आदमी बेरोज़गार हो जाए तो दुनिया लानतें भेजती है। औरत बेरोज़गार घर में पड़ी है, उसे तो कोई कुछ कहता भी नहीं। घर में घुसे-घुसे वो दुनिया से ऐसी कट जाती है कि उसे कोई ख़बर नहीं रहती। उसका व्यक्तित्व कुंठित हो जाता है। ये ख़तरनाक बात है। स्त्रियों के लिए विशेषतया ज़रूरी है कि वो ज़िंदगी के किसी भी मुक़ाम पर आर्थिक रूप से परनिर्भर न हो जाए। हर चीज़ से समझौता कर लेना, कमाने से मत करना। कम कमाओ, लेकिन इतना तो ज़रूर कमाओ कि रोटी अपनी खाओ। बात तुलना की नहीं है, बात आत्मनिर्भरता की है।
यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।
आचार्य प्रशांत: स्त्री के लिए तो बहुत-बहुत ज़रूरी है अपने पाँव पर खड़ा होना। हर चीज़ से समझौता कर लेना, कमाने से मत करना। आदमी के लिए भी ज़रूरी है, औरत के लिए भी। पर लड़कियों के लिए, स्त्रियों के लिए विशेषतया ज़रूरी है कि वो ज़िंदगी के किसी भी मुक़ाम पर आर्थिक रूप से परनिर्भर न हो जाएँ।
और प्रकृति का खेल कुछ ऐसा है कि आर्थिक रूप से सबसे ज़्यादा पराश्रित स्त्रियों को ही होना पड़ता है। शादी हो गई तो नौकरी छोड़ दो, क्योंकि पति दूसरे शहर में रहता है। लो, हो गई बेरोज़गार। हो गई न बेरोज़गार? पति थोड़ी नौकरी छोड़ता है कभी। नौकरी हमेशा कौन छोड़े? लड़की छोड़े।
अब इतना आसान है दूसरी जगह पर नौकरी मिल जाना? गई! अपना व्यवसाय आसानी से वो चला नहीं सकती, क्योंकि व्यवसाय में दौड़-धूप करनी पड़ती है और मन में ये बात बैठ गई है कि दौड़-धूप करना लड़कियों का काम नहीं है।
प्रश्नकर्ता: सर, ऐसा भी है कि बाहर काम करना है तो उसके लिए फिर घर को भी देखो तुम।




