
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मुझे कोई समस्या नहीं है।
आचार्य प्रशांत: और मुझे इसी बात से समस्या है।
प्रश्नकर्ता: मैं लगभग आपको तीन साल से सुन रहा हूँ। बदलाव बहुत है, मैं खुश बहुत हूँ। अब आत्मविश्वास बहुत है। मैं खेल रहा हूँ, कूद रहा हूँ, मतलब मैं मन का काम भी कर रहा हूँ, आचार्य जी। खुशी बहुत है। बस जैसे अभी मुझे प्रमोशन मिला, तो मैंने उसे डिनाइ कर दिया कि मुझे घर से दूर जाना है, क्योंकि अभी मेरा सब बँधा हुआ है। मेरे शेड्यूल बँधे हुए हैं, मैं आपको सुनता हूँ, सुबह खेलता हूँ, लेखन करता हूँ, म्यूज़िक जा रहा हूँ, आचार्य जी, ऑर्केस्ट्रा वग़ैरह भी करता हूँ। अच्छी जॉब है, सब बहुत अच्छा है, आचार्य जी। मुझे ऐसा लगता है कि मैं मुक्ति में जी रहा हूँ, मैं मोक्ष में जी रहा हूँ।
पर आचार्य जी बस मेरी एक दुविधा है, कि मुझे ऐसा लगता है कि इससे क्या मेरी प्रगति रुक रही है? मैं कोई लक्ष्य नहीं बना पा रहा हूँ। ये समस्या नहीं, ये दुविधा है। मैं क्या करूँ?
आचार्य प्रशांत: नौकरी क्या है? सरकारी है न?
प्रश्नकर्ता: हाँ। आचार्य जी, मैं आपका शिष्य हूँ और मैं बहुत मेहनत करता हूँ, आचार्य जी। यहाँ तक कि फ़ीडबैक भी आते हैं कि आप प्राइवेट जॉब में हो, मैं बहुत मेहनत करता हूँ। बस मैं बहुत खुश हूँ। बस दुविधा यही है कि क्या मेरी प्रगति रुक रही है इससे? मैं बस इतना, मैं द्वंद्व में हूँ, ऐसा बस।
आचार्य प्रशांत: बेटा, दुनिया में जब भी प्रगति होती है, वो किसी बाधा के विरुद्ध होती है न। आप पहाड़ चढ़ते हो, उसे बोलते हैं आरोहण है, असेंशन, प्रगति है; क्योंकि आप गुरुत्वाकर्षण के विरुद्ध जा रहे हो। कोई बाधा तो होनी चाहिए सर्वप्रथम प्रगति के लिए, अन्यथा उसे गति बोलते हैं बस। बाधा कुछ नहीं है ऐसे-ऐसे चल रहे हैं, उसे बोलते हैं गति। तो प्रगति और अगति में कुछ तो अंतर होगा।
प्रगति माने क्या होता है? जब नीचे खींचने वाली बाधा के विरुद्ध गति करी जाए।
आपके पास तो कोई बाधा ही नहीं है। मस्त नौकरी है, पेट भरा हुआ है, खेलते हैं, कूदते हैं, तंतूर बजाते हैं, सो जाते हैं; तो फिर इसमें जब कोई बाधा ही नहीं है तो प्रगति कहाँ से होगी।
इलेक्ट्रिकल इंजीनियर कोई है यहाँ पर? एक सर्किट है, जिसमें रेज़िस्टेंस ही नहीं है। उस सर्किट का क्या होगा? फुक जाएगा फट से। जब बाधा ही नहीं है तो करंट भी नहीं बह सकता, कितनी अजीब बात है। हम उसको नाम देते हैं रेज़िस्टेंस; पर क्या वो रेज़िस्टेंस है? वो तो इनेबलर है। एक रेज़िस्टेंस-लेस सर्किट हो तो वो फुक जाएगा। हम रेज़िस्टेंस इसलिए मिनिमाइज़ करते हैं, इलेक्ट्रॉनिक्स। ज़ीरो रेज़िस्टेंस की जो अवस्था होगी वो बड़ी गड़बड़ होती है। मिनिमाइज़ तो हम करना चाहते हैं ताकि लॉसेस न हों, पर ज़ीरो रेज़िस्टेंस।
इसी तरीके से हम इसपर चलते हैं, हम बोलते हैं फ्रिक्शन है, अब फ्रिक्शन तो गड़बड़ चीज़ है। पर फ्रिक्शन न हो तो मैं गिर पड़ूँगा, फ्रिक्शन न हो तो आप खड़े क्या आप बैठे भी नहीं रह सकते। आप गिर जाओगे, सोफे से भी गिर जाओगे बैठे-बैठे। बाधा कहाँ है? बाधा तो होनी चाहिए, तब तो प्रगति होगी।
जीवन में जब आपने अभी तक कोई बाधा ही नहीं चुनी, कहीं आपने कोई ऐसा लक्ष्य ही नहीं चुना जो पाने लायक हो। सीधे कहूँ तो आप अभी तक अपना दुश्मन ही चिन्हित नहीं कर पा रहे। तो आपकी प्रगति कौन-सी होगी? ऐसे-ऐसे (हाथ को ऊपर-नीचे करते हुए) करिए। यही माइक पकड़ के करिए ऐसे बार-बार। ये देखो ये डंबल्स कर रहे हैं, बाइसेप्स बन जाएँगी? ऐसे ही तो कर रहे हो। ऐसे ही तो करते हैं सब। करो माइक पकड़ के करो न। बन गई? क्यों? क्यों नहीं बनी? कोई बाधा नहीं है। हाथ में बाधा पकड़नी पड़ती है, तब ऐसे करने से कुछ होता है यहाँ पर (बाजू की ओर इंगित करते हुए)।
प्रश्नकर्ता: लेकिन, आचार्य जी, मुझे ऐसा लगता है कि मुझे यहीं तक आना था। और बाधाएँ मैं पार करके आया हूँ, खूब संघर्ष किया फिर मैं यहाँ तक आया; रिलेशन अच्छा,ये भी अच्छा। जितना मुझे चाहिए था उतना मिल रहा है। और मैं आपसे जुड़ा हुआ हूँ तीन साल हो रहे हैं, आचार्य जी; और मुझे लगता है, खुश हूँ, बहुत खुश हूँ। तो बस मतलब, प्रगति। बस मुझे यहीं तक जाना है।
आचार्य प्रशांत: यहीं तक जाना है, तो यहीं तक रहो। उसका कोई इलाज नहीं है। ये तो अपनी स्वेच्छा की बात है, कि “मैं अपने अब, कुआँ मिल गया है उसमें पानी भी है; छोटे-मोटे कीड़े भी हैं; पेट भर जाता है; सरकारी नौकरी है मस्त हैं, क्या समस्या है?” इसमें कुछ नहीं है। बस जितना वक्तव्य है तुम्हारा, उसमें से एक छोटा-सा वाक्यांश कट जाएगा। कट ये जाएगा, “मैं तो बड़ी से बड़ी चुनौतियाँ स्वीकार करके उनके विरुद्ध संघर्ष कर रहा हूँ।” तो, मेरे साथ तो वही चल पाएँगे जो चुनौतियाँ उठाने को स्वीकार हों, बाक़ी सब तो मेरे लिए डेडवेट जैसे हैं न।
एक फ़ाइटर-प्लेन और एक कमर्शियल एयरलाइनर, दोनों के वज़न में क्या अनुपात होता है? फ़ाइटर-प्लेन बहुत हल्का होता है क्योंकि फ़ाइटर-प्लेन को युद्ध करना है; और कमर्शियल प्लेन को बस गृहस्थों को उठाकर उनकी कामना की जगह पर ले जाना है। फ़ाइटर-प्लेन डेडवेट लेकर थोड़ी चल सकता है, मैं फ़ाइटर-प्लेन हूँ। जो बॉम्ब बनने को तैयार हों, जो ख़ुद ही एक्सप्लोड करने को तैयार हों, वो तो मेरे साथ नज़र आएँगे। डेडवेट थोड़ी फ़ाइटर-प्लेन के साथ होता है।
आपको कहना है, कि “सब ठीक है, कुछ भी बदलने की ज़रूरत क्या है?” और मैं कह रहा हूँ, कुछ भी ठीक नहीं है, सब कुछ बदलने की ज़रूरत है। अब “तेरो मेरा मनवा कैसे एक होई रे।” तुम कह रहे हो, “सब ठीक ही चल रहा है” मैं कह रहा हूँ, कुछ भी ठीक नहीं चल रहा है। तो हम दोनों एक साथ कैसे चलेंगे फिर?
तुमको चलना है अधिक-से-अधिक 700 की रफ़्तार पर; मुझको चलना है माक 3 पर। हम साथ कैसे चलेंगे, बताओ? पढ़ते हो दुनिया में क्या चल रहा है? “सब ठीक है, मुझे यहीं तक आना था, आगे जाना नहीं है।” पढ़ते हो दुनिया में क्या चल रहा है, या बस अपना पेट भर गया तो संतुष्ट हो?
दुनिया के लिए कोई तुम्हारे मन में संवेदना नहीं है। पेट तो मेरा भी भरा हुआ था। आप जिस सरकारी नौकरी में होंगे, उससे ऊपर की मेरे पास थी। तो मैंने क्यों नहीं कह दिया कि “मेरा भी सब अच्छा ही चल रहा है। मुझे क्यों बाहर जाकर के आफ़त मोल लेनी है, संघर्ष करना है?” कुछ करुणा, कुछ संवेदना, कुछ सेंसिटिविटी है दुनिया के लिए कि नहीं है? या बस ये कहोगे कि “मेरा सब ठीक चल रहा है?”
या मैं अपने व्यक्तिगत घर के लिए संघर्ष कर रहा हूँ? मेरे चार छोटे-छोटे बच्चे हैं; मुझे उनके लिए कुछ वसीयत, विरासत छोड़ के जानी है, तो उनके लिए पैसा इकट्ठा कर रहा हूँ। मैं ये जो कुछ कर रहा हूँ, किसके लिए कर रहा हूँ? और तुम सारी बातें वो बोल रहे हो: “मेरे पास नौकरी है, मेरा ठीक चल रहा है, मैं ऑफ़िस में मेहनत कर लेता हूँ, मैं इससे संतुष्ट हूँ, मैं वापस आके गाना सुन लेता हूँ, दौड़-भाग कर लेता हूँ, फिर गीता सुन लेता हूँ, मेरा सब ठीक चल रहा है।”
ये इतनी “मेरा-मेरा” की बात है, इसको अहंकार नहीं बोलते तो क्या बोलते हैं? अहंकार माने क्या? “मैं; मेरा तो सब ठीक चल रहा है न, मुझे दुनिया से क्या लेना देना? मेरा सब ठीक चल रहा है।”
ऑफ़िस जाते हो, घर से कितनी दूर है ऑफ़िस?
प्रश्नकर्ता: 7 कि.मी.
आचार्य प्रशांत: 7 कि.मी. में सड़क पर कोई कुत्ता, गाय, जानवर क्रूरता का शिकार दिखाई नहीं देता क्या? तो कैसे सब ठीक चल रहा है? अंधे होकर जाते हो ऑफ़िस? 7 कि.मी. में तो बहुत कुछ दिख जाता है, तुमने कुछ नहीं देखा? तो कैसे “सब ठीक चल रहा है?”
किस शहर में जाते हो?
प्रश्नकर्ता: सिटी है, सर।
आचार्य प्रशांत: कौन-सी सिटी?
प्रश्नकर्ता: जबलपुर, एम.पी.।
आचार्य प्रशांत: जबलपुर।
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मैं आपके साथ हूँ। मैं हमेशा से।
आचार्य प्रशांत: तुम मेरे साथ नहीं हो। मेरे साथ हो; एहसान कर रहे हो जैसे मेरे साथ। कैसे मेरे साथ हो लोगे? इतना सस्ता है? कैसे साथ हो?
प्रश्नकर्ता: हर चीज़ में लोगों को…।
आचार्य प्रशांत: हर चीज़ में कैसे साथ हो? तुम तो ऑफ़िस जाते हो, जॉब करते हो, वापस आते हो, खाना खाते हो, संगीत सुनते हो, व्यायाम करते हो, सो जाते हो। मेरे साथ कैसे हो? मेरे साथ कैसे हो? बताओ। कह और रहे हो, “मुझे तो मेरी ज़िंदगी का लक्ष्य मिल गया है, मंज़िल मिल गई है। बहुत मेहनत करी थी, नौकरी मिल गई सरकारी; अब मैं उसमें बहुत खुश हूँ।”
तुम्हें तुम्हारी मंज़िल मिल गई है, और मैं कहता हूँ कि मैं जिस यात्रा पर हूँ उसमें मंज़िल अनंत है। मुझे पता है मुझे मरते दम तक मंज़िल नहीं मिलनी। मेरे साथ कैसे हो तुम? भाई, मेरा काम उनके लिए नहीं है जो अपनी घर-गृहस्थी में संतुष्ट होकर बैठ गए हैं। कल को तुम शादी-ब्याह कर लोगे, बच्चे पैदा कर लोगे, और ज़्यादा संतुष्ट हो जाओगे। नहीं भी करोगे, तो पहले से ही संतुष्ट हो तुम तो।
मेरा काम उनके लिए है जिनकी असंतुष्टि रुकने का नाम नहीं ले रही, जिनके दिल में आग लगी हुई है। मेरा काम उनके लिए है।
जो मस्त हैं बिल्कुल, कि अब तो अपना मोटा, बँधा-बँधाया, सिक्योर पैसा आता है; परेशानी क्या है लाइफ़ में? चलो हॉबी की तरह गीता भी पढ़ लेते हैं। उनके साथ मेरा थोड़ा चलेगा। मुझे एक पल का चैन नहीं और तुम्हें कहीं बेचैनी नहीं। तुम मेरे साथ कैसे हो? बताओ। मैं तो अभी आधे घंटे का ब्रेक भी हुआ था, उसमें भी काम कर रहा था। मुझे एक पल का चैन नहीं है। तुम कह रहे हो, “मुझे कोई बेचैनी, कोई समस्या नहीं है।” हम दोनों एक साथ कैसे हैं? बताओ।
प्रश्नकर्ता: यही जवाब लेने आया था, आचार्य जी।
प्रश्नकर्ता: साहब नमस्कार। मैं सवाल पूछना नहीं चाहता था, लेकिन छिड़ गया है तो फ़ॉलो-अप पूछ रहा हूँ। मेरा बिल्कुल रिवर्स है, करियर में एक लीनियर ग्रोथ लगातार मिलती जा रही है। जैसे सोचा था कि इस पॉइंट पर इतने पैसे मिल जाएँगे तो ठीक रहेगा; इस पॉइंट पर इतने पैसे मिल जाएँगे, सब कुछ वो हो रहा है। लेकिन वो लगातार डिस-सैटिस्फ़ैक्शन खाए जा रहा है अंदर से, खाए जा रहा है। और अब मैं बहुत ज़्यादा कॉन्शियस हो रहा हूँ कि अभी तक मैं जैसा हूँ, मैंने जैसी चीज़ें चूज़ की थीं उसकी वजह से मैं यहाँ पहुँच गया।
अब मैं ऐसे ही रहते हुए अगला कुछ ऑप्शन चूज़ कर लूँगा तो और ज़्यादा फँस जाऊँगा। तो रुक गया हूँ, और रुक के अब बस खँगाल रहा हूँ कि कौन-सी ऐसी चीज़ है जहाँ पर बिल्कुल अंदर तक जाया जा सकता है। लेकिन वो प्रक्रिया बहुत स्लो चल रहा है। चीज़ें अंदर तक उतरने का इंतज़ार कर रहा हूँ, कि कॉन्शियसली चुनूँ या न चुनूँ, क्या चुनूँ? कौन-सी परेशानी है जिसमें बिल्कुल झुका जा सकता है, बिल्कुल ख़त्म हुआ जा सकता है।
लेकिन इस सबके बीच में जो ऑफ़िस के जितने भी KPI’s हैं, परफ़ॉर्मेन्स हैं, वो अपने-आप स्लो होती जा रही है क्योंकि 100% निकल ही नहीं रहा है; मतलब मैं दिल नहीं लगा पा रहा हूँ। जो ज़रूरी है वो कर दूँगा, लेकिन उससे ज़्यादा नहीं हो पाएगा।
तो मैं बस ये समझना चाह रहा हूँ, कि जो दूसरा वाला प्रोसेस है, जिसमें बहुत टाइम लग रहा है, जिसमें चूज़ करने में टाइम लग रहा है; क्या वो किसी तरीके से मैं और कैसे इम्प्रूवाइज़ कर सकता हूँ? कैसे बेटर कर सकता हूँ?
आचार्य प्रशांत: देखो, दो तरह के लोग होते हैं, एक ‘झटका’ वाले और एक ‘हलाल’ वाले। झटका वाले वो कि जिनमें दम होता है कि एक बार में ही जो चीज़ ख़त्म होनी चाहिए, कर दिया। और दूसरे वो होते हैं जो कहते हैं कि धीरे-धीरे, धीरे-धीरे स्लो ब्लड-लेटिंग हो रही है, उसके बाद रिश्ता टूटेगा।
तो ऐसे में जब कोई आकर बोलता है कि, “आचार्य-जी, मुझे दिखाई देता है कि मेरी जॉब मीनिंगलेस है। काम में अब मन नहीं लगता और मेरे जितने भी केपीआईज़ हैं और परफ़ॉर्मेन्स मैट्रिक्स हैं, वो सब डिप कर रहे हैं।” तो मैं उनको कहता हूँ, बेटा, उन्हें और तेजी से डिप होने दो, ताकि तुम्हें वो जल्दी से निकाल दें। क्योंकि ख़ुद तो तुम निकलने से रहे। झटका वाला तुम्हारा हिसाब है नहीं, तुम ख़ुद कभी निकलोगे नहीं। तो तुम्हारे लिए अच्छा यही है कि तुम्हारा काम इतनी तेजी से ख़राब हो कि तुम्हारा बॉस ही तुम्हें फ़ायर कर दे।
अब थोड़ी गरिमा रहती तो अच्छा ये होता, ख़ुद निकल गए होते। या थोड़ा साहस दिखाया होता तो अच्छा ये होता, कि ख़ुद कुछ अपने लिए एक नया जहान बना लिया होता काम का। वो बनाया नहीं; कई बार वो इसलिए भी होता है कि कोई विकल्प पता नहीं चल रहा होता है। तब अस्तित्व ख़ुद ऐसी स्थितियाँ तैयार कर देता है कि आपका जो पुराना जहान है वो टूट जाए, डिस्मैन्टल हो जाए; क्योंकि आप उसमें मन नहीं लगा पाओगे, ध्यान नहीं दे पाओगे, तो फिर वो ख़ुद ही आपको इजेक्ट कर देगा, वो ख़ुद ही आपको बाहर निकाल देगा।
वो प्रक्रिया अगर चल पड़ी है तो उसको और गति लेने दीजिए, ताकि वो ख़ुद ही आपको: “हाँ, जाओ भाई, रुख़्सत कर दिया, जाइए आप।”
भगवान महावीर के साथ कुछ-कुछ ऐसा ही हुआ था। वो निकलना चाहते थे, उनके घर वाले उन्हें निकलने नहीं दे रहे थे। और घर में स्थितियाँ भी कुछ बार-बार ऐसी बन जाती थीं कि उनका निकलना मुश्किल हो जाता था, कभी घर में किसी की मृत्यु हो गई, कभी कोई बीमार पड़ गया, कभी राज्य की कोई ज़िम्मेदारी आ गई। ये सब चल रहा था। तो जितनी बार बोलें, “मुझे जाने दो, मुझे जाने दो।” तो घर वाले बोलते थे, “नहीं, अभी तुम्हें नहीं जाना है। घर में ऐसी हालत हो गई है देखो, फलाने अब नहीं रहे, तो उनका सब काम तुम्हें संभालना है। अभी तुम नहीं जा सकते, ज़िम्मेदारी।”
तो वो बेचारे जा न पाएँ। तो वो घर में ऐसे अन्य-मनस्क होकर रहने लगे, वो घर में रहते हुए भी ऐसे रहने लगे जैसे वो घर में हैं ही नहीं। फिर घर वालों ने एक दिन ख़ुद ही हाथ जोड़कर उनसे कहा, “जा तो तुम चुके ही हो, अब चले ही जाओ। तुम्हें रोकने से कोई फ़ायदा नहीं होगा क्योंकि तुम यहाँ होकर भी यहाँ के हो तो नहीं। जा तो तुम चुके ही हो, अब चले ही जाओ।”
तो ये अस्तित्व की प्रक्रिया होती है, आपको राहत देने की।
प्रश्नकर्ता: सर, वो बिल्कुल हर एक ऐस्पेक्ट में हो रहा है। वो सिर्फ़ ऑफ़िस में नहीं हो रहा है, वो घर में भी वही हो रहा है कि आप बिल्कुल बुत बन के बैठे हुए हो वहाँ पर कि या तो आप ख़त्म कर लो, फिर मैं अपना शुरू करूँ।
आचार्य प्रशांत: समय बचाना चाहते हो तो ख़ुद ही जल्दी कर लो सक्रिय रूप से; समय अपनी ओर से नहीं भी बचाना चाहोगे, तो फिर अब स्थितियाँ स्वयं-ही ऐसी बनेंगी कि निकल तो जाओगे ही। हाँ, समय बर्बाद होगा, जो काम अभी हो सकता है वो चार साल बाद होगा।
पर ये आप सब लोग पक्का समझ लीजिए, कुछ चीज़ें ऐसी होती हैं जिन्हें देखकर अनदेखा नहीं करा जा सकता। कुछ बातें ऐसी होती हैं जिनको समझने के बाद आप नासमझ बने नहीं रह सकते। अगर मैं सफल हो पाया हूँ गीता आपको समझाने में, आंशिक रूप से भी, तो आप मुझसे भागकर भी चले जाओ, आप गीता को छोड़कर भी चले जाओ, आप चैन नहीं पाओगे। क्योंकि कुछ बात आपने समझ ली है, अपनी समझ पर ख़ुद ही पर्दा कैसे डालोगे। कुछ है जो आपने सुन लिया है, उसे अनसुना कैसे करोगे।
तो अब आपकी प्रक्रिया शुरू हो गई; मेरी संवेदनाएँ, मेरा शोक-संदेश आपके साथ है। पर आपकी वो प्रक्रिया तो शुरू करा दी है मैंने। अब वो प्रक्रिया आपके ऊपर है कि जल्दी से पूरी कर लेते हैं झटका दे-कर के या धीरे-धीरे आप कहते हैं कि “रक्त बहता रहे, रक्त बहता रहे” और पेनफ़ुल प्रोलॉन्ग्ड डेथ होगी।
मेरी आमतौर पर जो स्टाइल रहती है, वो ये रहती है कि करो-करो-करो-करो, बर्दाश्त करो, और जब एकदम स्पष्ट हो जाए कि हो गया, तो फिर एक झटके में अचानक, बिना सूचना, बिना चेतावनी के समाप्त। कोई मुझसे भी ज़्यादा साहसी हो तो वो और जल्दी भी समाप्त कर सकता है। लेकिन ये पक्का समझ लीजिए, कि अँधेरे कमरे में थे आप और सोच रहे थे कि ये सब पकवान ही पकवान पड़े हुए हैं ज़मीन पर, और आप चाट रहे थे। सिर्फ़ 3 सेकंड के लिए कमरे में रोशनी हो गई, सिर्फ़ 3 सेकंड के लिए, और फिर उतना ही घुप्प अँधेरा हो गया जितना पहले था। पहले घुप्प अँधेरा था, ज़मीन पर आप चाटे आ रहे थे कि पकवान पड़े हैं। 3 सेकंड की रोशनी हुई, उसने दिखा दिया कि ज़मीन पर टट्टी पड़ी हुई है। और फिर उतना ही अँधेरा हो गया जितना पहले था। क्या आप चाट पाएँगे?
कुछ देख लिया, आप अनदेखा कैसे करोगे? गीता 3 सेकंड को भी अगर आ गई है जीवन में, तो उसके बाद गीता-कम्युनिटी से दूर भी भाग जाओगे, तो वैसे नहीं रह पाओगे जैसे थे। जल्दी ही कर लो।
प्रश्नकर्ता: प्रणाम सर। सर, दुनिया में हमारे इंटरैक्शन्स होते हैं, तो उनमें लोगों के हिडन मोटिव्स होते हैं कई बार; तो वो हमें समझ नहीं आते कि वो किस मोटिव से बात कर रहे हैं। तो जब समझ में नहीं आते, कई बार तो तत्काल समझ में आ जाते हैं; पर जब समझ नहीं आते तो मन में बार-बार घूमती रहती है वो बात या उनकी बातें।
तो सर, जानने-समझने की जो प्रक्रिया है, ये उस चीज़ का हिस्सा होता है या फिर कुछ मैं गलत समझ रहा हूँ इसमें? ये जो स्ट्रेस पैदा होती है इससे।
आचार्य प्रशांत: समझ क्या रहे हैं आप?
प्रश्नकर्ता: मतलब, इससे स्ट्रेस पैदा होती है।
आचार्य प्रशांत: सामने वाले का पता नहीं, क्या इरादा है।
प्रश्नकर्ता: जी।
आचार्य प्रशांत: हाँ तो क्या पता क्या है, उसे ही नहीं पता उसका क्या इरादा है। आपको कैसे पता चलेगा? आपको अपने इरादे पता होते हैं? तो आपके सामने जो आपसे व्यवहार कर रहा है, उसको अपने इरादे कैसे पता होंगे?
किसी को कुछ नहीं पता पर फिर भी व्यवहार भी चल रहा है, बाज़ार चल रहा है, कारोबार चल रहे हैं, रिश्ते-नाते चल रहे हैं। किसी को कुछ पता थोड़ी है। आपकी कुछ करने की, कर्म की जो प्रेरणा है वो कहाँ से आ रही है, आपको पता थोड़ी होता है। आप कर्म के अनुभोक्ता होते हैं, स्रोत थोड़ी होते हैं।
एक्शन का जो पूरा प्रोसेस है, जब वो बिल्कुल अपने एंड-पॉइंट, आख़िरी मुक़ाम पर पहुँच रहा होता है तब आपको उसका पता चलता है। लगभग वैसे कि जैसे कोई बीमारी आपके भीतर बहुत समय से पनप रही हो। आठ महीने से पनप रही थी। पर जब वो बिल्कुल अंत में पहुँच रही है तो आपको उसका सिम्पटम पता चलता है। सिम्पटम पहले था ही नहीं, बीमारी थी, सिम्पटम नहीं था।
उसी तरह से कर्म की जो पूरी प्रक्रिया होती है, उसका आख़िरी सिम्पटम होता है ‘कर्म।’ प्रक्रिया तो उसके पीछे बहुत लंबी है, और जो पूरी लंबी प्रक्रिया है उससे हम अनभिज्ञ होते हैं। इसी को आत्म-अज्ञान कहते हैं। हमें नहीं पता कि मेरे भीतर क्या लहर चली जिसके कारण मैंने ये बात बोल दी। मुझे नहीं पता मेरे भीतर कौन-सी लहर कहाँ से उठी जिसके कारण मेरा मूड ख़राब हो गया।
कोई मेरे सामने कोई प्रस्ताव लेकर आया था, मुझे नहीं पता मेरे भीतर जो पूरी प्रोसेस है उसके अलग-अलग स्टेप्स क्या हैं, मैं नहीं जनता। मुझे बस ये पता है कि उसके आख़िरी बिंदु पर आकर मुझे ऐसा लगा, एक्स्पीरियन्स हुआ कि मुझे ‘येस’ बोल देना चाहिए, तो मैंने ‘हाँ’ बोल दिया।
आत्म-अज्ञान का मतलब है अपनी प्रक्रियाओं का स्रोत न होना, बल्कि अनुभोक्ता होना। सोचो कितनी अजीब बात है, हमें ही नहीं पता हमारे भीतर क्या पक रहा है। वो जब पक-पुका कर बाहर आ जाता है तो हमें पता चलता है, जैसे एसिडिटी। आपके भीतर बहुत एसिड है, आपको पता कब चलता है? जब डकार आती है और गला जलता है। तो कर्म हमारे और शब्द हमारे, भाव हमारे, सब एसिडिटी की तरह होते हैं। वो भीतर पक रहे होते हैं, पक रहे होते हैं। हमें नहीं पता होता। फिर जब वो ऐसे रिफ्लेक्स आता है और गला जलता है, तो पता चलता है: “अच्छा, ये था क्या?”
वैसे ही होता है। आप नहीं जानते कि आपको कोई कपड़ा क्यों पसंद है, आप एक्सप्लेन नहीं कर पाओगे। आपसे मैं इतनी देर से पूछता रहा, समस्या बताओ; आप बता ही नहीं पाओगे। आप अनुभव करते हो, जानते नहीं हो। और मैंने इतनी बार बोला है,अन्डरस्टैन्डिंग एंड एक्स्पीरियन्स, ये दो बहुत अलग-अलग बातें हैं। ठीक वैसे जैसे हम दुनिया भर की चीज़ों को एक्स्पीरियन्स करते हैं, जानते तो कुछ हैं नहीं। वैसे ही हमारे भीतर भी जो चल रहा है, हम उसको भी बस एक्स्पीरियन्स करते हैं जानते नहीं हैं।
प्रश्नकर्ता: तो सर, जानने के लिए जो है उसमें और पैनी दृष्टि की ज़रूरत है।
आचार्य प्रशांत: लंबा समय लगेगा। जो उसकी प्रक्रिया है, मैं आपको उसी में साथ ले चल रहा हूँ। पूरा गीता कार्यक्रम इसीलिए है।
जो गीता कार्यक्रम में है, ईमानदारी से है, मेरी बात को सुन रहा है, समझ रहा है, फिर बोल रहा हूँ: संसार में बेवकूफ़ नहीं बन सकता।
ऐसा नहीं हो पाएगा कि दुनिया आके आपको ठग ले गई। हाँ, इतना ज़रूर हो जाएगा कि दुनिया के प्रति आप ऐसे हो जाओगे कि कोई आपको ठगने आए, तो हो सकता है आप ख़ुद-ही उससे कहो: “ले जा, तेरे लिए इसकी बड़ी क़ीमत है, मेरे लिए नहीं है उतनी क़ीमत यार। वैसे तूने मुझे लूटा नहीं है, मैंने तुझे दिया है।”
प्रश्नकर्ता: तो सर, इस प्रोसेस में स्ट्रेस, टेंशन, ये सब भी…।
आचार्य प्रशांत: स्ट्रेस-टेंशन से कोई फ़ायदा नहीं है। क्योंकि नहीं समझ में आ रहा तो स्ट्रेस लेने से समझ में तो नहीं आ जाएगा। और समझ ऐसी चीज़ नहीं है कि खट से हो जाना है, अभ्यास करना पड़ता है। हर गीता सत्र आपकी समझ को पैनी करता है एक क़दम और, आगे बढ़ाता है।
तो ये कहना कि “मुझे अभी नहीं आ रहा, अभी नहीं आ रहा।” भाई, वक़्त लगेगा। वक़्त लगेगा, बहुत पुराना जेनेटिक क्लटर है, और सोशल कंडीशनिंग है वो साफ़ होने में वक़्त लगता है। लेकिन प्रमाण आने शुरू हो जाते हैं कुछ महीनों में ही।
प्रश्नकर्ता: धन्यवाद सर।