, दया-सी भी आती है, इतने आप लोगों के मुलायम-मुलायम, मासूम-मासूम चेहरे हैं, लगता है मैं कहाँ आप लोगों को धकेल रहा हूँ। अब छोड़ो, रहने दो। तुमसे न हो पाएगा। ठीक है, तो अच्छा चल रहा है, बढ़िया। गुजिया बनाओ गुजिया। गुजिया बनाओ, लड्डू बाँटो, यही करो।

“आचार्य जी, आपके लिए भी बनाई है वीगन गुजिया। मैं तो लेके आई थी।” महिलाओं के वर्ग को नहीं बोल रहा हूँ, पुरुष वर्ग को ही। चवालीस किलो वज़न। क्या-क्या किया था हॉस्टल में?

प्रश्नकर्ता: किसी न किसी चीज़ में फँस ही जाता था आचार्य जी। मतलब आरोप लग जाते थे और बदनाम रहता था।

आचार्य प्रशांत: ख़ूबसूरत फंदों में फँसना सीखो फिर से, बस फंदा इस लायक होना चाहिए कि फँसा जाए। भगत सिंह ने भी फंदा ही तो चुना था, वो भी। फंदा माने बंधन, पर वैसा बंधन चुनो तो क्या बात है! फिर उसके बाद शिकायत नहीं रह जाएगी कि ज़िंदगी रूखी है, बेरौनक है, जिया नहीं जाता। ये तो बात सही है, रूखी है और बेरौनक है। ये तो सही बात है, वो आपने ख़ुद कर रखी है, कोई और थोड़ी ज़िम्मेदार है।

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, आप जैसे बोलते हैं कि जो चुनाव है, वो सही होना चाहिए। पहला चुनाव। तो जब 2019 में संस्था में आने का चुनाव किया, तो मेरा यही था कि एक चुनाव सही करना है, और वो तो सही कर लिया था। पर तब फिर रेगुलर इतने चुनाव नहीं करना चाहता, एक कर लिया, बस।

आचार्य प्रशांत: संस्था में आने से मतलब क्या है आपका? आपने जॉइन की है संस्था?

प्रश्नकर्ता: मतलब मैं था दो महीने संस्था में।

आचार्य प्रशांत: उसके बाद हमने चुनाव कर लिया।

प्रश्नकर्ता: मतलब, आचार्य जी, मेरा जो काम था, वो तो मैंने कर लिया।

आचार्य प्रशांत: तो अब देखिए न फिर, मतलब कि आपने वहाँ क्या ऐसा प्रदर्शित किया होगा कि हमें चुनाव करना पड़ा। हमें भी लोग चाहिए जिनमें ज़रा दबंगई हो, जो आत्मा का सम्मान करते हों। इसलिए उनमें आत्मसम्मान हो। ये थोड़ी कि फ़ोन किया किसी को। अभी मैं मान रहा हूँ, कि आप मान लीजिए आउटरीच विभाग में थे, आप किसी और में भी हो सकते हैं। आप किसमें थे? आईटी में थे? किसमें थे आप?

प्रश्नकर्ता: उस समय तो इनॉग्रेशन हुआ था बोधस्थल का, 2019।

आचार्य प्रशांत: निर्माण विभाग में थे आप।

प्रश्नकर्ता: तो उस समय मैं आया था, पर कोई ऐसा कार्यव्रत नहीं था वहाँ पर, स्वयंसेवी की तरह।

आचार्य प्रशांत: स्वयंसेवी भी हमें दबंग चाहिए। वो थोड़ी कि फ़ोन पर कुछ बोल रहे हैं किसी को, और शब्द हलक में ही अटक गए। श्रीकृष्ण के साथ हैं अगर, तो अर्जुन के तीर तरकश में क्यों अटके रहें, कि अटके रहेंगे? गीता है तो तीर अटकने नहीं चाहिए फिर, तीर तीव्रता से चलने चाहिए। हमें चाहिए लोग जिनके तीर ऐसे चलते हों कि छेद दें बिल्कुल।

किसी विभाग में हो, उसकी जगह लेकिन वही सामाजिक उत्पाद यहाँ भी आ जाते हैं। जब आ जाते हैं, तो फिर हमें भी चुनाव करना पड़ता है। वो समाज का तरीका है हमारे मिशन को रोकने का, कि “तुम ये काम अगर बढ़ाना चाहते हो,” समाज मुझसे कहता है, “तो तुम्हें लोगों की ज़रूरत तो पड़ेगी ही न। तो लोग माँगने तो हमारे ही पास आओगे।” मैं खड़ा हूँ, सामने समाज खड़ा है। समाज कहता है, “तुम्हें भी तो लोग चाहिए। तुम लोगों को माँगने के लिए हमारे पास ही आओगे न। तो हम तुमको याद तो देंगे नहीं, या देंगे तो कैसे देंगे?” ऐसे ही बस कि…।

देखो भाई, एक ऐंठ होनी चाहिए उसके बिना, वरना बस याद करते रह जाओगे कि हॉस्टल में बड़ा रोमांच था और जवानी में बड़े जलवे थे। जवानी कोई पच्चीस साल भर की बात नहीं होती है, जवानी ज़िंदगी भर रहनी चाहिए। और रोमांच मृत्यु के पल तक रहना चाहिए, मृत्यु भी रोमांचक होनी चाहिए। लेकिन उसकी जगह हमारे चेहरे हो जाते हैं बिल्कुल मुर्दा। क्यों? सेफ़्टी, सिक्योरिटी, स्टेबिलिटी, सेटलमेंट। मैं उसमें कुछ नहीं कर सकता फिर। मैं क्या करूँ?

खोपड़े में ये बिल्कुल घुसेड़ दी गई है ये बात, क्या? सेफ़्टी, सिक्योरिटी, स्टेबिलिटी, सेटलमेंट। अब मौत बार-बार याद दिलाती है कि सेटलमेंट एक ही जगह होना है। कहाँ? मिट्टी में, चिता पर, वही है सेटलमेंट। मिट्टी ही सेटलमेंट है आख़िरी, और वो अरबों वर्षों का सेटलमेंट है। ये जो तुम घोंसला बनाकर कहते हो “नाउ आई ऐम सेटल्ड।” ये है पच्चीस वर्ष का। पर मान के नहीं दे रहे, इसी को मान रहे हो सेटलमेंट। कलपे जा रहे हो इसी के लिए, ईएमआई भर-भर के हालत ख़राब कर ली है। “नो, बट आई ऐम अ रिस्पॉन्सिबल फ़ादर।” नो, यू आर नॉट।

अच्छा, दिल से बोलना, इस माहौल में न कही जा रही होती ये बात और मेरे चेहरे से, मेरे नाम के साथ न कही जा रही होती ये बात, कहीं और सुन लेते किसी के मुँह से ये बात, तो यही बोलते न, “इम्प्रैक्टिकल है ये बात।” यही बोलते न? बस यही जवाब है। कौन-कौन बोलता, “इम्प्रैक्टिकल है ये बात?” शर्माओ नहीं, मुझसे क्या शर्माना? सबके एग्ज़ाम रिज़ल्ट्स मेरे ही पास हैं, मुझसे क्या छुपा रहे हो? (लगभग सारे श्रोता हाथ उठाते हैं)।

इम्प्रैक्टिकल हूँ न मैं? देखो अपने भीतर कैसा द्वैत बैठा रखा है, डाइकोटॉमी। मैं इम्प्रैक्टिकल हूँ तो यहाँ आए किस लिए हो? वही 364 पाँव एक तरफ़, एक पाँव यहाँ पर। मुझे ही तुम्हें मानना है कि मैं बातें जो हैं, वो अवास्तविक करता हूँ, अव्यावहारिक करता हूँ, तो यहाँ बैठकर के क्या पाओगे? मैं अगर अवास्तविक हूँ तो इस कुर्सी पर कौन, प्रेत बैठा है कोई? मैं तो अपनी ज़िंदगी से ही बोल रहा हूँ। और अगर बोल रहा हूँ, तो इसका मतलब ऐसी ज़िंदगी जी जा सकती है। और अगर ऐसी ज़िंदगी व्यर्थ होती, तो तुम मुझे सुन नहीं रहे होते। माने, जैसी ज़िंदगी जो मैं बोल रहा हूँ, वो सिर्फ़ जीने लायक नहीं है, वो ऐसी होती है कि उसको जियो और सबको सुनाओ, और आप सुनने आते हो उस ज़िंदगी को।

अब एक काम करो, आप आकर इस कुर्सी पर बैठ जाओ और अपनी ज़िंदगी सुनाओ, और देखते हैं कितने लोग सुनेंगे। पर हठ आपका यही है कि आपकी ज़िंदगी सही है, मैं इम्प्रैक्टिकल हूँ। ये कैसी बिखरी-बिखरी बातें हैं आपकी। हठ यही है न, “मैं इम्प्रैक्टिकल हूँ।” मैं इम्प्रैक्टिकल हूँ तो आप प्रैक्टिकल हो। तो आओ यहाँ बैठ के और अपनी ज़िंदगी सुनाओ, और देखते हैं कि कितने लोगों में रोमांच भर जाता है और प्रेरित हो जाते हैं और कहते हैं, “यही है!”

अगर मेरी बात सुनने लायक है, तो फिर ये ज़िंदगी भी जीने लायक है, क्योंकि ज़िंदगी से ही ये बात आ रही है। काहे के लिए भीतर से बेईमानी करते हो कि इनकी बात तो सुन लेंगे पर इनकी ज़िंदगी गड़बड़ है। मेरी ज़िंदगी गड़बड़ होती तो मेरी ज़िंदगी इतनों को ज़िंदगी कैसे दे रही होती?

असलियत बताता हूँ। आप ही लोग, अब इस जगह पर न जाने कितनी बार, अब तो शायद पच्चीस बार हो चुके होंगे हमारे सत्र, और ज़्यादा पचास बार हो चुके होंगे, नहीं जानते कितने। आए होंगे, बैठे होंगे, उसमें से बहुत ऐसे हैं जो अब गीता सत्रों में हैं भी नहीं। कई बार होता है मैं बाहर होता हूँ, कहीं पर कैफ़े में बैठा हूँ या कहीं स्टेशन पर हूँ या बाज़ार, एयरपोर्ट कहीं भी हूँ। कोई दिख जाएगा, देखा-देखा सा लग रहा है। वो एकदम मुँह चुरा के, छुपा के भागेगा इधर-उधर। ये है।

और वैसे मुझे भले न स्पष्ट होता कि इसको कहाँ देखा है, पर जहाँ किसी को मैं मुँह छुपा के भागते देखता हूँ, बिल्कुल पता चल जाता है, गीता प्रतिभागी है। ये मेरा एलुमनस है। और आप ही होओगे जो एक दिन मुझसे नज़रें चुरा-चुरा के इधर-उधर भाग रहे होंगे। और जो जितना क़रीब आता है उसको उतनी ज़्यादा ज़रूरत पड़ती है नज़रें छुपाने की जब वो भाग जाता है। नज़र झुकी हुई, चेहरा छुपा हुआ।

अभी तो ये इस माहौल का असर है कि आप बिल्कुल एकदम अच्छे बच्चे बनकर यहाँ बातें-वाते सुन रहे हो। अभी तो जैसे ही अपने इलाक़े में जाओगे, फिर देखिएगा आपके रंग! तड़का लगेगा, छौंक और बहार, और क्या-क्या नहीं होगा। “हाँ बेटा, अभी आपके लिए कार्टून शो लगा दें, फिर मम्मी जी आ रही हैं, मम्मी जी की तैयारी करनी है, उनको डांडिया बजाना है।” है कि नहीं है?

एक-आधा-दो साहस दिखाते हैं। वो फिर आके, “आज फिर से मेरे घरवालों ने सबने मिलकर के मेरे सामने आचार्य जी को गालियाँ दीं।” भाई, अट्ठाईस साल का जवान लड़का है, और ये अपनी आज ये बेबसी बता रहा है कि “आज मेरे बाप ने, माँ ने, भाई ने, भाभी ने, कुत्ते ने, बिल्ली ने, सबने मिलकर आज फिर से...। मैं बेबस हूँ, मैं कुछ कर नहीं पाया।” तू बेबस नहीं, तू बेईमान है।

कई तो बस यहाँ प्रायश्चित्त करने आते हैं, “हाँ आचार्य जी, हमारी खाल खींच लो ताकि हमारे पाप धुल जाएँ, ताकि फिर हम वापस जाकर अपने जैसे हो जाएँ।” अभी मैं ऐसे चुप बैठा हूँ न, तो ऐसे-ऐसे बैठे होते हैं न, कि “कैप्टिव्स वेटिंग फ़ॉर एक्ज़ीक्यूशन, कैप्टिव्स वेटिंग फ़ॉर मशीन-गन फ़ायर। ऐसा होता है न, दस–बारह ऐसे हाथ बाँध के बैठा दिया कि गोली मारी जाएगी। तो वो चुपचाप बैठे कहते, “हाँ, मारो गोली मारो, मार ही दो हमें, मार ही दो।” माने मरने को भी तैयार हो, बदलने को नहीं तैयार हो।

चलो, कोई बात नहीं, मैं और कोई सेवा नहीं कर सकता। मैंने पूरा उड़ेल दिया अपने आप को। मैं क्या करूँ, मैं उसके आगे? चमत्कार-वमत्कार तो है नहीं मेरे पास। चलिए, उठते-उठते चमत्कारों के बारे में भी आपको बताता हूँ, आप कैसे लोग हो!

तो मेरे पास चमत्कार नहीं है। मैंने बोला, “चमत्कार भाई, यहाँ पर चमत्कार की उम्मीद मत करना।” चमत्कार कैसा है? और मैंने बोला कि मैं एनलाइटेंड नहीं हूँ। मैंने बोला क्या है? मैंने बोला, “एनलाइटनमेंट जैसा कुछ होता ही नहीं है। होता ही नहीं है।” पर हमारी कम्युनिटी ने उसका मतलब ये किया है कि आचार्य जी एनलाइटेंड नहीं हैं, बाक़ी सब हैं।

अगर मैंने कहा एनलाइटनमेंट जैसा कुछ होता ही नहीं है, तो इसका मतलब मैं साफ़ कह रहा हूँ कि जिन्होंने भी अपने मुँह से घोषित किया कि वो एनलाइटेंड हैं, वो पाखंडी हैं। पर ये मानने की तुम्हारी हिम्मत ही नहीं है। ये घोषित करने का दम ही नहीं है। तो इतने चतुर हो कि आकर कहते हो, “देखो, आचार्य जी को मत बोलना कि महान हैं, आचार्य जी बिल्कुल आम आदमी हैं, हमारी-तुम्हारी तरह। उन्होंने अपने मुँह से बोला है।” आचार्य जी ने तो अपने मुँह से बोल दिया, “आम आदमी हैं।” पर तुम्हारे देखे, तुम्हारे बाक़ी सब, ये जो महापुरुष घूम रहे हैं, बाबे, ये अभी भी महान हैं।

कितना आंतरिक पाखंड पालोगे? क्योंकि अगर तुम मेरा सिद्धांत मान रहे हो, जो मैंने बताया कि एनलाइटनमेंट कुछ नहीं है तो फिर जितने घोषित किए बैठे हैं कि हैं, वो सब क्या निकले? वो मक्कार हैं, वो चोर हैं, झूठे हैं। पर ये कह पाने की हिम्मत नहीं है, क्योंकि जिनके सामने कहना है उनसे तुम्हारे स्वार्थ जुड़े हैं। हिम्मत ही नहीं है बोल दो। और जिनके सामने कहना है वो घर में ही कई बार बहुमत में होते हैं, तो हिम्मत ही नहीं है कि बोल दो। हाँ, इतना बोलने में एकदम आगे-आगे आ जाते हैं, “आचार्य जी की तारीफ़ मत कर देना, आचार्य जी को बुरा लगता है। आचार्य जी बिल्कुल आम आदमी हैं, घटिया हमारी तरह ही बिल्कुल।” आचार्य जी ने कहा है कि “आई ऐम यू, एंड यू कुड बी मी।” इसका मतलब वो भी घटिया हैं, मेरी तरह।

इतना कहने में कम्युनिटी आगे-आगे हुई, हर जगह जाकर कह रहे हैं कि अगर मैं कीटाणु हूँ तो आचार्य जी ने कहा, “तुम और मैं एक हैं।” इससे ये हुआ कि आचार्य जी भी कीटाणु हैं। वाह रे! वो देखो, रोमांच आया कि नहीं? ज्ञानवान तो काम आना नहीं है, मौज कर ले जाओ, यही बहुत है। मौज करी कि नहीं अभी आधे घंटे में? बस ठीक है। ज्ञान का छोड़ो, मैं कब की उम्मीद छोड़ आया कि उससे कुछ होगा। मज़े करा दूँ आप लोगों के इतना ही बहुत। अब जाइए, चाय-वाय पीजिए थोड़ा, बढ़िया मौसम अच्छा हो रहा है, कोई दिक़्क़त की बात नहीं, मज़े करिए। चलिए, फिर आते हैं फिर एक और अब स्टैंड-अप शुरू होगा।

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
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