लोग हर्ट क्यों करते हैं?

Acharya Prashant

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लोग हर्ट क्यों करते हैं?
तुम और क्या करोगे, भीतर परेशान हो तो दूसरों को परेशान करोगे। ‘आई लव यू’ भी बोलते हो, तो तुम्हारी आँखों में आशा रहती है। और फिर जब वो उम्मीद पूरी नहीं करेगा, तो कहोगे: ‘हर्ट।’ जो भी बात है, उसको थोड़ा खुला रखना सीखिए। देना सीखो और लो भी तो उसी से, जो बिना उम्मीद के दे रहा हो तुमको। यह सारांश प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन के स्वयंसेवकों द्वारा बनाया गया है

प्रश्नकर्ता: नमस्ते सर। सर, आई लव यू।

आचार्य प्रशांत: इसमें क्वेश्चन मार्क है अंत में, नहीं है?

प्रश्नकर्ता: नहीं सर, फॉर जेस्चर सर। सर, आइ हैव अ क्वेश्चन: व्हाइ डू पीपल हर्ट ईच अदर विद वर्ड्स ऐंड जेस्चर? लाइक टीचर टू स्टूडेंट्स, हज़्बैंड ऐंड वाइफ़, इन ऑफ़िस सीनियर टू जूनियर, व्हाइ डू दे हर्ट ईच अदर?

आचार्य प्रशांत: हग ईच अदर या हर्ट ईच अदर?

प्रश्नकर्ता: हर्ट ईच अदर, सर।

आचार्य प्रशांत: मतलब, ये इतने तरीके से इसका उत्तर दिया जा सकता है कि समस्या रहती है कि। तुम और क्या करोगे, भीतर परेशान हो तो दूसरों को परेशान करोगे और क्या करोगे? क्या करोगे, बताओ? ज़्यादातर जो दूसरे को हर्ट करते हो, तुम्हें पता भी नहीं होता कि हर्ट कर रहे हो। जानते-बूझते तो कम ही करते हो। अपना सारा काम ही ऐसा होता है जो दूसरे को दुखी किए बिना हो ही नहीं सकता। और क्या करोगे?

उधर उसका बैठा हुआ है अहंकार कुछ कामना लेकर के; इधर तुम्हारा बैठा हुआ है, कामना लेकर के; न उसकी पूरी हो सकती है न तुम्हारी पूरी हो सकती, वो भी हर्ट होने वाला है, तुम भी हर्ट होने वाले हो। तुम तो दूसरे को क्या हर्ट करोगे, उसने ख़ुद ही तय कर लिया था हर्ट होना। जिस दिन वो भीतर गुब्बारा लेकर बैठ गया था, उस दिन तय हो गया था कि अब इसके सुई लगेगी। इसलिए कह रहा हूँ, ड्राइवरलेस रखो, अब कोई जाकर के ड्राइवर सीट पर गोली भी चलाएगा तो कार नहीं रुक सकती। कौन है हर्ट होने को? नोबडी, कोई नहीं, खाली।

आकाश को डंडा मारो तो उसे चोट नहीं लगती, कि लगती है? तो आकाशवत होने का यही मतलब है, देयर इज़ नोबडी हियर टू गेट हर्ट। यस, यू ट्रायड, यू ट्रायड योर बेस्ट, बट देयर वज़ नोबडी हियर टू रिसीव द हर्ट। हर्ट का मतलब होता है रेज़िस्टेंस। इस दीवार पर गोली मारो तो छेद होता है, उस छेद का मतलब समझते हो क्या है? रेज़िस्टेंस। इस दीवार ने कोशिश करी कि गोली पार न निकले, तो इसलिए दीवार हर्ट हुई। दीवार की कामना है कि जैसी है दीवार वैसी रहे क्योंकि दीवार कुछ बन बैठी है, और अहंकार जो कुछ बन बैठता है उसका संरक्षण चाहता है, उसका प्रिज़र्वेशन चाहता है।

अहंकार भी इस दीवार की तरह ही जड़ है, वो कुछ बन बैठा है, अब उसको प्रिज़र्व करना चाहता है। दीवार चाहती है, मैं जैसी हूँ वैसी ही रहूँ। अब गोली आई दीवार की तरफ़ तो दीवार ने क्या किया? उसको रेज़िस्टेंस दिया। रेज़िस्टेंस देना मजबूरी थी क्योंकि रेजिस्टेंस न दे तो दीवार गिर जाएगी। तो रेज़िस्टेंस दिया, रेज़िस्टेंस दिया तो छेद हो गया। अब वही गोली अगर आकाश में चलेगी, आकाश को अपने आप को बचाना ही नहीं है, उसे कोई ख़तरा ही नहीं है तो उसमें कभी छेद भी नहीं हो सकता। कोई रेज़िस्टेंस ही नहीं है, क्योंकि वहाँ कोई नहीं है। लेट देयर बी नोबडी टू रिसीव हर्ट। नोबडी ऐट ऑल। क्या हर्ट? ओन्ली बिलीफ़्स गेट हर्ट।

और जितना तुम हर्ट के प्रति वल्नरेबल रहोगे, जितनी तुम्हारी वृत्ति होगी चोट और घाव स्वीकार करने की, उतना दुनिया का ग़ुलाम बनना पड़ेगा तुम्हें। और क्या कहकर ये दुनिया चढ़ बैठती है तुम्हारे ऊपर? “बात सुनो हमारी, नहीं तो तुम्हें चोट मार देंगे।” यही करके तो लोग राजा बनते हैं न तुम्हारे ऊपर, “बात सुनो हमारी नहीं तो घाव खाओगे।”

दिन-रात लोग ट्रोल कर रहे हैं, आज भी कर रहे हैं। आज तो खाली बैठे हैं, है न? छुट्टी-वुट्टी के दिन होते हैं तो पूरे ही खाली होते हैं, तो फिर क्या करते हैं? बैठ के लगे हैं गाली देने में, लगे हैं गाली देने में। अगर वो मैं याद रख लूँ तो मैं आपसे बात कर पाऊँगा? कर पाऊँगा? मुझे मेरा काम करना है तो मुझे भीतर से खाली होना पड़ेगा। इसलिए आप जब आकर के शत शत नमन वग़ैरह भी करते हो या ये सब भी करते हो, मैं वो भी स्वीकार नहीं कर पाता, क्योंकि वो स्वीकार करूँगा तो वो भी स्वीकार हो जाएगा। कोई आकर तारीफ़ कर रहा है, तो फिर जो आकर गाली दे रहा है वो दोनों बातें इकट्ठे स्वीकार करनी पड़ेंगी न; दोनों को ही स्वीकार करने की कोई वजह नहीं मेरे पास। क्या स्वीकार करूँ और कर लूँगा स्वीकार तो फिर ये काम नहीं हो पाएगा जो यहाँ पर हो रहा है।

कुछ भी बनोगे तो चोट खाओगे, ये पक्का समझ लो। और जितना ज़्यादा बनोगे उतना चोट खाओगे।

जो भी बनते हो दुनिया से रिश्ते में ही बनते हो, जो भी बनते हो दुनिया से कुछ लेकर ही बनते हो। इज़्ज़तदार भी बने हो तो दुनिया से इज़्ज़त ही लेकर बने हो न। हाँ तो गाली देकर इज़्ज़त अपनी वापस छीन लेंगे। अब कहोगे, “हर्ट, हर्ट, हर्ट; चोट लग गई, घाव लग गया।” तुम्हें कहा किसने था कि दुनिया की इज़्ज़त स्वीकार करो? किसने कहा था? क्यों ली चीज़ पहले? किसी की दी हुई चीज़ ले क्यों रहे हो? क्यों ले रहे हो? क्योंकि भाव यही है, मैं तो अपूर्ण हूँ, तो कुछ मिल गया तो फट से लपक लिया। लपक के बैठ गए। जिसकी चीज़ थी अब वो कहेगा, “अच्छा, मेरी चीज़ ली है तो बदले में मेरा ये काम करो,” तो ग़ुलामी करो और ग़ुलामी न करो तो उसने जो चीज़ ले ली है वो वापस छीनेगा। वापस छीने तो कहो, “हाय हाय, आई एम हर्ट।” आ रही है बात समझ में?

क्यों जाकर के किसी न किसी पर लदना है? वो तुम्हें लदवा लेगा कुछ समय के लिए, उसका भी कुछ मतलब है, और फिर कुछ समय के बाद ऐसे (कंधे को झटकते हुए) कर देगा, “गिर गए, घुटना छिल गया, हाय हाय हाय।” लदे काहे के लिए थे? आई लव यू भी बोलते हो न, तुम्हारी आँखों में आशा रहती है। पता है न क्या? क्या?

श्रोता: आई लव यू टू।

आचार्य प्रशांत: बहुत ग़ौर से देखते हो जिसको आई लव यू बोलते हो। बहुत ग़ौर से देखते हो उसको, ठीक वैसे जैसे शिकार को देखा जाता है, कि अब मैंने दिया है उधर से कुछ आएगा कि नहीं आएगा?

अब क्या करें? किसी साधारण इंसान की ओर कभी उतना ग़ौर से नहीं देखोगे। डीएम मारा है किसी को आई लव यू; दस बार चेक करोगे, ग़ौर से चेक करते रहोगे कुछ आया कि नहीं आया? भाई, तुम्हें आई लव यू बोलना है, तुमने बोल दिया, अब काहे के लिए रिफ्रेश मार रहे हो बार-बार। पूरी रात जगे हुए हो, और सुबह तक खून बह रहा है, कि “अरे हाय! चोट लग गई, घाव लग गया, दिल टूट गया।” तुमने आई लव यू बोला थोड़ी ही था, तुमने आई लव यू मारा था।

जैसे तीर मारा जाता है शिकार को, कि अब गया है तो अब कुछ लेकर आएगा, ऐसे ही करना चाहिए। आज अभी दो को आई लव यू मार के आया हूँ। वैसे नीचे से ऊपर चिड़िया उड़ रही है, नीचे से मारा है, बैठ के इंतज़ार कर रहा हूँ गिरेगी कब और ऐसे लपकने को तैयार हैं। ऐसे ही है न?

देना सीखो और लो भी तो उसी से जो निष्काम होकर दे रहा हो। निष्काम होकर देना सीखो और लो भी सिर्फ़ उसी से जो बिना उम्मीद के दे रहा हो तुमको।

कोई आकर बोले आई लव यू वग़ैरह तो पहले उससे पूछो, “क्या चाहिए?” जैसे ही कोई बोले आई लव यू पहला सवाल, “क्या चाहिए?” एकदम मासूमियत से पूछो, “कितना चाहिए? कब-कब चाहिए?” क्योंकि यही पूछने लायक सवाल है। वो आई लव यू दे नहीं रहा है वो लेने आया है, वो लेगा अच्छे से। पहले ही पूछ लो, “व्हाट्स द डील?”

हम तो बोलते भी हैं प्रपोज़ल। प्रपोज़ल ही तो बोलते हैं, प्रपोज़ल का और क्या मतलब होता है? प्रपोज़ल और क्या होता है, कि ये है आप भी अगर स्वीकार कर लें तो लेन-देन ज़रा शुरू हो हमारा। कोई दिक़्क़त नहीं है, कीप इट नीट। पहले ही पूछ लो, “कितना लेना है?” सब कुछ बताओ पूरा, जैसे कि क्लॉज़ेज़ होते हैं किसी डील में। एस.एल.ए. होने चाहिए, कितनी परसेंट सर्विस पर कितना रेट रहेगा? कॉन्ट्रैक्ट विदड्रॉ कब हो सकता है? केस होगा तो किस जुरिस्डिक्शन में होगा? सब कुछ पहले से तय होना चाहिए।

असल में दुनिया में कोई भी और आए आपकी ओर और आई लव यू क्या कुछ भी बोले, जवाब तो सही एक ही है, “क्या चाहिए?” कुछ भी बोले कोई, वो कामनावश ही तो बोल रहा है। तो और क्या जवाब दें उसे, यही तो पूछेंगे, “क्या चाहिए?”

आचार्य जी क्या बोलना चाहिए? “क्या चाहिए?” ले लो, पर निश्चित कर लो कि देने वाला उम्मीद बाँध के नहीं दे रहा है। और जहाँ देने वाले ने उम्मीदें रखी हों या तो उम्मीदें लिखवा लो साफ़-साफ़ या लेने से मना कर दो, एकदम मना कर दो। ख़ासकर बिल्कुल मना कर दो जहाँ कोई तुम्हें कुछ दे रहा है, तुम पैसे या कुछ दे रहे हो, “अरे नहीं-नहीं, छोड़िए, अपनी ही दुकान समझिए आ जाइएगा बाद में।” ये सब बातें, एकदम मना कर दो।

जहाँ बताया भी नहीं जा रहा न कि दाम कितना है, वहाँ बहुत बड़ा दाम है। या तो कोई ऐसा हो जो सचमुच दाम चाहता न हो, निष्काम है बिल्कुल, ठीक है उसने प्रेम दिया है ले लो; वो प्रेम था। वो ठीक है, वैसा कोई मिलेगा नहीं। या कोई ऐसा हो जो साफ़-सुथरा व्यापारी हो, वो भी ठीक है। उसने माल दिया और साथ में दाम बता दिया। सबसे ख़तरनाक वो है जो कहते हैं, “ले लो, दाम वग़ैरह कुछ है नहीं, बाद में देखी जाएगी, घर का मामला है, अरे तुम तो हमारे अपने हो, प्यार की बात है।” ये सब जहाँ हो रहा हो, वहाँ समझना सबसे गंदा सौदा नीचे-नीचे जो है, वो बदक रहा है। और अब लुटोगे, बहुत लुटोगे।

उम्मीदें या तो रखो मत या स्पष्ट रखो; सरल काम। या तो रखो मत, निष्काम हो जाओ; या हैं तो उन्हें सरलता से अभिव्यक्त कर दो कि “देखो भाई, ये चीज़ चाहिए हमें।” और जैसे व्यापार में होता है उसको स्वीकार है वो चीज़ देना, जो भी लेन-देन है, तो ठीक है कर लो सौदा। नहीं तो अपना-अपना रास्ता देखो।

हमारा ऐसा नहीं है, हम क्या? बोलेंगे ये कि “अरे कुछ नहीं, आपसे थोड़ी, अरे आप शर्मिंदा कर रहे हैं आपसे थोड़ी लेंगे।” भग! छोटे बच्चे इसलिए तो हमें भले लगते हैं न, वो ये थोड़ी कहते हैं, कुछ नहीं चाहिए; चाहिए तो चाहिए, खुले में चाहिए। हमें चाहिए भी और हमें छुपाना भी है कि हमें चाहिए, छुपाना भी है। जानवर भी अच्छे होते हैं उन्हें चाहिए तो चाहिए। मेरे खरगोश मेरे साथ बैठ के खाते थे वो मेरी थाली में, किसी से बात करने लगूँ उतनी देर में यहाँ बैठ के वो सब साफ़ कर देता।

इतना चंट हो गया था एक तो कि जब देखे कि ज़्यादा चोरी हो रही है। तो ये ऐसे ही होती थी, यहाँ पर अपना वो खा रहा है, इधर देखा (दूसरी तरफ़)। पता था ज़्यादा इतना नहीं लेना चाहिए, उनके लिए इस तरह की चीज़ें ज़्यादा अच्छी नहीं होती हैं, तो एक उनको सीमित मात्रा में ही; तो देखूँगा तो पूरी रोटी लेकर भाग गया होगा वहाँ कोने में।

तो इस मामले में न थोड़ा लाज, हया, शर्म एक तरफ़ रखना सीखो। जहाँ पर आपको व्यवहार करना ही है वहाँ जो भी आपकी अपेक्षाएँ, उम्मीदें हैं, वो स्पष्ट रूप से डिक्लेयर कर दीजिए, घोषित कर दीजिए, बेशर्म होकर। भाई नहीं हो पा रहे आप निष्काम, कोई दिक़्क़त नहीं है प्रकृति ने आप में कामना डाली हुई है, कोई दिक़्क़त नहीं है चलिए पर कम से कम बेईमानी तो मत करो, भीतर ही भीतर उम्मीद क्यों पका रहे हो, उसको बता दो। और फिर जब वो उम्मीद नहीं पूरी करेगा तो कहोगे न, “हर्ट।” उसने ठेका ले रखा है तुम्हारी उम्मीदें पूरी करने का?

और इसी तरीके से जब कोई वादे करे, तो भी थोड़ा पूछो ऐसे सर खुजाओ, कहो, इसको ऐसा मैं दे क्या सकता हूँ कि ऐसे बड़े-बड़े वादे कर रहा है? ये तो सौदा ही इसके लिए मुझे मुनाफ़े का नहीं लग रहा। निश्चित रूप से ये मुझसे कोई छुपी हुई चीज़ उगाहना चाहता है जो अभी बता भी नहीं रहा हो। इसलिए ऐसे-ऐसे वादे कर रहा है। पर कोई वादे कर देता है तो हमें तो एकदम ऐसे होता है, तो गुलबदन, गुलबहार सब हो गया, खिल गए बिल्कुल। खिला गुलाब की तरह मेरा बदन और उसके बाद घुंघरू की तरह बजता ही रहा हूँ मैं, कभी टूट गया, कभी तोड़ा गया, सौ बार फिर मुझे जोड़ा गया। कितने खुश हो रहे हो (प्रश्नकर्ता की ओर इंगित करते हुए)।

इसको थोड़ा सा आप एक अभ्यास के तौर पर ले सकते हैं। सरल काम होना सीखिए, जो भी बात है, उसको थोड़ा खुला रखना सीखिए।

पहला प्रयास तो होना चाहिए कि कोई व्यर्थ की कामना हो ही न। पर व्यर्थ की कामना आत्मज्ञान से हटती है। वो प्रक्रिया है, इसलिए आपकी चल रही है। तब तक जो भी चीज़ें हैं जो आपको चाहिए, नहीं चाहिए, वो सामने-सामने ये है। और तैयार रहिए कि आप जो प्रपोज़ल दे रहे हैं, वो अस्वीकार भी हो सकता है। अस्वीकार हो जाए तो फिर घाव मत ले लीजिए कि “ही रिजेक्टेड माई प्रपोज़ल।” अरे, प्रपोज़ल ही तो था, आदेश थोड़ी था कि उसे मानना ही है। प्रस्ताव था न, प्रस्ताव का तो मतलब ही होता है कि स्वीकार भी हो सकता है, अस्वीकार भी हो सकता है। तो अब रो किसलिए रहे हो?

और बहुत तुम्हारा मन कर रहा है कि स्वीकार हो जाए तो स्वीटन द डील, उसमें कुछ और बढ़िया सामग्री मिलाओ कि वो उसको मान ले। फिर तो व्यापार वाली बात चल रही है, कर लो, इतना ही कामना अगर। वो भी ठीक है, कम से कम बेईमानी नहीं कर रहे जो भी है सामने बता दिया, ये छुपा-छुप्पी मत खेला करो। और फिर छुपा-छुप्पी में हर्ट हो जाए तो वो भी छुपा ही लिया करो, किसी को बताओ मत। कामना छुपी-छुपी और जब हर्ट हो जाती है तो फिर समाज में निकल के सार्वजनिक क्रंदन, “हाय-हाय! लग गई!”

पूछता हूँ इसलिए जब आता है कोई, कहते, “लग गई!” मैं कहता हूँ जब लग गई तो दिखाने आया है, और जब लग रहा था तब आया था दिखाने? माने हमारी किस्मत ही ऐसी है कि जब सब तुम्हारी कढ़ी पकवान जब सड़ जाएँगे, तो हमारे सामने ला के रख दोगे कि “ये देखिए, ये क्या हो गया!” और जब बढ़िया पका रहे थे, खा रहे थे, तब अकेले-अकेले।

“नहीं बताने की क्या ज़रूरत है, प्रीतम, तुम तो हमारे हृदय में रहते हो, तुम्हें तो दिल की सारी बात ख़ुद ही पता होगी न। और अगर तुम्हें चुपचाप बिना बोले हमारे नहीं पता है तो, हमें तो इसी बात से लग गई।” पिया जाने जी की बतियाँ। अरे कोई तुम्हारे जी की बतियाँ नहीं जानेगा, वो अपने ही जी की बतियाँ नहीं जानता, तुम्हारे जी की बतियाँ कैसे जान जाएगा। नहीं, जी की नहीं जानते बतियाँ तो बने क्यों थे पतियाँ।

जो बात है बोल दो मुँह से, और जब मुँह से बोलो न तो कई बार पता चल जाता है कि “मैं बकवास कर रहा हूँ।” अपने ही शब्द अपने कान में पड़ते हैं। बात ही इतनी गंदी होती है कि भीतर-भीतर रखो तभी तक वो बची रह सकती है। ज्यों ही उसको ज़ुबान पर लाओगे, वो बात ही इतनी व्यर्थ की है कि झड़ जाएगी, हट जाएगी; तो इसीलिए बोल दिया करो। ये नोट कर लो, इनके वीडियो का टाइटल: “लग गई!” और ऐसी थम्बनेल जैसे अभी हँस रहे थे, दाँत। आई लव यू मत बोलना दोबारा, मैं ऐसे ही करता हूँ।

प्रश्नकर्ता: थैंक यू सर। आई लव यू।

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
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