
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, क्या मैं आपसे दो मिनट चलते-चलते ही बात कर सकती हूँ? प्लीज़ सर।
अच्छा जी, मैंने बहुत मार पिटाई खाई है अपने घर पर, और मैं बहुत बाग़ी टाइप की हो गई थी, रिवोल्यूशनरी टाइप की। मैं पढ़ती थी, मैंने सीएस किया हुआ है, लॉ किया हुआ है। मेरी जॉब भी थी कॉर्पोरेट में, पर सुकून नहीं मिलता था। उसके बाद, कॉर्पोरेट के बाद मैंने लॉ जॉइन किया, और फिर मेरी लाइफ़ में काफ़ी सारी चीज़ें चेंज हुईं।
एक लड़का मेरी लाइफ़ में आया, मैं इमोशनली उससे बहुत अटैच हो गई थी। और मैंने सोच ही लिया था कि मुझे इसके साथ ही लव मैरिज करनी है। हम दोनों के बीच में काफ़ी कुछ अच्छा चल रहा था। शादी, उसने भी कहा था कि कर लूँगा, लेकिन फिर जब टाइम आया तो एक दिन पहले ही हम रात को बैठ के मैगी खा रहे थे, और अगले दिन सुबह उसने मना कर दिया कि मैं नहीं कर सकता।
फिर मुझे अगेन मैं शॉक हो गई। और फिर मैंने मैट्रिमोनियल साइट्स पर अप्लाई करा, क्योंकि मैं बहुत डिप्रेशन में जा चली गई थी। मैंने सुसाइड करने का भी अटेम्प्ट किया। एक लड़का समझ में आया मुझे मैट्रिमोनियल साइट्स पर और उसके बाद उससे मैंने शादी भी कर ली। मुझे लगा कि वो शांत था और मुझे अपने बारे में बताता नहीं था। मैंने अपने पास्ट के बारे में उसको सब कुछ बता दिया। फिर अचानक इंगेजमेंट के बाद उसने मुझे अपने रिलेशनशिप के बारे में बताया।
मेरा बेसिकली सवाल अपने हस्बैंड से है, कि हस्बैंड के ऊपर है कि वो अच्छे इंसान हैं। पहली बार ही हुआ है कि उन्होंने लिमिट क्रॉस की है, मुझ पर हाथ उठाया है। मैं, आचार्य जी, उसको बोल कर आई हूँ कि मैं तीन दिन बाद आऊँगी और फ़ैसला करूँगी कि मुझे क्या करना है अपनी ज़िंदगी के साथ।
सर जी, मुझे अपनी ज़िंदगी के लिए आपसे सलाह चाहिए। अभी मैं एक एनजीओ में एज अ वॉलंटियर काम कर रही हूँ, गुरुद्वारे के बच्चों को भी पढ़ाती हूँ।
आचार्य प्रशांत: तो आप इतना परेशान होने की कोई ज़रूरत नहीं है। ठीक है। ज़िंदगी बहुत बड़ी चीज़ है, बस वो बड़ी चीज़ भीतर की घटनाएँ हैं। कोई भी घटना ज़िंदगी से बड़ी नहीं होती है। आप फ़ाइनेंशियली आत्मनिर्भर हैं न?
प्रश्नकर्ता: सर, लेकिन जब कोर्ट में भी जाती हूँ, लॉ फ़र्म में जॉब की है मैंने, तो वहाँ काम करते टाइम मज़ा आता है। पैसे भी मिलते हैं। मुझे अंदर से लगता है कि यह काम क्यों कर रही हूँ?
आचार्य प्रशांत: अभी वो स्थिति नहीं है कि काम की गुणवत्ता परखें। अभी आप कमा रही हैं?
प्रश्नकर्ता: सर, इस वक़्त मैं नहीं कमा रही हूँ।
आचार्य प्रशांत: सबसे पहले तो वो करिए। ये जो आँसू होते हैं, ज़रूरी नहीं है कि प्रेम के हों। कई बार तो बस मजबूरी के होते हैं, और वह आर्थिक मजबूरी होती है। हम सोचते हैं कि उसमें मामला इमोशंस का है, भाव का है। मामला इकोनॉमिक्स का होता है। हम सोचते हैं मामला इमोशंस का है। आपकी जो मजबूरी है, वो बहुत हद तक इसलिए है क्योंकि आप शायद डिपेंडेंट हो। डोमेस्टिक वायलेंस भी है।
प्रश्नकर्ता: यस सर। ऐसा पहली बार हुआ है कि वो इंसान रुका ही नहीं, रुका ही नहीं। मैं पुलिस के पास भी गई, और उसने मुझे सॉरी बोला, लेकिन फिर भी मुझे लगा कि इससे मेरे बच्चों पे बहुत ग़लत इंपैक्ट पड़ेगा।
आचार्य प्रशांत: कितने बड़े हैं बच्चे?
प्रश्नकर्ता: मेरी ग्यारह साल की बेटी है और सात साल का बेटा है।
आचार्य प्रशांत: सबसे पहले कमाना शुरू करिए। आप पाएँगी कि आधी से ज़्यादा समस्या वहीं सुलझ गई है। उसके बाद जो सही फ़ैसला होगा, वो आप निडर होकर के ले पाएँगी। सही फ़ैसला क्या है, वह आप ख़ुद ही जानती हैं। अभी भी जानती हैं।
प्रश्नकर्ता: सर, जानती हूँ।
आचार्य प्रशांत: हाँ, तो आपको सही फ़ैसला मेरे मुँह से सुनने की कोई बहुत ज़रूरत भी नहीं है। आपका विवेक जानता है, आपको यह बात ख़ुद ही पता है। पर आपकी मजबूरी ये है कि अभी आप सही फ़ैसले कर नहीं सकते, क्योंकि आप फ़ाइनेंशियली हैंडीकैप्ड हो। तो जो असली समस्या है, उस पे उँगली रखिए। असली समस्या है आपकी जो आर्थिक विवशता है, उसको हटा दीजिए, उसके बाद फिर आप सही फ़ैसले ले पाएँगे।
देखिए, प्यार वग़ैरह न आज़ाद लोग ही कर सकते हैं। जो आदमी दूसरे पर डिपेंडेंट है, वो प्यार वग़ैरह नहीं कर सकता। तो हमारे ज़्यादातर जो रिश्ते होते हैं, स्पेशली जब हाउसवाइफ़ डिपेंडेंट होती है, तो प्यार के नहीं, सिर्फ़ डिपेंडेंस के होते हैं। और डिपेंडेंस ही उनका ग्लू होता है। क्योंकि वाइफ़ डिपेंडेंट है, इसलिए हस्बैंड को छोड़ नहीं सकती। तो इसीलिए रिश्ता चल रहा है। बस कुल मिला के इतनी सी बात होती है।
तो आप पहले तो इंडिपेंडेंट हो जाइए। उसके बाद आप समझ जाएंगी कि सही निर्णय क्या है, और फिर उस सही निर्णय को आप एग्ज़ीक्यूट भी कर पाएँगी विद फ़्रीडम। ठीक है? अभी आप इमोशनली नहीं, फ़ाइनेंशियली हर्ट हैं। इस बात को समझिए, बात मटेरियल है।
प्रश्नकर्ता: मैं जानती ही थी, यस। इसमें मेरा एक मॉरल डिलेमा है, मॉरल डिलेमा ये है कि मैं काम करना चाहती हूँ, मुझे हर इंसान तक पहुँचना है, या जो भी मेरे...
आचार्य प्रशांत: अरे, आप अपने तक तो पहुँचिए न पहले। आप सोशल सर्विस बाद में करिएगा, पहले ख़ुद को तो आज़ाद बनाइए। अभी तो आपकी हालत यह है कि आप घर में पिट रही हैं। आप कह रही हैं, मुझे दुनिया का कल्याण करना है। दुनिया का कल्याण आप बाद में करना, पहले अपने आप को बचाओ आप। ठीक है? उसके बाद फिर हम दूसरों की भी भलाई कर लेंगे।
दूसरों की भलाई करने के लिए भी पहले ख़ुद सशक्त होना ज़रूरी है।
और रोइए नहीं, इससे कमज़ोरी आती है, ताक़त और घटती है। ठीक है? आप पढ़ी-लिखी हैं। पहले का भी आपका कॉर्पोरेट एक्सपीरियंस है। आप जल्दी से जल्दी, ठीक है? ऐसे नहीं होगा कुछ, ये करके बस आप अपने आप को यह जता लोगे कि मैं तो विवश हूँ। आप विवश हो नहीं, ठीक है? आपने कुछ ग़लत चुनाव करे हुए हैं, आप विवश नहीं हो। ठीक है? ताक़त है आप में। समझती हैं आप बात को? मामले को भावनाओं के लेंस से बाद में देखिएगा, पहले पैसे के लेंस से देखिए। आप आत्मनिर्भर बन जाइए।
प्रश्नकर्ता: सर, बीच में मैंने जॉब भी स्टार्ट की थी लॉ फ़र्म में, और वहाँ काम करते हुए मैं घर का काम भी करती थी। मेड है, पर फिर भी... और बच्चों को भी पढ़ाई देखना, ये सब...
आचार्य प्रशांत: मेड वाला काम क्यों कर रही हैं आप? किसने कह दिया? देखो, या तो आप रस्में, परंपराएँ और जो आपके पुराने रोल्स हैं, वो निभा लो, या आज़ाद ज़िंदगी जी लो। और जैसा पुराने समय से सब चला आया है न, उसमें डोमेस्टिक वायलेंस शामिल है। पत्नियाँ पिटती रही हैं। तो अगर आप पुराने ही रोल्स निभाओगे तो फिर जैसे पुरानी पत्नियाँ पिटती रही हैं, आप पिटोगे भी। ठीक है?
प्यार अलग चीज़ होती है और डिपेंडेंस अलग चीज़ होती है। रिश्तों में प्यार हो, यह बड़ी मीठी बात है। लेकिन अफ़सोस कि ऐसा होता नहीं है, हमारे रिश्ते चलते हैं इसलिए नहीं कि उनमें प्यार है, बल्कि इसलिए कि उनमें मजबूरी है। वो मजबूरी हटाइए। उसके बाद ज़िंदगी में कोई ऐसी चीज़ सामने आएगी। ठीक है? और आप देश की टॉप 5% महिलाओं में हैं एजुकेशन में, और आपने जो कॉर्पोरेट एक्सपीरियंस लिया हुआ है। आप भी ऐसे मजबूरी के आँसू बहाओगे, तो बेचारी बाकी महिलाओं का क्या होगा? आप तो बहुत हद तक बहुत एम्पावर्ड हो। ठीक है?
तो बस उसको एग्ज़ीक्यूट करिए आप। आपकी स्थितियों में समस्या नहीं है, आपके फ़ैसले की समस्या है। आप सही फ़ैसला नहीं कर रहे हो, फ़ैसला करो और उस पर आप डट जाओ। ठीक है? चलिए।