एपस्टीन फ़ाइल्स: असली दोषी कौन?

Acharya Prashant

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एपस्टीन फ़ाइल्स: असली दोषी कौन?
तुम एक झूठी मान्यता में जीना चाहते हो कि इंसान बाय डिफॉल्ट होता तो अच्छा है, बस वो पावर उसको करप्ट कर देता है। पावर ने इंसान को नहीं करप्ट किया, इंसान पावर को करप्ट करता है। मौका देकर देखो, पूरी दुनिया की आबादी आ जाएगी एप्स्टीन फ़ाइल्स में। पर आप सारा दोष डाल दोगे व्यवस्थाओं पर, कुछ लोगों पर। बात उन व्यक्तियों की नहीं है। हमारी प्रजाति के मैन्युफैक्चरिंग डिफेक्ट की है — अहंकार। उसी डिफेक्ट को ठीक करने के लिए जो होता है, उसको बोलते हैं अध्यात्म, आत्मज्ञान। यह सारांश प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन के स्वयंसेवकों द्वारा बनाया गया है

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, नमस्ते। मेरा सवाल एप्स्टीन फ़ाइल्स के ऊपर है, जो आज मीडिया में एक सनसनीख़ेज़ ख़बर बनी हुई है। एक साधारण-सा टीचर, उसका, यू नो, अंतरराष्ट्रीय सेक्स-ट्रैफिकिंग जैसे केसों में उसका नाम आने लगता है, और वो भी माइनर गर्ल्स वग़ैरह इसमें इनवॉल्व्ड हैं। हालाँकि केस 2006 से मीडिया की ख़बरों में है पर अभी तक भी उस केस की पूरी तरह से परतें खुल नहीं पाई हैं। अभी जनवरी के लास्ट में डिपार्टमेंट ऑफ़ जस्टिस ने कुछ सार्वजनिक किए हैं, कुछ उस केस से जुड़े हुए डॉक्यूमेंट्स। कोई 30 लाख के आसपास पेजेस जारी किए गए हैं, 2000 के आसपास कुछ वीडियोज़ हैं और कोई 1,80,000 के आसपास कुछ फ़ोटोग्राफ़्स जारी किए गए हैं। इसमें जिन लोगों के नाम केस में जुड़े हुए आ रहे हैं, काफ़ी रसूख़दार नाम हैं।

आचार्य प्रशांत: ये सब काफ़ी सारी बातें मुझे पता हैं। सवाल क्या है? कोई बहुत आनंद नहीं आ रहा न ये सारी काली कहानी सुनने में, तो इसीलिए सवाल पर आइए।

प्रश्नकर्ता: इसमें पॉलिटिशियंस हैं, सेलिब्रिटीज़ हैं, बहुत सारे स्पिरिचुअल टीचर्स के नाम आ रहे हैं। मेरा सवाल इसमें, सर, ये है कि क्या इसमें मनी, पावर और सेक्स इन चीज़ों में कोई संबंध है क्या? जैसे एक कहावत भी है कि जिसके पास ज़रूरत से ज़्यादा पैसा हो जाता है, उसकी कहते हैं बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है। क्या इसमें उस तरह का कुछ आता है? आपसे जानना चाहता हूँ।

आचार्य प्रशांत: ये कहावत बेकार की है या सही, कि ज़रूरत से ज़्यादा पैसा हो जाए तो बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है। पैसा ज़रूरत से ज़्यादा हो, ज़रूरत के बराबर हो या ज़रूरत से कम हो, बुद्धि अगर ईगो से चल रही है तो बुद्धि भ्रष्ट होगी ही क्योंकि ईगो बाय डेफ़िनेशन भ्रष्ट होती है। पैसा आकर ईगो को भ्रष्ट नहीं कर देता, ईगो के हाथ में कम पैसा हो, वो तब भी भ्रष्ट होगी। वो कहेगी, “मेरे पास कम पैसा था, मैं इसलिए चोर हूँ। पैसा इतना कम था इसलिए मैंने चोरी की।” उसके पास ज़्यादा पैसा हो तो कहेगी, “मेरे पास इतना पैसा है, मुझे कौन पकड़ सकता है? इसलिए मैंने चोरी की।” तो वो भ्रष्ट होती ही होती है।

आपने किन तीन चीज़ों में रिश्ता जोड़ा था? मनी, सेक्स और *पावर?

प्रश्नकर्ता: मनी, सेक्स और पावर। बिकॉज़ इसमें जिस तरह के नाम आ रहे हैं वो ज़्यादातर वैसे ही हैं, मतलब जिनके पास…

आचार्य प्रशांत: रिश्ता मनी, सेक्स, पावर में बाद में है रिश्ता तीनों का उससे खोजो, जो इन तीनों के ही केंद्र में है। अगर ये एक त्रिभुज के कोने हैं, तो वो उस त्रिभुज का सेंटर है ट्रायंगल का सर्कमसेंटर है, क्या? अहंकार।

आप इन तीनों में रिश्ता खोज रहे हो, कि मनी का रिलेशन सेक्स से है, सेक्स का रिलेशन पावर से है, पावर मनी से आता है। आप इस तरह का रिश्ता खोज रहे हो। और इस तरह का रिश्ता खोजने में जो असली चीज़ है आप उससे चूके जा रहे हो। असली चीज़ ये है कि इंसान वही जीव है जो हालिया ताज़ा-ताज़ा जंगल से निकला है, भीतर उसके हर तरीक़े का अंधेरा और स्वार्थ बैठा हुआ है। उस अंधेरे के हाथ में अगर पैसा आएगा तो वो पैसे के माध्यम से लोगों का शोषण करेगा। उस अंधेरे के हाथ में अगर ताक़त आएगी तो वो ताक़त के माध्यम से लोगों का शोषण करेगा, शोषण तो वो करेगा ही करेगा।

क्योंकि शोषण उसे करना था, अगर वो शोषण नहीं कर रहा, तो इसका मतलब ये नहीं कि वो अच्छा आदमी है। इसका मतलब बस ये है कि अभी उसको सामर्थ्य नहीं मिली है, ताक़त नहीं आई है। जिसके भी हाथ में ताक़त दे दोगे वो यही सब कुछ करेगा। मुझको तो ये नहीं समझ में आता कि आप इन चीज़ों को स्कैंडल क्यों मान रहे हो? इसमें स्कैंडल क्या है? जो हो रहा है, वो हर गली, चौराहे, नुक्कड़, मोहल्ले, समाज और घर के अंदर भी तो हो ही रहा है न। पर जहाँ जितनी सामर्थ्य होती है उसी अनुपात में होता है।

घर के अंदर जो ताक़तवर होता है उसके पास बहुत ज़्यादा ताक़त होती ही नहीं क्योंकि वो एक साधारण घर का साधारण आदमी है, तो वो अपनी ताक़त के अनुसार शोषण कर लेता है। फिर जिले में जो ताक़तवर होता है, बाहुबली होता है उसके पास ज़्यादा ताक़त होती है, तो वो ज़्यादा शोषण कर लेता है अपनी ताक़त के हिसाब से। फिर जो पूरे देश का सबसे बड़ा सेठ होगा उसके पास और ताक़त होगी, तो वो अपनी ताक़त के हिसाब से करेगा। जो राष्ट्रपति वग़ैरह होंगे दुनिया में, उनके पास और होगी ताक़त तो वो अपनी ताक़त के हिसाब से करेंगे। इसमें चौंक क्या रहे हो इतना? और पूरी दुनिया इसमें क्यों अचंभे में है कि अरे, बड़ा बुरा हो गया, बड़ा बुरा। क्या बुरा हो गया? जो हो रहा है, वो हर जगह हो रहा है और सदा से हो रहा है। इसमें चौंक क्यों रहे हो?

चौंक इसलिए रहे हो क्योंकि तुम एक झूठे सपने में जीना चाहते हो। तुम एक झूठी मान्यता में जीना चाहते हो कि इंसान बाय डिफ़ॉल्ट होता तो अच्छा है बस पावर उसको करप्ट कर देता है। कहावत भी चलती है न, *पावर करप्ट्स, एंड एब्सोल्यूट पावर करप्ट्स एब्सोल्यूटली। पावर गंदी चीज़ है, पावर ने करप्ट कर दिया।

नहीं, पावर ने इंसान को नहीं करप्ट किया, इंसान पावर को करप्ट करता है। मनी ने इंसान को नहीं करप्ट किया, इंसान मनी को करप्ट करता है। सेक्स ने इंसान को नहीं करप्ट किया, इंसान सेक्स को करप्ट कर देता है।

पर आप सारा दोष डाल दोगे व्यवस्थाओं पर, सारा दोष डाल दोगे कुछ लोगों पर। उन्हीं लोगों पर दोष डल भी रहा है। पचास, सौ, दो सौ लोगों के नाम आ गए हैं, अब दुनिया भर में उन पर छीछालेदर हो रही है, जैसे कि बाक़ी सब दूध के धुले बैठे हों।

सब कह रहे हो, “ये भी गंदा आदमी निकला। हॉ! ये भी गंदा आदमी निकला, हॉ! और ये भी।” और जो “हॉ-हॉ” कर रहा है, वो ख़ुद कैसा आदमी है? तुझे भी उतनी पावर मिली होती, तो तू उससे भी ज़्यादा गंदा आदमी निकलता।

अगर आम मध्यमवर्गीय आदमी किसी क़द्र अपने आपको अच्छा घोषित कर ले रहा है, तो उसकी वजह ये नहीं है कि वो अच्छा है, उसकी वजह ये है कि उसको बुरा होने का मौका नहीं मिल रहा है। जिस दिन तुम उसे मौका दे दो, ताक़त दे दो, फिर उसकी हवस देखो, उसकी दहशत देखो, उसकी पशुता देखो, उस दिन देखना। जेलों में तो बस वो क़ैद हो जाते हैं जो पकड़ में आ जाते हैं बाक़ी सब तो इज़्ज़तदार कहलाते हैं न।

आप कहेंगे, नहीं, हर आदमी थोड़ी गुनहगार होता है। हाँ, बिल्कुल, हर आदमी ने गुनाह किया नहीं है। पर इसलिए नहीं कि वो अच्छा आदमी है। इसलिए कि डरा हुआ था, कि गुनाह करूँगा तो पीटा जाऊँगा इसलिए गुनाह नहीं किया। और कई बार गुनाह सिर्फ इसलिए नहीं किया क्योंकि गुनाह करने का अनुकूल मौका नहीं मिला। मौका देकर देखो, पूरी दुनिया की आबादी आ जाएगी एप्स्टीन फ़ाइल्स में। जितना पैसा उन लोगों के पास था और जितनी ताक़त उन लोगों के पास थी जिनके नाम सामने आ रहे हैं, उतना पैसा, उतनी ताक़त आम आदमी को देकर देखो, वो क्या करता है। तो इसमें चौंकने की कोई बात नहीं है। इसमें ऐसा नाटक करने की कोई बात नहीं है कि बाक़ी सब दुनिया के लोग तो अच्छे हैं, बस ये अमीरज़ादे ही नालायक होते हैं।

हमारी जो प्रजाति है, वो अहंकार से चलती है। इस मायने में मनुष्य की प्रजाति बाक़ी सब प्रजातियों से विशिष्ट है। बाक़ी सब प्रजातियाँ प्रकृति पर चलती हैं, प्रकृति पर। उनका अहंकार विकसित ही नहीं हुआ होता बहुत ज़्यादा। आप नहीं कह पाओगे कि दो साँप हैं, एक अहंकारी साँप है और एक निरहंकारी साँप है। उन दोनों का चाल-चलन, प्रकृति, प्रक्रियाएँ, सब लगभग एक जैसी होंगी। उनके पास अहंकार अगर है भी तो बिल्कुल एकदम राई-बराबर। विकसित ही नहीं हुआ अहंकार, तो वो प्रकृति पर ही चलते रहते हैं। मनुष्य अकेली प्रजाति है जो अहंकार पर चलती है, इसीलिए बहुत-बहुत घातक है।

तुम्हें बड़ा अजीब लग रहा है कि अरे, छोटे बच्चों के साथ क्या कर दिया! छोटे बच्चों के साथ तो हर घर में बुरा ही हो रहा है न। तब बुरा नहीं लगता? अरे, मार भी देते थे बलात्कार करने के बाद। और कुछ तस्वीरों में, वीडियो में आ रहा है कि मांस खाया जा रहा है, काट के। अरे, जो आदमी जानवर को रोज़ काट-काट के खा रहा है। 800 करोड़ की तुम्हारी दुनिया की आबादी और 800 करोड़ से कई गुना जानवर रोज़ मारता है इंसान, रोज़ मारता है। तुम एक मेमने को देखो, एक मुर्गे को देखो, एक खरगोश को देखो, उसके मांस को देखो। बच्चे, जैसा नहीं है क्या?

जब इंसान उनके मांस को फाड़ सकता है, तो फिर छोटे बच्चों के मांस को भी फाड़ दिया न। तुम कहोगे, ये अतिशयोक्ति है। ये तो अजीब बात है कि आप मांसाहार और मोलेस्टेशन, पेडोफिलिया को एक ही श्रेणी में रख रहे हैं। हाँ, मैं एक ही श्रेणी में रख रहा हूँ, क्योंकि केंद्र एक ही है उस हिंसा का। जो अपने से कमज़ोर मिला, उसको फाड़ दिया, मार दिया, खा लिया। यही तो है न। सिद्धांत तो यही है न, अपने से कमज़ोर है तो उसको खा जाओ। शेर का मांस थोड़ी खाते हो, बाघ का मांस थोड़ी खाते हो, पोलर बियर का मांस थोड़ी ही खाते हो। बछड़े को मार देते हो, मेमने को मार देते हो, मुर्गे को मार देते हो, खरगोश को मार देते हो, सूअर को मार देते हो, क्योंकि वो कमज़ोर है। तो वही सब तो हो रहा था उस एप्स्टीन आइलैंड पर।

क्या नाम था आइलैंड का? नाम ही क्या था उसका एक आइलैंड का ही पूरा नाम दिया है न।

श्रोता: वर्जिन आइलैंड।

आचार्य प्रशांत: वर्जिन आइलैंड। और वहाँ उसका जहाज़ था, लोलिता एक्सप्रेस। लोलिता जानते हो न? एक कहानी की एक पात्र है, अंडरएज लड़की, लोलिता। उसके नाम पर उसने नाम रखा था। उसी से वो सारे वीआईपीज़ को ले-लेकर अपने आइलैंड पर जाता था और वहाँ पर जो भी।

उसके आइलैंड पर, ये सब हो रहा था तो तुमको बड़ा झटका लग गया। और घर-घर में भी तो यही हो रहा है, तब झटका नहीं लगता? हर घर में यही हो रहा है, तब तुम्हें झटका नहीं लगता? अंडरएज लड़की ही सबसे कम सुरक्षित मालूम है पूरी दुनिया में कहाँ होती है? अपने घर में। चौदह, सोलह, सत्रह साल की लड़कियों का मोलेस्टेशन हो रहा है। दुनिया भर में लड़कियाँ सबसे कम सुरक्षित अपने घर के अंदर होती हैं। पर आँकड़े सामने नहीं आ पाते, क्योंकि वो कैसे नाम ले लें, अपने बाप का, भाई का, ताऊ का, मौसा के लड़के का, मौसा के लड़के के चचेरे भाई का और ख़ुद मौसा का? कितनों का नाम लें लड़कियाँ?

तो आपको लगता है घर के अंदर सुरक्षित हैं, वो तो एप्स्टीन आइलैंड में उन बेचारियों के साथ बुरा हो गया। वहाँ वही हो रहा था जो घर-घर में हो रहा है। और घर-घर में नहीं हो रहा होता, तो वहाँ भी नहीं हो रहा होता।

सबसे बड़ा पाखंडी न, आम आदमी ख़ुद होता है। पर उसको बड़ा मज़ा आता है कि वो नेताओं पर, सेठों पर और बाबाओं पर उँगलियाँ उठा दे। कहता है, ये सब दोषी हैं क्योंकि इनके पास सत्ता है, धन है, पहुँच है। तो ये लोग दोषी हैं। नहीं, वो दोषी होंगे बाद में, सबसे बड़ा पाखंडी और सबसे बड़ा दोषी आम आदमी ख़ुद है।

आम आदमी दुनिया का ढंग का होता, तो ये एप्स्टीन कांड में जितने गुनाह हुए हैं, वो गुनाह होने नहीं पाते।

हाँ, सेंसेशनल हो जाता है मामला। क्या आप बता रहे थे? डेढ़ लाख, पाँच लाख तस्वीरें आ गई हैं और इतने-इतने लाख पन्नों के दस्तावेज़ सामने आ गए हैं, और ये हो गया। बड़ा सेंसेशनल लगता है। दुनिया भर की मीडिया लगी हुई है यही कवर करने में। बड़ा सेंसेशनल लग रहा है बड़ा। ये सेंसेशनल लगना भी कहीं एंटरटेनमेंट तो नहीं? कहीं ऐसा तो नहीं कि एप्स्टीन न्यूड्स की गूगल ट्रेंड्स में बिल्कुल स्पाइक आ गई हो? कहीं ऐसा तो नहीं? जब भी कभी कोई बड़ा रेप केस होता है, भले ही वो रेप एंड मर्डर केस हो, गूगल सर्च में स्पाइक आती है, गूगल इमेज सर्च में, गूगल वीडियो सर्च में।

लोग देखना चाहते हैं कि वो बलात्कार कैसे हुआ था। भले ही बलात्कार के बाद लड़की को मार दिया गया हो, पर लोग देखना चाहते हैं, हुआ कैसे था? हुआ कैसे था? पता है उसकी मौत हो गई, पर मुझे वो सेंसेशनल रेप का वीडियो देखना है। लगभग पोर्न की तरह इस्तेमाल करना है उसको। ये है आम आदमी। पर सज़ा मिलेगी सिर्फ़ बलात्कारी को। बलात्कारी को तो मिलनी ही चाहिए सज़ा, ये आम आदमी अपने आप को सफ़ेदपोश कैसे घोषित कर देता है?

आम आदमी माने कौन? आम आदमी माने, हर आदमी के भीतर बैठा वो, जिसको ईगो सेल्फ कहते हैं। अहंकार। अहंकार माने घमंड नहीं होता। अहंकार माने, “मैं” का भाव। हमारी स्पीशीज़ में एक मैन्युफ़ैक्चरिंग डिफेक्ट है। अहंकार को मैं एरर बोला करता हूँ, वो मैन्युफ़ैक्चरिंग डिफेक्ट हर बच्चे में जन्म से ही होता है। ये बड़े दुख की बात है, जन्म से डिफेक्ट है। पर एक अच्छी बात भी होती है, उम्मीद की। वो डिफेक्ट ठीक किया जा सकता है। लेकिन फिर एक और बुरी बात आ जाती है, उस डिफेक्ट को ठीक करने में घर का, परिवार का, शिक्षा का, व्यवस्था का, समाज का, मीडिया का, कोई इंटरेस्ट नहीं है।

आपको सब कुछ पढ़ाया जाता है, पर अपने इस डिफेक्ट को कैसे ठीक करना है, ये नहीं पढ़ाया जाता। आपकी परवरिश में, आपकी शिक्षा में, आपकी धार्मिक व्यवस्था में आत्मज्ञान के लिए कोई जगह नहीं है। तो वो डिफेक्ट बना रह जाता है भीतर। जब वो डिफेक्ट बना रह जाता है, तो फिर उससे हर तरह का भ्रष्टाचार होता है, हिंसा होती है, शोषण होता है, सब होता है। अब ताज्जुब क्यों हो रहा है?

और सुनो, जब इतना गिना ही रहे थे। ये जितने लोगों के नाम इसमें आ रहे हैं, जानते हो वो कौन हैं? वो हैं, जिनको पूजा है आपने। वो बड़े लोग कैसे हो गए? क्योंकि उनके सामने करोड़ों छोटे लोग झुके थे। इन करोड़ों छोटे लोगों ने झुक-झुक के ही उनको बड़ा आदमी बनाया। आज उन बड़े लोगों के नाम एप्स्टीन फ़ाइल्स में आ गए हैं, तो आप भौचक्के हो। उनको बड़ा बनाया किसने है? और आज भी आप ही उनको पूज रहे हो। और इतना ही नहीं, जो आपका पूज्य होता है, उसका नाम भले ही उस फ़ाइल में आ गया हो, तो भी आप अनदेखा कर रहे हो।

पॉलिटिशियंस का नाम आया है। इतने पॉलिटिशियंस का नाम आया है, पर उन पॉलिटिशियंस के जितने फ़ैन-बॉयज़ हैं, और उनके जो फ़ॉलोअर्स हैं, और उनके जो फ़ैन्स हैं, जो भक्त हैं, वो थोड़ी-बहुत जिज्ञासा कर रहे हैं कि ये मेरे आदर्श, ये मेरे महापुरुष, इनका नाम वहाँ कैसे आ गया? क्योंकि जैसे वो महापुरुष, वैसे ही उन महापुरुषों के चेले। वो चेले इतने सड़े हुए हैं कि उन्होंने जो सबसे सड़ा हुआ था, उसको ही अपना महापुरुष बना लिया। और ये बात अभी आई गई हो जाएगी अभी महीने-दो महीने में या साल-दो साल में, फिर से ये जितने लोग थे जिनके नाम आ रहे हैं, ये फिर से सार्वजनिक मंचों पर दिखाई देंगे। ये फिर से स्कूलों, कॉलेजों, यूनिवर्सिटीज़ में बुलाए जाएँगे। कॉन्वोकेशन फ़ंक्शंस में ये मुख्य अतिथि बनेंगे। ये अगर पॉलिटिशियंस होंगे अगर तो फिर से चुनाव लड़ेंगे, और आप ही जैसे लोग इनको फिर से वोट भी दोगे।

आप ये थोड़ी कहोगे कि ये बिज़नेसमैन है, ये ये सब काम कर रहा था मैं इसका प्रोडक्ट खरीदना बंद कर दूँगा। आप ही हो जो उसका प्रोडक्ट अभी भी खरीदोगे। आप ही हो जो उसका शेयर अभी-अभी खरीदोगे। दूसरों पर उँगली मत उठाओ। हमारी प्रजाति ही गड़बड़ है। देखो, हमने पृथ्वी ग्रह का क्या कर दिया। हम खा गए ना पूरे प्लैनेट को? हमारी प्रजाति ही गड़बड़ है, मैन्युफ़ैक्चरिंग डिफेक्ट है। और उस डिफेक्ट को ठीक करने में भी हमारी कोई रुचि नहीं है, यद्यपि वो ठीक किया जा सकता है। हमारे पास साधन मौजूद हैं, हमारे पास ज्ञान मौजूद है कैसे ठीक करना है। पर हम चाहते ही नहीं कि वो ठीक हो, क्योंकि उस डिफेक्ट के साथ हमारे स्वार्थ जुड़े हुए हैं।

प्रश्नकर्ता: अभी जो, सर, आपने बात बोली, इन लोगों का, मैं कुछ सोशल मीडिया पर या ऑनलाइन मीडिया में देख रहा था, तो इनकी जो पीआर एजेंसिज़ हैं, कुछ-कुछ बिज़नेसमैनों की, वो बहुत एक्टिव हो रखी हैं। तो उसके ऊपर कुछ-कुछ ख़बरें आने लगी हैं कि।

आचार्य प्रशांत: हाँ-हाँ, तुम्हें मालूम है एप्स्टीन जब मरा था 2019 में जेल में, अजीब बात। कोई भारत की जेल नहीं है, किसी अफ़्रीका के पिछड़े हुए देश की बनाना रिपब्लिक की जेल नहीं है। कहाँ की जेल है? अमेरिका की। अमेरिका में भी न्यूयॉर्क की? न्यूयॉर्क की। कह रहे हैं, सीसीटीवी उस दिन डिस्फ़ंक्शनल हो गया, तो पता नहीं चला कैसे मर गया। “अच्छा, तो गार्ड्स ने नहीं देखा होगा।” गार्ड्स का ध्यान इधर-उधर था, कुछ सो रहे थे, तो उन्होंने भी नहीं देखा कैसे मर गया।

ये कोई आज का मसला नहीं है, ये एप्स्टीन का जो पूरा खेल है ये बीस साल पुराना है। और बहुत लंबे समय तक उस पर मुक़दमा चला, एक बार बरी हुआ। जब बरी भी हुआ, तो भी सामने बिल्कुल ज़ाहिर था कि वो स्ट्रेटेजिक एसेट है, इसलिए उसको बरी कराया गया है। बरी, माने B-U-R-Y नहीं, बरी (रिहा)।

बहुत साफ़ था कि जुडिशरी, न्यायपालिका पर दबाव डाल के उसको छुड़वाया गया था। फिर ख़ैर, दोबारा वो अरेस्ट हो गया। जब दोबारा अरेस्ट हुआ तो जेल में ही उसकी बिल्कुल एकदम मौत हो गई। किसने उसको मरवाया? खोजबीन करने की भी क्या बहुत ज़रूरत है? दुख की बात ये है कि हम सब जानते हैं किसने मरवाया, उसके बाद भी जिन्होंने मरवाया हम उन्हीं के आशिक़ बने बैठे हैं। तो बताओ, इसमें दोष किसको दें? तुम रसूख़दार-रसूख़दार कर रहे थे, सत्तासीन लोग, बलशाली लोग, उनको दोष दें या आम आदमी को दोष दें?

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, जैसे सीनेट उनका हियरिंग कमेटी होता है यूएस में, कांग्रेस में। तो उसमें जो एफबीआई है, इन्वेस्टिगेशन एजेंसी है, उसके डायरेक्टर का एक कमेटी के सामने इंटरोगेशन हो रहा है। तो उसमें भी सवाल-जवाब के बहुत सारे वीडियोज़ रिकॉर्ड होते हैं, तो ऑनलाइन आते रहते हैं।

तो उसमें भी वो कन्वर्सेशन देखते हैं, तो ऐसा लगता है जैसे दो पॉलिटिकल ओपोनेंट्स हैं, जो एक-दूसरे पर बैठ के छींटाकशी कर रहे हैं। उसमें भी जो उस केस से जुड़े हुए सवाल हैं, जो तथ्य हैं, उनके ऊपर डिस्कशन नहीं हो रहा अभी भी। एफबीआई डायरेक्टर उनके ऊपर छींटाकशी कर रहा है, जैसे वो कोई पॉलिटिकल स्पीक अथॉरिटी है और एक पॉलिटिकल एंटिटी की तरह बात कर रहा है।

आचार्य प्रशांत: ये सब बहानेबाज़ी है। अगर इसकी जड़ तक पहुँच गए, तो दुनिया में जितनी व्यवस्थाएँ चल रही हैं, सब गिर जाएँगी: आर्थिक व्यवस्था, राजनीतिक व्यवस्था, शैक्षणिक व्यवस्था, पारिवारिक व्यवस्था, धार्मिक व्यवस्था, सब गिर जाएँगी। कोई इसकी जड़ तक पहुँचना नहीं चाहेगा। कोई किसी बात की जड़ तक नहीं पहुँचना चाहता।

आप एक छोटी-सी छोटी बात की अगर सचमुच जड़ तक पहुँच जाओ, तो इस दुनिया में जितनी व्यवस्थाएँ चल रही हैं न, सब गिर जाएँगी। क्योंकि सारी व्यवस्थाएँ हमारे उसी डिफेक्ट की बुनियाद पर खड़ी हैं, अहंकार, द ईगो सेल्फ।

यहाँ की एक भी व्यवस्था ऐसी नहीं है जो मनुष्य के कल्याण के लिए हो। वो बनी ही है मनुष्य को झांसा देने के लिए, और स्वयं मनुष्य द्वारा ही बनाई गई है। माने, स्वयं को ही झांसा देने के लिए।

अभी तो जो आपके सामने आ रहा है, वो सब क्यूरेटेड, सैनिटाइज़्ड वर्ज़न है। बहुत सारा तो सामने आया भी नहीं है। और उसकी एक सहयोगी होती थी, कुछ नाम है उसका, वो तो अभी ज़िंदा है। वो जेल में है।

प्रश्नकर्ता: मैक्सवेल।

आचार्य प्रशांत: हाँ, वो तो न जाने कितने राज़ लिए बैठी होगी। अगर सचमुच पर्दाफ़ाश किया जाए, तो पता नहीं क्या-क्या सामने आ सकता है। पर वो सब सामने अगर आ गया, तो ये दुनिया वैसी बचेगी ही नहीं जैसी ये है। आप कहाँ जाकर मुँह छुपाओगे? इस हमाम में सब नंगे हैं। कोई नहीं बचेगा। और अंततः बात आम आदमी पर आएगी। तुम ख़ुद को ही कैसे मुँह दिखाओगे कि मैं आज तक किसको भगवान बनाकर पूजता रहा, ये आदमी तो ऐसा था।

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, इसमें एक और एक अज़म्प्शन है। जैसे वेस्ट के बारे में, वहाँ की जुडिशरी के बारे में, हम लोगों को यहाँ लगता है कि नहीं, बहुत ट्रांसपेरेंसी है, स्पीड है। ये केस 2006 से चल रहा है और 2006 से अब 2026 आ गया। अभी भी उस केस में वही पॉलिटिकल गिमिकिंग, इधर से उधर, ये सब चल रहा है। आई मीन, एक्शन के तल पर देखते हैं तो ऐसा लगता है कि नहीं-नहीं उधर तो बहुत ट्रांसपेरेंसी होगी, फ़ास्ट होगा। हमारे इधर ही थोड़ा-सा स्लो है। बट एक सर्टेन लेवल पर जाकर वो सब एक जैसे ही दिखते हैं।

आचार्य प्रशांत: सर जी, ईस्ट ऑर वेस्ट, अहंकार इज़ द बेस्ट। क्या फ़र्क़ पड़ता है? इंसान तो इंसान है न, होमो सेपियंस ही तो हैं। ऊपर-ऊपर अंतर होते हैं नीचे-नीचे सब एक जैसे हैं। कहा था, “फॉर ईस्ट इज़ ईस्ट, एंड वेस्ट इज़ वेस्ट, एंड नेवर द ट्वेन शैल मीट।” गलत कहा था। ईस्ट, वेस्ट, सबकी जड़ एक है। क्या नाम है उसका? अहंकार। ऊपरी मुद्दे अलग-अलग हो सकते हैं। नीचे-नीचे तो इंसान है, भाई। वही वासना, वही हवस, वही अज्ञान, वही शोषण, जो कमज़ोर है उसको खा जाओ, फाड़ डालो। वोटर को धोखा दो, कस्टमर को धोखा दो, भक्तों को धोखा दो।

अच्छा, ये बताओ, ये जो आउटरेज चल रही है सारी, ठीक है? अब कोई है जो जाकर, कोई मान लो इंडस्ट्रियलिस्ट है, बड़ा वाला कैपिटलिस्ट है, बहुत सारे उनके नाम आए हैं, आए हैं न? और वो ट्विटर पर जाकर उनको खूब गाली वाली दे रहा है। ये कर रहा है, वो कर रहा है, “मिल जाए तो मार दूँगा! इतने गंदे लोग, छी-छी-छी!”

और तभी उसको एक फोन आए। तभी उसको फोन आए, “मैं एक्स-वाय-ज़ी कंपनी के एचआर डिपार्टमेंट से बोल रही हूँ।” और एक्स-वाय-ज़ी कंपनी किसकी है? उसी की है, जो बच्चों और कम उम्र की लड़कियों को फाड़ता पकड़ा गया है। उसी की कंपनी के एचआर से फोन आया कि “मैं आपको फोन कर रही हूँ, और आप जितनी सैलरी पर काम कर रहे हैं, उससे 10% हाइक दूँगी।” यही कूदता-फाँदता पहुँच जाएगा, बस उस 10% के लिए। सौ रुपए में बिकता है आदमी, भाई। दुनिया भर में देखते नहीं हो क्या चल रहा है? इंसान, ज़मीर, वोट, आशिकी, सबकी खरीद-फ़रोख़्त।

तो ये आउटरेज भी बस इसीलिए है कि अभी अपना कोई स्वार्थ फँसा नहीं हुआ है। जैसे ही 10% की हाइक मिलेगी, वैसे ही सब बदल जाएगा। वैसे ही कहना शुरू कर दोगे, “पर इंसान तो गलतियों का पुतला होता है। गलतियाँ किससे नहीं होतीं? क्षमा ही परम धर्म है। और ये भी तो देखना चाहिए कि उस महामानव सेठ ने कितने लोगों को रोज़गार दे रखा है। क्या हम इस बात की बिल्कुल क़द्र नहीं करेंगे कि वो एक महान एम्प्लॉयमेंट जेनरेटर है? क्या हम इस बात की बिल्कुल क़द्र नहीं करेंगे कि इतने सारे देशों को उन्हीं राष्ट्रपतियों और प्रधानमंत्रियों ने तो चला रखा है, जिनकी सब करतूतें अभी सामने आ रही हैं? अगर ये सब महामानव न होते राष्ट्रों के अध्यक्ष, तो वो राष्ट्र कब के बिखर गए होते। अतः इनकी ये छोटी-मोटी मानवीय भूलें हमें माफ़ कर देनी चाहिए। लाना बेटा, 10% की हाइक देना।”

ये हमारी दुनिया है, ये बिल्कुल हमारे जैसी है।

शहरों की सड़कों पर न सुबह-सुबह वो गाड़ियाँ निकलती हैं, जिनमें छोटे-छोटे पिंजरों में मुर्गे क़ैद रहते हैं? ये हमारी सभ्यता और संस्कृति है। हम होमो सेपियंस है।

कोलकाता में मैंने देखा, वहाँ गाड़ियाँ भी नहीं थीं। वहाँ साइकिल में दोनों तरफ़ पैरों से बाँध के बीस-बीस मुर्गे लटका रखे थे, ज़िंदा।

प्रश्नकर्ता: हर छोटे-छोटे शहर में बाइकों में है बाइकों में बाँधकर उल्टा लटकाना।

आचार्य प्रशांत: तुम्हें क्यों लग रहा है कि हम किसी भी तरह की जघन्य हिंसा नहीं करेंगे किसी छोटे बच्चे के साथ?

मैंने देखा, मछलियाँ बिक रही थीं और उनको परात में रखा गया था। उस परात में कुल इतना ऊँचा पानी, बस इतना ही, कि वो मछलियाँ किसी क़द्र ज़िंदा हैं, तब तक जब तक कि उन्हें ग्राहक खरीद न ले। ताकि दाम ऊँचे लगें, ये कह के कि मछली ताज़ी है। और वो मछली अपना मुँह खोल रही है, साँस लेने के लिए तड़प रही है। ये हम हैं।

हम किसी को भी फाड़ सकते हैं अपनी हवस की पूर्ति के लिए। और इतना ही नहीं, हम किसी को ज़िंदा भी रख सकते हैं अपनी हवस के लिए, जैसे उन मछलियों को ज़िंदा रख रहे थे।

हम किसी को ज़िंदा भी रखते हैं, तो उसमें कोई करुणा नहीं होती, उसमें भी हिंसा होती है। लड़कियों को लेकर के अचानक पूरी दुनिया में बड़ी संवेदनशीलता आ गई है। अरे, छोटी-छोटी बच्चियाँ, पूरी दुनिया संवेदनशीलता दिखाए तो समझ में आता है। भारत, हिंदुस्तान, हम लड़कियों को लेकर संवेदनशीलता दिखा रहे हैं। पाखंड।

अभी होगी जनगणना, तीन-चार कि पाँच करोड़ लड़कियाँ गायब निकलेंगी आबादी में से, भारतीय बच्चियाँ। कहाँ गईं वो? और हम भारतीय आउटरेज दिखा रहे हैं, कि “हम बड़े सेंसिटिव हो गए, हमें बड़ा बुरा लग गया। अरे, हम इतने संवेदनशील लोग हैं, लड़कियों को लेकर के।” भ्रूण-हत्या समझते हो? फ़ीटिसाइड, इन्फ़ैन्टिसाइड समझते हो? इतनी-सी होती है वो, अभी पैदा हुई है उसके मुँह में नमक का ढेला देते हैं, वहीं मर जाती है।

ताज़ा-ताज़ा एबॉर्टेड फ़ीटस देखा है? बहुत सारे छोटे शहरों में, क़स्बों में अस्पताल होते हैं, उनके पीछे चले जाओ वहाँ कचरे के डिब्बे में मिलेंगे। और कोई बात नहीं करना चाहता। बड़े-बड़े शब्द हम ले आते हैं, धर्म, सभ्यता, संस्कृति, परंपरा। कुत्ते खा रहे होते हैं फीमेल फ़ीटस को, स्ट्रे डॉग्स। ऐसे ही नहीं तीन-चार-पाँच करोड़ लड़कियाँ गायब हैं।

प्रश्नकर्ता: इसमें, आचार्य जी, एक और एंगल है। जो थोड़ा जैसे नेता बोल लो या कैपिटलिस्ट बोल लो, या ज़्यादा पावर वाले लोग बोल लो। मतलब एक तरफ़ पर, जैसे आपने बताया जैसा आम आदमी है वैसे ही वो है। वो क्लियर दिख रहा है। पर एक तरफ़, जैसे ही किसी आम आदमी से कोई छोटा-सा भी अपराध हो जाता है तो उसको जिस तरह से, भारत की एक बात थोड़ी-सी अलग है। एक्चुअली वेस्ट की अगर बात करें, तो वहाँ जिस तरह का जुडिशरी एक्सप्रेशन आता है, कि नहीं-नहीं बहुत जल्दी होता है, ट्रांसपेरेंटली होता है।

तो वहाँ जो आम आदमी होता है, उसके ऊपर कोर्ट है कचहरी है, शायद यही केस किसी आम आदमी के थ्रू होता, तो आज उसका मतलब, दस साल, बीस साल हो गए तो पता नहीं क्या होता। वहीं दूसरी तरफ़ ये।

आचार्य प्रशांत: उस आम आदमी की गलती बस ये होती कि उसने अपने पीछे, अपने से भी बौने आम आदमियों की भीड़ नहीं इकट्ठा करी।

बहुत सारे आम आदमी जिस आम आदमी को ख़ास घोषित कर देते हैं, वो ख़ास हो जाता है।

बहुत सारे अपराधी जिस महा-अपराधी को अपना आदर्श बना लेते हैं, वो ऊपर सिंहासन पर ताज पहने नज़र आता है। कोई पकड़ा जाता है न, तो सिर्फ़ इसलिए नहीं कि दोषी है बल्कि इसलिए भी कि अशक्त है। और उसके पकड़े जाने में ज़्यादा योगदान उसके दोषी होने का नहीं होता, उसके कमज़ोर होने का होता है। कारण आंतरिक है, अहंकार सिर्फ़ ताक़त की भाषा समझता है।

दो ही देखो भीतरी केंद्र होते हैं। या तो सत्य का केंद्र जिसको प्रेम का केंद्र भी बोलते हैं, कि मैं प्रेम के चलाए चलता हूँ। अहंकार प्रेम नहीं जानता और सच से तो उसकी जान सूखती है। और दूसरा केंद्र होता है भीतरी ताक़त का, कि जो मुझसे ज़्यादा ताक़तवर होगा उसके आगे झुकूँगा और जो मुझसे कम ताक़त का होगा उसको झुकाऊँगा। अहंकार वही केंद्र जानता है बस, ताक़त का।

तो समाज भी ऐसे ही चलते हैं, जो ताक़तवर होता है उसके आगे झुकते हैं और जिसकी ताक़त कम होती है, वो पकड़ा जाए तो उसको सज़ा दे देते हैं। जेल में जितने बंद हैं उन्होंने कई तरह के अलग-अलग अपराध किए होंगे, तभी बंद हैं। पर एक अपराध उन सबका साझा है जो उनमें से एक-एक ने करा है, वो अपराध ये है कि वो बलहीन हैं।

वैसे तो किसी ने पॉकेट मार दी होगी, किसी ने बलात्कार कर दिया है, किसी ने कहीं आग लगा दी है, कोई चोर है, किसी ने घूस ली थी। तरह-तरह के लोगों ने अपराध किए होते हैं जेल में होते हैं; पर एक साझा अपराध होता है सबका, वो बलहीन थे इसलिए जेल में हैं। वो अपराध नहीं किया होता तो बाक़ी सब अपराध उनके किसी-न-किसी तरीके से माफ़ हो जाते।

बात उन व्यक्तियों की नहीं है। बात दोहरा रहा हूँ, हमारी प्रजाति के मैन्युफैक्चरिंग डिफेक्ट की है, अहंकार। हम पैदा ही ऐसे होते हैं। उसी डिफेक्ट को ठीक करने के लिए जो होता है, उसको बोलते हैं अध्यात्म, आत्मज्ञान।

लेकिन जो डिफेक्टेड है, डिफेक्ट उसकी जान है। इसीलिए वो सारे अपने समाज, अपनी व्यवस्थाएँ और अपने संस्थान ऐसे बनाता है कि इस डिफेक्ट को ठीक न होने दिया जाए।

आपको स्कूल, कॉलेज में सब पढ़ाया जाता है पर क्या आपके बारे में पढ़ाया जाता है? आत्मज्ञान जैसी कोई चीज़ नहीं। मैं कौन हूँ? मेरी भावनाएँ कहाँ से आती हैं? मेरे विचार कहाँ से आ गए? मैं फलानी विचारधारा कैसे मानने लग गया? मेरे भीतर फलाने तरह की बिलीफ़, मान्यता कहाँ से आ गई? इन बातों पर न तो परिवार में चर्चा होती है, न स्कूल में, कॉलेज में, कहीं कोई पाठ्यक्रम नहीं है इनका। मीडिया में कभी कोई बात नहीं उठनी है। और यही वो बातें हैं, जिनसे वो डिफेक्ट ठीक करा जा सकता है, पर वो डिफेक्ट हम ठीक होने नहीं देंगे। ये सब जो हो रहा है ये चलता रहेगा।

एक मज़ेदार बात पता है, ये जो सज्जन हैं, एपस्टीन, ये तो अब रहे नहीं। आपकी नज़रों में वो एक बहुत ही ख़ौफ़नाक और गंदे क़िस्म के गुनहगार हैं न? आपकी नज़रों में। अब ये देखिए, वो अपनी नज़रों में क्या थे। वो आदमी अपनी नज़रों में हमारी स्पीशीज़ का सबसे स्मार्ट आदमी था। वो एक तरह की रेंच तैयार कर रहा था जिसमें वो दुनिया भर से सैकड़ों औरतों को लाने वाला था और उन्हें इनसेमिनेट करने वाला था। क्योंकि उसको पूरा भरोसा था कि उसका डीएनए बहुत ख़ास है।

तो वो चाहता था कि दुनिया भर की जो सबसे ख़ास क़िस्म की औरतें हों, शरीर से हष्ट-पुष्ट, हट्टी-कट्टी और सुंदर दिखने वाली, उनको लेके आऊँगा और उनको यहाँ फ़र्टिलाइज़ करूँगा, और उनसे बच्चे पैदा होंगे और उनको यहाँ रेज़ करूँगा, और इससे इस दुनिया को बहुत बेहतर क़िस्म की एक नई आबादी मिलेगी।

मिल भी गई होती वो आबादी पकड़ा नहीं गया होता तो, पकड़ा नहीं गया होता तो कोई बड़ी बात नहीं कि यही आदमी दस-बीस साल बाद एक नई मानवता का पितामह कहलाता, द हार्बिंजर ऑफ़ अ न्यू स्पीशीज़, द ग्लोरियस एग्ज़ाम्पल ऑफ़ द पावर ऑफ़ यूजेनिक्स। वो तो धर लिया गया, उसके बाद उससे भी बड़े-बड़े दानव थे उन्होंने उसकी हत्या भी करवा दी। तो वो बेचारे का इनसेमिनेशन प्रोजेक्ट पूरा नहीं हुआ।

ऐसे तो होते हैं हमारे महामानव और हमारे आदर्श। हमारे हैं न, तो और कैसे होंगे। आज भी आपके बहुत सारे रोल मॉडल्स हैं जो दर्जनों बच्चे पैदा कर रहे हैं यही बोल के कि मेरा डीएनए ख़ास है। मैं तो पृथ्वी पर एहसान कर रहा हूँ, इतने बच्चे पैदा करके। मैं तो ह्यूमन स्पीशीज़ को एक बेहतर डीएनए, एक बेहतर फ़िज़िकल कंपोज़िशन दे रहा हूँ। देखो, इसलिए मैंने बारह-चौदह बच्चे पैदा किए हैं। और आप उनको कहते हो, “वाओ! माय हीरो, माय लॉर्ड!” और ऐसे लोगों का भी नाम है वैसे फ़ाइल वग़ैरह में। पर फ़र्क़ क्या पड़ता है? पड़ता है क्या? वास्तव में कोई नहीं चौंका न किसी को कोई दुख है, स्कैंडल नहीं है सेंसेशन है, ट्रबल नहीं है टिटिलेशन है।

फ़ोटो, वीडियोज़ सर्कुलेट होंगे, बहुत मज़ा आ रहा होगा लोगों को। जो मैंने बोला है उसको छह महीने बाद आज़मा के देख लीजिएगा। यही बहुत सारे लोग जिनके नाम पर आज थू-थू हो रही है, ये दोबारा सिंहासनों पर नज़र आएँगे। ये दोबारा पॉपुलर इमेजिनेशन के आइडल्स बन जाएँगे, दोबारा आप पाएँगे कि सार्वजनिक मंचों पर इनका महिमागान हो रहा है और इनको माल्यार्पण हो रहा है।

वो जिनको अभी आप पकड़ रहे हो चाइल्ड मोलेस्टेशन में, यही बुलाए जाएँगे बच्चों के स्कूलों में एनुअल डे पर और ट्रॉफिज़ देने के लिए, और यूनिवर्सिटीज़ के कन्वोकेशन में। और यही यूनाइटेड नेशंस में जाकर के पीस एंड हार्मोनी पर लेक्चर देते भी नज़र आएँगे। और आम आदमी क्या कर रहा होगा? तालियाँ बजा रहा होगा। क्योंकि वो सब न, आम आदमी के ही प्रतिनिधि हैं। वो हम ही हैं। हम इसीलिए उनके लिए ताली बजाते हैं।

प्रश्नकर्ता: सर, इसमें एक्चुअली जब तक जो भी इसमें अपराधी है, तब तक वो ज़िंदा था तो लगभग एक हीरो की तरह था। और उसके ऊपर जो केस भी लगा था, वो एक साल आठ महीने की, उसको कुछ सज़ा हुई थी, छोटा-सा कुछ, तो प्रॉस्टिट्यूशन का केस लगाकर ये सारा जो भी मसाला-मिर्च आ रहा है, ये उसके जाने के बाद आ रहा है। तो अब उसको एक विलन की तरह पोर्ट्रेट किया जा रहा है। और बाक़ी जितने उसके साथ वाले हैं, उनकी पीआर एजेंसिज़ एक्टिव हो गई हैं। कि उनका ऑब्जेक्टिव ये था, उनको कोई ऐसा एक कोर ग्रुप बनाना था, जो पेंडेमिक के ऊपर रिसर्च कर सके, ये कर सके, वो कर सके।

आचार्य प्रशांत: पंद्रहों सालों से न, ख़ासकर जब जवान लोगों के सामने होता था, बोलता था कि तुम जिनके जैसा बनना चाहते हो, तुम्हें पता भी है वो कैसे हैं? तुम्हें बस उनकी वही छवि दिखाई देती है जो कैमरे के सामने की होती है, जो उनकी पीआर टीम द्वारा क्यूरेटेड होती है। तुम्हें कैसे पता, उनकी निजी ज़िंदगी में क्या चल रहा है? ये चल रहा है। और ये अपवाद नहीं है, ये सौ-पचास जो नाम सामने आ गए हैं, सिर्फ़ यही ऐसे हों, ऐसा नहीं है। सब ऐसे हैं, क्योंकि आम आदमी ही ऐसा है।

ज़्यादातर जो इसमें बात है, वो सेक्सुअल क्राइम्स की है। जब ज़िंदगी में और कुछ नहीं होता तो वासना तो भरपूर होती ही है न। आप दुनिया को भले बता लो कि मैंने पैसा बहुत इकट्ठा कर लिया, मैंने पावर बहुत इकट्ठा कर ली, तो मेरी ज़िंदगी सफल हो गई है। मैं तो देश को समर्पित हूँ। मैं तो राष्ट्र के उत्थान के लिए ये अपना कॉर्पोरेट एंपायर चला रहा हूँ। कुछ भी है, दुनिया को बता लो आप। भीतर-ही-भीतर तो आप जानते हो कि ज़िंदगी बेरौनक है। भीतर-ही-भीतर तो आप हो गोरिल्ला ही पुराने। तो वासना भभकती है। इसमें ताज्जुब क्या है?

जब वासना भभकती है तो फिर आप जाकर के हाई-क्लास प्रॉस्टिट्यूशन करते हो। होंगे आप कोई भी पॉलिटिशियन हो, आप बिज़नेसमैन हो, आप स्पिरिचुअल लीडर हो। ट्रांसेंडेंटल अवेयरनेस और प्योर कॉन्शियसनेस की बात करते हो, पर भीतर-ही-भीतर तो कुत्ते ही भौंक रहे हैं न। गोरिल्ला लटक रहा है, तो वही करोगे जो झुग्गी-झोपड़ी का कोई आदमी करता है। हाँ, वो तो जो झुग्गी-झोपड़ी में है, स्लम वाला वो थोड़ा भोंदू क़िस्म का है, तो वो तो कुछ जानता भी नहीं। उसको तो प्रोटेक्शन इस्तेमाल करना भी नहीं आता। तो उसको तो बच्चे हो जाते हैं, आठ-दस। फिर कहते हो, हाउसी है, दस बच्चे पैदा करके बैठा है।

ये शातिर होते हैं। इनको सब पता है क्या करना है। ख़ैर, इन्हें भी इतना नहीं पता। निकल के तो ये आ रहा है कि ये सब बीमारियाँ लगवा बैठे थे, सेक्सुअली ट्रांसमिटेड। और ख़ुद को नहीं, लगवा ली। वापस गए तो अपनी बीवी को लगा दी। और उसके बाद अब पकड़े भी इसलिए गए क्योंकि बीवी के लिए दवाइयाँ मँगवाईं, “कैन यू गिव मी समथिंग टू टेक केयर ऑफ द कॉन्सिक्वेन्सेज़?”

बीवी भाग गई। उसको दिए खूब सारे पैसे कि मुँह बंद रखना, बताना नहीं कि तुझे ये सेक्सुअल बीमारी लगी कैसे। पति से लगी, तो पति को कहाँ से लगी? ख़ैर, जो भी बीमारी लगी पर वो बच्चे नहीं पैदा करेंगे।

ग़रीब आदमी भी उतना ही हवसी होता है। उसकी हवस दिख जाती है, छह बच्चे, आठ बच्चे में। शातिर लोगों की सामने नहीं आती। आम आदमी को हवस से कोई समस्या नहीं है देखो, उसे समस्या प्रेम से है, प्रेम दिख गया कहीं तो वो गोली मार देगा। हवस तो प्राचीन है, हवस की तो निंदा भी बस ऊपर-ऊपर से कर दी जाएगी। “हाँ, ठीक है, अरे नहीं-नहीं-नहीं, वासना बुरी बात है।”

हवस वग़ैरह चलती है। सबसे ज़्यादा ख़तरनाक चीज़ क्या होती है आम आदमी के लिए? प्रेम। प्रेम दिख गया, तो गोली मार देगा। प्रेम नहीं बर्दाश्त होता। चाहे वो जीवन के प्रति प्रेम हो, चाहे किसी स्त्री के प्रति प्रेम हो, पुरुष के लिए किसी के प्रति प्रेम हो, प्रेम नहीं बर्दाश्त कर सकता। हवस तो नॉर्म है। हाँ, हवस को जस्टिफ़ाई करने के लिए नाम किसका दे देगा? प्रेम का। और जहाँ सचमुच प्रेम होगा उसको कलंकित करने के लिए, मेलाइन करने के लिए क्या नाम दे देगा? हवस। कुछ इल्ज़ाम लगा के ही तो गोली मारोगे। तो जहाँ सचमुच प्रेम हो, उसको बोल दो, “ये तो हवस है।”

प्रश्नकर्ता: धन्यवाद।

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
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