
प्रश्नकर्ता: नमस्कार आचार्य जी। एक साल पहले आपका वीडियो मेरे सामने आया। आपको जब मेरे हस्बैंड ने मुझे दिया कि आपको इनको सुनना चाहिए। मैंने कहा, ‘नहीं, मुझसे नहीं सुना जाएगा, ये बहुत स्लो बोलते हैं और मतलब मेरे टाइप के नहीं हैं ये।’ वो वीडियो बार बार मुझे भेजते रहे और आफ्टर सिक्स मंथ, जब मेरे मन में बहुत द्वंद्व हो गया कि क्या हो रहा है मुझे समझ ही नहीं आ रहा, मैंने जब आपका वीडियो सुना, उसके बाद से लेकर आज तक मैंने किसी को नहीं सुना।
आपकी लर्निंग्स, टीचिंग्स मेरी लाइफ़ में आती रहीं और मेरे दो बच्चे भी हैं और मेरी एज 30 प्लस है। अब क्या होता है? मेरी बेटी है, ग्यारह साल की, उसने बोला कि, ‘आपने आचार्य जी को जब से सुनना शुरू किया आपका जीवन बिल्कुल कैसा हो गया, आप तो बिल्कुल एक्साइटेड ही नहीं रहती हो, न किसी से बात करती हो। हमेशा बुक्स पढ़ती रहती हो और लोग किटी पार्टी करते हैं। अभी आपकी एज ही क्या है? और जैसे आप सीख रही हो, वैसे हमें भी सिखा रही हो। न आप कभी यूट्यूब देखने देती हो ग़लत लोगों को।’
तो मेरे मन में बस यही रहता है कि पता नहीं मैं सही रास्ते पर हूँ कि ग़लत रास्ते पर। आज के समाज में जैसे ये मतलब बहुत एक्साइटेड जीवन लोग जी रहे हैं। ऐसा करना चाहिए, पार्टी करनी चाहिए। बट मुझे मेरे बच्चों से हमेशा यह मिलता है कि, ‘मम्मी, आप बहुत मतलब पीछे का जीवन जी रही हो।’
बस इसी में आपसे मार्गदर्शन चाहती हूँ। कैसे अपने जीवन को बेहतर बनाऊँ और मेरे साथ जो दो लोग, मेरे जो बच्चे हैं उनके जीवन को भी बेहतर बना सकूँ। और ख़ासकर जो मेरी बेटी है इस टाइम बच्चे मतलब बहुत ज़्यादा अट्रैक्शन के पीछे भागते हैं। मैं किताबें, बुक्स; आपकी मैंने इतनी सारी बुक्स खरीदी हुई हैं, मैं पढ़ती रहती हूँ। और जो मेरा बेटा है, उसका नाम यथार्थ है। जब मैं आपकी वीडियो सुनती हूँ, तो कहता, ‘अच्छा, आचार्य जी मेरा नाम लेते हैं।’ और रात को सोने से पहले आपकी वीडियो सुनता है। अभी वो तीन साल का है। पता नहीं मुझे उसे कितना समझ आता है। बट जब तक वो आपको नहीं सुनता, तब तक वो कभी सोता नहीं है।
बस उसने आपके लिए बस एक छोटा-सा मैसेज दिया है, अगर आपकी अनुमति हो तो?
‘अज्ञान के प्रकाश में, अंधे कर्म सब त्याग कर दो। निराश, निर्मम बनो, ताप रहित बस युद्ध होता। धन्यवाद आचार्य जी।’
आचार्य प्रशांत: यथार्थ, यथार्थ से जुड़ा हुआ है। तो आपको अब समस्या क्या है?
प्रश्नकर्ता: समस्या बस बेटी की है। वो अभी सिक्स्थ क्लास में है। वो मतलब बहुत ज़्यादा चीज़ों के पीछे, जैसे मेरी सिस्टर-इन-लॉ है, वो उसके साथ जाती है तो कहती है, ‘बुआ मेरे टाइप की है, पर आप मेरे टाइप की नहीं हो। आप मॉल-गोइंग पर्सन नहीं हो। आप कहीं जाती हो, बस आचार्य जी को सुनना शुरू कर देती हो, पता नहीं क्या हो आप!’
आचार्य प्रशांत: ये छठी क्लास में इतनी विद्या उसने सीखी कहाँ से?
प्रश्नकर्ता: यही आचार्य जी, ये यूट्यूब और ये सब चीज़ें। मतलब उनको यूट्यूब का इतना ज्ञान है, ये, ये, ये हो रहा है। वो कहती है, ‘आपको इन सब चीज़ों की नॉलेज नहीं है। आप मतलब बहुत ओल्ड-फ़ैशन हो, एस्थेटिक टाइप नहीं हो, यो यो टाइप नहीं हो।’ सुन के ये सारी चीज़ों पर बहुत ग़ुस्सा आता है। तो मुझे कभी कहती है कि, ‘जब आचार्य जी को सुन रही हो, तो शांत रहना चाहिए न। आप इतना अग्रेसिव क्यों हो जाती हो?’
आचार्य प्रशांत: चलिए सुनिए। ऐसी स्थिति अन्य लोगों के घरों में भी है, जहाँ पर घर के और लोगों के और आग्रह हैं कि ऐसे होना चाहिए, इसको सुनना चाहिए, यह करना चाहिए, ज़िंदगी के दूसरे ढंग होने चाहिए। किन-किन के घरों में ऐसी स्थिति है? बहुत लोगों के? सबके ही? बाप रे! ऊपर भी सभी। ठीक है।
वेदान्त की विधि याद रखिए, वेदान्त की विधि किसी को सत्य बताने की नहीं है। उपनिषदों का एक वाक्य बता दीजिए जो कहता हो, ‘यह रहा सत्य।’ कहीं है उपनिषद् में ऐसा? नहीं है न? सारी की सारी चेष्टा क्या है? झूठ को काटने की। झूठ को काटना है। तो आपको यह नहीं बताना है अपने घरवालों को या बेटी को कि आपको क्या पता है। बेटी आप पर जो अभियोग लगाती है, वो कुछ हद तक सही है। अगर वो कह रही है कि फलानी चीज़ का आपको नॉलेज ही नहीं है, फलानी चीज़ ट्रेंडिंग है और आपको नॉलेज नहीं है, तो यह कमजोरी है न आपकी।
झूठ का अगर ज्ञान नहीं होगा, तो झूठ की नेति-नेति कैसे करोगे? झूठ का अगर ज्ञान नहीं है, तो झूठ काटोगे कैसे?
जिनसे बात करनी है, आपको उनकी ज़िंदगी पता होनी चाहिए। आपको उनकी ज़िंदगी उनसे ज़्यादा पता होनी चाहिए। और फिर जब वो बात करें, तो कहिए, ‘लेट्स टॉक अबाउट योर लाइफ़। तुम मेरी ज़िंदगी के बारे में बात करना चाहते हो, मेरी ज़िंदगी कैसी है। मैं तुम्हारी ज़िंदगी के बारे में बात करना चाहता हूँ। तुम्हारी कैसी है?’
समस्या यह होती है कि आप उनकी ज़िंदगी से इतना कट चुके होते हो कि आपको होश ही नहीं होता, उनकी कैसी है। आप जानते ही नहीं हो, आपको पता होना चाहिए न। मैं रखता हूँ पता। जो कुछ भी ट्रेंडिंग है, मुझे उसका पता होता है। अगर मुझे उसका पता नहीं होगा, तो मैं उसको काटूँगा कैसे। और क्या पता, जो ट्रेंडिंग है, उसमें कहीं कोई हीरा-मोती ही छिपा हो, क्या पता। मैं पहले से ही पूर्वाग्रह क्यों रखूँ? और अगर छिपा होगा, तो मैं उसको सर झुका के स्वीकार भी करूँगा।
आध्यात्मिक होने का अर्थ यह थोड़ी होता है कि जो कुछ समसामयिक है, उसको पीठ दिखा दो। जो करंट है, कंटेंपरेरी है, उसका पूरा ज्ञान, नॉलेज आपको होना चाहिए। दुनिया में कहाँ क्या चल रहा है? टेक्नोलॉजी में कहाँ क्या चल रहा है? राजनीति में क्या हो रहा है? खेलों में क्या हो रहा है? विज्ञान में क्या हो रहा है? आपको इसकी पूरी समझ होनी चाहिए, ताकि जब आप बात करें, तो बिटिया को वो इंसाइट्स दे सकें उसी के क्षेत्र के बारे में जो उसके पास नहीं है; फिर वह कहेगी, “मम्मा इज़ इम्प्रेसिव।”
कोई मेरे पास आएगा और उसका इंटरेस्ट सॉकर में है, या टेनिस में है, या क्रिकेट में है, तो यक़ीन जानिए मैं उससे उपनिषदों की बात नहीं करने वाला। मैं अगर किसी टेनिस एंथूज़ियास्ट से बात करूँगा तो मैं सारी बात टेनिस में करूँगा और मैं टेनिस से उसको दिखा दूँगा कि वेदान्त क्या है।
अब बिटिया को अगर टेनिस में रुचि है और आप जानती ही नहीं कि डबल फ़ॉल्ट क्या होता है, तो आप ही करते रहोगे डबल फ़ॉल्ट। टेनिस के माध्यम से वेदान्त क्यों नहीं समझा सकते और उसे क्यों नहीं बता सकते कि, ‘देख, इंटरेस्ट तेरा है टेनिस में, लेकिन फिर भी टेनिस के बारे में तेरे पास गहराई नहीं थी, इंसाइट्स नहीं थीं। तेरा इंटरेस्ट है टेनिस में, पर इंसाइट मेरे पास थी टेनिस के बारे में।’ मेरे पास कैसे थी? वो पूछेगी, ख़ुद ही पूछेगी कि, “मम्मा, हाउ कम यू हैव सच इम्प्रेसिव इंसाइट इंटू दिस स्पोर्ट?” तब बोलिएगा।
प्रश्नकर्ता: जी आचार्य जी, वैसे मुझे चीज़ें पता रहती हैं और जब मैं उसको बोलती हूँ, तो कहती है, “ओ मम्मा! अब तो छुपा रुस्तम निकलीं। सब कुछ पता है आपको, फिर भी आप एक्सप्रेस नहीं करती हो।”
आचार्य प्रशांत: तो फिर समस्या क्या है?
प्रश्नकर्ता: मैं जो उसे समझाना चाहती हूँ कि जो ये सब ट्रेंडिंग है और ये सब चीज़ें हैं, इनसे दूर हट के किताबों की तरफ...
आचार्य प्रशांत: ऐसे थोड़ी कहते, अभी मैंने क्या बोला था, दमन?
प्रश्नकर्ता: नहीं करना है।
आचार्य प्रशांत: समझने का है। जो कुछ भी ट्रेंडिंग है, हम कह ही नहीं रहे बुरा है। न अच्छा है, ना बुरा है, हम बस जानना चाहते हैं कि वो क्या है।
अगर आपकी ऐसी छवि बन गई न बच्चों के सामने या घरवालों के सामने कि, ‘जो कुछ भी चल रहा है, ये तो हर चीज़ को बस कह देते हैं बुरा है, बुरा है, बुरा है,’ तो कोई आपसे बात ही क्यों करेगा फिर। क्यों आपसे बात करेगा? और किसने कह दिया कि जो कुछ भी चल रहा होता है दुनिया में सब बुरा ही चल रहा होता है? किसने कह दिया? हम तो कह रहे हैं, दस में से एक चीज़ बिल्कुल बहुत अच्छी और सुंदर भी हो सकती है। हर चीज़ को हम ऐसे ही कैसे कह दें कि ‘यह भी बुरा है, यह भी बुरा है, यह भी बुरा है।’
आपको सब कुछ पता होना चाहिए, ताकि आप उस पर एक निष्पक्ष बात कर सकें। जब आप वो निष्पक्ष बात करते हो, तो लोग आपकी बात सुनते हैं।
यह संवाद का, कम्युनिकेशन का एक नियम है। उसका जहाँ इंटरेस्ट हो, वहाँ से बात शुरू करो, अपनी बात मत करो।
मैं यहाँ आकर के आपको यूँ ही स्लाइड दिखाने लगूँ, ज्ञान देने लगूँ, तो आप कितनी देर तक मुझे सुनोगे? मैं यहाँ पर क्या कर रहा हूँ? मैं कह रहा हूँ, ‘अच्छा चलिए, थोड़ा हमने कर लिया निर्वाण षट्कम्, अब आप अपने मुद्दे बताइए।’ हम आपकी बात कर रहे हैं न? जब आपकी बात होती है, तो आप सुनते हो। और मैंने आप पर कोई नियम रखा है कि आप सिर्फ़ इसी क्षेत्र से बात करोगे? जिसका जिस तरफ़ से आ रहा है, वह बात कर रहा है। कोई पूछ रहा है कि इस क्लाइमेट चेंज के बारे में कोई बात कर रहा है। कोई कह रहा है, ‘मेरे घर में यह हालत है,’ उसकी बात कर रहा है। कोई कह रहा है कि विदेशी महिलाएँ आई हैं, उन पर भारतीय पुरुष ऐसे क्यों व्यवहार करते हैं? कोई पूछ रहा है, ‘वोट किसको दें?’
हर दिशाओं से, सब दिशाओं से सवाल आ रहे हैं न? तो इसीलिए यह वार्ता रुचिकर है, क्योंकि जिसका जिस मुद्दे को लेकर सवाल है, हम उसी मुद्दे पर बात कर लेते हैं। अपनी बिटिया के मुद्दों पर ध्यान दीजिए, उसकी ज़िंदगी के क्या मुद्दे हैं, उनमें घुसिए। और आपके भीतर यह हौसला, आत्मविश्वास, यह बोल्डनेस होनी चाहिए कि अगर वेदान्त में सचमुच सच्चाई है, तो मुद्दा कोई भी हो उसका समाधान वेदान्त है।
प्रश्नकर्ता: जी, धन्यवाद आचार्य जी।
प्रश्नकर्ता: नमस्कार आचार्य जी। मेरा नाम अनन्या शर्मा है। मेरा क्वेश्चन स्कूल से रिलेटेड था। जैसे कि अगर कोई मतलब सब टीचर्स के लिए नहीं, जैसे जो थोड़ी-सी खड़ूस-सी होती हैं, अगर मान लो वो ग़ुस्से के मूड में हों और अगर हम उन्हें दिख गए, तो वो हमको ज़बरदस्ती डाँट के बोलेंगी कि, ‘तुम यह क्या कर रहे हो?’ और अगर हम उन्हें बता दें, तो वो हमको उल्टा और डाँटने लग जाती हैं, जबकि उन्होंने ख़ुद ही पूछा हुआ होता है।
और कभी-कभार क्लास में कोई टॉपिक चल रहा हो और अगर क्वेश्चन पूछ दिया, तो उनको नहीं पता, तो वो हमको और डाँट देंगी कि, ‘ज़्यादा डीप जाने की ज़रूरत नहीं। पेपर में नहीं आएगा।’ और पेपर के बाद अगर मार्क्स उसमें किसी बच्चों के मतलब मोस्टली के नहीं आए, तो वह बोलेंगी कि, ‘मुझसे कोई पूछता ही नहीं है, मैं तो यहीं बैठी हुई हूँ।’
आचार्य प्रशांत: हमारे पास टेक्स्ट बुक्स होती हैं न, तो हम उनमें अच्छे से पढ़ेंगे कि क्या लिखा है। ठीक है? और उसके बाद हम फिर टीचर के पास जाएँगे। ‘हमने यह पढ़ा है।’ उससे होगा कि हमारी पढ़ाई तो अब बहुत आगे बढ़ ही गई, हमने पढ़ ही लिया। काफ़ी हद तक हमारी पढ़ाई पूरी ही हो गई, हमने पढ़ ही लिया। और उसके बाद जो बस डाउट्स बचेंगे, उनको ले हम टीचर के पास जाएँगे और फिर टीचर से पूछेंगे, बताइए। टीचर को अच्छा लगेगा।
और तब भी अगर टीचर नहीं बता पा रही हैं, वही वाली हैं, तो हमारा कोई बहुत नुक़सान भी नहीं हुआ, क्योंकि हमने तो अपने आप ही पढ़ रखा है। है न? ज़्यादा प्रॉबेबिलिटी यही है कि आप जब अच्छे से पढ़ाई करके टीचर के पास जाओगे, तो टीचर को अच्छा लगेगा। और वो ख़ुद चाहेंगी कि आपको और ज़्यादा बताएँ। ठीक है?
पहली चीज़ अपनी तरफ़ की है। हमें अपनी ओर से पढ़ाई पूरी करके रखनी है। ठीक है? उसके बाद फिर टीचर का काम आता है। हम अपनी तैयारी पूरी रखेंगे, टीचर्स पता नहीं न, टीचर स्टूडेंट से पूछ के तो क्लास को अलॉट होते नहीं। तो टीचर ऐसे भी आ सकते हैं, टीचर वैसे भी आ सकते हैं, टीचर कैसे भी आ सकते हैं। है न? हमारे पास क्या है? हमारे पास हमारी टेक्स्ट बुक है, हमारे पास हमारी इंटेलिजेंस है। तो हम अपनी पूरी इंटेलिजेंस और पूरा कंसंट्रेशन अपनी टेक्स्ट बुक में लगा देंगे और हम अपनी ओर से पूरी तैयारी रखेंगे। उसके बाद हम टीचर से कहेंगे, ‘अब आप भी हेल्प कर दीजिए।’ ठीक है? पहली हमारी ओर से।