तुम जिस भी क्षेत्र में उत्कृष्टता हासिल करने जाते हो और कर लेते हो, उस उत्कृष्टता की दुनिया तुरंत बोली लगानी शुरू कर देती है। इसीलिए तो दुनिया के जितने भी कॉम्पिटेंट लोग हैं, वह शैतान की सेवा में लगे हुए हैं। वह बोली ऊँची लगाता है और ढंग के कामों के लिए कॉम्पिटेंट लोग मिलने बहुत मुश्किल है। सारा खेल ही इसी बात का है कि कर क्या रहे हो? कितनी कुशलता से कर रहे हो, ये पीछे की बात है। आदमी ऐसा चाहिए, अर्जुन जैसा, कॉम्पिटेंट भी हो और कृष्ण के साथ भी है। तब फिर गीता बरसती है। तब आता है मज़ा।
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प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी। मेरा प्रश्न कॉरपोरेट-वर्ल्ड को लेकर है। आई हैव नोटिस्ड कि मेरे अंदर जितना भी विज़डम उतरा है, एटलीस्ट मैक्सिमम जितना उतरा है, इट्स बीन थ्रूड वर्क बाई डूइंग डिफरेंट थिंग्स। तो अलग-अलग चीज़ें चुनौती उठाकर ये हुआ है। ऐसा भी नहीं था कि मैं कुछ आइडियल कुछ उसकी तरफ़ जा रहा था, ऐसा कुछ। बस जो आया सामने, आई वांटेड टू मास्टर इट। एंड उसी से जो विवेक है, जितना भी है अभी, उसी से उतरा है।
तो इन ए कॉरपोरेट वर्ल्ड, यू हैव दैट सेम फ्रेम। कुछ चुनौतियाँ मिलती हैं एंड एटलीस्ट इन ए कॉरपोरेट वर्ल्ड, आपने भी बोला था पहले दिन में, विच इज़, एक्सीलेंस इज़ ए नेसेसरी कंडीशन एंड एक्सीलेंस इज़ नॉट ईज़ी।
तो ये कॉरपोरेट वर्ल्ड में, व्हाय कैन नॉट कॉरपोरेट वर्ल्ड बी यूज़्ड एज़ ए मीडियम, एजुकेशनल मीडियम, जहाँ पर जो प्रोजेक्ट्स हैं, ऑल्दो, आइडियल




