आपका कहना है कि “सब ठीक है, कुछ भी बदलने की ज़रूरत क्या है?” और मैं कह रहा हूँ, कुछ भी ठीक नहीं है, सब कुछ बदलने की ज़रूरत है। तुम्हें तुम्हारी मंज़िल मिल गई है, और मैं कहता हूँ कि मैं जिस यात्रा पर हूँ, उसमें मंज़िल अनंत है। मुझे पता है, मुझे मरते दम तक मंज़िल नहीं मिलनी। मेरा काम उनके लिए है, जिनकी असंतुष्टि रुकने का नाम नहीं ले रही, जिनके दिल में आग लगी हुई है। मुझे एक पल का चैन नहीं, और तुम्हें कहीं बेचैनी नहीं। तुम मेरे साथ कैसे हो? बताओ।
यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मुझे कोई समस्या नहीं है।
आचार्य प्रशांत: और मुझे इसी बात से समस्या है।
प्रश्नकर्ता: मैं लगभग आपको तीन साल से सुन रहा हूँ। बदलाव बहुत है, मैं खुश बहुत हूँ। अब आत्मविश्वास बहुत है। मैं खेल रहा हूँ, कूद रहा हूँ, मतलब मैं मन का काम भी कर रहा हूँ, आचार्य जी। खुशी बहुत है। बस जैसे अभी मुझे प्रमोशन मिला, तो मैंने उसे डिनाइ कर दिया कि मुझे घर से दूर जाना है, क्योंकि अभी मेरा सब बँधा हुआ है। मेरे शेड्यूल बँधे हुए हैं, मैं आपको सुनता हूँ, सुबह खेलता हूँ, लेखन करता हूँ, म्यूज़िक जा रहा हूँ, आचार्य जी, ऑर्केस्ट्रा वग़ैरह भी करता हूँ। अच्छी जॉब है, सब बहुत अच्छा है, आचार्य जी। मुझे ऐसा लगता है कि मैं मुक्ति में जी रहा हूँ, मैं मोक्ष में जी रहा हूँ।
पर आचार्य जी बस मेरी एक दुविधा है, कि मुझे ऐसा लगता है कि इससे क्या मेरी प्रगति रुक रही है? मैं कोई लक्ष्य नहीं बना पा रहा हूँ। ये समस्या नहीं, ये दुविधा है। मैं क्या करूँ?




