माँ-बाप के प्रति कर्तव्य

Acharya Prashant

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माँ-बाप के प्रति कर्तव्य
माता-पिता को, दोस्त-यारों को, परिवार के जो भी लोग हों, इनसे अगर प्रेम है, तो इन्हें जो ऊँची से ऊँची चीज़ है, वही देना चाहोगे न। उच्चतम क्या है? बोध है, चेतना है, ज्ञान है। वो दीजिए न घर वालों को। माँ-बाप ने आपको शारीरिक जन्म दिया। अब आप अपने माँ-बाप को आध्यात्मिक जन्म दीजिए। ये हुई बराबरी। तुम जो मेरे लिए अधिकतम कर सकते थे, तुमने किया। और अपनी चेतना के तल पर, जो मैं तुम्हारे लिए अधिकतम कर सकता हूँ, वो मैं करूँगा। यह सारांश प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन के स्वयंसेवकों द्वारा बनाया गया है

प्रश्नकर्ता: पारिवारिक कार्य में मेरा ओवर-इनवॉल्वमेंट रहता है। पहले जब कुछ नहीं करता था तो प्रशंसा नहीं मिलती थी, अभी खूब प्रशंसा करते हैं घर वाले, काम करता हूँ तो साथी परिवार वाले, रिश्तेदार काफ़ी प्रशंसा करते हैं।

जब सोचता हूँ कि इन सारे घर के कामों से निकलूँ, कुछ बेहतर करूँ, तो कुछ-न-कुछ ऐसी परिस्थिति आ जाती है या इन्वॉल्वमेंट कम करूँ तो परिवार वालों द्वारा बचपन की चीज़ें याद कराई जाती हैं कि हमने तुम्हारे लिए बचपन में ऐसा किया था, ये किया था, ये त्याग किया। फिर कुछ साल पहले तक ये भी याद दिलाया जाता था कि बचपन और जवानी में तुम्हारे लिए किस परिस्थिति से गुज़रे हैं। और जब इन्वॉल्वमेंट कम करने की कोशिश करता हूँ तो फिर ये बोला जाता है कि ये तुम्हारा फ़र्ज़ है, ये तुम्हें करना ज़रूरी है।

तो ऊँचे कार्य या ऑफ़िस के इम्पॉर्टेंट काम उस चक्कर में मिस होते हैं, प्रायोरिटाइज़ नहीं कर पाता। घर के कार्य करने के बावजूद भी ऐसा लगता है कि मैंने समय गँवा दिया है।

आचार्य प्रशांत: मेरे पास मेरे खरगोश हैं। मैं उनका पूरा ख़याल रखता हूँ, ठीक है? अभी हम यहाँ आए हुए हैं, संस्था के कुछ लोग यहाँ सिर्फ़ इसलिए नहीं हैं क्योंकि वहाँ खरगोशों की और एक कुत्ता है उसकी देखभाल कर रहे हैं। तो उनको सुबह समय से घास पर छोड़ना होता है। दिन भर वो अपनी घास में, मिट्टी में खेलते-कूदते हैं। फिर शाम को बिल्ली का ख़तरा होता है, तो सूरज ढलने के बाद उनको जल्दी से उनके घर में बंद करना होता है और चीज़ें देखनी होती हैं।

खरगोश कोई आवाज़ नहीं करते हैं, तो उनको अगर बीमारी हो गई है या चोट लग गई है तो पता नहीं लगता; बहुत अंत में जाकर पता लगता है। तो नज़र रखनी होती है कि किसका क्या हाल-चाल चल रहा है। बड़ा समय लगता है, बड़ी मेहनत करी है उनको बचपन से बड़ा करने में। कितने चक्कर तो डॉक्टरों के लगाने पड़ते होते हैं बीच-बीच में। उनकी भी न्यूट्रिंग वग़ैरह होती है, पैसा भी लगता है। इनको बड़ा करने में बड़ी मेहनत कर रहा हूँ मैं। समय भी लग रहा है, पैसा भी लग रहा है, ध्यान भी लग रहा है।

आप यही समझ लो कि संस्था के चार लोग यहाँ इसलिए नहीं हैं क्योंकि वहाँ खरगोश हैं। और उनको मैं उठाता हूँ तो बस वो इतना कर देते हैं कि मेरा हाथ चाटने लगते हैं। वो भी सारे नहीं, एक-दो तो ऐसे नालायक हैं कि वो काट लें। जो थोड़े ज़्यादा स्नेहिल हैं, वो बस क्या कर देते हैं? ऐसे जीभ निकाल के हाथ चाटने लग जाते हैं। मैं जिसका बता रहा था न, नंदू खरगोश, जिसको डॉक्टर ने यूथेनेशिया बोला था, तो मैं सो रहा होता था, वहीं ज़मीन पर सोता था मैं, वो रात में आ जाता था और ऊपर बैठ जाता था और हाथ चाटने लगता था।

वो अपनी चेतना के तल पर जो मुझे दे सकता है, दे रहा है। अब मैं क्या करूँ? मैं भी उसे चाटने लगूँ? मेरी चेतना का तल दूसरा है न। तो मैं उसे वो देता हूँ जो मेरी समझदारी मुझे बताती है कि उसको दो। देना दोनों ओर से पूरा है, इल्ज़ाम किसी पर नहीं लगाया जा सकता। वो भी अपनी ओर से मुझे जो दे सकता है, दे रहा है। वो बेचारा यही दे सकता है कि कुछ खिलवाड़ कर लिया, पीछा किया तो दौड़ लगा दी। जब पीछा करना छोड़ दिया तो ख़ुद ही पास आ गया और ऐसे अपना कान खड़े करके देख रहा है। मज़े लगा दिए, वो इससे ज़्यादा कुछ कर नहीं सकता। तो वो ये कर रहा है।

पर मैं समझदार हूँ, कम से कम खरगोश से थोड़ा ज़्यादा। तो मैं अपनी ओर से उसे जो दे सकता हूँ, मैं वो दूँगा। मैं ये नहीं कहूँगा कि मैं उतना ही दूँगा खरगोश को जितना खरगोश ने मुझे दिया। या मैं ऐसा समीकरण लगाऊँ, इक्वेशन बिठाऊँ, बोलिए, कि खरगोश क्या करता है? मेरी घास खाता है। तो मैं क्या करूँगा? मैं खरगोश की घास खा जाऊँगा। तो खरगोशों के बर्तन में जो उनके लिए घास रखा है, पत्ता रखा है, वो मैं खाना शुरू कर दूँ। क्यों? लॉन मेरा है, घास मेरी है। तूने मेरी घास खाई और बात बराबरी की है, तो मैं तेरी घास खाऊँगा।

नहीं, ऐसा नहीं होता। तुम जो मेरे लिए अधिकतम कर सकते थे, तुमने किया। और अपनी चेतना के तल पर जो मैं तुम्हारे लिए अधिकतम कर सकता हूँ, उचित मुझे जो लगेगा, वो मैं करूँगा।

तुम्हें जो उचित लगा, वो तुमने किया। जो मुझे उचित लगेगा, वो मैं करूँगा। बराबरी इस तरह होगी। किस तरह होगी? तुमने वो किया जो तुम्हें उचित लगा। अब मैं वो करूँगा जो मुझे उचित लगा। बराबरी ऐसे नहीं होगी कि तूने मेरी घास खाई, मैंने तेरी घास खाई। ये वाली बराबरी नहीं चलेगी।

अब माँ-बाप और बच्चों के रिश्ते पर आ जाइए। आपने मेरे लिए वो किया जो आपको अच्छे से अच्छा लगा। आपकी अपनी एक चेतना थी, आपकी अपनी एक समझदारी थी। आपने सोच-विचार किया, आपको लगा, आपको अपने बच्चे के लिए ऐसा-ऐसा करना चाहिए। आपने किया। अब मेरी भी एक समझदारी है। और प्रेम मुझे आपसे खूब है, लेकिन मैं घास और घास की बराबरी नहीं करूँगा। मैं अब वो करूँगा आपके लिए जो आपके लिए वास्तव में उचित है। मैं ये थोड़ी करूँगा कि आप मुझे नहलाने जाते थे, तो मैं आपको नहलाना शुरू कर दूँ। ये कोई बात है?

माँ-बाप बच्चों को नहलाते हैं। तो बच्चे क्या करें बड़े होकर? बड़ों को नहलाना शुरू कर दें? ज़रूरत पड़ेगी तो वो भी कर देंगे, पर बराबरी इस तरह से नहीं की जाती न। उनके पास नहीं रही होगी विज़डम। वो नहीं दे पाए आपको कोई समझदारी। उनकी है मजबूरी। उनको कहीं से ज्ञान नहीं मिला था, तो वो नहीं दे पाए, बेचारे। आपके पास है न वो ज्ञान, तो आपके प्रेम का तक़ाज़ा ये है कि आप उन्हें ज्ञान दें।

उन्होंने आपको क्या दिया? उन्होंने आपको शारीरिक जन्म दिया। अब आप अपने माँ-बाप को आध्यात्मिक जन्म दीजिए। ये हुई बराबरी।

क्या कहना है माँ-बाप से? “आपने मेरे शरीर को जन्म दिया, और मैं अब आप में आत्मा को जन्म दूँगा।” ये हुई बराबरी न, देखो, दोनों ओर का प्यार बराबर का है। आपको मुझसे प्यार था, मुझे आपसे प्यार था। अपने प्यार में आप जो कर पाए, आपने किया। और अपने प्यार में अब जो मैं कर सकता हूँ, मैं वो करूँगा।

घास और घास वाली बराबरी नहीं करनी है। माता-पिता को, दोस्त-यारों को, परिवार के जो भी लोग हों, इनसे अगर प्रेम है, तो इन्हें जो ऊँची से ऊँची चीज़ है, वही देना चाहोगे न। तो आप तो इस शिविर में आए हैं। आप तो जानते हैं न कि उच्चतम क्या है? क्या है? बोध है, चेतना है, ज्ञान है। वो दीजिए न घर वालों को।

मैं नहीं कह रहा हूँ कि घर वालों को कपड़े की ज़रूरत है, तो आप कपड़े न दें। वो न देने के लिए नहीं कह रहा हूँ, वो भी दीजिए। लेकिन वहाँ नहीं रुकना है, माँ-बाप के पास शायद ऊँची से ऊँची चीज़ यही थी कि उन्होंने आपका स्कूल में दाख़िला करा दिया। एहसान मानिए, कृतज्ञता की बात है, ऋण है ये। तो आप क्या करेंगे? आप भी उन्हें स्कूल में डालेंगे? कहेंगे, वो ऋण होना है भाई, उन्होंने मेरा स्कूल में नाम लिखाया था, तो मैं भी उनका नाम लिखाऊँगा स्कूल में, बराबरी होनी चाहिए। ऐसे करना है? नहीं न, बेकार की बात।

आपका मुंडन कराया होगा पिताजी ने बचपन में, गलत हो जाएगा न फिर बराबरी कर दी तो। आपके कान भी खींचे होंगे पिताजी ने, बदतमीज़ी हो जाएगी बराबरी कर दी तो। क्योंकि जो हमने तुम्हारे लिए किया, वही तुम्हारे लिए करना है तो गलत हो जाएगा। ऐसे नहीं करना है। क्या करना है? कि अगर मैं किसी श्रेष्ठ चीज़ के संपर्क में आया हूँ, तो पिताजी, माताजी, मैं आपको भी वो चीज़ भेंट करना चाहता हूँ। ये उपहार है मेरा, ये प्रेम है मेरा।

अब होगा क्या? मम्मी जब पीछे-पीछे खाना ले भागती थीं, तो क्या करते थे? दूर भागते थे। बिस्तर के नीचे घुस गए। कुछ कर रहे हैं, ये करा, वो करा, छलाँग मार दी। सब करा है कि नहीं करा है बचपन में? वो हॉरलिक्स घोट के आ रही हैं, यहाँ पे कुछ और कर दिया, मग्गे में मुँह डाल दिया। कुछ भी पचास तरह की चीज़ें करी होंगी।

ऐसे ही अब आप जब उपनिषद् लेकर उनके पीछे भागोगे, तो वो भी मग्गे में मुँह डाल देंगे। इतनी आसानी से नहीं सुनने के वो पचास-साठ पार कर चुके हैं। बहुत पुरानी चीज़ हो गई। तो जैसे उन्होंने पकड़-पकड़ कर किसी तरीके से ले खा, वैसे ही आपको करना है पकड़-पकड़ के। क्या? ले खा। इनके प्रकरण, साम, दाम, दंड, भेद, सब लगाना है।

कुछ भी बोलो, ऋषिकेश का मौसम बहुत अच्छा है, गंगा नदी पवित्र है, फलाने मंदिर में चले जाएँगे। या “आइए, यहाँ नई शॉपिंग मॉल खुली है। आइए, मम्मी, शॉपिंग कराऊँगा।” ऐसे करके बुला लो। फिर यहाँ बैठा दो, और ये खड़े हुए हैं कुर्ताधारी मुष्टंडे, बाहर ये जाने नहीं देंगे। ऐसा ही उन्होंने तुम्हारे साथ भी किया था।

स्कूल क्या बोल के छोड़ा था? “टॉफ़ी मिलेगी। ये मिलेगा, वो मिलेगा।” ऐसे बोल के स्कूल में छोड़ आते। तुम घुसते थे यहाँ पर, कहाँ है वो? कहाँ है? कहाँ है? वहाँ वो आ जाती थी, मिस फैंटास्टा, वो कान पकड़ के क्लास में ले जाकर रख देती थी। “चलो बेटा, ए, बी, सी, डी।” ऐसे तुम ले आओ। बोलो, “ये ऐसे सब आप जो बाहर तैयारी देख रहे हैं, शादी है। अंदर आइए, बिल्कुल पकवान सजे हुए हैं। शादी है, और बहुत मज़ा आएगा। गाने-वाने हैं, डीजे लगा हुआ है।” और जब घुस जाए अंदर, तो फिर हमारा काम है।

कुछ समझ में आ रही है बात?

जो जिस तल पर दे सकता है, उसी तल पर देगा न। खरगोश को मुझसे बहुत प्यार भी आएगा, तो बस हाथ ही चाट सकता है मेरा। लेकिन उसने मेरा हाथ चाट दिया, मेरे लिए बहुत है। अब ज़िम्मेदारी आ गई मुझ में कि ज़िंदगी भर उसका ख़याल रखूँ। लेकिन वो ज़िम्मेदारी मैं ऐसे नहीं निभा सकता कि मैं खरगोश को चाटने लगूँ। ठीक है न? वो जो कर सकता है, उसने किया। अब आप जो कर सकते हैं, वो आप करके दिखाइए। ये हुई बराबरी की बात।

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
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