ज्ञान, मस्ती कैसे बन जाता है?

Acharya Prashant

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ज्ञान, मस्ती कैसे बन जाता है?
ज्ञान ही डर को मस्ती में बदलता है। अज्ञान भय पैदा करता है, जबकि सही समझ भय दूर करता है। सच्चे मित्र बनाने की कोशिश करने के बजाय आत्म-अवलोकन अधिक आवश्यक है। कबीर साहब का संदेश है कि केवल किताबें पढ़ने से नहीं, बल्कि ज्ञान के प्रति प्रेम से जीवन बदलता है। मन स्वयं चंचल नहीं होता; हमारी इच्छाएँ और अस्थिरता उसे भटकाती हैं। शिक्षा का उद्देश्य केवल जानकारी जुटाना नहीं, बल्कि अपनी मान्यताओं पर प्रश्न करना और सत्य की खोज करना है। यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, जब हमको पता है कि पेड़ से हमको साँस मिलती है, तो हम पेड़ क्यों काटते हैं?

आचार्य प्रशांत: हम बुद्धू हैं न। हमारे लिए जितनी अच्छी चीज़ें हैं, हम उनको सबको ख़राब कर देते हैं। और हमारे लिए जितनी गड़बड़ चीज़ें हैं, हम उनको सबको बढ़ा देते हैं, हम बुद्धू हैं। हम बस कहते रहते हैं कि हम इंटेलिजेंट हैं, होशियार हैं, लेकिन हम लोग बुद्धू हैं। हमें बुद्धू नहीं रहना है। ठीक है? तुम बड़े होकर बुद्धू मत रहना।

प्रश्नकर्ता: ज्ञान मस्ती माने क्या?

आचार्य प्रशांत: जब कुछ पता नहीं होता, तो डर लगता है। जैसे कि एक कमरा है और उसमें रैबिट हैं दो-तीन। वो खेल रहे हैं, मजे में खेल रहे हैं। कमरा बंद है, तुम्हें आवाज़ आ रही है रैबिट की, तो तुम्हें डर लगेगा कि क्या पता इसके अंदर भूत है, पता नहीं क्या है। डर लग सकता है न? क्योंकि तुम्हें क्या नहीं है? ज्ञान नहीं है।

जब ज्ञान नहीं होता, तो डर होता है। फिर तुमने कमरे का गेट खोल दिया। तो अंदर क्या थे? रैबिट, खरगोश। अब तुम भी उनके साथ खेल रहे हो, तो मस्ती हो गई न।

तो ज्ञान के साथ मस्ती आ जाती है और अज्ञान के साथ डर आता है।

जहाँ अज्ञान होता है, वहाँ बहुत सारा डर होता है। और जब ज्ञान होता है तो? जॉय होता है, मस्ती होती है। यही है ज्ञान मस्ती।

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मेरी मैम हमेशा फॉरेनर्स से ही प्यार से रहती हैं।

आचार्य प्रशांत: मतलब क्या है इसका?

प्रश्नकर्ता: मेरी मैम हमेशा फॉरेनर्स से ही प्यार से बातें करती हैं।

आचार्य प्रशांत: तो इंडियंस से नहीं करती?

प्रश्नकर्ता: नहीं, तो बिल्कुल नहीं।

आचार्य प्रशांत: इंडियंस से नहीं करतीं प्यार से?

प्रश्नकर्ता: नहीं।

आचार्य प्रशांत: हाँ तो फिर इंडियंस को अपने आप को और इतना अच्छा करना होगा कि हमसे सब प्यार से बात करें। और फिर कोई प्यार से बात करे कि नहीं करे, हमें फर्क भी नहीं पड़ेगा। जब हम सचमुच अच्छे हो जाते हैं न, उसके बाद अगर कोई हमें बुरा भी बोले, तो हमें फिर बुरा नहीं लगता।

प्रश्नकर्ता: और एक मेरा प्रश्न कि मेरे दोस्त क्यों नहीं बनते?

आचार्य प्रशांत: तुम दोस्त बनाने की कोशिश छोड़ दो। ठीक है? तुम बिल्कुल अच्छे से रहो, जिन्हें तुम्हारा दोस्त बनना होगा अपने आप बन जाएँगे।

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मैं एक दोहे का अर्थ पूछ सकती हूँ?

पोथी पढ़-पढ़ जग मुआ, पंडित हुआ न कोय, ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय।

~ कबीर साहेब

इसका मतलब क्या है?

आचार्य प्रशांत: इसका मतलब यह हुआ कि तुम्हें बहुत बड़ी भी चीज़ मिल गई अगर, लेकिन अगर तुम्हें उससे प्यार ही नहीं है, तो उस चीज़ को तुम अपने से दूर-दूर रखोगे। तो पोथी माने किताब। ठीक है? किताब से आपको बहुत अच्छा वाला ज्ञान मिल गया, लेकिन आपको उससे प्यार तो है नहीं, तो आप उसको अपने से दूर रखोगे। जब आपको यह किताब पसंद नहीं होती, तो आप क्या करते हो? उसको कहीं दूर रख आते हो। जब किताब पसंद होती है, तो ऐसे पकड़ के रखते हो। है न?

तो यह ज्ञान है, पोथी। ये पोथी में ज्ञान होता है। लेकिन जिनको ज्ञान से प्रेम ही नहीं, उन्हें ज्ञान मिल भी जाए, तो वो क्या करते हैं? वो ज्ञान को ऐसे दूर रखते हैं। जबकि ज्ञान तभी काम आता है, जब उससे प्रेम हो, जब ज्ञान को ऐसे रखा जाए (अपने सीने से किताब को लगाते हैं), जैसे रखा है। ऐसे रखोगे, तो फिर “ढाई अखार प्रेम का।” तो बहुत सारे ज्ञान के बाद एक छोटी-सी चीज़ और चाहिए होती है। क्या? प्रेम। लेकिन वो छोटी-सी चीज़ नहीं होगी, तो ज्ञान फिर काम नहीं आएगा।

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मेरा ये सवाल है कि ये मन क्यों आता है? हमारा मन इतना चंचल-सा होता है, ये एक जगह लगता क्यों नहीं?

आचार्य प्रशांत: बेटा, मन में जो होता है न, वही मन होता है। जो मन में होता है, मन वही होता है। तो मन में अगर दीवार है, तो मन क्या है? दीवार है। मन में अगर पैसा है, तो मन क्या है? पैसा है। मन ऐसी चीज़ है कि उसके अंदर जो है, वही है मन। मन की सामग्री ही मन है। समझे?

तो मन अपने आप में कुछ नहीं होता, जो आप डाल दोगे वही मन है। और डालने वाला कौन होता है? वो हम हैं।

मन में क्या होगा, उसका फैसला हम ही करते हैं। तो इसीलिए मन में जो भी लाएँ, वो थोड़ा सावधानी से लाएँ। ठीक है?

और क्या पूछा था? मन क्या होता है? उसके बाद क्या बोला था?

प्रश्नकर्ता: ये वाला, मन तो चंचल ही होता है।

आचार्य प्रशांत: मन चंचल नहीं होता। आप मन में कोई चीज़ डाल रहे हो, ताकि आपको उससे पीस मिले, शांति मिले। मन है, आप समझ लो, मन आपका एक घड़ा है। मन आपके पास एक बड़ी-सी टोकरी है, या बर्तन है, या पोटली है। आप मन में कोई चीज़ डालते हो, ताकि आपको शांति मिले। ठीक है? शांति मिलती नहीं, क्योंकि हमें पता ही नहीं सही चीज़ क्या डालनी है मन में। तो फिर हम उन चीज़ों को उलटते-पलटते रहते हैं। तो हम चंचल हैं। हम चंचल हैं, इसीलिए मन की सामग्री को हम लगातार बदलते रहते हैं।

मन नहीं चंचल है। अहम् चंचल है, मैं चंचल हूँ। और मुझे पता नहीं कि मन में सही चीज़ क्या रखनी है। तो कभी एक चीज़ रखता हूँ, फिर कहता हूँ, "अरे, ये चीज़ तो बेकार निकली।" तो अब मन में दूसरी चीज़ लेकर आओ, वो भी बेकार निकली। फिर तीसरी चीज़ लेकर आओ। ये मेरी चंचलता है।

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मैं आपको काफ़ी टाइम से सुन रही हूँ। मेरी लाइफ़ में, बहुत सारे चेंजेस आए हैं। और मैंने, मतलब, टाइम मैनेज करना सीख लिया। मैं ज़्यादातर सही चीज़ें चुनना-सीख चुकी हूँ।

थैंक यू सो मच, आचार्य जी।

आचार्य प्रशांत: वेलकम। मोस्ट वेलकम।

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, हम स्कूल क्यों जाते हैं?

आचार्य प्रशांत: “स्कूल क्यों जाते हैं?” स्कूल हमें जाना होता है, ताकि हम जैसा सोचते हैं, हम जिन बातों को मानते हैं, कोई उन बातों पर सवाल करे। हमें जो कुछ पता है, कोई हमें उससे आगे की बात बताए। नहीं तो हमें लगेगा कि हमें जो पता है, वही आख़िरी बात है। हमें लगेगा कि हम ही तो सबसे बड़े ज्ञानी हो गए। तो इसलिए पढ़ने जाते हैं, ताकि जो पता है, उस पर क्वेश्चन करें। देखें कि सही है कि ग़लत है, और फिर जो पता है उससे आगे का कुछ पता चले। इसलिए स्कूल जाते हैं।

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
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