
प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। आचार्य जी, मेरा प्रश्न अभी हाल ही में जो केस TCS नासिक का केस था, उससे रिलेटेड है। अप्रोक्स आठ फ़ीमेल्स चार साल तक चिल्लाती रहीं, अब जाकर जस्टिस शायद मिलेगा। उनके एचआर मैनेजर, जो ख़ुद एक फ़ीमेल थीं, कम्प्लेंट्स को दबाने का आरोप है।
आचार्य जी, ये कॉर्पोरेट सेक्टर है, यहाँ पर बहुत सारे मैकेनिज़्म्स हैं, पॉलिसीज़ हैं, लॉज़, रूल्स-रेगुलेशन्स, कमिटीज़, फ़ीमेल वुमेन कमिटीज़ हैं, जो ये सब न हो उसका ध्यान रखती हैं। उसके बाद भी, आचार्य जी, हमें ये लगातार बेसिस पर आए दिन दिखती रहती हैं, और ये एक बड़ा केस है तो इसलिए ज़्यादा उभर के आया है।
तो आचार्य जी, मेरा पहला प्रश्न तो है कि मैं इसको समझना चाहूँगी कि ये अभी तक ऐसा क्यों चल रहा है, और ये अभी भी चल ही रहा है। इसमें कोई बदलाव नहीं आ रहा है। आचार्य जी, ये मेरा प्रश्न है।
आचार्य प्रशांत: आप लोगों को ताज्जुब क्यों हो जाता है जब ऐसी कोई घटना सामने आती है? मुझे इस बात का ताज्जुब है। तीन चीज़ें हैं TCS नासिक वाले मामले में। ठीक है? और तीनों बताना कोई अपरिचित, अजनबी बातें हैं आपके लिए?
पहली, कुछ पुरुष हैं जो महिला के शरीर पर चढ़ बैठना चाहते हैं, सेक्सुअल हरैसमेंट। ये आपको अपनी ज़िंदगी में पहली बार पता चल रहा है? बोलो। कि एक इंसान दूसरे के शरीर पर अपने तात्कालिक प्लेज़र के लिए क़ब्ज़ा कर लेना चाहता है। दूसरे के शरीर को वो तोड़ने-मरोड़ने, छत-विछत करने को भी तैयार हो जाता है। ये भाई पहली बार तो नहीं पता चल रहा। ठीक है? तो ये सेक्सुअल हरैसमेंट वाला हो गया।
दूसरा केस आ गया कॉरपोरेट इम्प्रॉप्रायटी का, कि ये जो है कॉरपोरेट मिसगवर्नेंस का केस है, कि जहाँ पर पॉश जैसे नियम मौजूद हैं, प्रिवेन्शन ऑफ़ सेक्सुअल हरैसमेंट (POSH) और महिला को अधिकार भी मिले हुए हैं; वो ईमेल लिख सकती है, व्हाट्सऐप कर सकती है, ये सब मिला हुआ है। लेकिन उसके बाद भी एक बड़ी कम्पनी में इस तरह का ब्लंडर चलता रहा। ये भी कोई आप पहली बार देख रहे हो? और ये ब्लंडर चलता रहा, और वो महिलाएँ चार साल तक उस कम्पनी में टिकी भी रहीं। ये आप पहली बार देख रहे हो क्या, कि कॉरपोरेशन्स में किसी का शोषण भी हो रहा है पर फिर भी वो वहाँ पर काम किए ही जा रहा है, किए ही जा रहा है; ये पहेली बार देखा है?
ये जो यहाँ पर लोग बैठे हैं, इसमें से भी न जाने कितने होंगे। आप में से कितने लोग हैं जो अपने एम्प्लॉयर्स से खु श नहीं हैं? PAF वाले हाथ नहीं उठाएँगे, बाक़ी लोग उठाइए। उसके बाद भी ये कल सुबह वहीं पहुँच जाएँगे। तो ये कोई आप पहली बार तो देख नहीं रहे हो कि कॉरपोरेशन्स के अंदर एम्प्लॉइज़ का शोषण हो रहा है, चाहे वो मेल हो, चाहे फ़ीमेल हो पर एम्प्लॉई फिर भी वहाँ रुका हुआ है। कोई खुलकर न आवाज़ उठा रहा है, न विद्रोह कर रहा है। ठीक?
और तीसरी इसमें एक और चीज़ है, जो आपने सवाल में पूछी नहीं। पता नहीं क्यों नहीं पूछी, क्योंकि मीडिया में इस मामले का वही पक्ष छाया हुआ है, वो है रिलीजियस कोअर्शन। क्योंकि इसमें ये भी आ रहा है कि जो वहाँ पर उनके सुपरवाइज़र्स थे, और जो एजीएम था, और जो एचआर की इसमें महिला थी, ये सब मुस्लिम थे। और कहा जा रहा है कि इसमें सेक्सुअल कन्वर्ज़न के लिए भी दबाव डाला गया है।
तो ये भी कोई आप पहली बार देख रहे हो, कि जहाँ रिलिजन को एक ट्राइबल आइडेंटिटी बना दिया गया है, और कोशिश की गई है कि चलो तादाद बढ़ाएँ, तादाद बढ़ाएँ, कन्वर्ज़न कराएँ? और अफ़सोस जताया जा रहा है कि अरे, फलाने की तादाद बढ़ रही है, हमारी संख्या कम हो रही है। ये सब तो आए दिन अख़बारों में रहता है। तो इसमें नई चीज़ क्या हो रही है? नई चीज़ क्या हो रही है?
रिलिजन का अर्थ बर्बाद कर दिया गया है, मज़हब का मतलब तादाद कर दिया गया है। ये कोई नई बात है? तो ताज्जुब किस बात का है? पुरुष महिला का यौन शोषण करने को आतुर है, ये कोई आपने इतिहास में पहली बार देखा? तो इसमें ताज्जुब क्या हो रहा है इतना? बड़ी-बड़ी कम्पनियों के भीतर भी ज़ बरदस्त तरीक़े के घोटाले चल रहे हैं। करियर को ही ज़िंदगी मान लिया गया है, इसीलिए आपका शोषण भी हो रहा हो तो भी आप उसी नौकरी में बसे रहते हैं। ये सब आपने पहली बार देखा है क्या? तो आपको आश्चर्य क्यों हो जाता है?
मुझे आश्चर्य ये है कि ये मुद्दा हफ़्ते भर से ऐसे चल रहा है, जैसे पूरा देश हक्का-बक्का। “अरे, ये अनपेक्षित क्या हो गया है?” नई चीज़ क्या हो गई? नई चीज़ क्या हो गई, ये तो इस समाज में लगातार चल रही है। पूरी दुनिया में लगातार चल रही है, हर जगह हो रही है, हर घर में हो रही है। कम्पनियों में भी जो लोग जाते हैं, हमारे घरों और हमारे समाज से उठकर के जाते हैं। जो घरों में, समाज में, संस्कार में चल रहा है वो कॉरपोरेशन में भी तो चलेगा ही चलेगा न, कि नहीं चलेगा? तो वही हुआ है।
और तीनों मुद्दे जो हैं, यौन शोषण, कॉरपोरेट ब्लंडर, मिसगवर्नेंस, और रिलीजियस क्कोअर्शन, धार्मिक क्षेत्र में ज़बरदस्ती से किसी को दबाना, झुकाना या उसको धर्म-परिवर्तन के लिए उकसाना, इन तीनों ही चीज़ों के केंद्र में कौन है? अहंकार। उसको कुछ नहीं पता धर्म क्या होता है, उसके लिए धर्म माने गुटबंदी। उसके लिए धर्म माने गिरोहबंदी, उसके लिए धर्म माने इधर वाले एक क़बीले के हैं, इधर वाले दूसरे क़बीले के, चलो उनको मारते हैं, मारूँगा। उसके लिए धर्म माने अहंकार का फलना-फूलना और चर्बी इकट्ठा करना।
आम आदमी के लिए धर्म का मतलब अहंकार का घटना नहीं होता। आम आदमी के लिए मतलब होता है, धर्म अहंकार की सबसे बड़ी अभिव्यक्ति।
धर्म माने अहंकार का पहला नारा, “मैं मुसलमान हूँ, काफ़िरों को मौत के घाट उतार दूँगा,” या “मैं ईसाई हूँ, हिंदू हूँ, बौद्ध हूँ, कुछ भी और हूँ। धर्म नारा है मेरा।” और जब धर्म नारा है मेरा, तो ठीक है धर्म के नाम पर फिर और क्या होगा? जो कमज़ोर मिल गया, उसको पकड़ो। कभी उसको लालच दो, कभी उसको धमकी दो, और कहो, “चल, तू मेरी तरफ़ आ जा, मेरी साइड आ जा।” जो मिले, उसे पूछेंगे, “तू किसकी साइड है? तू किसकी साइड है? बैनर दिखा अपना बैनर, क्या बैनर लगा रखा है तूने?”
इसमें नया क्या है, ये सब हमारे इसी माहौल से, हमारी इसी हवा से उठ रहा है। जब इंसान धर्म को बिल्कुल बिकाऊ चीज़ समझ चुका है, जब इंसान धर्म को गैंगिंग-अप का रूप दे चुका है, गैंग बनाना है, “मेरा गैंग, मेरा गैंग” और अगर बड़ा धर्म है तो “मेरा इंटरनेशनल गैंग, मेरा इंटरनेशनल गैंग।”
जब इंसान धर्म को इतना गिरा चुका है, तो फिर वो अपनी तादाद बढ़ाने के लिए जहाँ कहीं पाएगा, वहाँ पर कन्वर्ज़न की कोशिश करेगा, और क्या करेगा? तो आश्चर्य क्या है?
जब अहंकार शरीर को अपनी संपत्ति समझ लेता है, तो अपनी बेचैनी को फिर वो शरीर के ही माध्यम से मिटाना चाहेगा न। अब जवान हो गए हो और भीतर अहंकार बिल्कुल तड़प रहा है, बेचैन है अपनी अपूर्णता में, ज़िंदगी पता ही नहीं क्या होती है, कैसे जीना है, क्या करना है, कुछ पता नहीं है। तो पहली चीज़ क्या है? पहला औज़ार क्या मिला हुआ है? देह। अपनी बेचैनी को चलो देह के माध्यम से मिटाते हैं। देह के माध्यम से कैसे मिटाएँ? “ये कुछ लड़कियाँ हैं, इन पर मेरा बस चलता है। ये मुझे रिपोर्ट करती हैं, और मुझे लग रहा है इन्हें पैसों की ज़रूरत भी है। चलो, उनको पकड़ लो, उनका सेक्सुअल हरैसमेंट करो।”
आपको पता है अभी एक लिंकडिन सर्वे हुआ था, हरैसमेंट तो नहीं लेकिन काम करने वाली 70% महिलाओं ने कहा कि उन्हें सेक्सुअल होस्टिलिटी झेलनी पड़ती है। होस्टिलिटी ज़रूरी नहीं हरैसमेंट बने, पर काम करने वाली 70% महिलाओं ने कहा, उन्हें सेक्सुअल होस्टिलिटी झेलनी पड़ती है। बहुत होता है 70%, भारत में लगभग 3 करोड़ महिलाएँ हैं जो काम करती हैं; यद्यपि बहुत कम है यह, हमारा एफ़एलपीआर 32% है, बाक़ी दुनिया का 52% है हमारा 32% है। इतने कम एफ़एलपीआर के बावजूद भारत में 3 करोड़ महिलाएँ काम करती हैं, उसमें से 70% कह रही हैं हमें होस्टिलिटी झेलनी पड़ती है।
बताओ, POSH में कम्प्लेंट्स कितनी आती हैं? प्राइवेट लिस्टेड सेक्टर में 3000 से भी कम। POSH क़ानून 2013 का है बहुत पुराना है, दस साल से ज़्यादा पुराना हो गया। और आज भी उसमें साल भर में जो सेक्सुअल हरैसमेंट की महिलाएँ *कम्प्लेन *करती हैं वो 3000। उसमें अभी पीएसयू वग़ैरह और जोड़ दो, तो 10–2000 और हो जाएगा। पब्लिक भी जोड़ दो, पब्लिक सेक्टर, तो 3000 से बढ़कर मान लो दस हज़ार हो जाएगा, बीस हज़ार हो जाएगा । तो भी 3 करोड़ के सामने 10–2000 क्या होता है? 0.1% से भी कम।
70% महिलाएँ कह रही हैं कि वर्कप्लेस पर सेक्सुअल होस्टिलिटी है, और शिकायत करने कितनी गई हैं? तो बाक़ी क्या कर रही हैं? बाक़ी कैरियर बना रही हैं, क्योंकि हम एक ऐसे समाज से आते हैं जहाँ हमें बताया जाता है, “योर मनी इज़ योर आइडेंटिटी।” पैसे के लिए अगर ख़ुद को बेचना भी पड़े, तो जा बेच दे झुन्नू, जा।
मैं विक्टिम ब्लेमिंग नहीं कर रहा हूँ बिल्कुल, बिल्कुल भी नहीं कर रहा हूँ। लेकिन याद रखो, तुम्हारा शोषण नहीं हो सकता, अगर तुम मुट्ठी भींचकर खड़े हो जाओ कि नहीं होगा। बिल्कुल एफ़आईआर होनी चाहिए, दोषियों को सज़ा मिलनी चाहिए और मिलेगी भी, केस मीडिया में इतना आ गया है, दोषियों को बिल्कुल सज़ा मिलेगी। बहुत अच्छी बात है सज़ा मिले। लेकिन उनको सज़ा मिलने से महिलाओं का यौन शोषण रुकेगा नहीं,
महिलाओं का यौन शोषण सिर्फ़ महिला ख़ुद रोक सकती है और कोई नहीं रोक सकता।
बात आ रही है समझ में?
लोग कह रहे हैं, ‘अरे POSH ने काम नहीं किया, POSH ने काम नहीं किया, मैनेजमेंट ने ध्यान नहीं दिया। इतनी ईमेल्स गई थीं, इतने व्हॉट्सऐप किए गए, किसी ने ध्यान नहीं दिया।”
आप ये जताना चाहते हो कि व्यवस्था तो ठीक बनी है, व्यवस्था का पालन नहीं हुआ। आप बताना चाहते हो कि प्रॉब्लम प्रोसीजरल है, प्रोसीजर का पालन नहीं हुआ। मैं आपसे कह रहा हूँ प्रॉब्लम स्ट्रक्चरल है। बात ये नहीं है कि व्यवस्था अच्छी थी, ठीक से चलाई नहीं गई। मैं कह रहा हूँ, तुमने जो व्यवस्था बनाई है वो खड़ी ही गलत बुनियाद पर है, प्रॉब्लम स्ट्रक्चरल है। POSH वग़ैरह बिल्कुल होने चाहिए, पर क्या करोगे अगर महिला वहाँ शिकायत करने ही न जाए तो? तो? क्या कर लोगे? और जितने मामलों में शिकायत होती है, उनमें भी कन्विक्शन कितनों में हो जाता है। क्या कर लोगे?
याद रखो, जब तक हम उस ज़मीन को ही नहीं बदलेंगे जिससे इस तरीक़े के विष-वृक्ष पैदा होते हैं, तो अलग-अलग ज़हरीले पेड़ों को काटने से कुछ नहीं होगा। तुम तीन काटोगे, तीस तैयार हो जाएँगे। बात आ रही है समझ में? ये इंसान है भाई इंसान, इसको नहीं पता ये कौन है, तो ये आँख बंद करके, कट्टर होकर, मज़हब को ही अपनी पहचान मान लेता है बिना ये जाने कि वो ख़ुद कौन है। उसको नहीं पता कि मैं कौन हूँ और मज़हब माने क्या, पर वो कहता है, “नहीं, मैं यही हूँ, और ये कर दूँगा, और जान ले लूँगा, और ये कर दूँगा। कुछ भी कर दूँगा। अपना बदन भी उड़ा दूँगा, सुसाइड कर दूँगा, जिहादी बन जाऊँगा।” ये इंसान है, इस इंसान को सही शिक्षा की ज़रूरत है। और मैं उस शिक्षा की नहीं बात कर रहा, जो हमारे स्कूल-कॉलेज में है, वो शिक्षा तो उन TCS वालों के पास भी रही होगी। मैं इनर एजुकेशन की बात कर रहा हूँ, एजुकेशन ऑफ़ द सेल्फ। और वो एजुकेशन ऑफ़ द सेल्फ जब तक तुम भारत के, दुनिया के हर बच्चे को नहीं दोगे, हर कंपनी में वो, प्राइवेट हो, पब्लिक हो, आईटी सेक्टर में हो, कहीं और हो, तुम्हें इस तरह के घोटाले मिलते ही रहेंगे। ये वारदातें होती रहेंगी और सौ में से छिटपुट एक-दो वारदात जब सामने आ जाएगी, तो तुम उस पर कुछ दिनों के लिए शोर मचा लोगे, फिर मामला ठंडा पड़ जाएगा।
जो असल समस्या है उसको समझो, तभी असल समाधान हो पाएगा। हम बस बीटिंग अराउंड द बुश कर रहे हैं। घाव पर हम बैंडेज लगा रहे हैं, रंगीन बैंडेज, सुगंधित बैंडेज। और मैं आपसे कह रहा हूँ, द बैंडेज इज़ द बॉन्डेज। तुम बैंडेज लगा-लगाकर ज़ख़्म को छुपा रहे हो बस, ताकि तुम्हें ज़ख़्म की जड़ का पता न करना पड़े, क्योंकि ज़ख़्म की जड़ तुम ख़ुद हो।
अभी मैं जिससे बात कर रहा हूँ, द ईगो, अहंकार; वही कह रहा है कि उसको ज़ख़्म लगे हुए हैं। और ज़ख़्म की जड़ तक जाएगा नहीं वो, क्योंकि वहाँ पर वो ख़ुद को खड़ा पाएगा। जब तक हम अपनी शिक्षा को, अपने समाज को ही नहीं बदल देते, तब तक ऐसे मामले कभी इस रूप में, कभी उस रूप में चलते ही रहेंगे, तुम नहीं रोक पाओगे। आ रही है बात समझ में?
हाँ, सेंसेशन बनाने के लिए मीडिया को मसाला मिल जाएगा। लोगों को बात करने के लिए, ज़ुबान चलाने के लिए एक-आध हफ़्ते के लिए सामग्री मिल जाएगी, फिर ख़त्म। ख़ासकर जहाँ महिला शामिल हो, ख़ासकर जहाँ जवान महिला शामिल हो, ख़ासकर जहाँ यौन उत्पीड़न शामिल हो, ख़ासकर जहाँ पर मज़हबी कोण हो, जहाँ हिंदू-मुस्लिम शामिल हों, जहाँ धर्मांतरण का मुद्दा शामिल हो, वहाँ मसाला पर्याप्त मिल जाता है। मसाला मिल जाएगा, इससे ज़्यादा कुछ नहीं होगा।
जो शोषण चल रहा है, जो नालायकी चल रही है, वो ऐसी की ऐसी चलती ही रहेगी।
बदलो, घरों को बदलो, शिक्षा को बदलो, परवरिश को बदलो। एक-एक इंसान तक ख़ुद की पहचान को लेकर के आओ। आत्मावलोकन और आत्मज्ञान के अलावा कोई विकल्प नहीं है।
ये बात सुनने में आपको बोरिंग लगे तो लगे, पर इसके अलावा कोई दवाई नहीं है।
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, इसी पर एक छोटी-सी बात और है, क्या हम इस पूरी सिचुएशन को इस एंगल से नहीं देख सकते कि वो जो फ़ीमेल्स थीं, उन्हें कोई-न-कोई उनकी जो मजबूरी रही होगी जो उन्हें उस जॉब में, भले ही वो हरास हो रही थीं, बट… और ऐसे कई महिलाएँ, 70% ऑफ़ द वर्किंग फ़ीमेल्स अगर उसमें झेल रही हैं, तो उनके पास…
क्योंकि इन इंडिया या जो हमारी व्यवस्था है, जहाँ पर फ़ीमेल्स को अपने इंडिपेंडेंस के लिए इनकम अर्न करना, ये उनकी बेसिक नेसेसिटी है, तो उनकी मजबूरी पूरी तरह से उनके हरासमेंट में…
आचार्य प्रशांत: इसका मैं जवाब नहीं दूँगा, मेरी मजबूरी है। पिछले छत्तीस घंटों में मैं चौथी बार आपके सामने खड़ा हुआ हूँ, उसके अलावा सड़कों पर जहाँ जा रहा हूँ, वहाँ लोग मिल रहे हैं वो भी बात कर रहे हैं। अभी मीडिया से भी बात करी। मैं बाइक चलाकर आया था, मैं बहुत थक चुका हूँ। मैं आपसे कोई बात नहीं करूँगा, मेरी मजबूरी है, मुझे नहीं करनी। मेरे पास पर्याप्त कारण है, और मेरे सारे कारण वाजिब हैं, वैध हैं। मैं मजबूर हूँ। दिखाओ कि मेरी मजबूरी झूठ है। नहीं है झूठ। एक-एक बात जो बोल रहा हूँ, वो फ़ैक्चुअल है। मैं मजबूर हूँ, मैं आगे नहीं करूँगा आपसे बात।
मर तो जाओगे ही एक दिन। मौत के सामने तो मजबूर हो ही जाना है, उससे पहले काहे मजबूरी-मजबूरी का रोना रो रहे हो? सौदा होती है मजबूरी, स्वार्थ होते हैं। विक्टिम ब्लेमिंग फिर कह रहा हूँ, नहीं कर रहा हूँ। लेकिन ये एक चुनाव की बात होती है, चुनाव की बात होती है। मैं शोषण को मंज़ूर कर रहा हूँ, क्योंकि बदले में मुझे कुछ लाभ मिल रहे हैं। तुम्हें जो लाभ मिल रहे हैं, वो बहुत छोटे हैं और जो तुम गँवा रहे हो, वो बहुत बड़ा है। लेकिन ये तुम्हें बताने वाला कोई नहीं है, नहीं तो तुम ठीक अभी विद्रोह कर दो। तुम झेलते नहीं रहोगे। जो आएगा तुम पर चढ़ने के लिए, ठीक अभी तुम मुँह तोड़ दोगे उसका, पुरुष हो, तुम्हारा बॉस हो, सुपरवाइज़र हो, हिंदू हो, मुसलमान हो, किसी को नहीं बख़्शोगे तुम।
क्या हो जाएगा? नौकरी चली जाएगी? तो करना न संघर्ष, गुज़रना मुश्किलों से, थोड़ी कठिनाई उठाना, खोजना दूसरी नौकरी, यही तो होगा। कठिनाई क्यों नहीं उठानी है? संघर्ष क्यों नहीं करना है? कोई पुरुष तुम्हारे ऊपर चढ़ा आ रहा है, उसका मुँह क्यों नहीं तोड़ देना है? क्या हो जाएगा?
शोषण करने वाला तो नालायक है ही; जो शोषण बर्दाश्त करता चले, उसके साथ भी सहानुभूति रखना उचित नहीं होता।
और क्या दम था इस मामले में शोषण करने वालों में? ये कोई बहुत बड़े पद पर बैठे प्रभावशाली लोग नहीं थे। एक साधारण क़िस्म के एम्प्लॉई थे, और ये शायद कॉल सेंटर था। है न? ये कोई बहुत क्वालिफ़ाइड टेक्निकल प्रोफेशनल्स भी नहीं थे। इनका विरोध करा जा सकता है, इनको गिराया जा सकता है। कोई तुम्हारे ऊपर दो-दो दिशाओं से चढ़ा आ रहा है, तुमसे कह रहा है कि धर्म बदल लो, तुमसे कह रहा है कपड़े उतारो। तुम क्यों नहीं उसका मुँह तोड़ देते?
आप गीता-छात्र हो। क्या बोलते हैं श्रीकृष्ण? “स्वधर्मे निधनं श्रेयः,” और परधर्म भयावह होता है। पर कहाँ हमने वेदान्त पढ़ना है, हम तो ख़ुद को कहेंगे “हम सेक्युलर, रैशनलिस्ट्स हैं, और वेदान्त पढ़-पढ़ के तो हम रिग्रेसिव हो जाएँगे, बैकवर्ड हो जाएँगे, ऑर्थोडॉक्स हो जाएँगे। पिछड़ेपन की निशानी है फ़िलॉसफ़ी पढ़ना।”
गांधी के पास क्या था? ताक़त थी? क्या था? दुबला-पतला आदमी और नेतृत्व भी ग़रीब लोगों का कर रहा है। पर उस आदमी को अपनी नज़र से जो कुछ भी ईमानदारी से ठीक लगता था न , उस पर वो अड़ जाता था। गांधी जी की ताक़त थी उनकी ज़िद, सच को लेकर उनका आग्रह। अब ये अलग बात है कि जिसको वो सच समझते थे, वो किस हद तक सच था, उस पर बहस हो सकती है। पर एक बात पक्की थी, जो उनको ठीक लगा फिर उससे पीछे नहीं हटते थे, वो ये नहीं देखते थे कि दुश्मन कितना ताक़तवर है। ये नहीं देखते थे अंजाम क्या होगा और अंजाम कुछ भी हो सकता था। कुछ निश्चित नहीं था, अंग्रेज़ों का कुछ नहीं बिगड़ जाता ऐसे ही इनको ही मार दे तो, कितनों को मार दिया अंग्रेज़ों ने। एक लाठी लगनी थी, बूढ़ा आदमी।
निष्काम कर्म, और क्या सिखाती है गीता? जो सही है, उसके अंजाम की परवाह मत करो। एक बार तो आपसे ये भी कहा था मैंने कि सही काम के अंजाम की परवाह करना ही पाप है। जिस इंसान के जीवन में श्रीकृष्ण का कुरुक्षेत्र उतरने लग गया न, उसको दबाया नहीं जा सकता।
समझ रहे हैं? और कुछ इसी से संबंधित?
प्रश्नकर्ता: इसी से ऑलमोस्ट रिलेटेड एक क्वेश्चन था। अभी हमने बात करी थी TCS में। मैं कुछ बच्चों को पढ़ाता हूँ, वो 11–12th में होते हैं। और उनमें काफ़ी फ़ीमेल्स हैं। क्योंकि मैं गीता की बातें भी उन तक पहुँचाता हूँ, आपकी लर्निंग्स भी, तो उनमें से कुछ ने अपने साथ, जो उनके साथ चाइल्डहुड में एक्सपीरियंसेज़ होते हैं, जो कि ऐसे ही होते हैं, किसी ताऊजी ने कुछ कर दिया, भैया, पापा, चाचा, जो भी। ये तो एक साइड हुआ। कई बार मेल्स ने भी बताया है कि हमने भी गलती से अपनी बड़ी दीदी या बड़ी बहन इनके साथ करा ।
और मैं जब ये सब कुछ देख रहा होता हूँ तो मैं कंटीन्यूअसली क्योंकि उनको थोड़ा ऑब्ज़र्व तो करता ही हूँ, कि हाउ दे प्रोसीड इन लाइफ़, और वो जो भी छोटी-मोटी हरकतें करते हैं, तो मैं एक मेजर इम्पैक्ट ऑफ़ दैट डिस्टॉर्शन पाता हूँ। तो इस चीज़ को हम अगर जैसे पढ़ते हैं कि क्लासिकली धीरे-धीरे बच्चा बड़ा होता है, तो बहुत इनिशियली ही अगर इतना मेजर सॉर्ट ऑफ़ डिस्टॉर्शन हो जाए, तो वो उसको आइडेंटिटी का पार्ट बना लेता है, और फिर कभी भी एक्सेप्टेंस उसको देता नहीं है।
मतलब जब भी इन बच्चियों से मैंने पूछा कि आपने कभी पहले बताया क्यों नहीं? और इन लड़कों से भी पूछा कि पहले कभी खुलकर बात क्यों नहीं करी इस पर? तो वो कहते हैं कि हम तो भूल गए इसको। और मैं देख पाता हूँ उनकी हरकतों में आज भी वो सब छोटी-छोटी तरीक़े से मौजूद है। और जब ये बात मुझे पता पड़ी धीरे-धीरे, जब लोगों ने खुलकर बताया, तो फिर मुझे बहुत अजीब लगा। और मुझे लगा मैंने उस समय ख़ुद को भी थोड़ा असहाय पाया, कि इतनी शुरुआती उम्र में अगर वो लड़का है, तो उसके साथ डिस्टॉर्शन हो गया, क्योंकि उसको भी नहीं पता उसने ये कैसे कर लिया है। बहुत छोटी उम्र, मान लो बारह, चौदह, पंद्रह साल व्हिच इज़ वेरी इनिशियल एज। और सेम फ़ीमेल्स के साथ जब ऐसा डिस्टॉर्शन…
सर, गर्ल्स के साथ तो ये नंबर, मुझे आँकड़े नहीं पता पर बहुत ज़्यादा होते हैं कि बहुत बचपन में ऐसे केसेस होते रहते हैं।
आचार्य प्रशांत: यार, समस्या ये है कि तुम मुद्दा सिर्फ़ तब उठाते हो, जब एक्चुअल फ़िज़िकल एग्रेसन हो जाता है तब। तब तुमको लगता है कुछ हो गया। घर में किसी ने आकर के घर की लड़की के साथ कुछ कर दिया, ज़्यादातर वो घर का ही कोई सदस्य होता है, ठीक है? उसने आकर कुछ कर दिया, तो तब तो कहते हो, “मुद्दा बन गया, मुद्दा बन गया।” और उसी घर में टीवी चल रहा होता है, जिसमें एक के बाद एक आइटम नंबर आ रहे होते हैं, तब आपत्ति करते हो क्या?
ये जो ताऊजी आए थे, घर की बच्ची का यौन शोषण कर गए रात में चुपके से, ये वही ताऊ है जो दिन भर बैठ के आइटम नंबर देख रहा था। तब तुमने विरोध करा क्या? तब तो तुमने कहा, नॉर्मल है। नॉर्मलाइज़ वहाँ होता है पहले जब तुम बजट गिनते हो, “अरे, एक फ़िल्म ने पाँच सौ करोड़ कर गई !” और वो जो फ़िल्म है, वो पाँच सौ करोड़ आधा इसलिए कर गई, क्योंकि उसमें ग़ज़ब का सेक्स और वायलेंस था। तब तो तुम कहते हो, तो नॉर्मल-सी बात है न, हम तारीफ़ तो करेंगे ही किसी फ़िल्म ने इतना कमाया है। अगर सेक्सुअल बेसिस पर चलने वाली फ़िल्म का कमाना नॉर्मल है, तो फिर घर में सेक्सुअल वायलेंस का होना भी नॉर्मल है।
ये मैट्रिमोनियल ऐड जो होते हैं, इनसे ज़्यादा अश्लील तुमने कुछ और देखा है? लड़के की आमदनी बताएँगे, ये बताएँगे, वो बताएँगे। लड़की का बताएँगे सुंदर है, ऐसा रंग है, इतनी हाइट है, दुबली-पतली है। जिस घर में ऐसे मैट्रिमोनियल ऐड दिए जा रहे हों, उस घर में किसी बच्ची का अगर मोलेस्टेशन भी चल रहा है तो तुमको ताज्जुब क्यों हो रहा है?
ये जाकर के देखो ये जो सब ज्वेलरी के होर्डिंग्स होते हैं, जिनमें गहनों के विज्ञापन होते हैं देखो उसमें बिल्कुल एक कामिनी खड़ी कर दी जाएगी वहाँ पर, जिसको देखते ही तुममें और कोई विचार आए ही न सेक्स के अलावा। और उसको खूब सारा सोना और चाँदी और हीरे और रत्न पहना दिए जाएँगे, और साथ में उसका ब्लाउज़ थोड़ा नीचा कर दिया जाएगा। और ये सब कुछ समाज में नॉर्मल माना जाता है न। “ये तो नॉर्मल-सी बात है, ज्वेलरी का ऐड है, तो लड़की की छाती तो दिखानी पड़ेगी न।”
फिर अब जिस घर में वही मैट्रिमोनियल दिया गया और ऐसी ही ज्वेलरी ख़रीदी गई, उस घर में लड़की का मोलेस्टेशन हो रहा है, तो तुमको आश्चर्य क्यों हो रहा है? क्यों हो रहा है?
शादियों में जाकर के देखो, अभद्रता, अश्लीलता, फूहड़ता। और हम बोलते हैं हम सज्जन लोग हैं और हमारे यहाँ वेडिंग हो रही है। वो जो वेडिंग्स में तुम जो कर रहे होते हो, वो सज्जनता होती है? छोटा बच्चा भी वहाँ चला जाए, तो जो कुछ शादियों में चल रहा होता है, उसको देखकर बिगड़ जाए। और घरों की ही लड़कियाँ महीने-महीने भर पहले से शरीर को सजाना-सँवारना शुरू कर देंगी, लाखों-लाखों रुपए जाकर के *सैलून-पार्लर्स/ में लगाएँगी। जितना रिवीलिंग हो सके, उतना परिधान पहनेंगी, “चोली, भैया, थोड़ी और बैकलेस हो सकती है क्या? घाघरे में कट डाल दो, भैया।”
ऐसी शादी के बाद फिर जो घर में लड़की पैदा होगी, उसका मोलेस्टेशन हो घर में ही, तो तुम्हें इसमें ताज्जुब क्या है? और महिलाएँ इसमें सिर्फ़ विक्टिम नहीं हैं, महिलाएँ हिस्सा हैं। अब तो घोड़ी के आगे महिलाएँ भी नाच रही होती हैं और उतने ही अश्लील तरीक़े से नाच रही होती हैं। और ये सब कहती हैं, “हम तो अच्छे घर की बहू-बेटियाँ हैं।”
आप बड़े भोले लोग हो न, आप सोचते हो सारी नालायकी करोगे पर उसके अंजाम से बच जाओगे। है न? जाकर के न जो पॉपुलर न्यूज़ वेबसाइट्स हैं उनको भी देख लेना। पहले के चार लिंक होते हैं न्यूज़ के, उसके बाद चौदह लिंक होते हैं, किस एक्ट्रेस का वार्डरोब मॉलफ़ंक्शन हो गया, कौन बिकिनी में कितनी हॉट लग रही है। और ये सब रिस्पेक्टेबल न्यूज़ वेबसाइट्स हैं। और आप वहाँ जाते हो गंभीर न्यूज़ सीकर बनकर, “या-या, हॉटी की पॉटी,” और सबसे ज़्यादा क्लिकस् उन्हीं पर आते हैं।
आपको जितने भी आँकड़े पता हैं न यौन शोषण के, वो कम हैं। सबका हो रहा है। बात व्यक्ति की नहीं है वातावरण की है; मनुष्य की नहीं है, माहौल की है। जब हवा में ही ज़हर होगा, तो सबके फेफड़ों में जाएगा।
यहाँ ताज्जुब उनका है जिन घरों में कहा जाता है, “नहीं, हमारा घर तो एक्सेप्शन है, हमारा घर तो बहुत सात्विक है। हम धार्मिक लोग हैं, हमारे घरों में ये सब नहीं होता।” सबसे बड़े झूठे तो ये लोग हैं। अगर कहीं नहीं हो रहा है, तो उसकी भी सिर्फ़ एक वजह हो सकती है, डर। जिसमें करने की हवस है वो हो सकता है थोड़ा दब्बू हो और लड़की थोड़ा तेज-तर्रार हो, तो बुरी नियत के होते हुए भी अभी तक काम अंजाम तक नहीं पहुँचा। बस ये हो सकता है। पर नियत ही ख़राब न हो, ये तो बड़ा मुश्किल है। और नियत ख़राब मतलब फिर उसमें ऐसा लग रहा है जैसे कि पुरुषों का ही दोष है; महिलाएँ भी बढ़-चढ़कर अब इसमें भागीदार हो चुकी हैं। मामला लगभग सौदे जैसा होता जा रहा है।
अभी नवदुर्गा पर मैं हैरान था; ये लोग या तो बहुत ही नालायक हैं या एकदम मूर्ख हैं। ये देवी को भी अब जिन रूपों में दिखा रहे हैं, थोड़ा ध्यान से देखना। इनकी मूर्खता, इनका अज्ञान, इनकी कामना, सब हदें पार कर चुके हैं, ये देवी को भी नहीं छोड़ रहे। जो देवी को नहीं छोड़ रहा, वो घर की बेबी को छोड़ेगा क्या?
कितनी ही महिलाओं ने आकर के पहले इधर-उधर घुमा-घुमाकर बात करी और फिर अंत में मालूम है क्या कहा है? “घर में हमारी छोटी बेटी है, मैं इसको इसके पापा को देते हुए भी डरती हूँ। मैं नहीं चाहती इसके पापा इसको घुमाने भी ले जाएँ, यहाँ तक कि इसको गोद में भी उठाएँ, मुझे ठीक नहीं लगता क्योंकि मैं इसके बाप को जानती हूँ कैसा है।” ये ख़ुद माँ कह रही है। आगे की बात ये होती है, पूछता हूँ, एक बात बता, ये ज़बरदस्त खुलासा तुझे कब हुआ?” बोलती है, “मुझे तो बहुत पहले से पता है।” तो मैंने कहा, “बिटिया तो तेरी दो ही साल की है। जब तुझे बहुत पहले से ये सब पता था, तो तूने उसी पुरुष के साथ संतान पैदा करना क्यों चुना?” वो कोई जवाब नहीं दे पाती क्योंकि उसने भी सौदा कर रखा है।
प्रश्नकर्ता: सर, बस इसी में ये चीज़ थी कि लोग अभी स्टूडेंट्स थे मतलब दे आर वेरी यंग, उन लोगों के लिए इस पूरे एक्सपीरियंस से… उन लोगों के लिए, मतलब वी गेट इट फ़ॉर व्हाट इज़ अराउंड।
आचार्य प्रशांत: मैं क्या जवाब दे सकता हूँ? तुम चाहते हो मैं आउटरेज करूँ, “हाय-हाय” नारे लगाऊँ? क्या जवाब क्या चाह रहे हो? समस्या क्या है?
प्रश्नकर्ता: फ़ॉर देयर इंडिविजुअल, मतलब उनका इंडिविजुअल बैटल क्या है इसमें? क्योंकि ऐट द एंड, इट इज़ द इंडिविजुअल सफ़रिंग फ़ॉर देम। या फिर उनकी अपनी दिक़्क़त है, वो तो ये नहीं कह सकते समाज का था, ये था, वो था। वो इससे कैसे लड़ें? क्योंकि वो आए दिन…
आचार्य प्रशांत: समाज में जो कुछ भी हो रहा है, उसका असर तुम तक आएगा ही आएगा। तुम सिर्फ़ एक तरीक़े से बच सकते हो, कि समाज से स्वार्थ और सुविधाएँ कम-से-कम कर दो। जब तक तुम समाज के बीच रह रहे हो, समाज की हवा में साँस ले रहे हो, जो समाज का माहौल है, वो तुम्हारे द्वार तक पहुँचेगा ही पहुँचेगा। तुम बस ये कर सकते हो कि तुम उस सौदे को ही नामंज़ूर कर दो। तुम कह दो जो भी अंजाम होगा, मुझे ये सौदा मंज़ूर नहीं है। बात ख़त्म।
इतना छोटा कोई नहीं होता कि उसको कुछ बातें समझ में न आएँ। भाई, स्टूडेंट है तो? बारह, चौदह, सोलह, अठारह साल का तो होगा। हाँ, तो यह इतनी उम्र काफ़ी होती है जानने के लिए कि मेरा एक्सप्लॉइटेशन हो रहा है।