बहुत लोग होते हैं, जिनको दूसरों को तकलीफ़ देने में खुशी मिलती है। बहुत लोग हैं, जिन्हें जानवरों का गला काट करके खाने में खुशी मिलती है। वो कहेंगे, “मैं तो वही करूँगा, जिसमें खुशी मिलती है।” पहले तो यह सीखना पड़ेगा न कि यह जो मेरा खुशी का सिद्धांत है, यह आया कहाँ से? आज की समस्या है, ब्लाइंड फ़्रीडम; जहाँ आदमी बाहर वाली तो किसी ताक़त का ग़ुलाम नहीं है, पर भीतरी ताक़त का ग़ुलाम हो गया है। और वो भीतरी ताक़त क्या है? अहंकार।
यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।
प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी। मेरा सवाल सोशल मीडिया से रिलेटेड है। सोशल मीडिया पर मैं देख रहा हूँ, आजकल एक वाइब कल्चर ट्रेंड होता जा रहा है। कि रील्स आती हैं, उनमें एक अट्रैक्टिव-सा सेल्फ अम्यूज़िंग-टाइप म्यूज़िक बज रहा होता है, और पीछे से कुछ शायरी चल रही होती है।
तो जैसे मैं एक शायरी पढ़ के सुना दूँ, मतलब कुछ कोट्स चल रहे होते हैं। लाइक कि जैसे: “तुम जैसे हो, बस वैसे जियो; बुरे तो बुरे, भले तो भले। तुम कह दो, उस परमात्मा ने तुम्हें बनाया उसकी ऐसी मर्ज़ी थी। स्वीकार करे दुनिया तो ठीक, न स्वीकार करे तो ठीक।” और एक और बोलना चाहूँगा, “तुम अपने ही अनुसार जीना। टूटना हो तो टूट जाना, मगर झुकना मत। अपने ही रंग से जीना।”
सर, इस तरह का कल्चर बहुत ज़्यादा वायरल हो रहा है। कभी-कभी, जैसे मैं इस तरह की वीडियो देखता हूँ, तो मैं ख़ुद भी उसमें खो जाता हूँ। या फिर मेरे आसपास वाले कुछ लोगों को देखता हूँ कि इस तरह के वीडियोज़ पर वो रीक्रिएट




