ज्ञान ही डर को मस्ती में बदलता है। अज्ञान भय पैदा करता है, जबकि सही समझ भय दूर करता है। सच्चे मित्र बनाने की कोशिश करने के बजाय आत्म-अवलोकन अधिक आवश्यक है। कबीर साहब का संदेश है कि केवल किताबें पढ़ने से नहीं, बल्कि ज्ञान के प्रति प्रेम से जीवन बदलता है। मन स्वयं चंचल नहीं होता; हमारी इच्छाएँ और अस्थिरता उसे भटकाती हैं। शिक्षा का उद्देश्य केवल जानकारी जुटाना नहीं, बल्कि अपनी मान्यताओं पर प्रश्न करना और सत्य की खोज करना है।
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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, जब हमको पता है कि पेड़ से हमको साँस मिलती है, तो हम पेड़ क्यों काटते हैं?
आचार्य प्रशांत: हम बुद्धू हैं न। हमारे लिए जितनी अच्छी चीज़ें हैं, हम उनको सबको ख़राब कर देते हैं। और हमारे लिए जितनी गड़बड़ चीज़ें हैं, हम उनको सबको बढ़ा देते हैं, हम बुद्धू हैं। हम बस कहते रहते हैं कि हम इंटेलिजेंट हैं, होशियार हैं, लेकिन हम लोग बुद्धू हैं। हमें बुद्धू नहीं रहना है। ठीक है? तुम बड़े होकर बुद्धू मत रहना।
प्रश्नकर्ता: ज्ञान मस्ती माने क्या?
आचार्य प्रशांत: जब कुछ पता नहीं होता, तो डर लगता है। जैसे कि एक कमरा है और उसमें रैबिट हैं दो-तीन। वो खेल रहे हैं, मजे में खेल रहे हैं। कमरा बंद है, तुम्हें आवाज़ आ रही है रैबिट की, तो तुम्हें डर लगेगा कि क्या पता इसके अंदर भूत है, पता नहीं क्या है। डर लग सकता है न? क्योंकि तुम्हें क्या नहीं है? ज्ञान नहीं है।




