
प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। मैं यहीं आईआईटी पटना के एमटेक फर्स्ट ईयर का छात्र हूँ।
सर, मेरा सवाल सराउंडिंग से होने वाले डिस्ट्रक्शंस और अपने करियर पर फ़ोकस को लेकर है। सर, एक युवा को इस ऐज में बायोलॉजिकल डिस्ट्रक्शन होना स्वाभाविक है, और ये समस्या तब हो जाती है जब ये हमारे करियर के गोल और पढ़ाई पर हावी होने लगता है। सर, हमारे सराउंडिंग में जब आँखों के सामने बहुत सारे कपल्स होते हैं और मन में करियर के लिए एक बहुत बड़ा डर होता है, तो सर एक स्टूडेंट कैसे अपनी ऊर्जा को सही डायरेक्शन में ले जा सकता है?
आचार्य प्रशांत: नहीं, मैं नासमझ हूँ। मैं समझा नहीं कि एक कपल को देख के तुम्हें करियर में क्या डर लग जाता है। ऐसा कौन सा करियर बना रहे हो जिसके लिए कपल ख़तरा है?
प्रश्नकर्ता: सर, जैसे कि कभी-कभी मेरे भी माइंड में इस तरह की बातें आती हैं।
आचार्य प्रशांत: नहीं, मैं समझता ही नहीं हूँ। किस तरह की?
प्रश्नकर्ता: सर जैसे सराउंडिंग में बहुत दिखते हैं मेरे।
आचार्य प्रशांत: क्या दिखते हैं?
प्रश्नकर्ता: एक बॉयज, गर्ल्स साथ में हैं। बहुत कुछ तरह के, ये, वो।
आचार्य प्रशांत: ये, वो क्या होता है? भाषा में बोलो न।
ये सब समझ रहे हो न? कोई है जो छुपा रहना चाहता है। वो जब बोलता भी है तो बताने के लिए कम, छुपाने के लिए ज़्यादा। मेरा नासमझ होना ज़रूरी है ताकि वो जो छुपना चाहता है, उसको उखाड़ सकूँ।
हाँ, बोलो, वो ये, वो क्या करते हैं?
प्रश्नकर्ता: सर, है वो।
आचार्य प्रशांत: ऐसा क्या करते हैं कि बताने में ही तुम खुश भी हो रहे हो, लजा भी रहे हो।
प्रश्नकर्ता: सर, बहुत ऐसी एक्टिविटीज़ हैं जो लगता है कि मैं भी करूँगा।
आचार्य प्रशांत: एक्टिविटीज़? कैरम वग़ैरह खेलते हैं?
प्रश्नकर्ता: नो, सर।
आचार्य प्रशांत: बोलो बेटा, उस बोलने में ही समाधान है। जो चीज़ तुम छुपा रहे हो, वो ऑब्वियस नहीं है। वो रूट ऑफ़ द प्रॉब्लम है। हाँ, बोलो।
प्रश्नकर्ता: मेरे हॉस्टल में बहुत सारे साथी हैं। वो अपनी लाइफ़ की बात कपल्स वाली शेयर करते हैं। तो सर, मुझे भी उस तरह की…।
आचार्य प्रशांत: फुलक उठती है और जलन भी होती है।
प्रश्नकर्ता: फिर सर, मुझे लगता है कि कहीं मेरा करियर इसके चक्कर में ख़राब न हो जाए। तो इस चीज़ के लिए कि मैं बहुत सारा कभी-कभी डिप्रेशन में ये वो बातें आती रहती हैं।
आचार्य प्रशांत: तो बिल्कुल ज़मीन से शुरुआत करते हैं, ठीक है?
तुम एक इंसान हो और दुनिया में आठ सौ करोड़ करोड़ इंसान हैं। उन आठ सौ करोड़ इंसानों में आधी लड़कियाँ हैं, महिलाएँ हैं। ठीक है? तो कोई ऐसी रेयर, विलुप्त होती थ्रेटेन्ड स्पीशीज़ नहीं है। चारों तरफ़ है, हैं ही हैं, आधी हैं। है न? तो कुछ ख़ास तो ऐसा हो नहीं सकता उधर, मतलब, समथिंग ऐज़ युबिकिटस ऐज़ 50% ऑफ़ ह्यूमन पॉपुलेशन। चारों तरफ़ वही, वही हैं। जैसे कहते हैं न कि ऐसे पत्थर फेंकूँ तो 50% प्रॉबेबिलिटी है कि किसको लगेगा? किसी महिला को लगेगा, क्योंकि आधी हैं वो। है न आधी?
तुमने जेईई की तैयारी करी, तुमने कुछ और करा। वहाँ पर तुम्हें तनाव इसलिए होता था क्योंकि जो चीज़ तुम पाना चाहते हो, वो रेयर है। तुम कहते थे, “मुझे टॉप वन परसेंटाइल में आना है।” तो समझ में आता था, क्योंकि वो चीज़ ही पाने में बहुत मुश्किल है और बड़ी प्रतिस्पर्धा है। और एक अनार, सौ बीमार हैं। एक सीट के पीछे सौ या पाँच साह या एक हज़ार एप्लिकेंट्स हैं। ऐसा ही है न?
प्रश्नकर्ता: यस, सर।
आचार्य प्रशांत: पर जब मनुष्यता की बात आती है, तो नर और नारी में अनुपात क्या होता है?
प्रश्नकर्ता: 50%
आचार्य प्रशांत: 1:1। तो समस्या क्या है? समस्या क्या है? ये तो प्राकृतिक रूप से हो ही जाना है। ठीक वैसे, जैसे प्रकृति स्वयं ये तय करती है कि एक लड़के पर एक लड़की खुद ही पैदा हो जाती है। प्रकृति ने ख़ुद ही ये तय कर रखा है कि एक लड़का पैदा होता है, एक लड़की पैदा होती है। तुम इसमें इतना परेशान क्या हो रहे हो? यहाँ ऐसा तो नहीं है कि मामला कॉम्पिटिटिव है और एक सीट के लिए एक हज़ार एप्लिकेशन्स हैं। यहाँ 1000:1 नहीं है, यहाँ 1:1 है।
तो फिर परेशानी क्या है? परेशानी फैक्चुअल नहीं लग रही है, साइकोलॉजिकल लग रही है। अगर तथ्य पर जाओ, तो जो तुम्हारी उम्र है और जिस जगह पर तुम हो, जिस परिवेश में तुम हो, तुम्हारी ही उम्र और तुम्हारे ही परिवेश की तुम्हारी ही संख्या की लड़कियाँ मौजूद होंगी। होंगी न?
तो जैसे प्रकृति में लड़की-लड़का, नर-नारी पैदा हो जाते हैं, वैसे ही प्रकृति में वो मिल भी लेंगे। प्रकृति ने उनका शरीर, उनका मनोविज्ञान, सब इस तरह का बनाया है कि उनका अनुपात, रेशियो सब इस तरह का बनाया है कि उनका मिलना स्वयं ही हो जाना है। तुम्हें उसके लिए कोई ज़ोर नहीं लगाना है।
कोई ज़ोर नहीं लगाना है। वो तो ख़ुद ही हो जाना चाहिए था काम। क्यों नहीं हो जाएगा? ऐसा कुछ होता है क्या कि कोई फीमेल कंट्री वग़ैरह है, नेशन नारी? जहाँ तुम रहते हो वहीं वो भी रहती हैं, बराबर की नागरिक हैं, हमारे ही समाज में, गलियों में, मोहल्लों में, सोसाइटीज़ में, वो भी मौजूद हैं। जिस प्रकृति ने तुम्हें एक और एक के अनुपात में पैदा करा, वही प्रकृति तुम्हें एक और एक के अनुपात में मिला भी देगी। तो फिर ये बेचैनी, ये उथल-पुथल, ये डेस्पिरेशन कहाँ से आ गया? जो होना था, वो ख़ुद-ब-ख़ुद क्यों नहीं हो गया अब तक?
साँस प्रकृति चलाती है; दिल प्रकृति धड़काती है; नर-नारी को एक-एक के अनुपात में प्रकृति पैदा करती है; जो नर खाता है, वो नारी खाती है; जहाँ नर रहता है, वही नारी रहती है। वही भाषा बोलते हैं; उसी राष्ट्र के हैं; वही ऑक्सीजन लेते हैं; उनकी शारीरिक व्यवस्था भी 90–95% एक जैसी होती है बिल्कुल। तो फिर ये विभाजन, ये तड़प, ये तकलीफ़, ये दूरी, ये कहाँ से आ गए? मैं जानना चाहता हूँ। और इतनी बड़ी बात कैसे बन गए कि इंसान के लिए इससे बड़ा कोई मुद्दा ही नहीं है? हिंदुस्तान में कम से कम 90% पिक्चरें ही यही बनती हैं, आदमी-औरत, आदमी-औरत, आदमी-औरत, जैसे ज़िंदगी में और कुछ हो ही न। और तुम जवान होते नहीं हो कि बस तुम्हारी धड़कन एक ही गीत गाती है, कहीं से मिल जाए कोई।
प्रकृति हैरान है। प्रकृति कह रही है, मैंने तो अनुपात एक और एक का रखा है। कहीं से कोई मिल जाए माने क्या? जितने तुम हो, उतनी ही लड़कियाँ हैं, तो कहीं से कोई मिल जाए माने क्या? तो अब इनका सवाल ये है कि मिलती क्यों नहीं? और मेरा सवाल भी यही है, ज़रा सा बदल के, कि मिली क्यों नहीं?
फिर समझो, मिलना तो सहज है, मिलना तो प्राकृतिक है। न मिलना कृत्रिम है। अरे बाबा, आपके पास जैसे साधारण, आप लोग जेई में सॉल्व करते थे, प्रॉब्लम्स होती थीं; वाइट, रेड, येलो, ब्लू बॉल्स की। वाइट बॉल्स हैं, ब्लैक बॉल्स हैं एक बराबर नंबर की। उनको आप ऐसे मिक्स कर दो और फिर कोई भी सैंपल निकालो, तो उसमें संभावना क्या होगी? मैं मान रहा हूँ कि सैंपल बिग इनफ है, बड़ा सैंपल है। उसमें से आपने निकाला उसको तो क्या प्रोबेबिलिटी होती है? जितनी वाइट बॉल्स होंगी, उतनी ब्लैक बॉल्स भी होंगी।
अब उसमें आपको एक ब्लैक बॉल मिले और कतई रो रही है, देवदास बन के, तो इसका मतलब क्या है? ये कैसे हो सकता है? ये स्टैटिस्टिकली इंप्रोबेबल है, ये अप्राकृतिक है। लड़का लड़की से मिल जाएगा, ये बात तो सहज है। ये तो होनी ही है। तुम बताओ, हो क्यों नहीं रही है? वो सवाल होना चाहिए। मत पूछो, मिलती क्यों नहीं? मुझे बताओ, अभी तक मिली क्यों नहीं? अटक कैसे गए तुम?
इतनी सीधी-सी बात है। इतनी सीधी-सी बात है, साँस लेने जैसी बात है। दिल के धड़कने जैसी बात है। बहुत सीधी, बहुत साधारण बात है, ज़िंदगी कोई बड़ी बात नहीं है, ज़िंदगी की बड़ी बातें दूसरी होती हैं। ज़िंदगी की बड़ी बातें होती हैं कि दुनिया के कितने काम आए। ख़ुद को कितना जीता। कोई सार्थक लक्ष्य जीवन में है कि नहीं है, ये सब होती हैं बड़ी बातें। लड़का-लड़की का मिलन तो बहुत साधारण-सी बात होनी चाहिए। हो गया तो ठीक है, खाना खाने जैसी बात है। प्राकृतिक बात है, कुछ उसमें इतना विशेष नहीं, कुछ इतना बड़ा नहीं कि उसका हवा बनाया जाए। तुम बताओ, ये साधारण-सी बात भी तुम्हारी ज़िंदगी में हुई क्यों नहीं? कौन आड़े आ रहा है? हम उसका नाम जानना चाहते हैं।
वो कौन है जो एक सहज प्राकृतिक मिलन को भी असंभाव्य, इंप्रोबेबल बना देता है? वो कौन है? वो कौन है? उसको बोलते हैं ईगो। और वो चलती है बिलीफ़्स पर, मान्यताओं पर, धारणाओं पर। “मैं” का दूसरा नाम है मान्यता। लड़का-लड़की तो बड़ी आसानी से मिल जाएँ। जैसे हवा में ऑक्सीजन, नाइट्रोजन, कार्बन डाइऑक्साइड, ये सब मिले हुए हैं। किसी को कोई जुगाड़-प्रयत्न थोड़ी करना पड़ता है, ये तो हो जाता है, अपने आप हो जाता है। पर नहीं हो पा रहा, क्योंकि अहंकार आड़े आ रहा।
और अहंकार माने बिलीफ़ सिस्टम। वो ख़ुद भी एक बिलीफ़ है न। मैं कहता हूँ, ईगो इज़ द फ़र्स्ट सुपरस्टिशन, वो ख़ुद भी एक बिलीफ़ है। तो सौ तरह की बिलीफ़ हैं और बिलीफ़ माने कहानी, क्योंकि सच्चाई तो कुछ है नहीं। तो सौ तरह की भीतर कहानियाँ हैं, सौ तरह की कहानियाँ। वो कहानियाँ ही तुम्हें सहज होकर के जीने नहीं देतीं। नहीं तो लड़कियाँ तो बहुत हैं। कहीं निकल जाओ, और लड़कियाँ ही लड़कियाँ हैं और लड़के ही लड़के हैं। पर लड़की रो रही है कि लड़का नहीं मिलता। लड़का रो रहा है, लड़की नहीं मिलती। इनको दूर रख कौन रहा है? कौन रख रहा है? उसका नाम जानना ज़रूरी है न? कि नहीं?
वही है, द फ़िक्टिशियस सेल्फ। द बिलीफ़ सिस्टम कॉल्ड द ईगो। वो कहता है, फ़ेयर वाली चाहिए। अपनी जाति की चाहिए, शर्मीली चाहिए, और जितना जैसा हमारा उत्तर भारत में चलता है एक और कॉन्सेप्ट, फ़र्स्ट-हैंड चाहिए। और ऐसी चाहिए जिसके सामने हम न आएँ; वो ख़ुद आकर के हमारे चरणों में लौट करके प्रणय-निवेदन करें। बोले, “हे प्राणनाथ, मैं मन-ही-मन तुम्हें अपना पति मान चुकी हूँ।”
तुम इतनी भारी शर्तें रखोगे तो कौन मिलेगी? कद भी इतना होना चाहिए, सेक्सी भी होनी चाहिए, अपनी जाति की भी होनी चाहिए, मम्मी जी को भी पसंद आए और बिकिनी में भी भाए। कैसे मिलेगी? कैसे मिलेगी, बोलो न? ये काम करता है अहंकार। वो इतनी मान्यताएँ, इतनी कहानी ले आता है कि जो कुछ प्राकृतिक है, वो भी कठिन हो जाता है। जैसे कि तुम खाने पर शर्तें रख दो कि आप जाकर माँ को बोलो, जो खिचड़ी बना रही हो, अगर उसका जो रंग है 5823.336 Å की वेवलेंथ का नहीं हुआ तो नहीं खाएँगे। तो भूखे ही मरोगे न। तो ऐसे ही जवानी में भूखे मर रहे हो।
ये ताली बजाने की थोड़ी बात है। कितनी शर्तें रखते हो, रंग गेहुआ है, रंग छुपा रहे हो। दाँत गिन रहे हो। ये जो हमारे आयोजित विवाह होते हैं कतई अश्लील क़िस्म के, उसमें अभी भी ये होता है कि लड़के की ओर से जो महिलाएँ जाती हैं लड़की को देखने, वो उसे पीछे कमरे में ले जाती हैं, उसे कपड़े-वपड़े उतरवा के, उसको उँगली-उँगली डाल-डाल के देखती हैं जैसे गाय-भैंस को देखा जाता है न कि मजबूत है कि नहीं है और बढ़िया दूध देगी कि नहीं।
इतनी तो तुम शर्तें रखते हो, फिर कहते हो कि अरे, मुझे कोई मिल नहीं रही। कोई एकदम अक़्ल की अंधी हो वो भी तुम कहो, नहीं, ये हमारे क्राइटेरिया में नहीं आ रही। कोई तुमसे ज़्यादा समझदार हो तो कहोगे, “क्या, ज़ोरू का ग़ुलाम बनना है?” कम पढ़ी-लिखी हो तो भी समस्या, ज़्यादा पढ़ी-लिखी हो तो भी समस्या। तुमने एक बहुत-बहुत नैरो रेंज बना रखी है और चाह रहे हो उस नैरो रेंज को पॉपुलेट करने वाली कोई मिल जाए। इतनी नैरो, इतनी नैरो कोई कैसे मिले?
अस्तित्व इतनी बड़ी शर्तें नहीं रखता। ज़्यादा लजाती हो तो कहोगे, टू कंज़र्वेटिव। और ज़्यादा खुली हुई हो, लिबरल हो तो कहोगे, भाई, टू मच, टू हैंडल। तुम्हारी कहानियों के अलावा और कोई बाधा है? दो ही तरह की बाधाएँ होती हैं, या तो फ़िज़िकल या साइकोलॉजिकल। फ़िज़िकल कोई कमी हो तो बताओ।
प्रश्नकर्ता: नो सर।
आचार्य प्रशांत: ठीक। तो समस्या साइकोलॉजिकल ही है।
प्रश्नकर्ता: यस।
आचार्य प्रशांत: पक्का है न?
प्रश्नकर्ता: यस सर।
आचार्य प्रशांत: फ़िज़िकल ठीक?
प्रश्नकर्ता: यस सर।
आचार्य प्रशांत: तो सारी बाधा खोपड़े में है फिर। यही खोपड़ा है जो इंसान को इंसान से नहीं मिलने देता, बूढ़े को जवान से नहीं मिलने देता; हिंदू को मुसलमान से नहीं मिलने देता और नर को नारी से नहीं मिलने देता। नहीं तो मिलन तो सहज है। अचरज की बात ये है कि तुम उस मिलन को रोक कैसे लेते हो? मिलन तो हो ही जाए। हिंदू निकले उसको मुसलमान न मिले सड़कों पर, कैसे हो सकता है? और मुसलमान के लिए तो और मुश्किल है कि मुसलमान निकले, उसको हिंदू न मिले। ये हो कैसे सकता है?
पर देखने में ये आता है कि मुसलमान सिर्फ़ मुसलमान से मिल रहा है और हिंदू सिर्फ़ हिंदू से मिल रहा है। अब तुम बताओ न ये आर्टिफ़िशियल, ये सिंथेटिक, कृत्रिम व्यवस्था चलाने वाला कौन है? ये कर कैसे लेते हो कि ब्राह्मण सिर्फ़ ब्राह्मण से मिल रहा है और कुर्मी सिर्फ़ कुर्मी से मिल रहा है और यादव सिर्फ़ यादव से मिल रहा है; ये कर कैसे लेते हो?
और ठीक जैसे तुम हर तरह का विभाजन बनाते हो, वैसे ही तुम नर और नारी का भी विभाजन बना देते हो। सौ तरह की मान्यताएँ, पहचानें, झूठी धारणाएँ, कहानियाँ, अंधविश्वास, कामनाएँ। ये हटा दो, फिर लड़की उतनी ग्लैमरस भी नहीं लगेगी।
कितनी अजीब बात है। जब तक तुम्हें वो बहुत बड़ी बात, बहुत चकाचौंध करने वाली चीज़ लगती है, तब तक उसको ज़िंदगी में लाना भी कठिन होता है। जिस दिन उसके साथ एक सहज मानवीयता का, इंसान-जैसा रिश्ता बना लोगे, पाओगे कि अपने-आप एक नहीं हो सकता है कई लड़कियाँ आ गई हैं। आ भी रही हैं, जा भी रही हैं। ठीक है, कोई बड़ी बात नहीं है। इंसान है, मैं भी इंसान हूँ, वो भी इंसान है। कोई आता है, कोई जाता है। इसमें इतनी बड़ी बात क्या है कि मेरी रातों की नींद हराम हो जाए?
है तो ज़िंदगी में लड़की, कोई है; नहीं है तो नहीं है। आज नहीं है तो कल होगी; कल होगी, परसों फिर नहीं होगी। आते हैं, जाते हैं प्रकृति का प्रवाह है, मुझे उसमें बहुत कहानियाँ क्यों खड़ी करनी हैं? मुझे क्यों कहना है कि ज़िंदगी की सार्थकता तभी है जब चाँद जैसी कोई जीवन में आए और फिर करवाचौथ मनाए?
ये सब जो तुमने कहानियाँ पाल ली हैं न, ये कहानियाँ तुम्हारा नासूर हैं। ये कहानियाँ हटा दो, देखो, जीवन कितना आसान हो जाता है।
जिस दिन सहज हो जाओगे, उस दिन तुम्हें बहुत बड़ा कोई अंतर भी लगना बंद हो जाएगा कि जीवन में कोई लड़की आ गई। क्योंकि है तो इंसान ही न। तुम क्या बार-बार उसको लड़की-लड़की-लड़की बोल रहे हो? इंसान क्यों नहीं बोल सकते? क्यों बोलते हो, “मेरा दोस्त अपनी गर्लफ़्रेंड के साथ घूम रहा है?” बोलो, “दो मनुष्य घूम रहे हैं।” ठीक है?
या सेक्सुअलिटी ही उस रिलेशनशिप का सेंटर है? अगर लड़का-लड़की साथ घूम रहे हैं, तो क्या ज़रूरी है कि वो रिलेशनशिप प्राइमरली सेक्सुअल हो? मैं ये नहीं कह रहा कि नॉन-सेक्सुअल होनी चाहिए, पर रिलेशनशिप के आधार होते हैं। ठीक है? सेक्स भी उसका एक हिस्सा हो सकता है। पर क्या ज़रूरी है कि सेक्स उसका सेंटर हो? क्या ज़रूरी है?
लड़का-लड़की जा रहे हैं, ठीक है। पति-पत्नी जा रहे हैं, उनके रिश्ते में सेक्स होगा। पर क्या ज़रूरी है कि सेक्स ही पहली चीज़ हो? पर तुम जब कहते हो कि ज़िंदगी में लड़की चाहिए, तो तुम इसी भाव से कहते हो कि एक सेक्सुअल ऑब्जेक्ट चाहिए, इसीलिए मिलता नहीं। आ रही है बात समझ में?
जिस दिन कहोगे कि मेरी ज़िंदगी ऐसी हो कि उसमें इंसान हों, अच्छे इंसान हों। मैं उनसे कुछ छीनने के लिए न मिलूँ। मैं उनसे मिलने के लिए मिलूँ, मिलने के लिए मिलूँ। तब पाओगे कि सहज ही नए-नए लोग तुम्हारे जीवन में आ रहे हैं। लड़कियाँ, लड़के, वृद्ध, जवान, बच्चे, सब। हिंदू, मुसलमान, सब। भारतीय, गैर-भारतीय, सब। जीवन खुल गया है, सब प्रवेश कर रहे हैं।
क्यों जीवन को इतना बंद रखा है? क्यों इतनी शर्तें लगाते हो? कुछ सूझ रहा है?
प्रश्नकर्ता: यस सर।
आचार्य प्रशांत: क्या?
प्रश्नकर्ता: साइकोलॉजी से बाहर निकलना है।
आचार्य प्रशांत: हाँ। बंधन बाहर नहीं है खोपड़े में है, और लड़की कोई ख़ास चीज़ नहीं होती। बहुत साधारण-सी चीज़ होती है। कुछ नहीं होता, जैसे तुम साधारण हो, वैसे ही कोई लड़की साधारण है। उसमें क्या ख़ास है? क्यों उसको इतना ग्लैमराइज़ कर रखा है?
तुम एक ही सेंटर से देखते हो, सेक्सुअल। और फिर इसी लिए, जब कोई लड़की मिल भी जाती है, चाहे गर्लफ़्रेंड, चाहे पत्नी, तो फिर तुम बहुत छटपटाते हो, क्योंकि तुम्हें लगा था कि जो ज़िंदगी में आ रहा है, वो एक सेक्सुअल ऑब्जेक्ट है, जबकि वो एक मल्टी-डायमेंशनल ह्यूमन बीइंग है। उसके अपने पॉलिटिकल ओपिनियंस भी हैं, उदाहरण के लिए। वो तुम झेल लोगे?
कई लोग होते हैं जो पॉलिटिकली काफ़ी कट्टर होते हैं, “मैं तो फलाने का ही समर्थन करता हूँ।” अब तुमने कोई लड़की देखी, तुम्हारे देखे तो वो सेक्स डॉल है। पर बिल्कुल हो सकता है उसके भी बहुत स्ट्रॉन्ग पॉलिटिकल ओपिनियन हों। और वो आई तुम्हारी ज़िंदगी में, उसने बोल दिया, “ये जिस नेता को तू पसंद करता है न, मैं थूक दूँ उसके मुँह पर।” अब क्या करोगे? और तुम अपने नेता पर भी जान देते हो, और वो आकर बोल रही है, “तेरे नेता को जूता मारूँगी।” अब क्या करोगे तुम?
क्योंकि तुम जिस सेंटर से देख रहे हो ज़िंदगी, उस सेंटर से कहीं आगे की बात है। तुम्हें लग रहा है ज़िंदगी में लड़की आएगी तो 24 घंटे सेक्स करोगे, ऐसा होता नहीं। वो भी एक परिपूर्ण मनुष्य है। तुम कह रहे हो कि तुम बिना अंडे-मांस के जी नहीं सकते। और वो आकर कह रही है, “कोई पशु-उत्पाद नहीं छुऊँगी। अंडा-मांस छोड़ दो, दूध भी नहीं होगा।” अब कैसे जियोगे? क्या करोगे? बोलो न। तुम किसी कौम से कट्टर नफ़रत करते हो, और वो कह रही है, “मेरे तो आधे दोस्त ही उस कौम के हैं।” अब क्या करोगे? बोलो, क्या करोगे?
इंसान को इंसान की तरह देखो, हमारी परंपरा ने न बहुत ज़्यादा सेक्सुअलाइज़ कर दिया है इस रिलेशनशिप को, बहुत ज़्यादा। हर तरह के पर्दे, शारीरिक पर्दे भी और मानसिक पर्दे भी, दोनों को इतना दूर कर दिया बीच में पर्दे डाल-डाल कर, कि दोनों ने एक-दूसरे के बारे में फ़ैंटेसीज़ बना ली हैं। कहानियाँ ही कहानियाँ, कहानियाँ ही कहानियाँ।
अभी कल ही गीता कम्युनिटी पर किसी ने पोस्ट डाली है, कि कोई डॉक्टर हैं। वो बोलीं कि ये उन्होंने एक पेशेंट की तस्वीर डाली है। किसी के पास हो तो वो अभी खोलकर देख भी ले, उसको अच्छे लाइक्स वग़ैरह हैं। वो ट्रेंडिंग में है कम्युनिटी पर। बिहार की कोई डॉक्टर हैं, वो कह रही हैं, किसी पेशेंट की तस्वीर डालकर, कि ये बहुत कॉमन है कि लड़कियाँ आती हैं, और वो आ रही हैं यहाँ पर डिलीवरी के लिए या अबॉर्शन के लिए और उसको देखकर ही पता चल जाता है कि नाबालिग है। और जब नाबालिग है, तो उनसे कोई अलग फ़ॉर्म साइन कराना पड़ता है। किस फ़ॉर्म का नाम भी उन्होंने लिखा है, कि एक अलग फ़ॉर्म होता है।
भले ही वो ब्याहता है, पर नाबालिग है, तो चाहे डिलीवरी हो, अबॉर्शन हो, अलग फ़ॉर्म साइन कराना पड़ता है। और आगे वो ख़ुद ही लिख रही हैं उस पोस्ट में, मुझे पोस्ट मिल जाए तो मैं ख़ुद ही पढ़कर आपको सुनाऊँगा, वो कह रही हैं, “बहुत कॉमन है। उसकी शादी इसी साल हुई है, और वो इसी साल आ गई है डिलीवरी के लिए।” क्योंकि वो जो लड़का था, वो पत्नी को नहीं एक सेक्सुअल ऑब्जेक्ट को लाया था।
वो आई ही नहीं। वो 17 साल की है, 16 साल की, उसको प्रेग्नेंट कर दिया। और यही नहीं, पहला अबॉर्शन हो गया, उसके तुरंत बाद उसको दोबारा प्रेग्नेंट कर दिया। और वो जो लड़की है, वो ये भी लिख रही हैं कि वो इतनी बेहोश है, इतनी बेहोश है कि उसको ये भी नहीं पता होता कि उसके लास्ट पीरियड्स कब आए थे। वो लिख रही हैं, कि वो ये चीज़ भी अपनी सास और अपने पति से पूछती है। क्योंकि उसकी उम्र ही बहुत कम है। वो कुछ नहीं जानती, पगली।
तुमने इतना सेक्सुअलाइज़ कर दिया रिलेशनशिप को कि तुम्हें 16 साल की लड़की को प्रेग्नेंट करते हुए भी दुख नहीं होता। बस वही, “मिल जाए, मिल जाए।” और कैसे मिल जाए? मम्मी ला के देगी, ताई ला के देगी, पंडित ला के देगा। और जब तक नहीं ला के देंगे, तब तक घूम रहे हैं ऐसे ही अपना। और जैसे ही फिर मिली, तो और कुछ नहीं कर सकते। बरसों की हवस पड़ी हुई थी, संचित, एक्यूमुलेटेड तो तुरंत उसको प्रेग्नेंट कर दिया।
ये किसी स्वस्थ रिश्ते के लक्षण थोड़े हि हैं। नर-नारी में कोई ज़रूरी है कि रिलेशनशिप फिर पूछ रहा हूँ, प्राइमरीली सेक्सुअल हो? सेक्सुअलिटी इज़ अ पार्ट ऑफ दैट रिलेशनशिप। वो हो भी सकती है, नहीं भी हो सकती है। है भी तो सेक्सुअलिटी ठीक है, है। कोई बुरा नहीं बोल रहे सेक्सुअलिटी को, है। आदमी है, औरत है, तो उनमें सेक्सुअलिटी भी होगी, वो ठीक है। लेकिन तुम उसको सेंटर बना देते हो कि यही सबसे बड़ी चीज़ है।
मिली क्या पोस्ट? उसमें फोटो होगी। आप अगर इमेज पोस्ट से सर्च करोगे, तो आ जाएगी। फोटो में एक कम उम्र की लड़की खड़ी हुई है, साड़ी पहन के, सिंदूर-विंदूर करके, और वो आई हुई है अबॉर्शन के लिए। अभी कल-परसों की पोस्ट है। मिल गई? और आपके बिहार की पोस्ट है। हाँ, यही है। प्रीति जी ने डाली है। कह रही हैं कि आपका नेट नहीं चल रहा है क्या? प्रीति नाम से सर्च करो विशाल। आधी ही पढ़ पा रहा हूँ, और पढ़ेंगे, आगे पढ़ भी नहीं पा रहा हूँ।
“13 घंटे पहले की पोस्ट है यह। इसमें एक लड़की है। ये ऐसा लग रहा है जैसे 10वीं-12वीं की लड़की हो। और नीचे लिखा है कि ओपीडी में एक ठेट दृश्य होता है। बिहार से आई नई-नई शादी की हुई, सजी-धजी, गर्भवती लड़की, जिसको देख के शक होता है कि ये बालिग है या नाबालिग।” फिर आगे ब्रैकेट में लिखा है, “नाबालिग विवाहित महिला में एमएलसी बनानी पड़ती है।” अब एमएलसी क्या होता है? मेडिको-लीगल केस। ठीक।
“अशिक्षित लड़की, कच्ची उम्र में शादी, शादी के तुरंत बाद गर्भ, और फिर बहुत कम अंतर के बाद दूसरी गर्भावस्था; ये सब बहुत ही आम बात है। इनको अपने महीने की आख़िरी तारीख तक याद नहीं है और पति, सास से पूछकर बताती हैं।”
ये सब क्या है? ये जो हमारी क्लोज़्ड सोसाइटीज़ हैं, जो क्लोज़्ड कल्चर है, उसने साधारण स्त्री-पुरुष के रिश्ते को इतना सेक्सुअलाइज़ कर दिया। हम कहते हैं, कि वेस्टर्न सोसाइटीज़ ज़्यादा सेक्सुअल होती हैं, क्योंकि वो ओपन में किसिंग कर लेते हैं। वेस्टर्न सोसाइटीज़ ज़्यादा सेक्सुअल हैं या हमारी नॉर्थ इंडियन सोसाइटी ज़्यादा सेक्सुअल हैं? ईमानदारी से बताओ। और हम कहते उनको हैं कि ये देखो, ये लेडीज़ को ऑब्जेक्टिफ़ाई करते हैं। हाँ, वो करते हैं, पर हम उनसे ज़्यादा करते हैं। वो करते हैं, बिल्कुल करते हैं पर हम उनसे ज़्यादा करते हैं।
फिर इन्होंने कल का सत्र देख के कहा है, कि “आज के सत्र में बिहार की हमारी महिला गीता प्रतिभागियों द्वारा प्रासंगिक प्रश्न पूछे जाने पर मुझे उम्मीद जागृत हो रही है कि ये दृश्य ज़रूर बदलेगा।” ये दृश्य बदलेगा।
ये देखो, ये खड़ी हुई है लड़की। और सिर्फ़ यही नहीं है कि कम उम्र की है, मस्त इसने इतना मोटा सिंदूर डाला हुआ है। मोटी लिपस्टिक लगाई हुई है और शेड्स भी लगा रखे हैं। पतिदेव ने दिलवाए होंगे गाँव के मेले से। ये लगा के चला कर, “अच्छी, तू सेक्सी लगेगी।”
ये पतिदेव कौन होंगे? ये वही हैं जिन्होंने 25 या 30 की उम्र में 18 साल वाली से शादी की है, और 25–30 तक कह रहे थे, “सबको मिल गई, हमें क्यों नहीं मिल रही?” दबाए बैठे थे। और जब मिली, तो ताबड़तोड़। हंसने की बात नहीं है, दुखद बात है। ये बलात्कार है।
देख रहे हो कि एक सहज, प्राकृतिक चीज़ को कितना विकृत करके, कैसे हम अपराध तक बना देते हैं। आप जवान हैं और आप कहते हैं कि किसी लड़की से आपकी दोस्ती नहीं है, तो आप बीमार हैं। आप वैरागी नहीं हैं, आप ब्रह्मचारी नहीं हैं। आप सतचरित्र नहीं हैं, आप बीमार हैं। पर हमारे उत्तर भारत में, ख़ासकर जो लोग बाबाओं की गिरफ़्त वग़ैरह में आ गए, उनमें ये खूब चलता है, “बड़ा अच्छा लड़का है, किसी लड़की से बात नहीं करता।” मनोरोगी है, विक्षिप्त है, पागल है। कौन है? क्या समस्या है उसको कि किसी लड़की से बात नहीं करता?
जीवन है, जिसमें स्त्री भी है, पुरुष भी है। अगर कोई आपको लड़का मिल रहा है जो कह रहा है कि मेरी उपलब्धि, मेरी श्रेष्ठता ही यही है कि मैं लड़कियों से ज़्यादा बातचीत नहीं करता, घुलता-मिलता नहीं, तो ये आदमी बीमार है। इस बात को उसकी श्रेष्ठता मत मानिए। उसको चरित्रवान होने का तमगा मत पहना दीजिए कि “बहुत चरित्रवान है हमारा सोनू। 30 साल का हो गया, जानता ही नहीं ये कि लड़की जैसी कोई चीज़ होती है कि नहीं।” ये महापाखंडी है, और अब इसका ब्याह जिससे करोगे, वो बेचारी कुचली जाएगी।
उसके बाद हम बना देंगे ये स्कूल, लड़कों के अलग, लड़कियों के अलग। कतारें बना देंगे, महिलाओं की अलग, पुरुषों की अलग। मैं कुछ हद तक उसका कारण भी समझता हूँ। कतारों में हर तरह के पुरुष होते हैं, वो फायदा उठाने की ताक में रहते हैं। वो ठीक है, वो अलग है। लेकिन सिद्धांत तौर पर ये सब बातें रुग्ण हैं, डिज़ीज़्ड हैं। स्त्री-पुरुष को इतना अलग-अलग कर देना मनोवैज्ञानिक विकार को जन्म देता है। उसी से ये सब होता है, फ़ोर्स प्रेग्नेंसीज़ और इतने रेप्स।
हेल्दी रिलेशनशिप बिटवीन ऑल डिस्टिंक्ट एंटिटीज़, किसी भी तरह के डिवीज़न को बहुत महत्त्व मत दिया करो। मैं अमीर हूँ तो ग़रीब से कैसे बात कर लूँ? मैं उत्तर भारत का हूँ, दक्षिण भारत वालों से कट कर रहूँगा कैंपस में भी। कैंपस में भी रीजनल ग्रुप्स बने रहते हैं, ये तेलुगु वालों का है, ये तमिल वालों का है, ये पंजाबियों का है, ये दिल्ली वालों का है, ये बंबई वालों का है।
किसी भी तरह के डिवीज़न की रेखा खींचने वाला कौन है? उसको पकड़ो, वही है ईगो-सेल्फ। “हम प्योर-ब्लडेड आर्यन्स हैं, इन ज्यूज़ को मार देंगे।” न सिर्फ़ जर्मनी में, बल्कि पूरे ईस्टर्न यूरोप में भी और यूएसएसआर में भी। ये क्या डिवीज़न है? इसी डिवीज़न का नाम था होलोकॉस्ट।
और यही डिवीज़न जब और आगे बढ़ाते हो, तो जानते हो क्या बनता है? प्रजातिवाद। मैं मनुष्य हूँ, बकरा तो खाऊँगा न, क्योंकि वो मेरे जैसा नहीं है। मैं बकरे की ओर हवस की निगाह से देखूँगा, क्योंकि वो मेरे जैसा नहीं है। ठीक वैसे जैसे मैं नारी को हवस की निगाह से देखता हूँ, क्योंकि वो मेरे जैसी नहीं है। उसमें कुछ अलग है, तो वैसे ही बकरा भी तो अलग है न। जो भी अलग है, मैं उसके प्रति भेद का रिश्ता रखूँगा। और भेद माने हिंसा, डिवीजन माने वायलेंस।
जो भी मुझसे कुछ अलग है, वो मारा जाएगा या फिर इस तरह से उसका इस्तेमाल होगा कि मेरे स्वार्थों की पूर्ति हो। अब शादी करके पत्नी को मार नहीं देते, पर उसका इस्तेमाल करते हो सारे स्वार्थों की पूर्ति के लिए। यही बात महिलाएँ भी करती हैं, पतियों का इस्तेमाल करती हैं स्वार्थों की पूर्ति के लिए। सहज रहो न।
छोटे बच्चों को देखा है? वो जानवरों के साथ खेलना शुरू कर देते हैं, उनको ये नहीं होता कि अलग प्रजाति का है। छोटा बच्चा है, वो चूजे के साथ खेलेगा, उसके बाद माँ-बाप उसको सिखा देंगे कि चिकन सूप पीना चाहिए। तो फिर उसी चूजे को मार के खा जाएगा। ये बात याद रखोगे? और ये लड़कियों के लिए भी और ज़्यादा ज़रूरी हो जाती है। आप अगर लड़कों से दूर-दूर रहती हैं, तो इससे आप चरित्रवान नहीं बन गईं, आप पागल बन गईं। दुनिया की आधी आबादी से दूर रहकर क्या पाओगी?