ज़िंदगी ज़ख़्म देती है

Acharya Prashant

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ज़िंदगी ज़ख़्म देती है
"वो मुझे याद आती है। उसकी छुप-छुप के तस्वीरें देखता हूँ।" ये गुलाबी समस्याओं का कोई समाधान नहीं होता है। ज़िंदगी इसलिए नहीं होती है कि आपको बहुत सुख देगी; ज़िंदगी तो ज़ख़्म ही देती है। अच्छे काम में ज़िंदगी में डूबने का यही फ़ायदा होता है। यादें भी आती रहेंगी, जीना दुश्वार होता रहेगा, डट के काम करो, खूब थक जाओ, सो जाओ। और काम के बाद भी ऊर्जा मिली है, तो रैकेट उठा के जाकर के फोड़-फाड़ दो। कोर्ट को भी, नेट को भी, एकदम टूट जाओ, जाकर सो जाओ। यह सारांश प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन के स्वयंसेवकों द्वारा बनाया गया है

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। आचार्य जी, थोड़ा स्वार्थपूर्ण प्रश्न है आज मेरा, और बहुत ज़रूरी है मेरे लिए ख़ासकर। अभी मेरे घर की स्थिति थोड़ी ज़्यादा ख़राब चल रही है; गृह-क्लेश प्लस दांपत्य जीवन में मेरी स्थिति इतनी ज़्यादा ख़राब है कि मैं डिवोर्स की स्थिति तक आ गया हूँ।

मेरे घर में ये स्थिति है कि मैं आठ महीने से अपनी वाइफ़ से नहीं मिला हूँ। छोटा बच्चा है, वह भी पटना रह रहा है वाइफ़ के साथ। और मदर की स्थिति यह है कि वह उनको लेना नहीं चाहती हैं। और मैं तो सबके साथ एडजस्ट कर सकता हूँ, करना भी चाह रहा हूँ, क्योंकि मुझे अपनी चेतना का स्तर बढ़ाना है। इस स्थिति में, मैं आ रहा हूँ, कुछ तरक़्की हो रही है आध्यात्मिक की ओर, तो मैं रुकना नहीं चाहता, मैं आगे ही बढ़ना चाहता हूँ। पर मेरी टाँग खींचे जा रही हैं दोनों तरफ़ से। मैं कुछ कर नहीं पाता। पारिवारिक रूप से मैं बहुत परेशान हो गया हूँ।

अब यह स्थिति आ गई है कि लीगल हर्डल भी आने वाला है, मुझे ऐसा महसूस हो रहा है। तो मैं कैसे बढ़ पाऊँगा? मुझे यह समझ में नहीं आ रहा है।

आपकी सारी शिक्षाओं से मैं आगे बढ़ रहा हूँ, बट वो कुछ रुकावट-सी होती है कि मैं बार-बार फिर पीछे खिसक जा रहा हूँ बार-बार। मुझे पता है इस प्रश्न पर आपने काफ़ी बार बोला है, मैंने सारी चीज़ें सुन के आया हूँ साहब, लेकिन मेरी स्थिति अभी बड़ी गंभीर बनी हुई है। मैं क्या करूँ? अभी मेरा रीसेंटली प्रमोशन भी हुआ है, पर मुझे कोई खुशी नहीं है क्योंकि घर में स्थिति ये बनी हुई है अभी।

आचार्य प्रशांत: आगे बढ़ पाऊँगा, माने क्या?

प्रश्नकर्ता: आगे बढ़ना, सर कुछ समझ में नहीं आ रहा कि मैं करूँ क्या।

आचार्य प्रशांत: क्यों नहीं समझ में आ रहा है? अभी जो चल रहा है, उसमें समस्या क्या है?

प्रश्नकर्ता: कोई समस्या नहीं है, सर, पर मैं तो इसको छोड़ना ही नहीं चाहता बिल्कुल भी। कुछ नहीं छोड़ना चाहता हूँ मैं, आपको भी नहीं छोड़ना चाहता।

आचार्य प्रशांत: तो समस्या क्या है?

प्रश्नकर्ता: समस्या, सर, परिवार में इस तरह से क्लेश बना रहा है तो मैं आगे कैसे बढ़ूँ?

आचार्य प्रशांत: क्लेश कहाँ है? वो तो अलग रहती हैं आपसे।

प्रश्नकर्ता: यस, सर।

आचार्य प्रशांत: तो क्लेश कहाँ है? क्लेश तो ख़त्म हो गया।

लीगल हर्डल माने क्या? हर्डल तो होता है बाधा; माने मैं कुछ करना चाहता हूँ, कुछ कामना है उसकी राह में जो बाधा होती है, उसको हर्डल बोलते हैं। जब आपका सब ठीक चल रहा है, तो आपकी कामना क्या है? कामना तो होनी ही नहीं चाहिए सब ठीक है तो। कामना क्या है?

प्रश्नकर्ता: सर, वह मुझे नहीं छोड़ना चाहती न।

आचार्य प्रशांत: आप अपनी कामना बताओ न पहले। आपकी क्या कामना है?

प्रश्नकर्ता: मेरी कामना बस यह है कि मैं बस जुड़ा रहूँ यहाँ से।

आचार्य प्रशांत: किससे जुड़ रहे हो?

प्रश्नकर्ता: आपसे।

आचार्य प्रशांत: तो मैं निकाल थोड़ी रहा हूँ आपको। समस्या क्या है?

प्रश्नकर्ता: समस्या यह है कि अब मैं उसको लेकर आऊँ कि नहीं लेकर आऊँ।

आचार्य प्रशांत: किसको लेकर आऊँ?

प्रश्नकर्ता: वाइफ़ को।

आचार्य प्रशांत: अभी तो बोला, मत लेकर आओ।

प्रश्नकर्ता: मम्मी बोलती हैं कि एक बार आचार्य जी से पूछो।

आचार्य प्रशांत: पहले आप समस्या बताओ साफ़।

प्रश्नकर्ता: सर, मदर ने आज बोला है कि आप पूछ के आइए आचार्य जी से।

आचार्य प्रशांत: पूछना क्या है? मैं मना करता हूँ? मुझसे पूछ के होता है क्या? वहाँ कहीं पर एक बटन लगा होता है, एप्रूव्ड बाय आचार्य जी? जो रजिस्टर कर ले, कर ले; मेरा क्या है।

समस्या बताइए पहले।

प्रश्नकर्ता: समस्या सर यही है कि अब मैं कुछ…।

आचार्य प्रशांत: आपका प्रमोशन हो गया है, कोई समस्या है?

प्रश्नकर्ता: नहीं सर, कोई समस्या नहीं।

आचार्य प्रशांत: आप गीता से जुड़े हुए हैं, कोई समस्या है?

प्रश्नकर्ता: बिल्कुल नहीं सर।

आचार्य प्रशांत: समस्या क्या है?

प्रश्नकर्ता: मैं सर कंसंट्रेट नहीं कर पा रहा हूँ।

आचार्य प्रशांत: क्यों नहीं कर पा रहे, समस्या बताइए?

प्रश्नकर्ता: क्योंकि वह मेरी टाँग खींचते रहते हैं।

आचार्य प्रशांत: टाँग कैसे खींचते हैं? वो तो दूर हैं।

प्रश्नकर्ता: सर उसी समय ऐप पर मैं सुन रहा हूँ आपको, फ़ोन आते रहते हैं।

आचार्य प्रशांत: तो फ़ोन तो आ रहा है, साइलेंट पर कर दीजिए, बंद कर दीजिए, कुछ कर दीजिए। समस्या क्या है? जब तक समस्या बताओगे नहीं ईमानदारी से, तब तक बात बनेगी नहीं।

प्रश्नकर्ता: कुछ फँसा हुआ है, सर। कुछ समझ में नहीं आ रहा।

आचार्य प्रशांत: ऐसे बोल रहे हो जैसे जानते ही नहीं क्या फँसा हुआ है। आठ महीने से सेक्स नहीं मिला होगा, और क्या है? इधर-उधर की बातें दुनिया भर की। यही?

प्रश्नकर्ता: नहीं, सर, ऐसा नहीं।

आचार्य प्रशांत: तो फिर रोमांटिक? मीठी-मीठी बातें नहीं करी आठ महीने से?

प्रश्नकर्ता: सर, छोटा बच्चा है उसको भी देखना है।

आचार्य प्रशांत: छोटा बच्चा कहाँ है?

प्रश्नकर्ता: वाइफ़ के साथ।

आचार्य प्रशांत: तो माँ के साथ है, ख़ुश है, आपको क्या समस्या है? साफ़-साफ़ समस्या बताइए, नहीं तो बात नहीं बनेगी।

प्रश्नकर्ता: बस मैं, सर आगे क्या करूँ, मुझे यह समझ नहीं आ रहा।

आचार्य प्रशांत: आगे क्या करें, चल तो रहा है जो चल रहा है। ऑफिस जाते हैं, वापस आते हैं। दौड़ो, पिक्चर देखो, मौज करो, रात में सेशन करो। समस्या क्या है?

प्रश्नकर्ता: शायद मैं ख़ुद ही समस्या बन गया हूँ।

आचार्य प्रशांत: नहीं नहीं नहीं, दार्शनिक नहीं मामला; व्यावहारिक रखिए। समस्या क्या है?

प्रश्नकर्ता: कई बार, सर, मैंने सोचा है कि कुछ मैं ही साइड हट जाऊँ तो फिर।

आचार्य प्रशांत: साइड हट जाऊँ माने क्या? प्रतीकों में बात मत करिए; व्यावहारिक समस्या बताइए। आपका पूरा दिन रहता है उसमें समस्या कहाँ पर आ रही है? यादें आती हैं?

प्रश्नकर्ता: हाँ, सर, ये है।

आचार्य प्रशांत: तो बोल क्यों नहीं रहे हो? गंदे-गंदे गाने सुनते हो न, “मोहब्बत भी ज़रूरी थी, बिछड़ना भी ज़रूरी था; मगर भटके तो याद आया भटकना भी ज़रूरी था।” सुनते हो न। बता क्यों नहीं रहे हो?

प्रश्नकर्ता: फ़िलहाल तो सर, आपके ए.पी. सजेस्टेड सॉन्ग हैं यूट्यूब पर, वही सुनता हूँ मैं तो।

आचार्य प्रशांत: अब तुम उसमें भी कुछ निकाल लेते होंगे, “तेरा मेरा प्यार अमर, फिर क्यों मुझको लगता है डर।” मैं तो अहम् और आत्मा की बात कर रहा हूँ, आप वहाँ कोई और बात कर रहे हो।

यह गुलाबी समस्याओं का कोई समाधान नहीं होता है। “वो मुझे याद आती है। उसकी छुप-छुप के तस्वीरें देखता हूँ। वो गाने सुनता हूँ, इसका कोई समाधान नहीं होता है।”

कुछ नहीं हो सकता इसका। सुन लिया करो गाने, इसका यही है।

प्रश्नकर्ता: कोशिश की सर मैंने, उसको काफ़ी बुक्स भी दी हैं पढ़ने के लिए।

आचार्य प्रशांत: वो तो चली गई है, अब क्या बुक्स भेज रहे हो। आपको नहीं स्वीकारा, आपकी बुक्स को स्वीकार रही हैं! होता है कभी ऐसा? किस मुग़ालते में हो?

फ़िल्मी बातें। वही पूरा का पूरा लोकधर्म भी क्या है, प्लीज़ैन्ट एक्सपीरियन्सेज़, द रोमैन्स ऑफ़ लोकधर्म। “फिर ऐसा होता है, फिर ऐसा होता है, फिर एक जोड़ी बनती है और उस जोड़ी में दोनों एक-दूसरे के लिए होते हैं।” क्या मतलब? कैसी बातें कर रहे हो यार! फिर वो बिछड़ जाती है, तो एक अलग स्टीरियोटाइप, एक अलग टेम्पलेट एक्टिवेट हो जाता है। उसमें शराब-वराब भी पी जाती है, गंदी-गंदी ग़ज़लें और ऐसे गाने सुने जाते हैं।

इसका क्या कोई समाधान देगा? तुम्हें अपनी ज़िंदगी ख़राब करनी है, समय नष्ट करना है तो कर लो। कितना भी इसमें समय लगा सकते हो। कोई अंत नहीं है।

कोई शारीरिक काम हो तो शरीर थक भी जाता है, मन तो अतल कुआँ है। उसमें कितना भी आप शायरी डाल दो, रोमांस डाल दो, भावनाएँ डाल दो, रील्स डाल दो; यही सब होता है। वो थोड़ी कभी भी भरता है।

और ये सब कितना प्रेडिक्टेबल है न। जिसको बहुत प्यार से घर ले आए होते हैं, जब वह चली जाती है छोड़-छाड़ करके और अपना रौद्र रूप दिखा देती है, तो फिर वो अलग आते हैं कि “वो तो कितने मासूम थे; क्या से क्या हो गए देखते-देखते।” और बार-बार सुन रहे हैं उस रील को लूप में, “क्या से क्या हो गए देखते देखते।” लगता है, बिल्कुल मेरे लिए ही तो गाई गई है। आपके लिए भी गाई गई है, वो पूरी मानवता के लिए गाई गई है, क्योंकि ये सबकी कहानी है, क्योंकि ये एक अनिवार्य दुष्चक्र है, जिसमें आप फँसोगे ही फँसोगे; आप जैसे पैदा होते हो। और जैसे ये पूरा सामाजिक ढर्रा है, तो इसलिए वो चीज़ें सब पर लागू हो जाती हैं।

हाँ, किसी पर पच्चीस की उम्र में, किसी पर पैंतालीस की उम्र में, किसी पर हो सकता है पचपन, पैंसठ, एक सौ पाँच की उम्र में। अभी तो आ रहा है, एक बड़े अभिनेता का चालीस साल के बाद अब भारत में उसका डिवोर्स हो रहा है।

उसमें मुँह लटकाने की क्या बात है? सबके साथ होना ही था। तुम्हारे साथ भी हो रहा था, ये मौत जैसी चीज़ है, तो होनी ही है इसमें क्या परेशान हो रहे हो? और परेशान हो सकते हो कितना भी, होना है तो हो लो। चुनाव की बात है कि कितना परेशान होना है। पर यह होना सबके साथ है।

जिनके साथ ऊपर-ऊपर से नहीं हो रहा, उनके साथ अंदर-अंदर से हो गया है। आप आठ महीने के वियोग में परेशान हो रहे हो, ऐसा भी हो सकता है कि एक ही घर, एक ही कमरे, एक ही बिस्तर में आठ साल से रहते हों, तो भी वियोग पूरा-पूरा हो। उनकी व्यथा और गहरी होती है। पर यह होना सबके साथ है, चाहे स्थूल, चाहे सूक्ष्म। इसमें कोई एक्सेप्शन नहीं होता। यह नियम है।

अब यह होने के बाद चाहे तो शायरी सुनो, चाहे तो गीता सुनो। वह आपका चुनाव है।

अच्छे काम में ज़िंदगी में डूबने का यही फ़ायदा होता है। यह जो भावनात्मक दलदल होती है न, यह खा जाएगी नहीं तो, कोई इससे नहीं बच सकता। और इंसान पैदा हुए हो, तो कोई ऐसा नहीं होगा जिस पर भावनाओं के ज़ख़्म न हों। कोई ऐसा हो ही नहीं सकता। ज़िंदगी इसलिए नहीं होती है कि आपको बहुत सुख देगी, ज़िंदगी तो ज़ख़्म ही देती है।

वो आपको सब टालते भी रहेंगे, यादें भी आती रहेंगी, जीना दुश्वार होता रहेगा। उसका एक ही तरीक़ा है, डट के काम करो, खूब थक जाओ, सो जाओ।

और काम के बाद भी ऊर्जा मिली है, तो रैकेट उठा के जाकर के फोड़-फाड़ दो। कोर्ट को भी, नेट को भी, सब तोड़-ताड़ दो। एकदम टूट जाओ, जाकर सो जाओ।

बाक़ी मजनूँ बनने का अलग मज़ा है, वो लुत्फ़ उठाना है तो उठाओ। मेरे ख़्याल से हीर राँझा का है, उसमें अभिनेता राजकुमार “यह दुनिया, यह महफ़िल, मेरे काम की नहीं।”

क्या ग़ज़ब का पिक्चराइज़ेशन है। अच्छा-ख़ासा आदमी बिल्कुल उसमें बाबा बन जा रहा है, एक गाने के अंदर-अंदर, पाँच मिनट के गाने में, उसका पूरा रूपांतरण हो जा रहा है। और चाहो तो वो सब भी कर सकते हो। ज़िंदगी तुम्हारी है, पूरी स्वाधीनता है, बर्बाद करना चाहो तो पूरी छूट है। क्यों भाई?

और ये मसले सबके साथ होते हैं। जो बोले नहीं हैं; मक्कार। हमें कैसे पता ये सब रील्स सुनी जाती हैं? सबके साथ होता है।

प्रश्नकर्ता: थैंक यू सो मच, सर।

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
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