जो हमें कहा जाता है कि "इंडियन वूमन की तो बात ही दूसरी होती है। वह तो होती ही कमज़ोर है, भावुक बहुत होती है।" नहीं, कमज़ोर नहीं होती। और उसका प्रमाण यह है कि उसने गोरी महिलाओं को हराया है। और किस मैदान में? भावना के मैदान में नहीं, खेल के मैदान में। जूझती हुई लड़की ज़्यादातर लोगों को पसंद नहीं आएगी, क्योंकि अगर वो क्रिकेट में या बैडमिंटन में जूझ सकती है, तो फिर वो समाज से भी जूझ सकती है। लड़की को तो जुझारू होना ही पड़ेगा, क्योंकि बहुत-बहुत ज़्यादा संभावना है कि वो जहाँ भी जाएगी, उसको माहौल प्रतिकूल ही मिलेगा।
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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, आपने महिला क्रिकेट टीम की जीत पर अपनी आज की कविता में कहा कि “सच्ची जीत प्रतिद्वंदी पर नहीं, अपने ही बेड़ियों पर होती है।” जब महिला क्रिकेट टीम जैसी बाहरी जीत होती है तो क्या ये केवल खेल की विजय पर है या ये उस मानसिक ग़ुलामी पर है जो सदियों से स्त्री को सीमित करती आई है?
आचार्य प्रशांत: देखिए, सबसे पहले तो ये समझिए कि जो बधाई मैंने दी है और जो बधाइयों का पूरा आप मज़्मा देख रहे हैं चारों तरफ़, उसमें एक मूलभूत अंतर है। ज़्यादातर लोग जो बधाई दे रहे हैं, वो बधाई क्रिकेट को दे रहे हैं क्योंकि उन्हें क्रिकेट पसंद है। मैं क्रिकेट को नहीं बधाई दे रहा हूँ, ठीक है? मैं एक ज़्यादा व्यापक दृष्टि से देख कर के इस घटना के सांकेतिक महत्त्व को बधाई दे रहा हूँ, और वो बधाई तब भी दी जाएगी जब महिला हॉकी टीम विश्वकप जीत ले या कि शतरंज में कोई लड़की, कोई महिला बाज़ी मार ले जाए, या एथलेटिक्स में, वो सब जगह।
आप अगर सबसे ऊँची जगह पर पहुँचते हो, बात महिला की है, तो वो स्पष्टीकरण देना ज़रूरी है, क्योंकि ज़्यादातर लोगों के लिए तो बस यही है कि “क्रिकेट है, क्रिकेट है,” तो इसलिए मज़ा आ गया। वो नहीं है।




