जो भीतर के अंधेरे को हटा सके उसके लिए नाम दिया गया गुरु। गुरु शब्द का इतना महत्त्व है कि सिखों ने मंदिर को नाम दिया गुरुद्वारा। गुरु नानक साहब उच्चतम कोटि के और असली गुरु हैं, पर कितने लोग हैं जो वास्तव में गुरु नानक साहब के जीवन पर और उनकी सीख पर चल रहे हैं? जो एक से बढ़कर एक अंधविश्वास के विक्रेता हैं, उनको हमने नाम दे दिया गुरु का। आपकी उच्चतम संभावना को जो अभिव्यक्ति देने में मदद कर सके, उसका नाम गुरु है। बहुत खोजें, बहुत संदेह से भरे रहें, परीक्षण करें, यूँ ही किसी को गुरु मत बना लीजिए।
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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम। आने वाले कुछ दिनों में ही देश-विदेश में गुरु नानक जी को समर्पित पाँच-सौ-पचासवाँ प्रकाश पर्व मनाया जाएगा। गुरु नानक देव जी की शिक्षाओं में ‘गुरु’ शब्द का सदैव महत्त्व रहा है। और जो आपसे सीखने को मिला है, उसमें भी यह बात तो स्पष्ट हो ही गई है कि आज के युग के साधक के लिए बिना गुरु, डगर बड़ी कठिन है।
आचार्य जी, जिस संस्कृति में, जिस शहर में मैं रहती हूँ, वहाँ हर कोई गुरु बना बैठा है। कोई मोटिवेशनल गुरु है, कोई मार्केटिंग गुरु है, कोई इस बात का गुरु है तो कोई उस बात का गुरु है। आज आपसे यह समझना चाहती हूँ कि गुरु नानक देव जी में और जो आज हज़ारों की संख्या में गुरु बने घूम रहे हैं, उनमें मूलभूत क्या अंतर था, और मुझ जैसे लोग कैसे समझ सकते हैं उस अंतर को, और कैसे स्पष्टतापूर्वक चुनाव कर सकते हैं।
आचार्य प्रशांत: जो भीतर के अँधेरे को हटा सके, उसके लिए नाम दिया गया ‘गुरु।’ अब उस शब्द का जनमानस दुरुपयोग कर ले तो वह अलग बात है। ध्यान दीजिएगा, भीतर का अँधेरा, और भीतर के अँधेरे का ही नाम होता है — मैं भाव। ‘मैं, मेरा संसार, मेरे इरादे, मेरी इच्छाएँ, मेरी उम्मीदें, मेरे हर्ष-विषाद’ — जो इन पर प्रकाश डाल सके, उसका नाम गुरु है। जो बता सके कि, आपके परेशान संसार के मध्य, जो मूल परेशानी बैठी हुई है उसका नाम ‘मैं’ है, उसी का नाम गुरु है।







