माता-पिता को, दोस्त-यारों को, परिवार के जो भी लोग हों, इनसे अगर प्रेम है, तो इन्हें जो ऊँची से ऊँची चीज़ है, वही देना चाहोगे न। उच्चतम क्या है? बोध है, चेतना है, ज्ञान है। वो दीजिए न घर वालों को। माँ-बाप ने आपको शारीरिक जन्म दिया। अब आप अपने माँ-बाप को आध्यात्मिक जन्म दीजिए। ये हुई बराबरी। तुम जो मेरे लिए अधिकतम कर सकते थे, तुमने किया। और अपनी चेतना के तल पर, जो मैं तुम्हारे लिए अधिकतम कर सकता हूँ, वो मैं करूँगा।
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प्रश्नकर्ता: पारिवारिक कार्य में मेरा ओवर-इनवॉल्वमेंट रहता है। पहले जब कुछ नहीं करता था तो प्रशंसा नहीं मिलती थी, अभी खूब प्रशंसा करते हैं घर वाले, काम करता हूँ तो साथी परिवार वाले, रिश्तेदार काफ़ी प्रशंसा करते हैं।
जब सोचता हूँ कि इन सारे घर के कामों से निकलूँ, कुछ बेहतर करूँ, तो कुछ-न-कुछ ऐसी परिस्थिति आ जाती है या इन्वॉल्वमेंट कम करूँ तो परिवार वालों द्वारा बचपन की चीज़ें याद कराई जाती हैं कि हमने तुम्हारे लिए बचपन में ऐसा किया था, ये किया था, ये त्याग किया। फिर कुछ साल पहले तक ये भी याद दिलाया जाता था कि बचपन और जवानी में तुम्हारे लिए किस परिस्थिति से गुज़रे हैं। और जब इन्वॉल्वमेंट कम करने की कोशिश करता हूँ तो फिर ये बोला जाता है कि ये तुम्हारा फ़र्ज़ है, ये तुम्हें करना ज़रूरी है।
तो ऊँचे कार्य या ऑफ़िस के इम्पॉर्टेंट काम उस चक्कर में मिस होते हैं, प्रायोरिटाइज़ नहीं कर पाता। घर के कार्य करने के बावजूद भी ऐसा लगता है कि मैंने समय गँवा दिया है।




