
प्रश्नकर्ता: नमस्कार आचार्य जी। ये अभी एक गोवा में बड़ी दुखद घटना हुई, जिसमें क़रीबन 25 लोगों की जानें गईं, और उस घटना के बारे में मैं सोच रहा था। फिर कुछ वीडियोज़ भी उस घटना के आए सोशल मीडिया के ऊपर। उसमें दो चीज़ें दिखती हैं। एक तो जो तंत्र है, उसने अपना काम किया नहीं। जो भी रेगुलेशंस वग़ैरह हैं, वो सब नहीं हुए। लेकिन फिर मैं वीडियो देख रहा था, और उस वीडियो में ऐसा मैंने देखा कि आग लग रही है, लोग वहाँ पर फिर भी बने हुए हैं, इस आशा में कि शायद कोई बुझा लेगा, हम बच जाएँगे। और उससे पहले जो हो रहा था, वो एंटरटेनमेंट चल रहा था, और लोग गए भी वहाँ पर पूरे एंटरटेनमेंट के लिए थे।
मुझे ऐसा लग रहा था कि उस टाइम पर क्यों तुरंत वो भाग नहीं रहे। क्या चीज़ उन्हें वहाँ पर रोककर रखे हुई है, वो एंटरटेनमेंट, वो एक तरह की मेरी कामना है कि ठीक है, सब कुछ हो जाएगा, ठीक हो जाएगा, और कंटिन्यू करेंगे इसी चीज़ को। और ये ऐसा नहीं है, ये और भी बहुत सारी जगहों पर हुआ है।
तो इसमें एक और, इससे पीछे मेरा भी अपना एक जो फँसा हुआ है, और शायद अभी भी फँसा हुआ है, जिसमें निर्णय नहीं हो रहा है, वो सिस्टम वर्सेस इंडिविजुअल का भी है। तो इसके बारे में थोड़ा-सा अगर आप, कि कहाँ पर ये लोग वहाँ पर फँसे; बाहर निकलने की बजाय तुरंत रुके।
आचार्य प्रशांत: देखिए ज़िंदगी की त्रासदी ये नहीं होती ज़्यादातर मौकों पर कि वयस्कों की तरह, ऐज़ एडल्ट्स, हमको बातें पता नहीं होतीं। हमें आमतौर पर न बातें पता होती हैं या सच्चाई ज्ञात होती है। कोई बहुत गुप्त रहस्य हो किसी क्षेत्र का तो अलग बात है। वरना आमतौर पर ऐसी जाहिर बातें, कि कहीं आग लग रही है, ये तो पता ही होती हैं। बच्चे थोड़े ही हैं हम दो साल, चार साल के। बच्चे छोड़ दो, जानवर भी जहाँ दिख रहा होता है कि आग लग रही है, वहाँ से भाग जाएगा।
तो हमारी ट्रैजेडी ये नहीं होती कि हम अज्ञानी हैं। हमारी ट्रैजेडी ये होती है कि हमें जो बात दिख भी रही होती है, हम उसको अनदेखा करना चाहते हैं। क्योंकि जो दिख रहा होता है न, चूँकि वो यथार्थ है, इसलिए हमारे काल्पनिक सुख में बाधक बनता है। सोचो अगर सुख कल्पना पर आधारित हो; आपका जो प्लेज़र है, अगर उसका बेसिस ही इमेजिनरी हो, फ़ैंटास्टिक हो; फ़ैंटास्टिक माने फ़ैंटेसी पर आधारित हो, तो रियलिटी आपके प्लेज़र में बाधा बनेगी न, ऑब्स्ट्रक्ट करेगी न? करेगी कि नहीं करेगी? करेगी न।
इसी बात को आप लोग गीता में कैसे गाते हो? कैसे गाते हो? “जब काम भरा हो आँख में, तब सच नज़र नहीं आता है।” और ये अजीब विडंबना है, दुखद विडंबना है, ट्रैजिक बात है। जब आप ये गाते हो, तो इसकी पहली पंक्ति में आग का उल्लेख है। जैसे कि गीता को भी पता हो, कि जहाँ काम होता है, वहाँ आग तो होती ही है।
आग दहकते पर धुएँ से प्रकाश ढक जाता है काम भरा जब आँख में सच नज़र नहीं आता है।
आग तो दहक रही है, लेकिन उस पर कामना का, डिज़ायर का धुआँ है। तो अब सच्चाई नज़र नहीं आने वाली। सच्चाई प्रत्यक्ष हो सकती है, प्रकट हो सकती है, समक्ष हो सकती है, लेकिन ये जो देखने वाली आँख है, ये देखने को तो तैयार हो। इस आँख में क्या भरा हुआ है? काम का धुआँ। आँख में धुआँ है, तो आगे कितना भी प्रकाश हो सच्चाई का, वो दिखाई नहीं देगा। कभी देखा है, ऊपर सूरज होता है इतना बड़ा, और आँख में इतना-सा कोई कण चला जाए धूल का, तो ये विराट सूरज भी दिखाई देना बंद हो जाता है। कामना ऐसी चीज़ है।
छोटा-मोटा प्रकाश तो छोड़ो, स्वयं सूर्य न दिखाई दे अगर आँख में कामना का कण भी बैठ गया है तो।
ये सबके साथ हो रहा है। काश कि इसमें कोई रहस्य होता, काश कि इसमें कोई जटिलता होती, कोई पेंच होता, कोई गाँठ होती, कोई पहेली होती, तो हम सुलझाते। कोई पहेली है ही नहीं, बात बहुत सीधी है। आपको साफ़ दिख रहा है कि ये क्या है।
जो वहाँ के मालिक वग़ैरह रहे होंगे, जो वहाँ के प्रबंधक रहे होंगे, ऐसा तो नहीं कि उनको भी नहीं पता रहा होगा। उनको भी तो साफ़-साफ़ पता ही रहा होगा न। आपने यहाँ जो व्यवस्था करी है, क्या उसमें पूरे फ़ायर सेफ़्टी के इंतज़ाम किए गए हैं? फ़ायर एक्सटिंग्विश करने के सारे उपकरण आपके यहाँ पर क्लब में मौजूद हैं क्या? जानते तो रहे होंगे वो। और जो ख़बरें आ रही हैं, उनमें यही है कि पहले भी कई बार चेतावनी दी गई थी। इंस्पेक्शन हुआ था गवर्नमेंट एजेंसी से, तो उनको बोला गया था कि भाई, ये सब ठीक करो। उन्होंने ठीक नहीं किया। मैं जानता नहीं यथार्थ क्या है, पर अभी तक जो ख़बरें थोड़ी-बहुत मुझे पता हैं, वो यही हैं।
उसके बाद यही था न नीचे से फ़ायर-क्रैकर्स या कुछ छोड़ा था, और ऊपर कुछ इनफ़्लेमेबल मटीरियल था, कपड़ा था या कुछ था। तो जो ये कर रहा है, उसको दिख नहीं रहा है क्या? दिख सब कुछ रहा है, पर आँख में काम भरा हुआ है। दिख तो सब रहा है। कौन पागल होगा जिसको नहीं दिखेगा कि तुम नीचे से आग लगा रहे हो, या कुछ है रॉकेट जैसा है, पता नहीं क्या है, उसको कर रहे हो, तो ऊपर वहाँ पर कपड़े में आग नहीं लगेगी। किसको नहीं दिखेगा यह? छोटे बच्चे को भी दिखेगा।
क्लब हो; क्लब का तो मतलब ही होता है। लीगली यही मतलब होता है कि ड्रिंक्स तो होंगे ही कम से कम। और ड्रिंक्स हैं, आप क्लब में आए होंगे, 10-11:00 बजे भी आए हैं। तो आपको घंटे मिल चुके हैं पीने के लिए। ठीक? तो एक तो आप उनमें से हैं जो अभी भी कह रहे हैं कि मुझे और चाहिए, और चाहिए, और चाहिए, और नाचना है मुझे। आई वांट टू एक्सट्रैक्ट मोर फ्रॉम द डांस फ्लोर ऑर व्हाटएवर।
दूसरे, अब नशा भी घंटे का हावी हो रहा है। तो अब तो कुछ दिखाई नहीं देगा। जो सामने है, जो इनएविटेबल है, आप उससे भी इनकार कर दोगे। ख़ासकर अगर माहौल में ग्लैमर भी मौजूद हो, और ख़ासकर अगर ये हो रहा हो कि अगर वो डांस फ़्लोर है और वहाँ पर कोई डीजे वग़ैरह है, वो बोल रहा है कि लास्ट थ्री सॉन्ग्स या लास्ट हाफ़ ऐन आवर; तब तो आप कतई कोई व्यवधान बर्दाश्त नहीं करोगे। क्योंकि आपको पता है कि ये जो मुझे स्वर्ग-तुल्य अनुभव हो रहा है, इसके बस अब आख़िरी कुछ लम्हे बचे हैं।
तो अब उसमें कोई आकर के बोले, “सुनो, सुनो, टेक नेसेसरी प्रिकॉशन्स।” तो आप कहोगे, “भाग जा। भाग जा, मौज कर लेने दे। मेरे जाम में आख़िरी अब कुछ बूँदें बची हैं, मुझे पी लेने दे।” आप उसकी बात सुनोगे ही नहीं।
अनुभवी लोगों को हँसी आ रही है। भाई, ट्रैजेडी हुई है, लोग मरे हैं और दो-चार नहीं, बीस-पच्चीस लोग मरे हैं।
श्रोता: पचास के आस पास।
आचार्य प्रशांत: पचास।
श्रोता: और मरने वाले ज़्यादातर किचन में और नीचे थे; जो ये सब कर भी नहीं रहे थे।
आचार्य प्रशांत: हाँ, और मरने वाले ज़्यादातर वो थे जो वहाँ किचन में थे, वहाँ के एम्प्लॉइज़ थे जो नाचने-गाने में तो बेचारे शामिल भी नहीं थे।
कोई कॉम्प्लिकेशन नहीं है, सर। कुछ इसमें ऐसा है ही नहीं कि कोई एक्सपर्ट कमेटी भी इसमें बैठेगी, इन्वेस्टिगेशन भी होगी; तो कुछ ख़ास निकलकर नहीं आएगा। बहुत ऑब्वियस-सी बात है। क्या निकालोगे उसमें? रेगुलेशंस का उल्लंघन हुआ है, और उसके बाद जो वहाँ चल रहा था, वो बस बेहोशी का समाँ है, उसमें कुछ भी करो। और वहाँ जो हो रहा है, वो कोई नई चीज़ नहीं है। वो हम हर जलसे में, हर मजमे में, शादी-ब्याह में, पार्टी में होता देखते हैं।
कितनी तो ख़बरें आती हैं कि वो बारात निकल रही थी, नीचे से फ़ायरिंग कर दी। ऊपर एक बच्चा झुककर देख रहा था, गोली उसके यहाँ (गले की तरफ़ इंगित करते हुए) से निकल गई। क्योंकि वो माहौल ऐसा है, माहौल में ही नशा है। उस माहौल की परिभाषा में ही नशा है। जिसने नहीं भी पी रखी, वो भी नशे में है। यही है। और इन चीज़ों को हम ज़िंदगी का उत्कर्ष बोलते हैं।
दिसंबर चल रहा है। दिसंबर में गोवा होने का मतलब है कि साल भर मौज में जो कमी रह गई थी, वो पूरी कर लेनी है; साल भर। मैं इस साल तीन महीने गोवा में था, जब; ट्रुथ विदाउट अपॉलजी यहाँ लगी है? ये लिखी थी। और कब था? जब वहाँ कोई नहीं आता, बारिश में। और इसीलिए वहाँ था, क्योंकि वहाँ कोई नहीं आता, कम लोग होते हैं।
और अब जब पीक सीज़न है, जब वहाँ पर लोग रहते हैं, मैं वहाँ से दूर हूँ। क्योंकि मुझे वहाँ वो जो खाली सड़कें होती थीं रात में, बड़ी अच्छी लगती थीं। बहुत अच्छी। मुझे मालूम है वहाँ की इकॉनमी के लिए खाली सड़कें अच्छी नहीं हैं। मैं जानता हूँ, उस बात का सम्मान करता हूँ। ठीक है। पर अभी वहाँ पर जाऊँगा तो यही सब हो रहा होगा। हर 500 मीटर पर क्लबिंग हो रही है और ये हो रहा है। क्लबिंग से भी मुझे कोई समस्या नहीं। पर जब तुमको होश ही नहीं है, तो तुम्हें ये भी कैसे पता कि तुम्हें मज़ा आ रहा है?
इसी बात को थोड़ा और आगे बढ़ा दो, एक्सटेंड कर दो। पूरे ही बेहोश हो जाओ फिर, गिर जाओ। अगर बेहोशी में ही मज़ा है, तो सबसे ज़्यादा मज़ा तो फिर कोमा में होगा। बात समझ में आ रही है?
आप इसमें और गहरा अगर जाना चाहो तो आप ये ज़रूर पूछ सकते हो, कि वो कौन-सा ज़बरदस्त आदमी था, जिसने खुशी को उछल-कूद से, शोर-शराबे से और सामूहिक मूर्खता से जोड़ दिया। वो कौन था जिसने ये शुरू करा, कि खुशी ऐसे मनाई जाती है? ये आई चीज़ कहाँ से? क्योंकि बात एक क्लब की नहीं है, बात तो हमारे पूरे समाज की, हमारे पूरे संस्कार की है। दुनिया भर में, भारत में ही नहीं। हमारे लिए खुशी का मतलब ही यही होता है।
खुशी के मौके पर अगर आपको कोई ध्यानस्थ दिख जाए, मेडिटेटिव दिख जाए, या कोई चिंतनशील दिख जाए, कि वो गंभीरता से सब देख रहा है, समझ रहा है, सोच रहा है; तो आप कहोगे, “मनहूस! निकल यहाँ से, भाग। तू यहाँ पार्टी में आया है और तू बेहोश नहीं हुआ अभी तक? तू पार्टी में आकर के ऐसे ऑब्ज़र्वेशन कर रहा है?”
आप बताओ न, जो उस क्लब में होता है। ठीक है? उसी का एक डायल्यूटेड रूप क्या आप अपने बच्चे के जन्मदिन पर नहीं करते? ठीक है बच्चे के जन्मदिन पर शराब नहीं पी जाती, ठीक है; लेकिन हो-हुल्लड़ तो उसी तरह का होता है। डिग्री कम हो सकती है; डायमेंशन तो वही है न, कि नहीं है?
और ये जो लोग वहाँ पर ये सब कर रहे थे, ये कोई असामाजिक तत्त्व नहीं थे। ये कोई अपराधी नहीं थे। अगर ये घटना नहीं घटी होती, तो ये अपने-अपने घरों को लौटते और ये अपने-अपने घरों में इज़्ज़तदार लोग कहलाते। कहलाते कि नहीं कहलाते? तो ये किसकी पैदाइश है? ये हमारी सामाजिक मिट्टी की पैदाइश है। ये हमारी इसी ज़मीन की पैदाइश है, जहाँ से हर आम आदमी उठता है, पूरा मध्यम वर्ग जहाँ से उठा है।
और हमें ये बता दिया गया है कि सेलिब्रेशन माने इंटॉक्सिकेशन। बताया गया है कि नहीं? बोलिए। सेलिब्रेशन माने, लोअरिंग ऑफ़ कॉन्शियसनेस। हाँ या ना? बोलो। आपका कोई सेलिब्रेशन होता है जिसमें चेतना का स्तर उठता हो? हमारा कोई भी उत्सव हो, समारोह हो, उसका मतलब ही यही होता है कि चेतना को और गिरा दो। चाहे वो व्यक्तिगत हमारा कोई सेलिब्रेशन हो, चाहे पारिवारिक हो, चाहे सामाजिक हो, चाहे धार्मिक हो और चाहे राष्ट्रीय हो। कुल मिलाकर के हमें उसमें करना क्या है? हो-हुल्लड़।
अब तो धार्मिक उत्सवों पर भी ये होता है कि नशा कर लो। धार्मिक उत्सवों पर भी ये होता है कि जानवर काटो। होता है कि नहीं? जितनी बर्बादी, जितना प्रदूषण, धर्म और उत्सव में होता है उतना आमतौर पर न होता हो। शादियों में जितनी फ़िज़ूलख़र्ची होती है और ज़िंदगी का जितना नाश होता है शादियों की तैयारी में और दहेज में, उतना और किसी चीज़ में न होता हो।
तो मैं आपसे पूछ रहा हूँ, हमारे मन में ये बात डाल किसने दी कि सेलिब्रेशन माने इंटॉक्सिकेशन? फिर उसी का एक एक्सट्रीम रूप हमें देखने को मिलता है, ये जो पच्चीस-पचास मौतें हो गईं। हाँ या ना?
गोवा बहुत सुंदर जगह है, बहुत, बहुत सुंदर जगह है। मुझे तो नहीं समझ में आता कि वहाँ कोई जाकर के शोर क्यों करना चाहेगा। गोवा वो नहीं है जो आपको फ़िल्मों में दिखा दिया जाता है कि बीच है, और वहाँ बिकनी है, और सन, सैंड एंड स्कर्ट्स। एकदम नहीं। हाँ, ये आपको करना हो तो आप कर सकते हैं; कोई मनाही नहीं है। ये भी ठीक है। लेकिन हरियाली आप देखिए गोवा की, बारिशें आप देखिए गोवा की। कुछ नहीं करना होता है। आप बस चलना शुरू कर दीजिए सड़क पर, बहुत अच्छा लगता है। और हवा चल रही होती है। ख़ासकर अगर आप बीच के आसपास इसी इलाके में, दिन भर थोड़ी हवा चलती रहती है। बरसातों की बात कर रहा हूँ।
बड़ी गाड़ी की ज़रूरत भी नहीं है। आप टू-व्हीलर ले लीजिए दूर जाना है तो। और चुपचाप 30-40 की स्पीड पर बस चलते रहिए, चलते रहिए। दिल जीतने वाली जगह है गोवा। और आप बीच पर जा रहे हैं, वहाँ टूटी हुई बियर की बोतलें हैं। नंगे पाँव चलने में पाँव कट जाए। सब बीचों पर ऐसा नहीं होता पर अनुभव से बोल रहा हूँ। बियर की बोतल से चोट खा चुका हूँ। मैंने कहा भाई, जूते ठीक हैं।
ये सब कहाँ से आ रहा है? ये गोवा कल्चर भी नहीं है। जो गोवा के स्थानीय निवासी हैं, आप उनसे कहें कि आप लोग इस तरह करते हो, इतना शोर? वो कहेंगे, “हम बिल्कुल भी नहीं करते।” तो फिर ये कहाँ से आ रहा है? ये किसने पूरे देश की संस्कृति में, शोर मचाने को और बेहोश हो जाने को, उत्सव का पर्याय बना दिया? कैसे हुआ यह?
मैं बताता हूँ कैसे हुआ, ये बाज़ारवाद है। कोई भी आता है मौका; बाज़ार मौके ढूँढ़ रहा होता है अपना माल बेचने के। राखी भी आई है, “बहन के लिए तुमने कुछ ख़रीदा? बहन के लिए तुमने कुछ ख़रीदा?” और जाकर बहन के कान में बाज़ार फुसफुसाता है, “ये तेरा भाई नकली है; कुछ लाया नहीं तेरे लिए।” एनिवर्सरी, बर्थडे, ये न्यू ईयर तो बड़ी बात हो जाती है। होली, दिवाली; स्वतंत्रता दिवस भी, भाई, वो भी ख़रीदने का मौका है। और ख़रीदने की चीज़ों और नशे में बहुत निकट का संबंध है। क्योंकि ज़्यादा वही आदमी ख़रीद सकता है, जिसको बेहोश कर दिया गया हो।
आपसे एक्सेसिव कंज़म्प्शन कराया जा सके, इसके लिए ज़रूरी है कि आपको पहले इंटॉक्सिकेट किया जाए। जिस आदमी को नशा कर दिया गया, अब उसकी जेब खाली करी जा सकती है। नशा किसी भी क़िस्म का हो सकता है, ज़रूरी नहीं है शराब का हो। कोई भी नशा हो सकता है, वो वासना का नशा हो सकता है, वो पैसे का नशा हो सकता है। वो ट्रेंड का नशा भी हो सकता है। बात समझ रहे हैं?
गोवा लगभग कुछ हद तक समझिए वैसा ही है, कि जैसे हिमालयों की शुरुआत हो रही हो; हिमालय की पहाड़ियों की। जैसे तराई से आप चले हों और शिवालिक वग़ैरह में प्रवेश कर रहे हों। उतने ऊँचे नहीं हैं वेस्टर्न घाट्स, पर इलाका वो भी पहाड़ी है।
हिमालय पर तो हम जानते हैं कि लोग काहे के लिए जाते थे? ध्यान के लिए जाते थे। पर जैसे अब हिमालय पर भी हम किस लिए जाते हैं? भोग के लिए जाते हैं। वही हाल हमने गोवा का किया है।