जलवायु आपदा और मध्यवर्ग का भ्रम

Acharya Prashant

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जलवायु आपदा और मध्यवर्ग का भ्रम
जलवायु संकट केवल किसानों, मज़दूरों या गरीबों की समस्या नहीं है; इसका प्रभाव समाज के हर वर्ग पर पड़ने वाला है। बढ़ती गर्मी, आर्द्रता, बाढ़, सूखा, प्रदूषण, खाद्य संकट, स्वास्थ्य समस्याएँ और सामाजिक अस्थिरता धीरे-धीरे जीवन के हर पहलू को प्रभावित करेंगी। तकनीकी सुविधाएँ और निजी आराम स्थायी सुरक्षा नहीं दे सकते। यह संकट भविष्य का नहीं, वर्तमान का है, और इससे बचाव के लिए सामूहिक जागरूकता व गंभीर कार्रवाई आवश्यक है। यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।

प्रश्नकर्ता: नमस्ते, आचार्य जी। मेरा नाम सिद्धार्थ है। मैं क्लाइमेट चेंज और सस्टेनेबिलिटी स्पेस में एक टेक कंपनी में कार्यरत हूँ। मेरे जो इंटरेक्शंस होते हैं, उन चुनिंदा लोगों को छोड़ दीजिए जो इस स्पेस में हैं। जो अर्बन मिडिल क्लास लोग हैं, उनसे बात करके उनका जो परसेप्शन पता चलता है, कि वो आज भी ये सोचते हैं कि क्लाइमेट चेंज एक दूर का इश्यू है। मेबी किसानों का, गाँव का, या दूरदराज़ की जगहों का इश्यू है। उनकी लाइफ़ में जो कन्वीनियंसेस उन्हें मिली हुई हैं, जैसे पानी की समस्या नहीं है, एसी में बैठे हैं, सुबह घर से ऑफिस जा रहे हैं तो कैब में, कन्वीनियंसेस जुड़े हुए हैं। तो क्लाइमेट चेंज छूता हुआ भी उन्हें अछूताकुछ हद तक कर देता है। मतलब, इम्पैक्ट फ़ील नहीं होता है।

तो सर, मेरा सवाल ये है कि *क्लाइमेट चेंज** है, फिर भी कन्वीनियंसेस के कारण कुछ नहीं हो रहा है। तो ऐसा क्या होगा, जब उनकी लाइफ़ में ऐक्चुअल इम्पैक्ट दिखेगा उनको और वे हिट होंगे? क्योंकि अभी तो, सर, ऐसा नहीं हो रहा है, अर्बन मिडिल क्लास हम एक गुमराह सिचुएशन में ही चल रहे हैं, सर।

आचार्य प्रशांत: नहीं, ऐसा नहीं है कि आप अर्बन हैं या लोअर क्लास नहीं हैं, आप मिडिल क्लास हैं तो इसलिए आप बच जाएँगे। ऐसा बिल्कुल भी नहीं होने वाला। और सवाल का आधार सही है, जब क्लाइमेट क्राइसिस की बात होती है तो उसमें जो ज़्यादा उल्लेख आता है वो आता है किसानों का, वो आता है मज़दूरों का, विशेषकर जो लैंडलेस लेबरर्स होते हैं, उनकी बात आती है। उसमें बात आती है जो बाहर आउटडोर वर्कर्स होते हैं, उनकी बात आ जाती है। या वो लोग जो होमलेस होते हैं, ठीक है? उनको माइग्रेशन करना पड़ेगा, इसकी बात आ जाती है।

तो ये बिल्कुल हो सकता है कि जो लोग थोड़े प्रिविलेज्ड हैं, जिनको ज़िंदगी में जैसा आपने कहा, कन्वीनियंसेस मिली हुई हैं, उनको ये लगे कि हाँ, क्लाइमेट चेंज होता तो है, इट इज़ रियल, बट इट वोंट इम्पैक्ट मी दैट मच। द क्राइसिस इज़ फ़ॉर समबडी एल्स। क्राइसिस है, मेरे लिए नहीं। किसके लिए? ग़रीब, मज़दूर, किसान के लिए, ठेलेवाले के लिए, रिक्शेवाले के लिए; मेरे लिए नहीं। ऐसा कुछ भी नहीं है, ऐसा कुछ नहीं है। क्राइसिस सबके लिए है, जो अर्बन ड्वेलर है, जो शहरी बाशिंदा है, उस पर भी ज़बरदस्त चोट पड़ रही है और आगे और ज़ोर की पड़ने वाली है।

आप क्लाइमेट चेंज की बात इसलिए कर रहे हो क्योंकि अभी मई महीने का अंत चल रहा है और गर्मी बहुत है। और आप यहाँ पर हो, दिल्ली में एनसीआर में; गर्मी लग रही है। तो आजकल चारों तरफ़ क्लाइमेट क्लाइमेट की बात हो रही है। लेकिन क्लाइमेट की सबसे बड़ी जो आपको मार पड़नी है, वो मई में नहीं पड़नी है; वो पड़नी है जून-जुलाई में। जो हीट वेव्स होती हैं, जो हीट स्ट्रोक्स होते हैं, वो बाहरी तापमान मात्र पर उतना निर्भर नहीं करते हैं। वो निर्भर करते हैं तापमान पर और ह्यूमिडिटी पर। तो अभी हालत और ख़राब होगी और ये जो प्रिविलेज्ड मिडिल क्लास, अपर मिडिल क्लास है, इनके लिए भी ख़राब होगी।

ये कब तक अपने-अपने प्राइवेट केबिन्स में बैठे रहेंगे? ये कब तक आर्टिफ़िशियल क्लाइमेट को खरीद पाएँगे? ये सोचते हैं कि हम प्राइवेटली अपने लिए क्लाइमेट खरीद सकते हैं न? मेरे कमरे में तो 23° है न? तो बाहर क्लाइमेट कुछ भी होगा, मेरा तो क्लाइमेट है जो मैंने खरीद रखा है। ये तुम कब तक कर लोगे? ये बहुत लंबे समय तक नहीं कर सकते, कमरे से बाहर तो निकलना पड़ेगा न।

आपको पता है, एक टेम्परेचर ऐसा होता है जिसके बाद अगर आप पेड़ की छाँव में भी बैठे हो और आपको दुनिया भर का भी पानी उपलब्ध है तो भी आप मर जाओगे। हम कितने टेम्परेचर की बात कर रहे हैं? आप पेड़ की छाँव में भी बैठे हो और पानी भी आपको मिला हुआ है और आप स्वस्थ हो, आप एक हेल्दी यंग इंडिविजुअल हो, आप तब भी मर जाओगे। आप बच ही नहीं सकते, क्योंकि आपका शरीर डिज़ाइन्ड ही नहीं है उतना टेम्परेचर झेलने के लिए।

मैं जो आपको तापमान बताऊँगा, आप उससे चौंकोगे। कितना है वो तापमान? सिर्फ़ 35 डिग्री। पर हम बात कर रहे हैं वेट बल्ब टेम्परेचर की, वेट बल्ब टेम्परेचर जो होता है न, वो वास्तविक एक्सपीरियंस्ड हीट वेव और हीट स्ट्रोक का इंडिकेटर होता है। बाहर 45° हो, पर ह्यूमिडिटी 10-15% ही हो, आप बच जाओगे। क्यों? क्योंकि पसीना बहेगा, पसीना बहेगा। बाहर हवा में उतनी नमी नहीं है न, ह्यूमिडिटी कम है तो पसीना निकलेगा और जब बाहर हवा में ह्यूमिडिटी कम है, तो पसीना फिर भाप भी बन जाएगा, इवैपोरेट हो जाएगा, इवैपोरेशन से कूलिंग हो जाएगी, आप बच जाओगे।

लेकिन अगर तापमान सिर्फ़ 38 डिग्री हो और 38 डिग्री तो बहुत कॉमन है, 38 डिग्री से कहीं ज़्यादा तो आज भी था, और ह्यूमिडिटी 50% पार कर गई हो, तो आपका बचना मुश्किल हो जाएगा। क्योंकि इवैपोरेशन नहीं होगा, इवैपोरेशन नहीं होगा, कूलिंग नहीं होगी और आपके सिस्टम के पास कोई तरीका ही नहीं है ख़ुद को ठंडा रख पाने का। जो ह्यूमन बॉडी है ये अपने आप को सिर्फ़ और सिर्फ़ स्वेटिंग से ठंडा रख सकती है। और जो हमारा मेटाबॉलिज़्म होता है वो लगातार हीट जनरेट करता है। आप एक ऐसी मशीन हो, जो इनएफ़िशिएंट है। तो आप जब खाना खाते हो न, उसका मेटाबॉलिज़्म होता है, तो वो जो मेटाबॉलिज़्म है वो एक्ज़ोथर्मल है। तो वो सिर्फ़ एनर्जी नहीं जनरेट कर रहा, जिससे फिर आप काम करते हो; उससे हीट भी जनरेट हो रही है, हीट, लगातार। और हमारे पास कोई तरीका नहीं है उस हीट को डिसिपेट करने का, एक ही तरीका है। क्या? स्वेटिंग।

वेट बल्ब टेम्परेचर कहता है कि थर्मामीटर है, उसमें ऐसे कपड़ा बाँध दो गीला, और हवा चलती रहे, ताकि पानी का वो जो कपड़ा है उसके गीले पानी का इवैपोरेशन होता रहे। फिर देखते हैं कि वो टेम्परेचर कितना दिखाता है थर्मामीटर। उसे वेट बल्ब टेम्परेचर कहते हैं। वो 35 डिग्री हो गया, तो इंसान बच नहीं सकता, भले ही फिर उसको तुम पीने के लिए खूब सारा पानी दे रखा है, भले ही वो पहलवान है, भले ही वो छाँव में बैठा हुआ है, वो तब भी नहीं बच सकता। वो मरेगा ही मरेगा।

और अब ये आधी ख़बर थी पूरी ख़बर सुनिए, दिल्ली में 32-33 डिग्री पहले भी हो चुका है। 32-33 डिग्री हो चुका है। इंसान को पता भी नहीं लगेगा कि हुआ क्या, मेरे साथ हुआ क्या, अचानक चलते-चलते बस गिर जाएगा। और जब मैं इंसान की बात कर रहा हूँ, तो उसमें अर्बन प्रिविलेज्ड मिडिल क्लास भी आती है। या वो इंसान नहीं है कुछ और हैं? वो भी आते हैं। घर से क्या बाहर निकलोगे नहीं? कितना एसी चला लोगे? और सारे एसी जब एक साथ को खींच रहे होंगे ग्रिड को, तो ग्रिड कब तक चल जाएगी? ग्रिड तो गिरेगी, जब ग्रिड गिरेगी तब तो बाहर निकलोगे, तब बच लोगे क्या? तब बच लोगे?

हमारे सामने जो आमतौर पर टेम्परेचर आता है न, वो होता है ड्राई बल्ब टेम्परेचर। और वो बहुत काम का नहीं होता, उसमें बस आपको ये बता दिया जाता है कि, साहब, आज 45 डिग्री था। उससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता। उससे ज़्यादा महत्त्वपूर्ण, सिग्निफ़िकेंट होता है वह, जिसमें लिखा रहता है, “फ़ील्स लाइक”। पढ़ा होगा आपने कहीं पर, “फ़ील्स लाइक”। वो “फ़ील्स लाइक” बेहतर है, उसमें ये भी शामिल होता है कि हवा कितनी चल रही है, थोड़ा उसमें ह्यूमिडिटी को भी ले लेते हैं, कई चीज़ें उसमें। वो “फ़ील्स लाइक”, ड्राई बल्ब से बेहतर होता है। लेकिन जो सबसे ज़बरदस्त पॉइंटर है, द मोस्ट सिग्निफ़िकेंट ऑफ ऑल, वो “फ़ील्स लाइक” भी नहीं है, वो है वेट बल्ब टेम्परेचर।

लेकिन आमतौर पर मीडिया वग़ैरह में वेट बल्ब टेम्परेचर की बात करी नहीं जाती है। जबकि वेट बल्ब टेम्परेचर तय करेगा कि हम जिएँगे कि मरेंगे, वही बताता है।

हमारे दो-तीन ऑर्गन्स हैं, जो टेम्परेचर को लेकर सुपर सेंसिटिव होते हैं और उनका ऑलमोस्ट सडन शटडाउन होता है टेम्परेचर राइज़ होने पर। जिनमें सबसे प्राइमरी है ब्रेन, क्योंकि वहाँ पर सबसे डेलिकेट वेसल्स होती हैं, वहाँ टेम्परेचर राइज़ बर्दाश्त ही नहीं होती। आपका हाथ गर्म हो जाए, आपका पाँव गर्म हो जाए, आपका चल जाएगा। बाक़ी हिस्सों में कुछ गरमा-गरमी हो जाए वो भी चल जाएगा। ये गर्म हो गया तो सडन शटडाउन होता है सिस्टम का, आप चलते-चलते ऐसे गिर जाओगे। ये क्या मिडिल क्लास के साथ नहीं होना है क्या?

मैं ह्यूमिडिटी की बात क्यों कर रहा हूँ? मैं ड्राई बल्ब की बात क्यों नहीं कर रहा? मैं वेट बल्ब की बात क्यों कर रहा हूँ? क्योंकि क्लाइमेट चेंज का मतलब होता है एटमॉस्फियर में एनर्जी का इन्क्रीज़ होना। और वो जब एनर्जी इन्क्रीज़ होगी, तो उसके साथ प्रेसिपिटेशन का पैटर्न ज़बरदस्त रूप से बदलता है। ये जो आप आए दिन शहरों में पढ़ते रहते हो, बाढ़ आ गई, ज़्यादा बारिश हो रही है, वो और क्या है? वो जो एक्सेस हीट है एटमॉस्फियर में, वही एक्सेस प्रेसिपिटेशन कर रही है।

बंबई में क्या पहले इतनी फ्लडिंग होती थी? नहीं होती थी। वहाँ का जो पूरा ड्रेनेज सिस्टम है, वो बनाया गया है कि अधिकतम घंटे में 25 मि.मी. बारिश हो जाए, तो चलेगा। वहाँ पर अब बारिश हो रही है 100 मि.मी., 150 मि.मी.। तो ड्रेनेज सिस्टम कैसे हैंडल कर लेगा? और दिल्ली का उतना भी नहीं बनाया गया, दिल्ली का 1976 का एक प्लान है उसके हिसाब से बनाया गया था। वो है कि पूरे दिन में अगर 75 या 100 मि.मी. बारिश हो जाए तो दिल्ली का ड्रेनेज सिस्टम संभाल लेगा। बारिश हो रही है उससे दूने भी ज़्यादा।

क्लाइमेट चेंज सिर्फ़ टेम्परेचर नहीं बढ़ाता वो बारिश भी बढ़ाता है और वो बारिश का अभाव भी बढ़ाता है। जब होती है बारिश तो ज़बरदस्त होती है, वो ऐसे नहीं जैसे कि बस फुहार है। ऐसा होता है जैसे कि एक पानी की दीवार खड़ी हो गई है ज़मीन और आसमान के बीच में, ऐसे होती है बारिश। और जब वैसे बारिश होती है, तो वेट बल्ब टेम्परेचर ऐसे भागता है आसमान की ओर। और जब वैसे बारिश होती है, तो पानी भरता है, जलभराव होता है, और फिर उससे डेंगू, चिकनगुनिया, ये सब खड़े होते हैं।

मिडिल क्लास को डेंगू नहीं होता क्या? वैसे उसको डेंगी बोलते हैं, वो ज़्यादा एक्यूरेट है। या मिडिल क्लास को नहीं काटते वो? कुछ आ रही है बात समझ में? और जलभराव का ज़्यादा बड़ा मंजर हमें मेट्रोज़ में ही देखने को मिलता है। गाँव वग़ैरह में ड्रेनेज उतनी बड़ी समस्या नहीं होती, जितनी बड़ी, उदाहरण के लिए, मुंबई या बेंगलुरु में होती है।

आपको मालूम है, मुंबई में ये शुरू हो चुका है कि प्रॉपर्टी प्राइसेज़ अब इस बात से तय हो रहे हैं कि वो जगह अबव फ्लड लाइन है या बिलो फ्लड लाइन। तो जब विज्ञापित किया जाता है किसी जगह को, तो साथ में ये भी लिख देते हैं धीरे से कि “अबव फ्लड लाइन”। उससे उसके रेट बढ़ जाते हैं कि यहाँ पर पानी नहीं भरेगा। ये अब तय है कि फ्लड तो आनी ही आनी है फिर से, अब मानसून में। तो जो बिलो फ्लड लाइन वाले हैं उनको; और ख़ासकर अगर आपका ग्राउंड फ्लोर पर अपार्टमेंट वग़ैरह तो उसकी क़ीमतें एकदम गिर गई हैं, कोई नहीं खरीदेगा क्योंकि सबको पता है कि इसमें हर साल पानी घुसेगा।

अब ये जो अपार्टमेंट हैं, ये लैंडलेस लेबरर्स खरीदते हैं क्या? मिडिल क्लास के हैं? पूछ रहा हूँ। तो मिडिल क्लास को क्यों लग रहा है कि उन पर फ़र्क़ नहीं पड़ना है? क्यों लग रहा है?

एक्यूआई का और क्लाइमेट चेंज का बहुत सीधा रिश्ता है, ये दो अलग-अलग समस्याएँ नहीं होती हैं। जब आप एक्यूआई की बात करते हो, वो भी एक तरह का पॉल्यूशन है। वहाँ डस्ट होती है। और जब आप क्लाइमेट चेंज की बात करते हो, वो भी एक तरह का पॉल्यूशन है, वहाँ कार्बन डाइऑक्साइड होती है। और ये दोनों तरह के एटमॉस्फेरिक पॉल्यूशन अंतरसंबंधित हैं, इंटररिलेटेड हैं।

नवंबर के मध्य के बाद के दिनों में ये हर साल निश्चित हो जाना है कि स्कूल बंद होंगे ही होंगे, एजुकेशन डिसरप्ट होगी ही होगी, क्योंकि एक्यूआई 500 पार करेगा। करेगा ही करेगा। मिडिल क्लास के बच्चे स्कूल नहीं जाते क्या? या मिडिल क्लास को लग रहा है कि क्लाइमेट क्राइसिस बस ग़रीबों के लिए है? मिडिल क्लास टहलने नहीं जाती नीचे? तुम कैसे टहलने जाओगे? अच्छा चलो, गिनना शुरू करते हैं। कब टहलोगे? अक्टूबर, नवंबर, दिसंबर, जनवरी, फ़रवरी, हवा में ज़हर है, एक्यूआई इतना बुरा है तुम टहल नहीं सकते। तुम टहलने जाओगे, खौ खौ खाँसोगे, लगेगा गले में मेटल घुसा हुआ है। कितनों को एहसास होता है, जैसे गले में मैटेलिक-सा स्वाद आ रहा हो? कितनों को होता है? ऐसा लगेगा, गले में मेटल घुसा है। कर लो इवनिंग वॉक, मॉर्निंग वॉक, कैसे कर लोगे? ठीक है?

अप्रैल आते ही इतना गर्म हो गया कि अब आप वॉक नहीं कर सकते। और जुलाई आते ही पानी इतना भर गया कि अब आप वॉक नहीं कर सकते। तो बताओ, वॉक करोगे कब? वॉक कब करोगे? या मिडिल क्लास एसी चला के भीतर ट्रेडमिल पर वॉक करेगी? हम किस मुगालते में हैं? एसी के लिए पावर प्लांट भी अपने ही लगाओगे, अपने घर में? या गैस के चूल्हे से एसी चलाओगे? वो भी नहीं होगा। ईरान वहाँ बैठा हुआ है, वो कह रहा है “गैस भी नहीं जलने दूँगा, तुम रखे रहो अपने अरमान।”

क्राइम ज़बरदस्त तरीके से। देखो, एक बात बताओ। जो रह रहा है, वो टीन की छत के नीचे। ठीक है? जिसका एक्सपीरियंस्ड टेम्परेचर 58 डिग्री हो रहा है, वो विक्षिप्त नहीं हो जाएगा? फिर वो कुछ भी नहीं करेगा क्या? आप इसमें एक ज़बरदस्त सोशल टर्बुलेंस नहीं देख पा रहे हो क्या? पूछ रहा हूँ। आपकी कॉलोनी, आपकी सोसाइटी के बाहर कोई गार्ड खड़ा होता है, वहाँ कोई माली काम करता है। आप बुलाते हो किसी को घर में हाउसहेल्प की तरह, मेड की तरह, करते हो ये सब। और वो जहाँ रह रहे हैं, वहाँ पर दिन में पंद्रह घंटे बिजली की कटौती हो रही है। और टीन की छत है, भीतर ग्रीनहाउस इफ़ेक्ट हो रहा है और वो उबल रहे हैं।

आपको दिखाई नहीं दे रहा कि क्राइम कितना बढ़ेगा? आपको दिखाई नहीं दे रहा है कि वो ज़िंदा रहने के लिए अब कुछ भी करेगा? और आप उसे अब कितना दोष दे सकते हो? कितना दोष दोगे? बोलो न। तापमान इतना बढ़ रहा है कि जान बचाने के लिए हमारे महानगरों में कीड़े-मकोड़े घरों के अंदर भाग रहे हैं, क्योंकि घरों के अंदर एसी है। साँप घरों के अंदर भाग रहे हैं क्योंकि घरों के अंदर ठंडक है। बात समझ रहे हो न?

जब आप ये दो कैटेगरीज़ खड़ी कर दोगे, हैव्स और हैव नॉट्स की, एक है जो रिलेटिवली कूल है और दूसरा है जो बाहर उबल रहा है, उसकी खाल में फफोले उठ रहे हैं, तो क्या क्राइम नहीं बढ़ेगा? माली कब आ के काम करे? बताओ। माली को तो दिन में काम करना होता है, दिन में कर नहीं सकता। उसकी आजीविका का क्या होगा? कंस्ट्रक्शन वर्कर्स कब काम करेंगे? बताओ। उनकी आजीविका का क्या होगा? और यहाँ हम ग़रीबों की बात नहीं कर रहे, अब ग़रीबों के साथ तुम ये सब कुछ करोगे तो उसका असर फिर अमीरों पर भी पड़ेगा। जब तुम ग़रीबों के साथ ये होने दोगे तो वो अमीरों को छोड़ने नहीं वाले, क्योंकि दिख तो उनको भी रहा है कि उनका ये हाल कराया किसने है।

अभी पिछले साल ही हुआ था, यहाँ जब ग्रेटर नोएडा के आसपास के ही गाँव थे, वहाँ पर लगातार पावर कट, पावर कट, पावर कट। तो उनके मन में कहीं से ये बात आ गई होगी कि अमीर लोग जो इतना एसी चलाते हैं इसी के कारण गर्मी बढ़ी हुई है। और इन्हीं एसी के कारण ग़रीबों को फिर बिजली नहीं मिलती है। और एसी पीछे से गर्मी फेंकता है। तो उसकी वजह से भी एक ये मान्यता बनती है कि ये एसी जो पीछे से गर्मी फेंक रहा है, इसी ने क्लाइमेट चेंज करा है। ये मान्यता सच नहीं है, पर हाँ एसी भी जो गर्मी फेंकता है उससे अर्बन हीट स्पॉट्स तो ज़रूर क्रिएट होते हैं। वो बात ठीक है।

तो मालूम है, पिछले साल क्या हुआ था? बड़ी-बड़ी गाड़ियाँ वहाँ हाईवेज़ पर और एक्सप्रेसवे पर रोक करके ग्रामीणों ने उनकी ठुकाई करी थी अच्छे से, अपना गुस्सा निकाला था, गाड़ियाँ तोड़ी थीं। और जितनी बड़ी गाड़ी, उसको और ज़्यादा रोका और ज़्यादा तोड़ा। भीतर भाव क्या था? कि यही गाड़ी है, जिसमें वो अमीर बैठा हुआ है, जो सारी बिजली ख़ुद खा जाता है। और यही वो गाड़ी है, जितनी बड़ी गाड़ी होती है उसका एसी भी उतना बड़ा होता है। यही वो गाड़ी है, जो जब चलती है, तो इतनी गर्मी फेंकती है कि बगल में अगर एक बाइक वाला खड़ा हो जाए ट्रैफ़िक सिग्नल पर, तो बाइक वाले को गर्मी महसूस होती है। तो उन्होंने रोक-रोक कर गाड़ियाँ फोड़नी शुरू कर दीं।

आपको इसमें दिखाई नहीं दे रहा है कि कितना डिसऑर्डर और कैओस फैलने वाला है सोशल लेवल पर भी? और इस डिसऑर्डर से मिडिल क्लास बच लेगी क्या? न जाने कितने और पहलू हो सकते हैं। आपके पूरे दिन की कोई हरकत ऐसी नहीं है, जो क्लाइमेट क्राइसिस से अछूती रह जानी है। लेकिन हम दिवास्वप्न में जी रहे हैं, हमने अपने आपको बता रखा है कि ये तो किसी और की समस्या है, साहब, मेरी थोड़ी है।

भारत में आप जो क्वालिटी ऑफ लाइफ़ एंजॉय करते हो, उसका एक बड़ा कारण यही है कि यहाँ पर लेबर चीप है। ठीक है न? जो लोग बाहर चले जाते हैं, विदेशों में, वे विदेशों में बहुत चीज़ें हैं जिनके लुत्फ़ लेते हैं, लेकिन एक चीज़ को मिस करते हैं। क्या? कहते हैं काम करने वाले लोग नहीं मिलते। भारत में बहुत चीज़ें हैं जो मिडिल क्लास को बिल्कुल दबाकर रखती हैं, परेशान करती हैं, ऑप्रेस करती हैं। पर एक चीज़ है, जिससे मिडिल क्लास बहुत खुश रहती है, डोमेस्टिक लेबर मिल जाता है आसानी से। धोबी, माली, नाई, बाई, और मिल जाते हैं, वो सस्ते मिल जाते हैं। जब उन पर असर पड़ेगा तो आप पर असर नहीं पड़ेगा क्या? पूछ रहा हूँ।

क्या हालत हो जाती है जब वो काम वाली दीदी चार दिन नहीं आती है काम पर? क्या हालत हो जाती है? कैसे आएँगी काम पर? कब आएँगी? जॉगिंग वग़ैरह कितने लोगों को पसंद है? कर लो जॉगिंग। वेट बल्ब साथ ले चलना जॉगिंग में। कहाँ करोगे जॉगिंग? आउटडोर स्पोर्ट्स कितनों को पसंद हैं? कैसे खेलोगे टेनिस? कभी गर्मी बहुत ज़्यादा है और कभी बारिश हो गई, दोनों ही हालत में तुम्हारा कोर्ट तो ख़राब हो गया। किनके बच्चे जाते हैं कुछ भी सीखने के लिए, बैडमिंटन, टेनिस या कुछ भी? कब भेजोगे? कब भेजोगे?

मेरे ही कोच यूँ कहते हैं कि अब सुबह 5:30 का बैच लगाने की नौबत आ रही है, इतनी गर्मी रहती है। बच्चे बिल्कुल ऐसे, 6:30–7:00 बजते ही, बच्चे ऐसे होने शुरू हो जाते हैं। क्योंकि एक तो एटमॉस्फेरिक हीट, दूसरे दौड़-भाग कर रहे हो आप कोर्ट पर जो कुछ भी खेल रहे हो उसमें। और कितना ऊपर ले जाओगे? सनराइज़ भी और जल्दी कर दोगे क्या?

मिडिल क्लास सोच रही है, “ये तो कुछ नहीं, मेरे पास एसी है। मेरा कुछ नहीं हो सकता, मेरे पास तो एसी है।” ज़रूर। एसी की सर्विसिंग कौन करेगा? चला लो एसी। आप और विचार करेंगे, आपको ख़ुद ही और उदाहरण मिल जाएँगे भाई, मैं इसमें क्या ऐसा बता रहा हूँ? एजुकेशन प्रभावित होने जा रही है। ऑफिस कम्यूट प्रभावित होने जा रहा है। कैसे चले जाओगे ऑफिस? पानी तो भरा हुआ है। कितने लोग हैं, जो बरसातों में घंटों-घंटों जलभराव की जगहों पर फँसे रहे हैं? मैं भी फँसा रहा हूँ। अब क्या कर लोगे आप? आप बिज़नेस ओनर हो सकते हो या आप एम्प्लॉयी हो सकते हो। आप क्या जवाब दोगे किसी को? कुछ नहीं। आपको तो कुछ नहीं करना, एक फ़ोटो खींच के भेज देनी है, कोई आपको दोष भी नहीं दे सकता।

कितने लोगों को बड़ा अच्छा लगता है, जल्दी से स्विगी से, ब्लिंकिट से चीज़ें मँगा लेना? वो कैसे ले आएगा? वो कैसे ले आएगा? और कुछ हमारे दिल हैं कि नहीं हैं? अगर हमें दिखाई दे कि जो लेकर के आया है वो यहाँ से यहाँ तक पसीने से तर-बतर है। और इतना पसीना, इतना पसीना कि उसकी जो काली टी-शर्ट है, उस पर नमक झलकने लगा है, इतना पसीना। और आपको दिख रहा है कि अभी-अभी 11 ही बजा हैं, और 11:00 बजने में ही वो सुबह से 25 डिलीवरीज़ कर चुका है। और अभी पीक टेम्परेचर आना बाक़ी है। और आप उसे पूछोगे, तो वो कहेगा, “अभी मेरे दिन में 40 डिलीवरीज़ और होनी हैं।”

मैं अभी तीन-चार दिन पहले बाइक पर जा रहा था टेनिस खेलने। तो जो मेरा टेनिस वियर है वो मैंने बोधस्थल में ही पहन लिया, आमतौर पर वहाँ कोर्ट पर जाकर उधर चेंज करता हूँ। मैंने कहा, पहले ही पहन लेता हूँ। उसके बाद बाइक पर बैठा, तो टाँगें खुली हुई हैं। और रात में बज रहे हैं 8:00–8:30, टाँगें खुली हुई हैं। 8:00–8:30 बजे भी बाइक चलाते हुए ऐसा लग रहा था, टाँगें जल रही हैं।

और ये सिर्फ़ आहट है, खेल अभी आगे और होना है। और सौ साल आगे नहीं होना है। अगले साल और होना है, उसके अगले साल और होना है, उसके अगले साल और होना है।

इस साल के भी खेल की अभी बस शुरुआत हुई है। अभी थोड़ी ह्यूमिडिटी बढ़ने दीजिए, फिर देखिएगा। वेट बल्ब याद रखिएगा। कुछ पता नहीं चलेगा, ये हो क्या रहा है। लोग जाएँगे, बारातों में नाच रहे होंगे, अचानक नाच-नाचते बस ऐसे गिर जाएँगे। कुछ मायनों में हीट स्ट्रोक, कार्डियक अरेस्ट से भी ज़्यादा फ़ेटल होता है। और पैसे का अंतर हो सकता है अमीर और ग़रीब में, शरीर का अंतर नहीं होता। प्रकृति ने फिज़ियोलॉजी दोनों को एक-सी दी है। जो चीज़ ग़रीब को मारेगी, वो अमीर को भी मारेगी।

अभी मैं जानवरों की तो बात कर ही नहीं रहा। अभी मैं वन्य प्रजातियों की, पेड़-पौधों की, नदियों की, पहाड़ों की तो बात कर ही नहीं रहा। मैं पिघलते हुए ग्लेशियर्स की, समुद्रों की, मछलियों की तो बात कर ही नहीं रहा। मैं इस पर तो अभी जा ही नहीं रहा कि ये सब जब हो रहा होगा, तब ये सब होने के बावजूद हम CO₂ कंसंट्रेशन और बढ़ा ही रहे होंगे, कम नहीं कर रहे होंगे। ये सब बातें तो अभी मैं कर ही नहीं रहा। ये बातें अभी कर ही नहीं रहा हूँ कि कैसे मानवता ख़ुद को ही धोखा दे रही है और राष्ट्र एक-दूसरे को धोखा देने की प्रतिस्पर्धा लगा रहे हैं।

सबके अपने-अपने नेशनल टारगेट्स हैं, पेरिस संधि के अंतर्गत, कि तुम्हें इतना कम करना है, तुम्हें इतना कम करना है। कोई कम नहीं कर रहा, और सब एक-दूसरे से कहते हैं, “पहले तुम कम करो न, तब हम करेंगे।” कम करना है तो छोड़ दो, कार्बन एमिशन साल-दर-साल और बढ़ रहे हैं। अभी मैं अमीरों की तो बात कर ही नहीं रहा, जो अपना साल भर का एमिशन कोटा कोई हफ़्ते में, कोई 10 दिन में, कोई 20 दिन में पूरा कर देता है। जितना उनको अनुमत था, जितना उनको अलाउड था कि 365 दिन में एमिशन करो, वो 10 दिन में करके बैठ जाते हैं। और बाक़ी 355 दिन वो एक्सेस एमिशन करते हैं। अभी उनकी तो हम कोई बात कर ही नहीं रहे, वो सब अलग एक कहानी है।

और फ्लडिंग से ये मत समझ लीजिएगा कि कुछ अच्छा होगा। चलो, बरखा बहार आई, पानी ही पानी तो भर जाएगा। द सडन फ्लडिंग विल बी इनवैरिएबली फ़ॉलोड बाय सडन ड्राउट्स, बारिश पड़ेगी, फिर भयानक सूखा पड़ेगा। और ये बात सिर्फ़ उस जल की नहीं है जो हमें वर्षा से मिलता है, ये बात उस जल की भी है जो हमें नदियों से मिलता है। ग्लेशियर पिघलेंगे, तो पहले तो कुछ साल तक नदियों में पानी बढ़ेगा और बाढ़ आएगी। और उसके बाद कुछ नहीं, वो नदी ही शेष नहीं रह जाएगी।

एक बार आपसे कहा था मैंने कि जिन नदियों से हमें प्यार है और जिनको हम पवित्र मानते हैं, जाकर के उनसे मिल लो, जुड़ लो, स्नान कर लो, तस्वीरें ले लो, वीडियो बना लो। अपने ही जीवनकाल में कहीं ऐसा न हो कि हम उन्हें विलुप्त होता देखें और हम कहें कि यहाँ पर कभी मेरी प्यारी नदी बहा करती थी। अब यहाँ पर कुछ भी नहीं है, खाली जगह है, लोग उस पर चल-फिर रहे हैं। और ऐसा बहुत नदियों के साथ हो चुका है, और हर बीतते साल कुछ छोटी नदियाँ हमेशा के लिए मिटती जा रही हैं।

जो लोग पहाड़ों से परिचित हैं, आते हैं, जाते हैं, उन्होंने ऐसी नदियाँ देखी भी होंगी। वो कहेंगे कि, “अरे, चार साल पहले यहाँ तो नदी थी। वो कहाँ गई?” अब वहाँ पर जाकर के बोलेरो की पार्किंग हो रही है, और उस पर राफ्ट लदे हुए हैं। “यहाँ तो नदी होती थी। नदी कहाँ गई?” नदी नहीं है अब, अब नहीं है नदी। आप इस बात पर रिलाई कर रहे हो कि आप प्राइवेट क्लाइमेट के कंज़्यूमर बनोगे, यही है न उम्मीद? यही है न? बाहर जो हो रहा हो, रहा होगा। मैं तो अपने लिए प्राइवेट क्लाइमेट कंट्रोल केबिन खरीद लूँगी। नॉट फ़ॉर लॉन्ग, मैम। नॉट फ़ॉर लॉन्ग। नो।

बारिश और गर्मी, इनका सीधा संबंध उस चीज़ से होता है जिससे मिडिल क्लास का भी शरीर बनता है। क्या? अन्न। और मिडिल क्लास बहुत बड़ी रेंज होती है, बहुत बड़ी रेंज होती है मिडिल क्लास। मिडिल क्लास में वो भी आते हैं कि जिनका, अगर आपने फूड बजट बिगाड़ दिया तो उनको न्यूट्रिशनल डेफ़िशिएंसी शुरू हो जानी है। मिडिल क्लास माने वही नहीं होते सब कि जिनके पास; महीने में आपके पास अगर 5 लाख भी आ रहा है, तो भी टेक्निकली आप मिडिल क्लास ही हो। मेरे ख़याल से मिडिल क्लास की परिभाषा तो ये भी है, महीने में अगर आप 10–15 लाख, 20 लाख भी कमा रहे हो तो भी आप शायद टेक्निकली मिडिल क्लास हो। जो भी उसकी डेफ़िनिशन है, देखनी पड़ेगी एक बार। पर अगर आप 30–35 हज़ार महीने का कमा रहे हो, तो भी आप मिडिल क्लास ही हो। भारत में, मेरे ख़याल से, लोअर मिडिल क्लास महीने के शायद 15,000–20,000 तक जाती है। उसके नीचे फिर लोअर इनकम शुरू होता है।

कहने का आशय ये है कि मिडिल क्लास में वो लोग भी आते हैं कि जिनको खाने के लाले पड़ जाएँगे, अगर फूड प्राइसेज़ एक सीमा से आगे बढ़ गए। वो भी मिडिल क्लास में ही आते हैं। ऐसा नहीं कि फिर वो भूखे मरेंगे, खाएँगे, पर सब ऑप्टिमली खाएँगे? नहीं। कुछ ऐसा खाएँगे, जिससे उनकी न्यूट्रिशनल नीड्स पूरी नहीं होंगी। इंसान आसानी से मरता नहीं है, कुछ भी खा के ज़िंदा रह लेता है। भारत में बड़े-बड़े दुर्भिक्ष पड़े। बंगाल वाला याद कर लो, बिहार वाला याद कर लो। तो ऐसा थोड़ी है कि सब मर ही गए थे। पर कैसे हो जाते हैं? फिर वो ऐसे हो जाते हैं कि एक पीढ़ी के अंदर जो एवरेज हाइट है, वो कुछ इंच कम हो जाती है, एक पीढ़ी के अंदर। इतना मैल-न्यूट्रिशन होता है।

अच्छा, आप में से कितने लोगों के साथ ऐसा हुआ है या अपने आसपास होता देखा है, कि जब किसी फूड आइटम के दाम बढ़े हैं, तो किचन से वो फूड आइटम फिर हटा दिया गया है? कितने लोगों ने ऐसा किया है या देखा है? ये आगे और ज़्यादा फ़्रीक्वेंसी से होने वाला है। फ़्रीक्वेंसी भी, इंटेंसिटी भी। पहले अगर ऐसा सिर्फ़, मान लीजिए, प्याज़ के साथ आपने होता देखा है, या मटर के साथ होता देखा है, तो हो सकता है कि आगे आप ऐसा कहीं गेहूँ के साथ भी होता देखें। उगना तो उसे ज़मीन पर ही है न? या ज़मीन को भी एसी दे दोगे? कहोगे, “ज़मीन, तुझे भी गर्मी न लगे। चल, तुझे भी एसी दे देते हैं।” ज़मीन तो एक्सपोज़्ड है न। ज़मीन कैसे बेमौसम की बारिश सह लेगी, जलभराव सह लेगी, ग़लत टेम्परेचर पैटर्न बर्दाश्त कर लेगी, और फिर वही अन्न उगा देगी? उगेगा ही नहीं उस पर।

ये हमारी, आपकी, सबकी समस्या है। कोई ग़लतफ़हमी न रहे कि हम बच जाएँगे। सिर्फ़ बेचारे रिक्शे वाले और ठेले वाले ही मारे जाएँगे। नहीं, नहीं, नहीं। हाँ, उन पर असर ज़्यादा पड़ेगा और पहले पड़ेगा, ये बात ठीक है। पर बचोगे तो आप भी नहीं। ये जो आग लगेगी, ये जब फैलेगी, तो हर घर को चपेट में लेगी। लगेगी नहीं, भविष्य की बात नहीं है लग चुकी है, फैल रही है, हर साल और ज़्यादा बढ़ रही है।

इससे संबंधित कोई बात करिए। ये मुद्दा बहुत ज़रूरी है।

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, नमस्ते। आचार्य जी, जैसे आप क्लाइमेट चेंज की बातें हम करते हैं पड़ोस में, तो वहाँ पर अब ये बातें होने लगी हैं कि अब तो पहाड़ों में मकान लेना ज़्यादा अच्छा रहेगा। बना लोगे, तो आगे चलकर जितनी भी गर्मियाँ होंगी, उसके लिए अच्छा रहेगा। और दूसरा ये है कि, जैसे ये तक भी बताते हैं कि वहाँ पर ऐसे कुछ 10–12 लाख नाली का हिसाब होता है, आज लेना काफ़ी अच्छा रहेगा। ये सब सलाहें, मतलब, आने लगी हैं।

आचार्य प्रशांत: मैं कई तलों पर इसका जवाब दे सकता हूँ। पर पहली बात तो ये है कि हम नादान हैं, नासमझ हैं। भोले हैं इतने कि भोंदू हैं, कि क्या हैं? हम कितने हैं और पहाड़ों पर ज़मीन कितनी है? और जो ये बातें बोल रहे हैं, वो कहाँ के धन्ना सेठ हैं? जब पहाड़ों पर ज़मीन की इतनी माँग बढ़ेगी, तो जो पहाड़ पर भी ज़मीन का मालिक बैठा है वो तुम्हें उसी दाम पर दे देगा? उसी रेट पर दे देगा, जो आप रेट बता रहे हो? वो ज़मीन भी अमीरों के ही हत्थे लगनी है। आप बस जाकर के इधर-उधर घूमते रह जाना कि, “मैं पहाड़ पर ज़मीन लेने आया हूँ।”

पहाड़ पर इतनी रेजिडेंशियल ज़मीन है नहीं, पहाड़ इतने ज़्यादा हॉस्पिटेबल हैं नहीं। और नियम-क़ानून भी पहाड़ों पर रेजिडेंशियल प्रोजेक्ट्स को एक सीमा से ज़्यादा अनुमति देते नहीं, पर ये मिडिल क्लास के मुंगेरीलाल के हसीन सपने, “जब दिल्ली में गर्मी बहुत बढ़ जाएगी, तो हम पहाड़ों पर मकान खरीदेंगे।” तुम्हें दिल्ली में जितने में मिलता है, उससे चार गुना क़ीमत पर मिलेगा पहाड़ पर मकान, क्योंकि प्राइस बढ़ेगा ही भाई। सप्लाई एकदम लिमिटेड है, ज्योग्राफिकली लिमिटेड है, बाय टेरेन लिमिटेड है। आप लैंड मैन्युफैक्चर नहीं कर सकते। सप्लाई लिमिटेड है और डिमांड करने वाले इतने करोड़ों लोग खड़े हैं। तो तुम्हें दामों का क्या लग रहा है? क्या होने वाला है? पर मिडिल क्लास “दिल को बहलाने को, ग़ालिब, ख़याल अच्छा है। अरे, कोई बात नहीं। खूब पॉल्यूशन कर लो। कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। जब यहाँ टेम्परेचर बढ़ेगा, तो हम नेचुरल एसी में चले जाएँगे।”

खरीदना तो छोड़ दो। होटल भी ठीक से अफ़ोर्ड कर पा रहे हो? पूछ रहा हूँ। और जो होटल मिडिल क्लास वहाँ अफ़ोर्ड कर पा रही है, वहाँ पर नौटंकियाँ, बदतमीज़ियाँ, गुंडागर्दी, मारपीट, यही तो हो गया हमारे हिल स्टेशंस का हाल न। क्योंकि सबको वहीं जाना है गर्मी से बिल्कुल परेशान होकर। इधर गर्मी बढ़ती है, सब भागते हैं अपना। “बैठो, बैठो। स्विफ्ट निकालो अपनी, वैगनार निकालो, क्रेटा निकालो। भागो। हम जा रहे हैं नेचुरल एसी में।” और वहाँ पर उस शहर में घुसने के लिए पहले दो घंटे का जाम है। उसके बाद एकदम कोई बहुत साधारण-सा, बल्कि सड़ा-सा होटल होगा। वो भी अब कहेगा, “हाँ भाई, ₹12,000।”

एक कमरे का भाड़ा देने में हालत ख़राब हो जा रही है और सपने हैं मकान खरीदने के! कुछ सप्लाई, डिमांड, प्राइसिंग को, इकोनॉमिक्स को समझते भी हो, क्या सपने ले रहे हो? छूने को नहीं पाओगे पहाड़ों को। क्योंकि वो प्राइम प्रॉपर्टीज़ होंगी। वो प्राइम एसेट्स होंगे, जिन पर प्राइम लोगों का क़ब्ज़ा होगा। जो भी जगह ऐसी होगी, जो ठंडी होगी, सुंदर होगी, वहाँ मिडिल क्लास को कौन घुसने देगा भाई? आपको कौन घुसने देगा? क्यों घुसने देगा? आपके पास क्या है? या ऐसे ही बस मुँह उठाकर पहुँचोगे और कहोगे, “अब हम भी आ गए हैं यहाँ पर।” हाँ भाई, कालीन बिछाओ ग्लेशियर पर। क्या बोल रहे हो!

गंगा किनारे, आप ऋषिकेश से आगे चलिए। गंगा किनारे पहले साधारण कैंप लगते थे जहाँ आम आदमी भी जा सकता था। पहले लगते थे वहाँ बिल्कुल साधारण कैंप, वहाँ पर, हमने अपने आज से दस पंद्रह साल पुराने बहुत सारे कैंप वहीं, शिविर वहीं पर लगाए थे, और उनमें बड़ा बढ़िया रहता था। वो साधारण कैंप होते थे, टेम्परेरी स्ट्रक्चर्स। वो तंबू है, उसको गाड़ा, आप वहीं पर हो और फिर वहाँ से वो हट जाता था। वहीं अपना बैठो, खाओ, पियो।

एनजीटी ने वो सब बंद करा दिया, और अच्छा किया कि बंद करा दिया। क्योंकि लोग वहाँ आते थे, गंदगी करते थे, बोतलें फोड़ते थे और बहुत तरह का प्रदूषण, आवाज़ें भी करते थे, धुआँ भी छोड़ते थे। तो इसका क्या मतलब है? कि वो जो सुंदर, रमणीक जगह है गंगा तट, उसकी एक्सेस सबको बंद हो गई? नहीं, सबको नहीं बंद हुई। अब वहाँ बड़े-बड़े होटल हैं, वहाँ ताज है, और बहुत बड़े-बड़े होटल हैं। जाइए आप वहाँ पर, एक रात का पचास हज़ार रुपया, एक लाख रुपया दीजिए। कैंपों में आप एक रात का पाँच सौ देते थे, आम आदमी जा सकता था। आम आदमी अभी भी सोच रहा है कि उसे गंगा तट सुलभ हो जाएगा, उपलब्ध हो जाएगा। सॉरी, सर। नो एक्सेस। नहीं मिलेगा आपको। उनको मिलेगा, जो एक रात का एक लाख रुपया दे सकते हैं, आप नहीं दे सकते।

“हम जाएँगे अब, जब यहाँ गर्मी बढ़ेगी। ओ, कोई न, वो तो फरीदाबाद का टू बीएचके छोड़ के सीधे पहाड़ पर दो बीघा ज़मीन लेंगे।” वाह बेटा, वाह! वाह! “और वहाँ प्राइवेट एक्सेस रोड बनवाएँगे।” उसमें सिर्फ़ हमारी आई10 खड़ी होगी।” वाह बेटा, वाह!

ये एक तल था जिसमें मैं इकोनॉमिक कंस्ट्रेंट की बात कर रहा था। अब दूसरी बात आती है कि अगर किसी तरह ऐसा हो भी सकता हो, हो भी जाए, तो वो बात पहाड़ों के लिए कितनी बुरी होगी। क्योंकि डिमांड के प्रेशर के चलते अगर फॉरेस्ट लैंड को या एग्रीकल्चरल लैंड को रेजिडेंशियल लैंड में पहाड़ों की सरकारों ने कन्वर्ट कर दिया, तो इसमें पहाड़ों का कितना बड़ा नाश है। आप समझ रहे हो? आप समझ रहे हो, कि जंगल काटे जा रहे हैं कि अब यहाँ पर बन रही हैं सोसाइटीज़। और जब सोसाइटीज़ बनेंगी, तो एक्सेस रोड भी बनेंगी और बड़ी-बड़ी बसें भी चलेंगी, फिर वहाँ शॉपिंग कॉम्प्लेक्सेस भी बनेंगे, फिर वहाँ रेलवे भी पहुँचेगी। फिर आसपास कई छोटे-मोटे हवाई अड्डे भी बनाए जाएँगे। सारी दुर्दशा।

अगर ऐसा हो भी सकता है कि पहाड़ों पर और ज़मीन निकल आए लोगों के बसने के लिए, तो ऐसा होना नहीं चाहिए। पहली बात तो हो नहीं सकता, टेरेन अलाउ नहीं करेगी। और हो सकता हो, तो होना नहीं चाहिए। पहाड़ों में कुछ हिस्सों में ऐसा हुआ भी है, जहाँ हुआ है वहाँ की दुर्दशा आप जानते हैं।

आप में से कितने लोगों ने बीस तीस साल पहले का शिमला देखा है, या बीस तीस साल पहले के नैनीताल, मसूरी देखे हैं? आप समझ रहे होंगे मैं क्या बोलना चाह रहा हूँ। पहाड़ इकोलॉजिकली बहुत सेंसिटिव होते हैं, मैदान तो फिर भी पॉपुलेशन प्रेशर बर्दाश्त कर लेते हैं, पहाड़ पॉपुलेशन प्रेशर बिल्कुल नहीं झेल सकते। ख़ासकर जो हमारी हिमालयन रेंजेस हैं, ये दुनिया के अभी सबसे नवजात पहाड़ हैं। आपको लगता है, “अरे, बूढ़ा हिमालय!” वो बूढ़ा हिमालय नहीं है, वो शिशु हिमालय है। उन्हें हम बोलते भी हैं, यंग फोल्ड माउंटेन्स। उनका नाम है। क्योंकि वो अभी-अभी बन रहे हैं, वो अभी बनते ही जा रहे हैं। हिमालय पर्वत इतने नए हैं कि वो अभी भी हर साल एकाध-दो इंच और बढ़ जाते हैं।

वो पता है न, हिमालय कैसे बने हैं? वो एक तरह की क्रीज़ है। जैसे ऐसे आए ये, तो यहाँ पर उठ जाएगा न ये, ऐसे बने हैं वो। एक तरफ़ ये जो एशियन मास ? था, वो था। और दूसरी तरफ़? ये बहता हुआ आया अफ्रीका से टूटकर, और आकर टकराया है जहाँ तिब्बत है वहाँ पर। तो उसके टकराने से ये ऐसे ये दो टकराए हैं, तो ऐसे…

ये बहुत अभी फ़्रैजाइल है, इन पर आप पॉपुलेशन प्रेशर दोगे, लैंडस्लाइड्स, ये-वो, दुनिया भर की दुर्दशा होगी। तो ये सपना सपना ही रहे तो अच्छा है। साकार नहीं होना चाहिए कि “हम अब जाएँगे और पहाड़ों को बर्बाद करेंगे, हम मिडिल क्लास हैं।”

अभी उस दिन तो देहरादून में जब हमारा खुला मंच था, तो मैं कह रहा था कि उल्टा है, लगाओ भारी टैक्स, घुसने ही मत दो पहाड़ों पर। तुमने जो दुर्दशा करी है मैदानों की, तुम मैदानों पर ही रहो और झेलो अपनी दुर्दशा को। अब आकर पहाड़ों को भी क्यों ख़राब कर रहे हो?

प्रश्नकर्ता: सर, ये आपने बोला कि बाहर को जानना वो फिर भी हो जाता है। लेकिन बाहर को जानना भी नहीं होता, अगर आपने ख़ुद को नहीं जाना। और अभी जो बात हो रही है, वो भोग वाली बात ही हो रही है कि पहाड़ पर जाकर भोग ही करना है हमें। और उसमें हम पहाड़ को भी नहीं जानते। और पहाड़ में जो जीवन है, वो इतना आसान नहीं है जो गंगा के मैदान में है। और दूसरा जो फ़्रैजिलिटी वाली आपने बात करी, गंगा के मैदान बहुत स्टेबल हैं, पहाड़ बहुत फ़्रैजाइल हैं। आप सुंदरबन चले जाएँ, आप कच्छ चले जाएँ, वो बहुत फ़्रैजाइल एरिया है, क्योंकि वो बहुत कॉम्प्लेक्स चीज़ों से बने हुए हैं।

इसमें एक चीज़ जो मुझे याद आ रही थी, वो ये भी था कि जो फूड की क्वांटिटी है, वो तो आपने बोली, लेकिन उसकी जो न्यूट्रिशनल वैल्यू है, टेम्परेचर के साथ में उसका भी बहुत बड़ा कनेक्शन है।

आचार्य प्रशांत: बल्कि वो और वाइडर मुद्दा बन जाएगा, क्योंकि फूड का जो न्यूट्रिशनल कॉन्स्टिट्यूशन है, वो वास्तव में हर लिविंग ऑर्गेनिज़्म के कॉन्स्टिट्यूशन से रिलेटेड है।

देखिए, हम सब एक ख़ास इकोसिस्टम की पैदाइश होते हैं। पृथ्वी जितनी बड़ी है, उतनी बड़ी न होती, तो इंसान जितना लंबा है उतना लंबा न होता। ठीक है? पृथ्वी पर जितना तापमान है उतना न होता, तो हमारी खाल जितनी मोटी है उतनी न होती। हम जैसे दिखते हैं उसका सीधा संबंध पृथ्वी की स्थितियों से है। बात समझ रहे हैं? ज्योग्राफिकल एंड एटमॉस्फेरिक। उसी ने इवोल्यूशन को ड्राइव करा है। तो इतना ही नहीं है कि सब्ज़ियों का, फलों का, पेड़-पौधों का कॉन्स्टिट्यूशन ही बदल जाएगा, जब एटमॉस्फेरिक कंडीशन्स बदलेंगी। मेरा वाक्य पूरा करिए। इंसान भी बदल जाएगा। जैसे आलू बदल जाता है न अगर गर्मी ज़्यादा हो, वैसे ही आदमी भी बदल जाएगा अगर गर्मी ज़्यादा हो।

अरे, एक होता है देसी चना, एक होता है काबुली चना। ये दोनों अलग-अलग क्यों होते हैं? एक होता है इंडियन एलीफ़ेंट, एक होता है अफ्रीकन एलीफ़ेंट। ये दोनों अलग-अलग क्यों? बहुत कारण हैं, पर उन सारे कारणों को जो एक नाम दिया जा सकता है, वो क्या है? जिस जगह पर इनका इवोल्यूशन हुआ, वो जगह अलग-अलग थी, जगह अलग-अलग थी। इसीलिए वही सब्ज़ी या वही फल भारत में भी उत्तर में मिलता है, तो एक तरह का होता है। दक्षिण में मिलता है, एक तरह का होता है। और पहाड़ों पर मिलता है, तो तीसरे तरह का हो सकता है। केला देखा है दक्षिण में कैसा होता है, और उत्तर में कैसा होता है? क्या वजह है? केला ही तो है। क्या हो गया? कुछ नहीं है, तापमान बदल गया, हवाएँ बदल गईं, मौसम बदल गया, बारिश बदल गई। तो वो जो जीव है, उस जीव की पूरी हस्ती ही बदल गई।

न्यूट्रिशनल वैल्यू तो गोभी की, आलू की, पालक की, मेथी की, ये तो बदलेगी ही बदलेगी। मुझे ये बताओ, इंसान का क्या-क्या बदलेगा। इंसान का भी सब बदल जाना है, हॉर्मोनल सीक्रेशन्स बदल जाएँगे। आपको नहीं पता चलेगा कि आपका ब्रेन दूसरी तरीके से क्यों काम करने लग गया। ये मूड ऐसे से ऐसे क्यों होने लग गया है? इंसान बदल जाएगा। जितनी भी साइक्लिकल एक्टिविटीज़ होती हैं बॉडी के अंदर, पीरियडिक, वो सब बदल जाएँगी। क्योंकि वो सब एक ख़ास एटमॉस्फेरिक इनपुट का नतीजा थीं। एंड टू टॉप दैट, आप जो खा रहे हो वो भी बदल रहा है। आप जो गेहूँ खा रहे हो, दिखने में गेहूँ जैसा है। पर वो चीज़ अब कुछ दूसरी हो चुकी है, क्योंकि वो जिस मिट्टी से आ रहा था वो मिट्टी बदल गई है। जब एटमॉस्फियर बदलेगा, टेम्परेचर बदलेगा, तो उसके भीतर जो माइक्रोऑर्गेनिज़्म्स हैं, उनका भी बैलेंस बदल जाएगा।

कुछ ऐसे होंगे, जो ज़्यादा हीट को और ज़्यादा ह्यूमिडिटी को बेहतर अडैप्ट करेंगे, तो उनका प्रोपोर्शन बढ़ जाएगा। कुछ ऐसे होंगे, जो ज़्यादा हीट वग़ैरह को अडैप्ट नहीं कर पाएँगे, तो उनका प्रोपोर्शन कम हो जाएगा। तो मानें मिट्टी ही बदल गई। मिट्टी माने बस मिनरल्स ही नहीं होता, मिट्टी माने वो सब बैक्टीरिया वग़ैरह भी होता है एल्गी, फंगस, जो वहाँ हैं, और वो क्रॉप्स के लिए ज़रूरी होते हैं। पानी भर दोगे, उनमें से कई हैं जो ख़त्म हो जाएँगे। एकदम ड्राई कर दोगे, उनमें से कई जो ख़त्म हो जाएँगे। यहाँ तक कि अगर हवाएँ भी ऑन एन एवरेज जिस गति से चलती रही हैं, अगर वो एवरेज ज़्यादा बदल जाएगा तो जो सुपरफ़िशियल लाइफ़ है, वो बदल जाएगी। जब वो सब बदल जाएगा तो हमारे पास ये जो चावल आता है, जो गेहूँ आता है, ये क्या वैसे ही रहेगा? और मिडिल क्लास कुछ और खाती है क्या?

आप सोचोगे कि अपने बच्चे के लिए आज मैंने इडली बनाई है चावल की। वो पता नहीं आपने उसको क्या खिला दिया, क्योंकि वो चावल, चावल है ही नहीं जो चावल होता है, तो दिखेगा वैसे ही। बस महँगा होगा ख़ूब, और महँगा हो गया होगा, पर वो चावल चावल नहीं है। और इसमें ऐसा नहीं कि किसी ने धाँधली करी है। यही (जलवायु) बदल गया।

प्रश्नकर्ता: और ये ऑलरेडी हो चुका है। ये 40% जो है, न्यूट्रिशन डाउन जा चुका है मेजर क्रॉप्स में। और ह्यूमन बॉडी में भी 50% से ज़्यादा जो है हमारे सेल बैक्टीरियल हैं। बैक्टीरिया हैं हम लोग, तो वो चेंज होगा तो एब्ज़ॉर्प्टिव कैपेसिटी, वो सब भी चेंज होगा।

आचार्य प्रशांत: हाँ, बिल्कुल। जो आँत के भीतर सब बैठे हुए हैं छोटे-छोटे जंतु, वो भी एक पर्टिकुलर ऑक्सीजन कंसंट्रेशन माँगते हैं। कार्बन डाइऑक्साइड होगी कि नहीं होगी, मामला एरोबिक होगा, एनऐरोबिक होगा, ये सब भी होता है। आपका जो टेम्परेचर है, अगर वो एवरेज से ज़्यादा डेविएट करने लगेगा तो आपकी ऊपर से नीचे तक पूरी व्यवस्था बदल जाएगी। आप इंसान दूसरे हो जाओगे। एक तरह से, आप प्रजाति दूसरी हो जाओगे। क्योंकि जिसको हम होमो सेपियंस बोलते हैं, वो एक कॉलोनी होती है, जिसके भीतर, जैसा आपने कहा, हज़ारों तरीके के दूसरे जीव बैठे हुए हैं, वो सब मिल-जुलकर, क्यूमुलेटिवली कहलाते हैं ह्यूमन बीइंग।

आप सोचते हो, ह्यूमन बीइंग माने बस यह (शरीर की ओर इंगित करते हुए)? नहीं, इसके साथ में हज़ार और स्पीशीज़ हैं, जो यहाँ भीतर बैठी हुई हैं। तो उन सबको जब जोड़ते हो, तो जो निकलकर आता है उसको कहते हैं ह्यूमन बीइंग। अब आप दिखने में ऐसे ही रह गए पर भीतर का जो मामला था वो बदल गया। तो क्या आप सेम स्पीशीज़ कहलाओगे? स्पीशीज़ ही बदल जानी है, आप कुछ और हो जाओगे। पर मिडिल क्लास को लगता है, “नहीं, ये सब तो ग़रीब मज़दूरों के साथ होगा, हमारे साथ थोड़ी होगा।” ऐसा? हाँ

कहीं तो मैंने पढ़ा था, वेरिफ़ाई कर लीजिएगा नहीं तो मिसइन्फ़ॉर्मेशन हो जाएगा। फ़र्टिलिटी रेट्स बहुत तेज़ी से ड्रॉप या तो हो रहे हैं, या होने वाले हैं। पुरुषों में स्पर्म काउंट बहुत तेज़ी से गिर रहा है, महिलाओं में मेन्स्ट्रुअल इर्रेग्युलैरिटीज़ बढ़ रही हैं। बच्चियों के पीरियड्स ज़्यादा अर्ली शुरू हो रहे हैं। जब सब कुछ बदलेगा, तो शरीर क्या पुराने जैसा ही रह जाएगा?

प्रश्नकर्ता: यूपी के अंदर कुछ रिलेटिव किसान हैं, उनसे मिलना हुआ तो उन्होंने बताया कि गेहूँ का दाना इस बार बहुत पहले से पतला हुआ है और पैदावार बहुत कम हुई है।

आचार्य प्रशांत: आप इस बात का मतलब समझ रहे हो? किस स्तर तक जाएगी अराजकता? जिसको खाने को नहीं है जिसके सामने मौत प्रकट खड़ी है, क्या वो पुलिस के डंडे या आर्मी की गोली से भी घबराएगा? वो तो पूरा सिविलाइज़ेशन ही उखाड़ फेंकेगा न। वो कहेगा कि, “अरे, मैं क्या लॉ एंड ऑर्डर का सम्मान करूँ, ऐसा लॉ, ऐसा ऑर्डर, ऐसी व्यवस्था, ऐसा देश मेरे किस काम का, जहाँ मैं भूखा मर रहा हूँ?” और आप सोच रहे हो कि आप अपने गेटेड अपार्टमेंट में रहते हो और बाहर दो गार्ड्स खड़े हैं, तो सिक्योरिटी हो जाएगी। वो दो गार्ड्स खड़े रहते हैं न, वो जो भी लोग आएँगे, वो पहले उनसे रजिस्टर पर *एंट्री करवाएँगे?

गाँव के गाँव उठकर आएँगे क्योंकि वो भूखे होंगे, और भूखे आदमी को डराना बहुत मुश्किल होता है। उसके पास अब खोने के लिए कुछ नहीं बचा, आख़िरी चीज़ थी शरीर। वो शरीर भी उसका अब जा रहा है, भूख से। उसको आप गोली से भी नहीं डरा पाओगे।

अब हो गया, सबको बहुत डरा दिया। हो गया।

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, जो अर्बन मिडिल क्लास ऐसा कह रहा है, अभी ऑलरेडी एक बार आपने भी डिस्कस किया था, कि जो एयरलाइंस की फ़ंक्शनिंग है और जो रनिंग है, वो अफ़ेक्टेड होती है...

आचार्य प्रशांत: अरे अब तुम खोजोगे, यार, तो क्या-क्या नहीं निकलकर आएगा! क्या-क्या नहीं निकलकर आना है, मैं क्या बताऊँ इसमें। जिस स्तर की टर्बुलेंस शुरू होगी, जब एटमॉस्फेरिक एनर्जी बढ़ेगी; हीट माने एनर्जी। जब एटमॉस्फेरिक एनर्जी बढ़ेगी, तो विंड स्पीड भी बढ़ेगी न? जो करंट्स होती हैं एटमॉस्फेरिक, उनकी इंटेंसिटी भी बढ़ेगी न? आपके प्लेन्स डिज़ाइन नहीं हैं उतनी टर्बुलेंस झेलने के लिए। और ज़रूरी नहीं है कि, मतलब, प्लेन मिड-एयर स्प्लिट हो जाएगा या उसका विंग क्रैश कर जाएगा, वो ज़रूरी नहीं है। बस ये होगा, ऐसे, ऐसे, ऐसे, ऐसे। और मिडिल क्लास भीतर बैठी हुई है।

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, जस्ट एक शायद मेरा अज़म्प्शन है, क्योंकि इक्विपमेंट्स जो डिज़ाइन होती हैं हेल्थकेयर में भी, तो वो थर्मोसेंसिटिव होती हैं।

आचार्य प्रशांत: सब कुछ ही हमारा थर्मोसेंसिटिव है, सब कुछ ही। आँख भी। आँख को गर्म कर दो, दिखाई देना कम हो जाएगा। आपका कुछ भी ऐसा नहीं है, जो हीट और ह्यूमिडिटी पर डिपेंडेंट न हो। कुछ भी नहीं है आपका ऐसा।

प्रश्नकर्ता: कैसे वो फ़ंक्शन करेंगे इन दोनों पैरामीटर्स पर?

आचार्य प्रशांत: कार के इंजन, एयर कंडीशनर्स, ये भी एक टेम्परेचर रेंज में ऑपरेट होने के लिए डिज़ाइन्ड होते हैं।” आपको लग रहा है, 48° पार करने के बाद आपका एसी काम करेगा? रखे रहो। हाँ, कुछ एसी होते हैं, जो एकदम डेज़र्ट कंडीशंस के लिए बने होते हैं, वो 55° पर भी चल जाते हैं। पर फिर उनकी क़ीमत दो गुना, तीन गुना होती है। अफ़ोर्ड करो, मिडिल क्लास।

ये जो हमारी कारें होती हैं, ये कारें आपको लग रहा है चल जाएँगी? आप कहते हो, “ईवी।” ईवी की बैटरिज़ भी कोई इनफ़ाइनाइट टेम्परेचर रेंज झेलने के लिए नहीं बनी होती हैं। हर तरह के व्हीकल, चाहे वो पेट्रोल हो, डीज़ल हो, ईवी हो, इनमें सडन एक्सप्लोज़न्स के लिए तैयार रहिए कि गाड़ी खड़ी है और फट गई। या एक्सप्लोजन नहीं भी हो रहा है। इतने मत डरिए। एक्सप्लोजन नहीं भी हो रहा है, तो मालफ़ंक्शन के लिए तो तैयार ही रहिए। और छोड़ो न, ये जो मोबाइल फ़ोन है, आप बाइक चला रहे हो उसको जेब में रखा हुआ है। ब्लास्ट नहीं भी होगा, तो शटडाउन तो हो ही जाएगा। उसके भीतर ये मैकेनिज़्म होता है कि उसका टेम्परेचर ज़्यादा बढ़ेगा, तो ऑटोमेटिकली शटडाउन हो जाएगा। अच्छा है कि शटडाउन हो जाए, शटडाउन नहीं होगा तो जल्दी फटेगा। और रखते अभी उसको यहाँ (पैंट की जेब) पर हो। स्पर्म काउंट वैसे ही लो हो रहा था। उसको ऐसे शक से देखा करो, “यही है वंश का दुश्मन!”

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
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