जन्मदिन गीत: जन्म लिया तो मरेगा

Acharya Prashant

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जन्मदिन गीत: जन्म लिया तो मरेगा
जन्म लिया तो मरेगा, जन्म लिया तो मरेगा, जन्म लिया तो मरेगा तू, जन्म लिया तो मरेगा। ये मृत्यु का नहीं, अमरता का गीत है। इसका मतलब है: अजन्मे रहो, अमर रहो। देह का ही तो कहते हो कि जन्म हुआ। तो अजन्मे रहने का अर्थ है: देह मत बनना, चेतना बनना, जानना। जानना, नहीं तो एक्शन-रिएक्शन के ही खेल में फँस जाओगे और फिर उसमें दुख आ जाता है ज़िंदगी में। तो दुख से बचने का गीत है ये। ये आशीर्वाद है; अजन्मे रहो, अमर रहो। यह सारांश प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन के स्वयंसेवकों द्वारा बनाया गया है

प्रश्नकर्ता: (छोटे बच्चे का प्रश्न) आचार्य जी प्रणाम। आज मेरा बर्थडे है और जब आप सेंट मैरी में पढ़ते थे तो आपका गंदा नंबर आया था, तो आपका कैसे बर्थडे मना था?

आचार्य प्रशांत: अच्छा तुम्हारा सवाल है या किसी ने ये तुमको बता के भेजा है? मम्मी ने भेजा? किसने भेजा है? बताओ।

प्रश्नकर्ता: मम्मी।

आचार्य प्रशांत: मम्मी ने। तुम तो बेटा अभी बोल भी नहीं पा रहे ठीक से। क्या बोला है तुमने? क्या बोला है? आज मेरा बर्थडे है। इतना सुना, और?

प्रश्नकर्ता: जब आपका सैंट मेरी में गंदा नंबर आया था।

आचार्य प्रशांत: हाँ, स्कूल में गंदा नंबर आया था। फिर?

प्रश्नकर्ता: आपका केक कटा था फिर?

आचार्य प्रशांत: “आपका केक कटा था।”

प्रश्नकर्ता: (बच्चे की मम्मी)। प्रणाम आचार्य जी। एक्चुअली इसका बर्थडे है, और ये बर्थडे पूरा फ्रेंड्स के साथ केक काटने के लिए पूरा ज़िद कर रहा था। तो मैं ज्ञान मस्ती इसको पढ़ के सुना रही थी बुक, तो वो आपका सुना कि आपका ख़राब नंबर आया था फिर आपने अच्छा किया अच्छा नंबर आया। तो फिर मैं बोली कि तुम आचार्य जी से पूछना, कि उनका कैसे बर्थडे सेलिब्रेट होता था। ये ज़िद कर रहा था, कि दोस्तों के साथ होटल में जाके पार्टी करना है, तो इसीलिए मैंने ये क्वेश्चन इसको पूछने को बोला था। सर घर में लाइब्रेरी बना रखा है लेकिन कुछ ख़ास मतलब पढ़ नहीं पाते हैं दोनों इसलिए।

आचार्य प्रशांत: आ जाओ, ऐसे ही आ जाओ (बच्चे को अपने पास बुलाते हैं)। सारे जवाब कोई ज़रूरी थोड़ी है कि शब्दों से दिए जाएँ। कि ज़रूरी है? जिसको जैसे समझ में आए। बेचारा कह रहा है मेरा बर्थडे है, केक कहाँ है?

केक काटना था आज, दोस्तों के पास? (बच्चे से पूछते हैं)।

(बच्चा, हाँ में सिर हिलाता है)।

दोस्तों के पास जाना था? मम्मी यहाँ ले आई?

(बच्चा, हाँ में सिर हिलाता है)।

आज गलत हो गया, बेचारा। अच्छा, बर्थडे अच्छा दिन है?

(बच्चा, नहीं में हिलाता है)।

अच्छा दिन क्यों नहीं होता? आज आपकी बर्थ हुई थी, आपका अच्छा दिन है आज। तो अच्छे दिन में न कुछ ऐसा करते हैं, कि सबके लिए अच्छा हो। क्या? सबके लिए अच्छा हो, और सबके लिए एक दो चीज़ें बताओ जो अच्छी हो सकती हैं। केक? केक तो पहले भी खाए होंगे। अपने फ्रेंड्स के बर्थडे पर खाए होंगे न?

(बच्चा, हाँ में सिर हिलाता है)।

वो केक याद भी हैं कैसे थे?

(बच्चा, नहीं में हिलाता है)।

तो केक क्या अच्छा है? वो तो अभी खाओगे, अगले दिन भूल भी जाओगे। कुछ और हो सकता है केक से अच्छा? क्या?

प्रश्नकर्ता: (बच्चा) पढ़ाई।

आचार्य प्रशांत: पढ़ाई। मम्मी ने बोला? तुम्हें सचमुच क्या अच्छा लगता है जो पता है कि ये तो अच्छी ही चीज़ है? जो मम्मी ने नहीं बताया हो फिर भी तुमको पता हो कि ये चीज़ तो अच्छी है ही, कौन सी चीज़ है? एक-आध-दो चीज़ें बताओ, अपनी बात, क्या अच्छा लगता है? अच्छा बताओ तुमको क्या बुरा लगता है? जैसे एक तो बुरा ये हुआ, कि केक फंस गया। पर जब बर्थडे नहीं भी होता है, तो कौन सी चीज़ें हैं जो गंदी लगती हैं?

अच्छा आपसे कोई झूठ बोले तो कैसा लगता है?

प्रश्नकर्ता: अच्छा नहीं लगता।

आचार्य प्रशांत: “अच्छा नहीं लगता।” झूठ अच्छा नहीं लगता, है न? तो उसका ऑपोजिट फिर क्या होगा, जो अच्छा लगेगा?

प्रश्नकर्ता: सच्चाई।

आचार्य प्रशांत: सच्चाई, है न? तो हम फिर ये कर सकते हैं कि बर्थडे वाले दिन ख़ासतौर पर ध्यान रखेंगे, कि सच्चाई पूछेंगे भी और बताएँगे भी। ये करें?

प्रश्नकर्ता: हाँ।

आचार्य प्रशांत: केक से थोड़ा बेटर होगा? इसका मतलब ये नहीं है कि केक नहीं आएगा, केक भी आ जाएगा। केक के साथ में ये करें?

प्रश्नकर्ता: हाँ।

आचार्य प्रशांत: इतने उदास क्यों हो फिर? केक तो आ रहा है। केक आ रहा है न? कहाँ है मम्मी जी? केक तो आ रहा है। केक आ रहा है, पक्का। दोस्त रह गए थे? दोस्त नहीं थे, तो दोस्तों तक भी केक आ जाएगा। कल भी आ जाएगा, दोबारा भी आ जाएगा। कोई दिक़्क़त नहीं है, केक आ जाएगा। पर केक के साथ कुछ और भी करें। क्या था? अभी क्या बात करी थी? क्या करेंगे? कि आज पता करूँगा हर छोटी-छोटी चीज़ में कि सच्चाई क्या है? ठीक है? छोटी-छोटी बात नहीं। फालतू ही सही लेकिन आज क्वेश्चंस पूछूँगा।

क्या करूँगा?

प्रश्नकर्ता: क्वेश्चंस पूछूँगा।

आचार्य प्रशांत: और कोई मुझसे कुछ पूछेगा और मुझे नहीं पता होगा तो मैं क्या बोलूँगा? क्योंकि सच बोलना है और किसी ने मुझसे कुछ पूछा, कोई छोटी सी बात भी, पर मुझे नहीं पता ठीक से। तो मैं क्या बोलूँगा? सच बोलना है, और नहीं पता, तो क्या बोल दूँगा?

प्रश्नकर्ता: झूठ।

आचार्य प्रशांत: सच बोलना है न और नहीं पता है। किसी ने कुछ पूछा और बोलना सच है और नहीं पता, तो क्या बोलूँगा?

सच्चाई क्या है? मैं तुमसे पूछूँ मान लो, कि ये मशीन कैसे काम करती है? तुम्हें पता है क्या? नहीं पता। तो तुमसे पूछा ये कैसे काम करती है? तो क्या बोलोगे?

प्रश्नकर्ता: नहीं पता।

आचार्य प्रशांत: नहीं पता। बस यही है। ठीक है? और इसी तरह से जो चीज़ें नहीं पता वो सबसे पूछेंगे कि बता दो भाई, तुम्हें पता हो तो। और हमें नहीं पता, तो बोलेंगे, नहीं पता। ऐसा करेंगे, और फ्रेंड्स के साथ केक वाला कार्यक्रम हो जाएगा, चिंता मत करो। मैंने बोल दिया है, पक्का। बड़ी देर में थोड़ी सी खुशी आई। ठीक है?

अब केक का भी जुगाड़ हो गया और सच्चाई का भी। लेकिन शर्त रखें एक छोटी सी? केक का काम तभी होगा कल रात को, जब पूरा दिन सच्चाई का काम होगा। तो कल हम गिनेंगे कि कम से कम चार-पाँच बढ़िया वाले सवाल पूछे कि नहीं पूछे, और कहीं किसी को झूठ तो नहीं बोला। चार-पाँच अच्छे-अच्छे सवाल पूछे हों और झूठ न बोला हो, तो फिर शाम को आएगा मस्त वाला केक।

प्रश्नकर्ता: हाँ।

आचार्य प्रशांत: आएगा? (प्रश्नकर्ता हाँ में सिर हिलाते हुए)। बढ़िया। कौन सा फ्लेवर?

प्रश्नकर्ता: चॉकलेट।

आचार्य प्रशांत: चॉकलेट फ्लेवर। चलो, कल चॉकलेट फ्लेवर आ रहा है और फोटो भी खींचेगी इसकी, और सब लोग देखेंगे। मम्मी डाल देंगी। ठीक है? लेकिन शर्त पूरी कर देना। अपने मुँह से अब शर्त बता दो, फाइनल। जो नहीं पता वो पूछना है। ठीक है? और कोई हमसे पूछे, हमें नहीं पता तो क्या कहना है?

प्रश्नकर्ता: नहीं पता।

आचार्य प्रशांत: बस इतनी सी शर्त है। ठीक है?

प्रश्नकर्ता: ठीक।

आचार्य प्रशांत: तो भरोसा है नहीं। अब मैंने कह दिया है तो कल कर दीजिएगा पक्का, नहीं तो। (आचार्य जी प्रश्नकर्ता की माँ से बोलते हुए)।

श्रोता: (दूसरा बच्चा) बर्थडे में केक क्यों काटना चाहिए?

आचार्य प्रशांत: एक माइक उधर भी देना पड़ेगा अब, करवा दो शास्त्रार्थ इनका अब।

देखो भाई, मेरा तो केक कटता नहीं, कभी भी नहीं कटा। अब बीच-बीच में किसी को सुर्र चढ़ आती है, तो लेके आ जाता है हर तीसरे-चौथे साल। तो ठीक है, कर लो।

इसको बहुत केक चाहिए (प्रश्नकर्ता को इंगित करते हुए)। एक आज कट चुका है, एक कल का वादा लेकर गया है, सार्वजनिक रूप से। अब मम्मी इंकार भी नहीं कर सकती। ये बताएँ, ये केक माने क्या? हमें तो नहीं पता कि केक माने क्या? और उसका बर्थडे से क्या संबंध है, ये तो हमें और भी नहीं पता, यही बताएगा। और केक में भी चॉकलेट चाहिए इसको, पर अब वादा कर दिया है तो अब तो आएगा। लेकिन सवाल अच्छा है तुम्हारा।

श्रोता: केक नहीं खाना चाहिए।

आचार्य प्रशांत: और कल न, उसने वादा ये किया है कि वो सच ही सच बोलेगा। तो कल ये सवाल पूछना उससे, कि केक खाना भी चाहिए या नहीं, या केक काटना भी चाहिए। तब पूछना, जब काटने ही जा रहा हो, और उसने वादा किया है कि झूठ बोलेगा नहीं। तो जब काटने जा रहा हो तो पकड़ लेना। कहना, कि केक माने कुछ होता भी है, ये क्या काट रहे हो? क्यों चाहिए? देखते हैं क्या सच बोलता है।

प्रश्नकर्ता: ये पूछना चाह रहे थे।

आचार्य प्रशांत: क्या?

प्रश्नकर्ता: कि जब आप छोटे थे, तो आपके जन्मदिन में क्या होता था?

आचार्य प्रशांत: वही जो सब घरों में होता है ज़्यादातर, कुछ बहुत अलग नहीं। हाँ, केक नहीं होता था, लड्डू-वड्डू होता था, ये सब होता था। वो सब बारह-चौदह की उम्र तक चला होगा, कुछ नहीं। पर ये नहीं होता था कि स्कूल नहीं जाओगे या ऐसा कुछ। रात में बुलाया जाता था बाहर वालों को, तो आते थे लोग। पर उसके अलावा कुछ अलग नहीं होता था।

और अब मैं तुम्हें अंदर की बात बताता हूँ! मेरे हर जन्मदिन पर वही देव आकाश मार्ग से उतरते थे, जिनकी अद्भुत कृपा से, मैं अवतरित हुआ था। तुम गुस्ताख़ी कर रहे हो कह के कि जन्मदिन, मेरा अवतरण दिवस होता है! क्योंकि मैं हाड़-मास का आदमी नहीं हूँ, मैं आचार्य प्रशांत हूँ। समझ में आ रही है बात? लोग पैदा होते हैं, मैं प्रकट हुआ था! हँस पा रहे हैं न? हँसना सीखिए। ये बातें जहाँ भी सुनिए, हँसना सीखिए।

मेरा कुछ नहीं हो सकता। अचानक पीछे से एक आवाज़ आई, “कौन सी बातें हो रही हैं?”

स्वयंसेवी: हमें लगा आचार्य जी आपने कहा था कि जन्मदिन मनाएँगे, वो कल मनाएँगे, तो आज ही मना लें, आप कहें तो? केक आ गया है। (गुलशन लेके आइए)।

आचार्य प्रशांत: अब तुम्हारे लिए खास हैप्पी बर्थडे सॉन्ग आएगा। ठीक है? संस्था का जन्मदिन गीत किस-किस को पता है? तो उसके जो ओरिजिनल सिंगर हैं, देवा, आप गाएँगे उसको।

(देवेश जी गाते हैं: “जन्म लिया तो मरेगा, जन्म लिया तो मरेगा, जन्म लिया तो मरेगा तू, जन्म लिया तो मरेगा।)

आचार्य प्रशांत: इसका मतलब समझते हैं न, जिन्होंने नहीं सुना होगा, वो थोड़ा सन्नाटे में आ गए होंगे, कि ये क्या गा रहे हो।

इसका मतलब ये है; अजन्मे रहो, अमर रहो। अजन्मे रहो, अमर रहो। ये मृत्यु का नहीं गीत था, ये अमरता का था। ये आशीर्वाद है; अमर रहो। अजन्मे रहो,अमर रहो। अजन्मे रहने का वैसे मतलब क्या हुआ? देह का ही तो कहते हो न कि जन्म हुआ। तो इसका अर्थ हुआ, अपने आप को देह से कहीं आगे, चेतना मानना। अपने आप को जड़ देह मत मानना। अपने आप को क्या मानना सदा? चेतना मानना।

ये आशीर्वाद है, क्योंकि देह बनकर जिओगे तो या तो तुम मटेरियल हो जाओगे; जड़ पदार्थ, या पशु हो जाओगे। पशु भी देह की तरह ही जीता है।

प्रश्नकर्ता: (बच्चा, आचार्य जी से पूछता है।) ये क्या है?

आचार्य प्रशांत: ये बेटा, जड़ पदार्थ है। क्यों है जड़ पदार्थ? क्योंकि वो कभी नहीं पूछता, ये क्या है। तुम हमेशा वो रहना जो उसको देखे और पूछे, “ये क्या है, ये काम किसका है?” चेतना का।

तो ये सोफिस्टिकेटेड है, लेकिन फिर भी मटेरियल है। तो ये कभी नहीं पूछेगा कि वो कौन है और मैं कौन हूँ। इसमें ये आंतरिक जिज्ञासा नहीं उठ सकती। तुम में उठ सकती है। तो तुम वही बनकर जीना, मटेरियल नहीं, कॉन्शियसनेस। तो

ये हमारा उद्दण्ड तरीका है उसको गाने का; कि “जन्म लिया तो मरेगा” माने देह मत बनना, चेतना बनना, जानना।

जानना नहीं तो एक्शन-रिएक्शन के ही खेल में फंस जाओगे और फिर उसमें ज़िंदगी में दुख आ जाता है। तो दुख से बचने का गीत है ये।

प्रश्नकर्ता: बेहोशी में इसको हम 10 साल का कर दिए, लेकिन इसको बुक में हम नहीं ला पा रहे हैं। कोशिश तो कर रहे हैं, लेकिन आ नहीं पा रहा है। कैसे करें?

आचार्य प्रशांत: आप कोशिश मत करिए। कुछ उसको आप उसके सामने सब रखते रहिए, बताते रहिए, बस कोशिश मत करिएगा।

प्रश्नकर्ता: ज़बरदस्ती का टाइम लगा दें क्या? कि 10 से 11 पढ़ना ही है। फिर नहीं पढ़ते हैं सर।

आचार्य प्रशांत: हाँ, मैं जानता हूँ, नहीं करेंगे, लेकिन मैं कह रहा हूँ, कोशिश करके नहीं, प्रदर्शित करके कर सकते हैं, तो करिए। कोशिश में फिर बल आ जाता है, धक्का आ जाता है।

प्रश्नकर्ता: हाँ, ज़बरदस्ती तो करते हैं, अगर टीवी देख सकते हैं तो वो क्यों नहीं?

आचार्य प्रशांत: मैं आपकी बात भी समझता हूँ। आप क्या चाह रही हैं? पर आप जैसे चाह रही हैं न, वैसे आमतौर पर हो नहीं पाता। आप उसके सामने सब रखते रहिए, रखते रहिए। वो चीज़ ऐसी है, उसमें सुंदरता ऐसी है कि वो सही समय पर ख़ुद ही आएगा। बस अपनी ओर से आप कभी ये ढील मत दीजिएगा, कि आपने उसके सामने प्रदर्शित करना ही छोड़ दिया। प्रदर्शित करती रहिए, लेकिन साथ में प्रतीक्षा भी करिए।

प्रश्नकर्ता: सर, वो बोलती नहीं लगता है कि…।

आचार्य प्रशांत: हाँ, मालूम है। माँ का आग्रह, कि जल्दी से जल्दी, जल्दी से जल्दी, इसको सबसे ऊँची चीज़ मिल जाए।

प्रश्नकर्ता: लगता है कि हम ख़राब कर रहे हैं उसके हिसाब से। एक तो दस साल दिया नहीं, ऊपर से फिर छूट देंगे।

आचार्य प्रशांत: “माली सींचे सौ घड़ा, ऋतु आए फल होय।” कुछ चीज़ें प्राकृतिक भी होती हैं, उसमें प्रतीक्षा करनी पड़ती है। उसका अभी इंटेलेक्ट, ब्रेन वो प्राकृतिक चीज़ है, उसमें थोड़ा इंतजार करना पड़ता है।

प्रश्नकर्ता: ज़बरदस्ती करने पर होता है, जैसे ‘रश्मिरथी’ अभी तो ये नहीं है, लेकिन आपका वो जो ‘ज्ञानमस्ती’ वाला बुक है, उसमें ‘रश्मिरथी’ का लास्ट में थोड़ा सा आपने कहा है, “प्रासादों के कनकाभ शिखर, होते कबूतरों के ही घर“। तो उससे इम्प्रेस होके, वो जो श्रीकृष्ण और दुर्योधन, वो जो बाँधने की बात है, वो याद कर लिया।

आचार्य प्रशांत: तो उसी तरीके से लाइए न सामने। वो ज़बरदस्ती नहीं है, वो प्रदर्शन है इस तरीके से कि उसको बात समझ में आ रही है और प्रेरक भी लग रही है। वैसे ही करना होगा।

प्रश्नकर्ता: हेलो सर, प्रणाम। घर में लाइब्रेरी है और मतलब, एक साल से लाइब्रेरी मैंने किया है आपके वजह से। जो छोटी-छोटी चीज़ें हैं, उनमें मैं बोलती हूँ घर में जैसे यहाँ आना था, मैं राँची से आई हूँ, कोलकाता। तो आज सुबह आना हुआ फिर यहाँ सत्र, फिर कल सुबह वाला और फिर उसके बाद कल लौट भी जाना है। तो ये सब घर में किसी को पसंद नहीं आ रहा था, तो उसके बावजूद भी मैं कि नहीं, मुझे जाना ही है, ज़िद करके। तो फिर नहीं माना गया। उसके बाद मैंने खाना बनाना छोड़ दिया, कि मैं नहीं बनाऊँगी अगर मैं नहीं जाऊँगी तो। तो एक तरह का ये अहंकार या फिर मतलब किसी के ऊपर ज़िद करके एकदम से चढ़ ही जाना। तो उसके बाद हुआ प्रोग्राम, आए हम लोग।

हस्बैंड यहाँ है, दोनों बच्चे। लेकिन मेरा बड़ा बेटा ये बोल रहा था कि, "मम्मी, तुम पापा पर एकदम चढ़ के बोलती हो।" तो इसका कैसे मतलब बच्चों में भी ऐसा कैसे लाया जाए, सच्चाई की तरफ़ जाकर भी, क्योंकि उधर तो जाने के लिए घर में लड़ाई करनी पड़ती है।

आचार्य प्रशांत: देखिए, मेरा तो काम है आपको सच्चाई, हक़ीक़त दिखा देना। वो मैं आपको दिखा देता हूँ। अगर आप मुझे सुनते हैं तो अपने शब्दों के माध्यम से, और जो मुझे नहीं पसंद करते, उनको मैं सच्चाई दिखा देता हूँ। उनकी प्रतिक्रिया के माध्यम से। मेरा तो काम है अहंकार के ढर्रों को प्रदर्शित कर देना।

आप अगर मुझे सुनते हो तो मैं अपने शब्दों के माध्यम से आपको समझाऊँगा कि अहंकार के ढर्रे क्या होते हैं। और अगर आप मुझे सुनते नहीं या मुझे पसंद नहीं करते, तो आपकी मेरे प्रति जो नफ़रत आएगी, मैं उस नफ़रत के माध्यम से आपको दिखा रहा हूँ कि अहंकार क्या होता है। और मेरा काम तो है दिखाना। आप समझ रहे हैं न?

तो जो मुझे पसंद नहीं करते, वो अपनी नापसंद से ही दिखा रहे हैं, कि मैं ठीक बोल रहा हूँ। क्योंकि मैं यही तो सिखा रहा हूँ कि अहंकार कूट-कूट के भरा हुआ है, यही तो सिखा रहा हूँ कि माया छुपी होती है। तो अगर आप प्रतिरोध भी करते हो, तो आप मेरा ही काम कर रहे हो। क्योंकि मैं यही तो आपको दिखाना चाहता था। जिन्होंने सुन लिया, उन्हें शब्दों के माध्यम से दिखा दिया। जिन्होंने नहीं सुना, उन्हें उन्हीं की नफ़रत के माध्यम से दिखा दिया कि देखो, अहंकार क्या होता है। सीखो अब। ये आपका फैसला है कि आप कैसे सीखोगे।

कुछ सीख लेते हैं मेरे शब्दों को सुनकर के, और दूसरे मुझसे सीखते हैं मुझसे नफ़रत करके। मैं उनके सामने ना पड़ूँ, तो उनमें इतनी उग्र नफ़रत भी नहीं उठेगी। तो उन्हें कभी पता भी नहीं चलेगा कि उनके भीतर क्या भरा हुआ था। आपके सामने एक आदमी आकर सच्ची बात बोल रहा है और आपके भीतर उसके लिए नफ़रत उठ रही है। ये कुछ अच्छा हुआ। वो आदमी आपके सामने आईने की तरह खड़ा हो गया। वो न आता तो आपको आपके ही भीतर घुसी हुई सच्चाई के लिए जो नफ़रत है, वो कभी पता नहीं चलती। आप समझ रहे हैं न बात को?

प्रश्नकर्ता: सर, मेरे को भी तो अभी अहंकार बहुत भरा हुआ है। तो समझ में नहीं आता है कि सच में मैं अहंकारी हो रही हूँ कि सामने वाला गलत है।

आचार्य प्रशांत: अहंकारी सब हैं। जो जीव खड़ा हुआ है, न, जो मैं बोल रहा है, तो मैं माने ही अहंकार होता है। अंतर ये नहीं होता कि किसी में अहंकार है कि नहीं है। सब में होता है। ये भी अहंकारी, ये भी अहंकारी, मैं भी अहंकारी, ये भी, ये भी, सब है।

प्रश्न ये होता है कि वो अहंकार प्यार किससे करता है? एक अहंकार होता है, जिसको हम बोलते हैं सत्यमुखी, आत्ममुखी, जिसको सच्चाई से प्यार है, उसकी एक दिशा होगी, उसकी एक गति होगी। और एक अहंकार है, जिसको अपने अंधेरे, अपनी बेहोशी से प्यार है, उसकी दूसरी गति होगी। दो व्यक्ति हो सकते हैं अहंकारी, दोनों हैं, पर दोनों के अहंकार की दिशा बहुत अलग-अलग है। समझ में आ रही है बात?

तो अहंकार अपने आप में कोई बुरी बात नहीं है। न अच्छी बात है, न बुरी बात है। वो यथार्थ है। व्यवहारिक तल पर, अहंकार नहीं होगा तो और क्या होगा? श्रीकृष्ण और बुद्ध भी बोलते हैं, तो मैं की भाषा में ही बात करते हैं।

अहंकार तो होगा ही। प्रश्न ये है, कि उस अहंकार की दशा क्या है और दिशा क्या है?

अहंकार तो है, पर वो किसकी गोद में जाकर बैठ जाना चाहता है; सच्चाई की या झूठ की? प्रेम की या पाखंड की? ये प्रश्न होता है।

प्रश्नकर्ता: थैंक यू, सर।

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
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