आज़ादी या भीतर की गुलामी?

Acharya Prashant

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आज़ादी या भीतर की गुलामी?
बहुत लोग होते हैं, जिनको दूसरों को तकलीफ़ देने में खुशी मिलती है। बहुत लोग हैं, जिन्हें जानवरों का गला काट करके खाने में खुशी मिलती है। वो कहेंगे, “मैं तो वही करूँगा, जिसमें खुशी मिलती है।” पहले तो यह सीखना पड़ेगा न कि यह जो मेरा खुशी का सिद्धांत है, यह आया कहाँ से? आज की समस्या है, ब्लाइंड फ़्रीडम; जहाँ आदमी बाहर वाली तो किसी ताक़त का ग़ुलाम नहीं है, पर भीतरी ताक़त का ग़ुलाम हो गया है। और वो भीतरी ताक़त क्या है? अहंकार। यह सारांश प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन के स्वयंसेवकों द्वारा बनाया गया है

प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी। मेरा सवाल सोशल मीडिया से रिलेटेड है। सोशल मीडिया पर मैं देख रहा हूँ, आजकल एक वाइब कल्चर ट्रेंड होता जा रहा है। कि रील्स आती हैं, उनमें एक अट्रैक्टिव-सा सेल्फ अम्यूज़िंग-टाइप म्यूज़िक बज रहा होता है, और पीछे से कुछ शायरी चल रही होती है।

तो जैसे मैं एक शायरी पढ़ के सुना दूँ, मतलब कुछ कोट्स चल रहे होते हैं। लाइक कि जैसे: “तुम जैसे हो, बस वैसे जियो; बुरे तो बुरे, भले तो भले। तुम कह दो, उस परमात्मा ने तुम्हें बनाया उसकी ऐसी मर्ज़ी थी। स्वीकार करे दुनिया तो ठीक, न स्वीकार करे तो ठीक।” और एक और बोलना चाहूँगा, “तुम अपने ही अनुसार जीना। टूटना हो तो टूट जाना, मगर झुकना मत। अपने ही रंग से जीना।”

सर, इस तरह का कल्चर बहुत ज़्यादा वायरल हो रहा है। कभी-कभी, जैसे मैं इस तरह की वीडियो देखता हूँ, तो मैं ख़ुद भी उसमें खो जाता हूँ। या फिर मेरे आसपास वाले कुछ लोगों को देखता हूँ कि इस तरह के वीडियोज़ पर वो रीक्रिएट भी करने लगते हैं, मतलब वाइब मैच करने लगते हैं।

तो हम लोग ऐसे समझ क्यों नहीं पाते? मतलब हमारे लिए हर एक अच्छे म्यूज़िक के साथ चलने वाला वीडियो हमें लगता है कि हाँ, इसने जीवन का राज़ बता दिया, और शायद इसमें कही गई बात ही मेरे जीवन का फ़लसफ़ा हो सकती है। तो हम उसमें इंटू हो जाते हैं, देख नहीं पाते कभी।

आचार्य प्रशांत: म्यूज़िक तो बढ़िया रहता है।

प्रश्नकर्ता: हाँ, म्यूज़िक बढ़िया रहता है।

आचार्य प्रशांत: बिल्कुल लगता है, नाच ही दो। नहीं, यह जो बात है, कि “अपने अनुसार जियो, किसी और के अनुसार नहीं जियो,” यह बात अपने आप में ठीक है, शुरुआत करने के लिए, बढ़िया बात है। इसमें कोई बुराई नहीं है, बस यह बात अधूरी है।

देखो, सबसे निचले तल के लोग वो होते हैं जो दूसरों के हिसाब से जी रहे होते हैं। ठीक है? वहाँ पर जो आपकी ग़ुलामी होती है, वह बिल्कुल प्रकट होती है, सामने होती है, स्पष्ट होती है। आपको किसी ने बाहर से घुड़क दिया, आज्ञा-आदेश दिया, क्या? चल, तू ऊपर चल, सीढ़ी पकड़, ऊपर चला जा, और आप ऊपर चले गए। तो यह दिख जाता है कि आदमी किसी और की ग़ुलामी कर रहा है।

तो ऐसे लोगों के लिए यह बात ठीक है कि तुम अपने अनुसार जियो, या अपनी ख़ुशी के लिए जियो, अपने रंग से, अपने ढंग से जियो। वो ठीक है। यह आपसे कहा जा रहा है कि दूसरे से डरने की, झुकने की कोई ज़रूरत नहीं है। ठीक है। लेकिन यह बात मैंने कहा, अधूरी है। अधूरी इसलिए है क्योंकि दूसरों की ग़ुलामी से ज़्यादा ख़तरनाक होती है? बोलिए? अपनी ग़ुलामी।

दूसरों की ग़ुलामी से ज़्यादा ख़तरनाक होती है अपनी ग़ुलामी। और आज का समय दूसरों की गुलामी का तो है ही नहीं।

दास-प्रथा, गुलामों की ख़रीद-फ़रोख़्त, यह सब तो ख़त्म हो चुकी है, कि नहीं? रंगभेद, जातिवाद, इनको भी क़ानूनन निषिद्ध किया जा चुका है। तो कोई आपके ऊपर चढ़ करके एक्सप्लिसिटली आपका मालिक, आपका कमांडर तो बन नहीं सकता। आप समाज के किसी वर्ग से आते हों, किसी वर्ण से आते हों, किसी लिंग से आते हों, क़ानून ने आपको अधिकार दे रखे हैं, आपकी सुरक्षा के उपाय कर रखे हैं। है न?

तो आज बाहर से कोई नहीं आएगा आपको नियंत्रित करने। आज बाहर से कोई नहीं आएगा आपके गले में पट्टा डालकर आपको ग़ुलाम बनाने। आज की जो समस्या है, वह वही है जो तुमने बोला, ब्लाइंड फ़्रीडम; जहाँ आदमी बाहर वाली तो किसी ताक़त का ग़ुलाम नहीं है, पर भीतरी ताक़त का ग़ुलाम हो गया है। और वो भीतरी ताक़त क्या है? अहंकार। और वो अहंकार आया कहाँ से है? बाहर से आया है।

ऐसे समझो, कि मैं तुम्हारी कनपटी पर बंदूक रखकर कहूँ कि मुझे ₹1000 दे दो। तो तुम कहोगे, “मैं अपने रंग से जिऊँगा, मैं अपने ढंग से जिऊँगा, अपनी ख़ुशी के हिसाब से चलूँगा, मैं किसी के आगे नहीं झुकूँगा।” वही सब जो रील्स में चलता है। है ना? और तुम विरोध कर दोगे और कहोगे, “मुझे किसी की नहीं सुननी, जहाँ मेरी ख़ुशी है, मैं तो वही करूँगा।” तुम ये सब कर दोगे।

लेकिन मैं तुमसे कहूँ कि मुझे ₹1000 देने से ऐसे-ऐसे लाभ होते हैं, यह होता है, वो होता है, तमाम तरह के झूठ लेकर के मैं तुम्हारे मन के अंदर घुस जाऊँ। तब तुम अपनी स्वेच्छा से मुझे हज़ार दे दोगे। यह ज़्यादा ख़तरनाक हो गया मामला। अब आपको नियंत्रित करने वाला औज़ार कोई बंदूक नहीं है, जो आपकी कनपटी पर रखी गई हो। अब आपको नियंत्रित करने वाला औज़ार एक चिप है, जो आपके ब्रेन में लगा दी गई है, और उसको बाहर से रिमोट से कंट्रोल किया जा रहा है। और यह बात बड़ी लिबरल लगती है।

किसी से ज़बरदस्ती कोई काम कराओ, तो विरोध करेगा। पर किसी को सेड्यूस कर दो, किसी को टेम्प्ट कर दो, किसी को कंडीशंड कर दो, किसी के भीतर लालच भर दो, भय भर दो, भ्रम भर दो, और फिर अपना उल्लू सीधा करो, फिर उसकी जेब खाली करो। तो यह बात ऐसा लगता है कि यह तो मेरी स्वेच्छा की अभिव्यक्ति है। मैंने किसी के दबाव में ₹1000 नहीं दिए, मैंने तो अपनी स्वेच्छा से दिए हैं। और ये स्वेच्छा झूठी है।

अब आप कहोगे, “मेरी डिज़ायर थी, साहब, मेरी डिज़ायर थी, मैंने इसलिए ₹1000 दिए हैं।” पर वो डिज़ायर आपकी है नहीं। वो डिज़ायर तो आपके भीतर डाली गई है। और जो आज का युग है, वो एक्सटर्नल कोअर्ज़न का नहीं, इंड्यूस्ड डिज़ायर का है। एक्सटर्नल कोअर्ज़न माने बाहर से ज़बरदस्ती की गई। इंड्यूस्ड डिज़ायर माने बाहर से ज़बरदस्ती नहीं करेंगे, नहीं तो क़ानूनन गलत हो जाएगा। तो आपके भीतर हम चालाकी से एक भावना पैदा कर देंगे, जिसमें हमारा काम निकल जाए, हमारा स्वार्थ पूरा हो जाए।

तो आप बोलो बार-बार, “मैं तो वही करूँगा जिससे मुझे खुशी मिलती है।” पर तुम यह तो बता दो कि तुम्हें किसने सिखाया किस काम में खुशी मिलती है। बताओ न।

एक आदमी मिलावटी माल बेचता है। उसको मिलावट करने में खुशी मिलती है, तो वो तो नाचेगा, मैं तो वही करूँगा जिससे मुझे खुशी मिलती है। बहुत लोग होते हैं, जिनको दूसरों को तकलीफ़ देने में खुशी मिलती है। वो कहेंगे, मैं तो वही करूँगा जिसमें खुशी मिलती है। बहुत लोग हैं जिन्हें जानवरों का गला काट करके खाने में खुशी मिलती है। वो कहेंगे, मैं तो वही करूँगा जिसमें खुशी मिलती है।

बहुत लोग हैं जिनके पास करने को कुछ नहीं होता, तो उन्हें अंधाधुंध शॉपिंग करके खुशी मिलती है। वो कहेंगे, मुझे तो यही बताया गया है। मैंने तो वाइब पर डांस भी किया कि मैं तो वही करूँगा जिससे मुझे खुशी मिलती है। तो मैं क्या कर रहा हूँ? मैं जाकर के फ़िज़ूल अंधाधुंध शॉपिंग करूँगा।

अच्छा, खुशी मिलती है कि नहीं मिलती है किसी को नीचा दिखा देने में? दिल से बोलना। बोलो जल्दी। किसी से रगड़ा चल रहा हो, उसको नीचा दिखा दिया, खुशी मिलती है कि नहीं? अरे, मुझे मिलती है अब बताओ। अब ठीक है। तो ये तो जो शिक्षा आ गई, यही आ गई कि दूसरों को नीचा दिखाओ। अगर तुम्हें नीचा दिखाने में खुशी मिलती है। पहले तो यह सीखना पड़ेगा न कि यह जो मेरा खुशी का सिद्धांत है, यह आया कहाँ से? इसको दर्शन कहते हैं।

बाक़ी ये सब बातें शुरुआती तौर पर ठीक हैं। आगे बहुत उथली बातें हैं ये, कि “मैं अपने हिसाब से जिऊँगा।” तुम्हारा हिसाब तुम्हारा अपना है ही नहीं। तुम्हारा हिसाब सोशली कंडीशंड है। और तुम कह रहे हो, “मैं तो अपने हिसाब से जिऊँगा।” अपना हिसाब माने क्या? अपना है क्या?

तुम्हारी आदत तुम्हारी नहीं। तुम्हारी मान्यता तुम्हारी नहीं। तुम्हारे फ़ैसले तुम्हारे नहीं। तुम्हारी कल्पनाएँ तुम्हारी नहीं। तुम्हारी आशाएँ तुम्हारी नहीं। ये सब तुम्हारे भीतर इंप्लांटेड हैं, आरोपित हैं।

और तुम कह रहे हो, “मैं तो अपने हिसाब से चलूँगा।”

तो ये बड़ी थोड़ी, यू नो, नासमझी की बात है। इमैच्योर बात है ये, लिबर्टीरियन वैल्यूज़ यही होती हैं सारी। द इंडिविजुअल इज़ सुप्रीम, और इंडिविजुअल जो भी करना चाहता है, उसको करने दो। यही तो फ़्रीडम है। आपको लगता है, इसी को फ़्रीडम बोलते हैं? यही है फ़्रीडम? कि भाई, इंडिविजुअल जो भी करना चाहता है, उसे करने दो।

गीता प्रतिभागी कितने हैं?

(श्रोता हाथ उठाते हैं)।

यही है फ़्रीडम? कि जो भी कोई करना चाहता है उसे करने दो। यही तो है स्वतंत्रता, इसी को तो मुक्ति बोलते हैं। हाँ, यही है? और यह जब आपसे कोई बोले, तो अच्छा तो लगता है सुनने में। मज़ा आ जाता है, कि “तेरे जो जी में आए, कर जा, सिमरन, जी ले अपनी ज़िंदगी।” अब सिमरन भाग गई है ड्रग एडिक्ट के साथ, उसने ड्रग्स के साथ सिमरन को भी बेच दिया। पर सिमरन को मौज आ गई थी, जब बाप ने बोला, “जा, सिमरन। मैं बन गया लिबर्टेरियन। अब जा ले, जी ले अपनी ज़िंदगी।”

अरे, सिमरन को पता कहाँ है कि ज़िंदगी माने क्या? सिमरन ने सीखा कहाँ कि जीना बोलते किसको हैं? और जिसे जीव कहते हैं, जो जिएगा, वो कौन है? हू ऐम आई? मैं कौन हूँ? कोऽहम्? इस प्रश्न पर तो सिमरन अपने जीवन में कभी आई ही नहीं।

पर सिमरन को बोला जा रहा है, नहीं, तू अपने हिसाब से कर। जिसमें तुझे ख़ुशी मिलती है, भाई, वही कर। और आपको ऐसे लोग मिले होंगे जो कहते होंगे, स्पिरिचुअलिटी वग़ैरह की कोई ज़रूरत नहीं, भाई। जिसको जिस काम में मौज आती है, वो करो। कितने लोग ऐसे हैं, कुछ लोगों को जानते हैं? बोलते हैं, छोड़ो ये सब इतनी तुम गहरी फ़िलॉसफ़ी वग़ैरह क्या बता रहे हो? जिसको जिस चीज़ में खुशी मिले, उसे वही करना चाहिए।

जैसे ही कोई बोले, जिसको जिस चीज़ में खुशी मिलती है, वही करना चाहिए। फटाक से एक-दो उसको। “मुझे काहे को मारा?” बोलो, मुझे इसमें खुशी मिलती है।

ये इतनी मूर्खतापूर्ण बात है, कि जिसको जिसमें खुशी मिलती है, वही करें। और पूरी पृथ्वी का सत्यानाश इसी तरह की बातों से तो हुआ न। यह क्लाइमेट चेंज और क्या है? हर इंसान वही कर रहा है जिसमें उसे खुशी मिलती है, तो हो गई पृथ्वी बर्बाद।

खुशी क्या है? खुशी तो एक कंडीशंड कंस्ट्रक्ट है, भाई। द पर्स्यूट ऑफ हैप्पीनेस, वह सिर्फ़ कंडीशंड भी नहीं है; वह एक इंडस्ट्रियल और कैपिटलिस्ट कंस्ट्रक्ट है। हर प्रोडक्ट जो बाज़ार में मिल रहा है, बिक रहा है, वो इसीलिए तो बिक रहा है कि इसको ले लोगे तो तुम्हें क्या मिल जाएगी? खुशी।

आप जब भी पैसे ख़र्च करते हो, तो क्या ख़रीदने के लिए करते हो? प्रोडक्ट नहीं, खुशी। तो यह तो भोगवाद है, और कुछ नहीं है। और कुछ भी नहीं है।

रेपिस्ट रेप करता है, किस लिए करता है? मुझे खुशी मिलती है इसी में। पर यह सब बातें सुन के सबको बहुत मज़ा आता है। महिलाओं को ही मज़ा आता है, वो भी नाचती हैं, कि तुम वही करो जिसमें ख़ुशी मिलती है। और रेपिस्ट ने ये बात सुन ली तो?

प्रश्नकर्ता: सर, हम अवेयर कैसे हो पाएँ? क्योंकि जब इस तरह का कंटेंट या किसी पॉडकास्ट...

आचार्य प्रशांत: ये तीन साल से यह भगवद्गीता किस लिए चल रही है? तीन साल से ज़्यादा हो गए।

अगर सब पढ़ने के बाद भी, वेदान्त, माध्यमिक दर्शन, अष्टावक्र, नागार्जुन, लाओ त्ज़ु, सबको मिलने के बाद भी, आपके कान में इस तरह की कोई बात पड़ती है, बचकानी, आधी-अधूरी, और आप उससे प्रभावित हो जाते हो, और आप भी वाइब पर नाचना शुरू कर देते हो। तो फिर हमारी सारी मेहनत बेकार ही गई न।

प्रश्नकर्ता: थैंक यू।

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
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