अपनी क़ाबलियत किसे बेच रहे हो?

Acharya Prashant

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अपनी क़ाबलियत किसे बेच रहे हो?
तुम जिस भी क्षेत्र में उत्कृष्टता हासिल करने जाते हो और कर लेते हो, उस उत्कृष्टता की दुनिया तुरंत बोली लगानी शुरू कर देती है। इसीलिए तो दुनिया के जितने भी कॉम्पिटेंट लोग हैं, वह शैतान की सेवा में लगे हुए हैं। वह बोली ऊँची लगाता है और ढंग के कामों के लिए कॉम्पिटेंट लोग मिलने बहुत मुश्किल है। सारा खेल ही इसी बात का है कि कर क्या रहे हो? कितनी कुशलता से कर रहे हो, ये पीछे की बात है। आदमी ऐसा चाहिए, अर्जुन जैसा, कॉम्पिटेंट भी हो और कृष्ण के साथ भी है। तब फिर गीता बरसती है। तब आता है मज़ा। यह सारांश प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन के स्वयंसेवकों द्वारा बनाया गया है

प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी। मेरा प्रश्न कॉरपोरेट-वर्ल्ड को लेकर है। आई हैव नोटिस्ड कि मेरे अंदर जितना भी विज़डम उतरा है, एटलीस्ट मैक्सिमम जितना उतरा है, इट्स बीन थ्रूड वर्क बाई डूइंग डिफरेंट थिंग्स। तो अलग-अलग चीज़ें चुनौती उठाकर ये हुआ है। ऐसा भी नहीं था कि मैं कुछ आइडियल कुछ उसकी तरफ़ जा रहा था, ऐसा कुछ। बस जो आया सामने, आई वांटेड टू मास्टर इट। एंड उसी से जो विवेक है, जितना भी है अभी, उसी से उतरा है।

तो इन ए कॉरपोरेट वर्ल्ड, यू हैव दैट सेम फ्रेम। कुछ चुनौतियाँ मिलती हैं एंड एटलीस्ट इन ए कॉरपोरेट वर्ल्ड, आपने भी बोला था पहले दिन में, विच इज़, एक्सीलेंस इज़ ए नेसेसरी कंडीशन एंड एक्सीलेंस इज़ नॉट ईज़ी।

तो ये कॉरपोरेट वर्ल्ड में, व्हाय कैन नॉट कॉरपोरेट वर्ल्ड बी यूज़्ड एज़ ए मीडियम, एजुकेशनल मीडियम, जहाँ पर जो प्रोजेक्ट्स हैं, ऑल्दो, आइडियल नहीं हैं, बट एटलीस्ट* लोग उसमें एक्सीलेंस छूते हुए, *दे कैन लर्न, यू नो, थ्रू द वर्क। अगर वो एक सॉल्यूशन है क्योंकि कॉरपोरेट में एटलीस्ट वो ऑनेस्टी है टूवर्ड्स एक्सीलेंस कि ये काम अच्छा करना है, ढँग से करना हैं, ऑर एल्स देयर इज़ नो अदर वे, तो एटलीस्ट वो ऑनेस्टी टूवर्ड्स एक्सीलेंस है। एंड वो मैं काफ़ी कॉरपोरेट के बाहर काफ़ी चीज़ों में, आध्यात्मिक इंस्टीट्यूशन्स में भी मैंने देखा नहीं है।

तो एटलीस्ट कॉरपोरेट में इफ़ वी हैव टू चैनलाइज़ दैट, हाऊ वुड वी डू इट? और या आपकी ये राय है कि कॉरपोरेट इज़ नॉट एट ऑल द मीडियम टू रियली ब्रिंग आउट विज़डम एंड कैरेक्टर।

आचार्य प्रशांत: नहीं, कुछ चीज़ें हैं जो वहाँ आप सीखते हो। जो वहाँ सीखते हो उसका आप किसलिए इस्तेमाल करोगे, वो आप जानो।

उदाहरण के लिए कोई कॉरपोरेट में है तो वो प्रोडक्टिव होना सीख लेगा। वो सीख लेगा कि कोई काम कर रहे हो तो उसमें जो स्पेक्स हैं उनके आख़िरी अंत तक जाना है। स्पेसिफ़िकेशन दी गईं है कि ये पूरी करनी है, आप करोगे। एक अनुशासन है वो भी आप सीख लोगे। जिस चीज़ में जितनी अलाउंस दी जा रही है उसके भीतर काम करना आप सीख लोगे। मैन्युफैक्चरिंग में हो चाहे कहीं भी हो। वो सब आप सीखोगे, अच्छी बात है। उसका इस्तेमाल लेकिन क्या करना है, वो आपको फिर देखना है।

तो व्यवहारिक कुशलताएँ हासिल करने के लिए कॉरपोरेट अच्छी जगह है। पर आमतौर पर वो कुशलताएँ तो आप हासिल कर ही लेते हो दो-चार साल में। कई बार उतना भी नहीं लगता है। ठीक-ठाक जगह से पढ़े लिखे हो तो जो व्यवहार कुशलता कॉरपोरेट में चाहिए, वो आप अपनी पढ़ाई से ही लेकर निकले होते हो। तो थोड़ा सा कॉरपोरेट एक्सपोज़र पर्याप्त होता है। बीस साल कॉरपोरेट में काम करके क्या करोगे? बीसवें साल में तुमने कौन सी अतिरिक्त कुशलता हासिल कर ली?

और ज़िंदगी क्या दो-सौ साल की है? ये सब जो कुशलताएँ हासिल कर रहे हो, कुछ सीख लिया है। कोई चीज़ बताओ तुम वहाँ सीख रहे हो? स्टैटिस्टिकल एनालिसिस सीख लिया है। उसका क्या करोगे? पैसे कमाने के अलावा उसका उपयोग क्या बच रहा है? या तुम बहुत पारंगत हो गए हो कॉरपोरेट में एक-आध-दो साल काम करके, माइक्रोसॉफ्ट एक्सेल में ही तुम बिल्कुल विशेषज्ञ बन गए हो। सब कुछ करते हो, मैक्रोज़ लिखते हो, ये वो। करना क्या है उसका? अच्छी बात है कि सीखा, पर उसका क्या करना है ये तो तुम तय करोगे न अब।

टाइम मैनेजमेंट तुम्हारा बहुत अच्छा हो गया है। बिल्कुल तुम्हारी आदत बन गई है कि दस बजे बुलाया है, दस ही बजे पहुँच जाएँगे। जो काम छह बजे निपटाना है, छह बजे तक निपटा भी देंगे। पर कौन सा काम निपटा रहे हो? टाइम मैनेजमेंट अच्छी बात है, उस टाइम का कर क्या रहे हो? ये देखना पड़ेगा।

प्रश्नकर्ता: करेक्ट। मतलब आप जो बोल रहे हो, इट्स मोर अराउंड स्किल्स, जो आप बोल रहे हो। बट मैंने नोटिस किया है कि अगर एक अच्छा कॉरपोरेट है तो मतलब एट ईच स्टेज, आपको ऐसे एक्सपीरिएंसेस मिलेंगे, जैसे लीडिंग पीपल।

आचार्य प्रशांत: टूवर्ड्स व्हॉट?

प्रश्नकर्ता: टूवर्ड्स एनी, व्हॉटएवर…

आचार्य प्रशांत: एनीथिंग क्या होता है? जैसे पाइड-पाईपर लेकर गया था सबको मारने के लिए। वो भी तो लीड ही कर रहा था।

प्रश्नकर्ता: बट थ्रू दैट प्रोजेक्ट पीपल कैन लर्न समथिंग अबाउट देमसेल्व्स लाइक आई हैव नोटिस्ड, इफ़ आई हैव फेल्ड ऑन समथिंग, आई हैव नोटिस्ड समथिंग ईज़ यूजयुएली…

आचार्य प्रशांत: बिल्कुल अच्छी बात है। यू लर्न अबाउट योर वीकनेसेज़ एंड यू इंप्रूव दैम, बट टूवर्ड्स व्हॉट?

भाई आप अभ्यास करते हो, दुर्योधन ने भी, जितने दिन पाण्डव अज्ञातवास में थे उतने दिन दुर्योधन अभ्यास कर रहा था। किसका अभ्यास कर रहा था? गदा चलाने का। बहुत बढ़िया गदा चलाने लग गया वह। टूवर्ड्स व्हॉट? तो वो सब ठीक है कि लीडिंग पीपल आ गया, टूवर्ड्स व्हॉट? मुझे कोई ऐतराज़ नहीं है लीडिंग पीपल से। बहुत अच्छी बात है आपमें नेतृत्व की क्षमता आ जाए। पर वो जो नेता है वो अपने अनुयायियों को लेकर कहाँ जा रहा है?

प्रश्नकर्ता: इफ़ आई कैन एड, आई थिंक इन माई व्यू, इट्स टूवर्ड्स द बेस्ट वर्क, जो है….

आचार्य प्रशांत: कौन सा वर्क?

प्रश्नकर्ता: उनका, जो भी उनके अंदर जो कुछ भी।

आचार्य प्रशांत: जो भी क्या होता है?

प्रश्नकर्ता: जो भी विवेक है।

आचार्य प्रशांत: हाँ।

प्रश्नकर्ता: मैक्सिमम जितना उतार पाएँगे।

आचार्य प्रशांत: और उस विवेक में यही पता चले कि वो वर्क ही नहीं करना है?

प्रश्नकर्ता: तो दे कैन लीव, दैट्स फाइन।

आचार्य प्रशांत: डज़ दैट हैपन? तुम्हारे जो सबसे एक्सीलेंट कॉरपोरेट्स हैं फिर तो उसमें हाइएस्ट एट्रिशन रेट होना चाहिए क्योंकि जो सबसे बढ़िया कॉरपोरेट है, तुम्हारे अनुसार विवेक उसमें सबसे ज़्यादा जागृत होगा तो फिर सबसे ज़्यादा लोगों को उन्हें छोड़ना चाहिए। डज़ इट हैपन, दैट द बेस्टेस्ट ऑफ द कॉरपोरेट्स हैव द हाइएस्ट एट्रिशन रेट्स? डज़ दैट हैपेन? होता तो ये है कि जितना तुममें ये सब चीज़ें जागृत होती हैं तुम उतना ज़्यादा गुड़ की मक्खी की तरह पैसे से चिपकते हो।

प्रश्नकर्ता: व्हॉट आई हैव सीन इज़, जो मेरे हिसाब से जो एबल पीपल हैं जिनमें हू आर कॉम्पिटेंट एंड वाइज़, कॉरपोरेट में।

आचार्य प्रशांत: कॉम्पिटेंट टूवर्ड्स व्हॉट? द बेस्ट मक्खी?

प्रश्नकर्ता: नो, दे हैव ए स्पार्क इन दैम, आई मीन।

आचार्य प्रशांत: टूवर्ड्स व्हॉट? व्हॉट डू दे बर्न विद दैट स्पार्क? ऑल द अमेज़न फॉरेस्ट्स?

प्रश्नकर्ता: नो, उनके वर्क में दिखता है।

आचार्य प्रशांत: कौन सा वर्क?

प्रश्नकर्ता: व्हॉटएवर दे।

आचार्य प्रशांत: व्हॉटएवर क्या होता है? ये व्हॉटएवर क्या है? तुम कुछ भी करोगे और अच्छे से करने लग गए तो तुम कहोगे मैं सफल हूँ? ये व्हॉटएवर क्या होता है? सारा खेल ही इसी बात का है कि कर क्या रहे हो? कितनी कुशलता से कर रहे हो, पीछे की बात है।

तुम कुशलता की बात कर रहे हो और इस बात पर आना ही नहीं चाहते कि क्या कर रहे हो। क्या कर रहे हो? क्यों कर रहे हो? ये करने को पैदा हुए थे? कोक बेच रहे हैं विद ग्रेट कॉम्पिटेंस एंड एक्सिलेंस, फिज़ी ड्रिंक्स, फिज़ी लाइफ़।

वो बहुत अच्छा एम्प्लॉयर है, बहुत पैसे देता है। ये करने को पैदा हुए थे कि सबको ये पिलाएँगे पानी में कार्बोनिक एसिड बना करके, शक्कर बहुत सारी डाल करके?

प्रश्नकर्ता: नथिंग इज़ टू ऐड।

आचार्य प्रशांत: हाउ यू डू इट इज़ नॉट द थिंग। व्हाट यू आर डूइंग इज़ द थिंग, एंड हाउ फॉलोज़ व्हाट।

अगर जो कर रहे हो वो सही है तो वो चीज़ तुम्हें मजबूर कर देगी उसको अच्छे से, कुशलता के साथ करने के लिए। और जो तुम कर रहे हो वो ठीक नहीं है फिर भी उसे कुशलता के साथ कर रहे हो तो ये बहुत ख़तरनाक बात है।

जो तुम कर रहे हो ठीक नहीं है फिर भी कुशलता के साथ कर रहे हो, तो ये तो कितनी ज़्यादा खतरनाक बात है न, कि नहीं है?

जंगल काटने में एक्सीलेंस पूरी है।‌ फुली ऑटोमेटेड स्टेट ऑफ द आर्ट स्लॉटर हाउस, एक्सीलेंट स्लॉटर हाउस, ग्रेट प्रोडक्टिविटी एंड दे हैव ए ग्रेट लीडर देयर जो कि अपनी टीम को मार्शल करके रखता है, “और जानवर काटेंगे।” क्या कॉम्पिटेंस है!

प्रश्नकर्ता: धन्यवाद।

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। मेरा क्वेश्चन एक्सीलेंस को लेकर ही है, कि आपने कहा था फर्स्ट-डे में, जब एक्सीलेंस अचीव हो जाए, उसके बाद उसको समर्पित कर दीजिए श्रीकृष्ण को।

तो एक्सीलेंस को अचीव करने में बुद्धि का काफ़ी बड़ा रोल होगा और मुझे ऐसा लगता है कि जब वो अचीव होने लगेगा, जब वो प्वाइंट आएगा, तभी मन; क्योंकि वो माया के ट्रैप में है, वो ये करेगी कि और अचीव करना है। वो अभी तक आया नहीं है और वो क्योंकि ख़ुद को समर्पित कभी नहीं करना चाहेगी। तो वो कैसे डील करें इस सिचुएशन से?

आचार्य प्रशांत: ज़बरदस्ती करो और क्या करोगे? पर बिल्कुल जायज़ सवाल है इनका। तुम जिस भी क्षेत्र में उत्कृष्टता हासिल करने जाते हो और कर लेते हो, उस उत्कृष्टता की दुनिया तुरंत बोली लगानी शुरू कर देती है। और दुनिया बड़ी ऊँची बोली लगाएगी। तुम इतने प्रवीण हो, एक्सीलेंट हो, उत्कृष्ट हो, दुनिया ऊँची बोली लगती है, “आओ आओ आओ, हमारे स्लॉटर हाउस को समर्पित कर दो अपनी उत्कृष्टता।” रन इट वेरी कॉम्पिटेंटली, प्लीज़। हम तुम्हें हायर करना चाहते हैं, तुम इतने उत्कृष्ट हो गए हो, आओ ना। और और मुश्किल हो जाएगा श्रीकृष्ण की तरफ़ जाना, बिल्कुल सही बात है।

इसीलिए तो दुनिया के जितने भी कॉम्पिटेंट लोग हैं, वो शैतान की सेवा में लगे हुए हैं। वो बोली ऊँची लगाता है। और ढँग के कामों के लिए कॉम्पिटेंट लोग मिलने बहुत मुश्किल है। और मिलते भी हैं तो वो अपनी इतनी कीमत बताते हैं कि उनको लाएँ कहाँ से?

संस्था का आईटी का काम है, हमारा पूरा आईटी डिपार्टमेंट है, उसको लोगों की सख़्त ज़रूरत है। मिलते नहीं, जो मिलते हैं वो बोलते हैं, इतने हज़ार रुपए चाहिए महीने के, इतने लाख चाहिए। कई भग जाते हैं कि उतने लाख दिए नहीं इसलिए भाग रहे हैं।

भैया, हम आईटी के; और जो हम काम कर रहे हैं आईटी में, वो सॉफिस्टिकेटेड काम है। वो हल्का-फुल्का नहीं है कि ऐसे ही कुछ बना दिया। ऐप का काम है और दस काम हैं। लोग नहीं मिलते। जाओ किसी के पास, उसके पास ऊँची डिग्री हो, तुरंत मुँह खोल कर कहेगा। वो संस्था से जुड़ा हुआ है, संस्था के शिविर कर रखे होंगे अटेंड। कहेंगे, ”तीन साल से आपके साथ हैं आचार्य जी, तीन साल से आपके साथ हैं।“

अरे तो आ ही जाओ न। हमें आईटी के लोगों की ज़रूरत है।

“नहीं नहीं नहीं, देखिए उसके लिए तो इतने लाख रुपए महीने के दे ही दीजिए न। उससे कम में नहीं आएँगे हम।” उनको खरीद रखा है गूगल ने और अमेज़न ने। वो बिके हुए हैं, उनको यहाँ बुलाओ वो नहीं आते। तो वो तो है ही।

हाँ, हम कभी भी कहेंगे कि हमें संस्था में लोग चाहिए तो झटके से पाँच-सौ-हज़ार आवेदन आ जाते हैं। वो किनके आते हैं? जो कॉम्पिटेंट ही नहीं होते, जो दुनिया से बिल्कुल परित्यक्त हैं। जिन्हें कहीं नौकरी नहीं मिल रही दस साल से। वो खट से कहेंगे, “आप बुला लीजिए। आप आचार्य जी, आप हमें दस हज़ार भी देंगे तो चलेगा।”

अब ये ज़्यादातर वो लोग हैं जिन्हें कहीं दस हज़ार भी नहीं मिल रहा था और ये जता ऐसे रहे हैं कि आचार्य जी हम आपसे इतना प्यार करते हैं कि आप दस हज़ार भी देंगे तो चलेगा।

तो मैं कह रहा हूँ आदमी ऐसा चाहिए, अर्जुन जैसा, कॉम्पिटेंट भी है और श्रीकृष्ण के साथ भी है। तब फिर गीता बरसती है। तब आता है मज़ा

और इसीलिए फिर जो गीता का अंतिम श्लोक है, कितना मार्मिक है। कह रहे हैं, “जब ये दोनो होंगे तब आनंद और ऐश्वर्य की वर्षा होगी। सिर्फ़ श्रीकृष्ण के होने भर से नहीं होगा।“ वे कह रहे हैं, अर्जुन होंगे और श्रीकृष्ण होंगे। जहाँ ये दोनों एक साथ होंगे, वहाँ आनंद, अमृत होगा। नहीं, श्रीकृष्ण तो हैं हीं। वो सत्य हैं, सत्य कहाँ चला जाएगा। अर्जुन नहीं मिलता न। जब दोनों हो जाते हैं, तब आता है मज़ा।

तो देखो कि क्या ऐसा कर सकते हो कि ऊँचे भी हो, दुनिया के बाज़ार में तुम्हारी कीमत भी खूब है, उसके बाद भी श्रीकृष्ण के साथ रहो।

कौरवों की नहीं, पाँडवों की तरफ़ नज़र आओ। भले ही पाँडवों की तरफ़ लोग कम हैं, सेना छोटी है, संसाधन कम हैं, फिर भी उधर नजर आओ।

प्रश्नकर्ता: थैंक-यू गुरुजी।

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
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