क्या अध्यात्म सिर्फ पढ़े-लिखों के लिए है?

Acharya Prashant

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क्या अध्यात्म सिर्फ पढ़े-लिखों के लिए है?
आप ‘अद्वैत’ को कोई सिद्धांत समझते हैं? जब तक ‘मैं’ है, तब तक दुनिया और दूसरा भी है, यही द्वैत है। अद्वैत तब होता है जब ‘मैं’ ही अपने मिथ्यात्व को देख ले। तब न कहने वाला बचता है, न कहने को कुछ। अद्वैत कोई विचार नहीं, अस्तित्व का अनुभव है। यह अहंकार के समाप्त होने का नाम है, जहाँ सिर्फ़ बोध शेष रह जाता है। यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, बचपन से ही या कहूँ हमेशा से ये 'अद्वैत' शब्द सुनते आ रहे हैं। इसकी एग्ज़ैक्ट डेफिनेशन आप क्या दोगे?

आचार्य प्रशांत: द्वैत के दो सिरों में से एक पर जो होता है, वो है जिसने अभी सवाल पूछा। वही कहता है कि दूसरा है। "ये दीवार है," ये आप कहेंगे। "वो माइक है," ये आप कहेंगे। जब तक आप हैं, तब तक दूसरा है। ऐसा हो सकता है कि इस ब्रह्मांड में सिर्फ़ आप हों?

प्रश्नकर्ता: ब्रह्मांड तो बहुत सारी चीज़ें हैं, बहुत सारे इंसान।

आचार्य प्रशांत: उसको हटाइए। ऐसा हो सकता है कि आप हों और ये कुर्सी न हो? या आप हों और आपके खड़े होने के लिए कोई ज़मीन न हो? ऐसा हो सकता है?

प्रश्नकर्ता: नहीं, ऐसा तो नहीं हो सकता।

आचार्य प्रशांत: तो, ये द्वैत है। ये अहंकार होता है और हमेशा अपने किसी विषय के साथ होता है। कभी वो माइक के साथ है, कपड़ों के साथ है, जमीन के साथ है, पड़ोस में कोई बैठे हैं उनके साथ है, विचारों के साथ है। है न? 'मैं' का हमेशा कोई विषय होता है। 'मैं' का हमेशा कोई विषय होता है, ये होता है द्वैत। इसमें जो 'मैं' है, जब वह अपने ऊपर मुड़ के अपना मिथ्यात्व देख लेता है, तो अद्वैत हो जाता है।

द्वैत मतलब अहंकार का होना। अहंकार का होना, तो अहंकार के विषय का होना।

प्रश्नकर्ता: द्वैत इज़ अहंकार। द्वैत और ईगो एक ही चीज़ है?

आचार्य प्रशांत: द्वैत हो ही नहीं सकता बिना अहंकार के। द्वैत के एक सिरे पर सदा अहंकार होगा।

प्रश्नकर्ता: और अगर किसी में अहंकार नहीं है, तो वो अद्वैत हो गया, ऐसा?

आचार्य प्रशांत: जब अहंकार नहीं है, तो बात करने के लिए ही कोई बचा नहीं न? ये कहने के लिए भी कोई नहीं बचा कि अहंकार नहीं है, तो वो अद्वैत है। "अहंकार नहीं है," ये भी कौन बोलता है?

प्रश्नकर्ता: इंसान।

आचार्य प्रशांत: इंसान हटाइए न, अहंकार ही बोलता है न? "अहंकार नहीं है," ये भी अहंकार ही बोलता है न। तो अगर जब अहंकार सचमुच नहीं होगा, तो ये कहने के लिए भी कोई नहीं है कि अहंकार नहीं है। वो अद्वैत है। तो अद्वैत का मतलब किसी दार्शनिक सिद्धांत से नहीं है; अद्वैत का मतलब अस्तित्वगत है।

अद्वैत कोई दूर की चीज़ नहीं है कि उस सिद्धांत को मैंने जान लिया तो मैंने अद्वैत को जान लिया। अद्वैत का संबंध अपनी हस्ती से है, अपने अस्तित्व से है।

अहंकार है तो अद्वैत नहीं है। क्योंकि अहंकार होगा तो इधर अहंकार होगा, उधर संसार होगा। इधर अहंकार, उधर संसार; इधर जीव, इधर जगत। ये द्वैत है, इधर जीव, इधर जगत। और इतना ही नहीं है, जगत में भी तमाम तरह की विविधताएँ दिखाई पड़ेंगी। उनको भी कई बार द्वैत बोल देते हैं। पर उन विविधताओं को भी देखने वाला कौन है? उन विविधताओं का भी दावा करने वाला, उनको सत्य मानने वाला कौन है? अहंकार ही है। तो इसलिए द्वैत में अहंकार सदा मौजूद होता है, सदा।

अब जैसे जो शास्त्रीय द्वैत है, उसमें ऐसे कहा जाता है कि एक सृष्टिकर्ता है, उसने सृष्टि बनाई है। ये डुअलिटी है। उदाहरण के लिए, जैसे 'द्वैत वेदान्त' भी होता है; वेदान्त की कुछ लोगों ने द्वैतात्मक व्याख्या भी करी है। तो वो कहते हैं कि सृष्टिकर्ता है ईश्वर और उसकी सृष्टि है, और ये दोनों अलग-अलग हैं, इसको द्वैत बोलते हैं।

पर ये बात भी बोलने वाला कौन है? मैं। मैं कह रहा हूँ "मैं हूँ" और "मैं इस सृष्टि पर चल रहा हूँ" तो ये सृष्टि है। माने, मेरे होने से प्रमाणित होता है कि ये सृष्टि है और मैं हूँ तो मुझे किसी ने तो बनाया होगा। मैं हूँ तो मुझे किसी ने तो बनाया होगा, तो मेरे होने से प्रमाणित होता है कि कोई ईश्वर है। यहाँ भी कौन बैठा है केंद्र में? अहंकार।

तो द्वैत में सदा अहंकार ही केंद्र में होता है। हम द्वैत में सदा भले ही द्वैत में आप बोलें कि द्वैत का मतलब है, 'द एसेंशियल सेपरेशन बिटवीन गॉड एंड द वर्ल्ड, द क्रिएटर एंड द क्रिएशन।' कई लोग ऐसे भी उसे व्यक्त करेंगे, पर वहाँ भी आप देखिएगा कि बात अहंकार की ही हो रही है। क्योंकि क्रिएशन के पक्ष में तर्क यही दिया जाएगा कि मुझे ये सृष्टि दिखाई देती है, इसलिए सृष्टि है। अगर ये सृष्टि नहीं है, तो मैं खड़ा किस चीज पर हूँ? मैं हूँ, मैं ये जमीन पर खड़ा हूँ, तो ज़मीन सच होगी न। जेमीन क्यों सच है? क्योंकि मैं तो सच हूँ न। और ये दावा किसका है?

तो शुरुआत ही किससे हो रही है? अहंकार कह रहा है, "मैं सच हूँ, आई एम रियल। मैं रियल हूँ तो ये ज़मीन रियल है। और मैं रियल हूँ तो मेरा कोई रियल क्रिएटर भी होगा।" तो वहाँ भी अहंकार ही बैठा हुआ है। तो अद्वैत का संबंध सीधे-सीधे अहंकार के लोप से है। बाक़ी जितना दर्शन है, वो 'आई' को मान्यता देकर चलता है। अद्वैत अकेला है जो 'आई' पर ही वापस मुड़ जाता है; और इसीलिए उसको आख़िरी दर्शन कहते हैं। क्यों? क्योंकि वो दार्शनिक को ही मिटा देता है। अब आगे दर्शन कौन बढ़ाएगा?

एक दार्शनिक था, वो अपने आप को मान्यता दिए पड़ा था, "मैं तो हूँ ही।" अब वो इसके बारे में अपना फलसफा दे रहा है, उसके बारे में सिद्धांत दे रहा है, वहाँ नई थ्योरी ला रहा है, एक और नई किताब लिख रहा है। वो दार्शनिक है, ठीक है? और जहाँ कहीं भी ‘आई’ को सेंटर में रख के कुछ भी करा जाएगा, वे सारी थ्योरीज़ क्या होंगी? डुअलिस्टिक, द्वैतवादी। क्योंकि उसमें एक छोर पर तो 'आई' है ही, और दूसरे छोर पर कोई और होगा। एक छोर पर 'आई' है, दूसरे छोर पर ‘एक्स' है, ये डुअलिटी हो गई: आई एंड एक्स, आई एंड एक्स।

अद्वैत इस मामले में एकदम अलग है, एकदम विशिष्ट है। वो कहता है, "एक्स गया भाड़ में।" ‘आई’ मुड़ेगा और किसको देखेगा? ‘आई’ मुड़ेगा और किसको देखेगा? ‘आई’ को ही देखेगा। और ‘आई’ जब मुड़कर 'आई' को देख रहा है, तो 'आई' को पता चलता है, कि "मैं तो फर्जी निकला!"

'आई’ अभी तक किसको देखने में व्यस्त था? X1, X2, X3, X4, इनको देखने में लगा हुआ है। अद्वैत कहता है, "तू छोड़ सब कुछ, ख़ुद को देख। अपने मा ही टटोल। अपने में वापस मुड़, मुड़ वापस। ‘मोको कहाँ ढूँढे बंदे, मैं तो तेरे पास में।’ भीतर मुड़, भीतर मुड़।" अद्वैत भीतर मोड़ देता है। जब भीतर मोड़ देते हो, तो 'आई' ही उड़ गया। 'आई' के उड़ने को ही 'अद्वैत' कहते हैं।

अद्वैत ही अध्यात्म है। अद्वैत के अलावा जो कुछ है, वह सब 'लोक-धर्म' है। अध्यात्म माने अद्वैत।

कोई कहे, "मैं आध्यात्मिक हूँ," लेकिन अद्वैत नहीं मानता, तो वो आध्यात्मिक नहीं है; वह लोकधर्मी है। क्योंकि अगर अद्वैत नहीं है, तो क्या है? अद्वैत किसको उड़ा देता है? किसको साफ़ कर देता है?

श्रोता: अहंकार को।

आचार्य प्रशांत: और अगर अद्वैत नहीं है, तो फिर क्या है?

श्रोता: अहंकार।

आचार्य प्रशांत: तो फिर अगर अद्वैत नहीं है तो अहंकार है। और जितना आप दर्शन बता रहे हो, वो अहंकार की रक्षा का दर्शन है। अद्वैत के अलावा जितना दर्शन है, वो वास्तव में अहंकार को सुरक्षित रखने का दर्शन है। वो अध्यात्म कैसे हो सकता है?

प्रश्नकर्ता: इसका इंग्लिश वर्ड क्या होगा आचार्य?

आचार्य प्रशांत: किसका?

प्रश्नकर्ता: अद्वैत का?

आचार्य प्रशांत: नॉन-डुअलिटी।

प्रश्नकर्ता: जी नमस्कार आचार्य जी। सबसे पहले तो मैं बहुत-बहुत ग्रेटफुल हूँ कि आप मेरी ज़िंदगी में आए। जहाँ तक मैंने ऑब्जर्व किया है कि आपके जैसे व्यक्ति शायद हज़ारों सालों के बाद एक ऐसे व्यक्ति होते हैं जो हमें सही मार्ग दिखाते हैं।

आचार्य जी, मैं जिस जगह से बिलॉन्ग करता हूँ, मैं जहाँ से आया हूँ, वहाँ मुझे जहाँ तक मालूम है कि लोगों की जो मेंटालिटी है, वो बहुत ही प्रिमिटिव है। मैं अरुणाचल से आया हूँ और वहाँ के लोग, जैसे कि मैं अपने आप को ही देख लूँ, तो अभी-अभी जस्ट जंगल से हम आए हैं। मेरे अरुणाचल में अब देखा जाए तो ज़्यादातर फर्स्ट, सेकंड या थर्ड जनरेशन के लोग ही हैं जिन्होंने फॉर्मल एजुकेशन ली हैं। इनफैक्ट, मेरे फैमिली से तो मैं फर्स्ट जनरेशन ही हूँ जिसे **फॉर्मल एजुकेशन मिल पाई है।

हमारे रीति-रिवाज बिल्कुल ही एकदम प्रिमिटिव स्टेज में ही हैं। अभी तक भी हमारे खान-पान सिर्फ़ मांस-मछली यही होते हैं। रीति-रिवाजों में जैसे कि शादी हो, तो हज़ारों 'मिथुन' (जो गाय जैसा होता है) शादियों में सैक्रिफाइस होता है, त्योहारों में होता है बहुत सारा। तो मेंटालिटी अभी तक बहुत लो लेवल की है। उन तक यह आत्मज्ञान, बोध और अध्यात्म, ये सब चीज़ तो दूसरे कोई डायमेंशन की है।

आचार्य प्रशांत: ऐसा कुछ भी नहीं है। सब इंसान हैं, सभी जंगल से निकले हैं। और इन शब्दों का इस्तेमाल करा जाए, ये भी कोई ज़रूरी नहीं। क्यों तुम्हें बोलना है 'आत्मज्ञान' या 'बोध' अगर ये शब्द तुम्हें या उन लोगों को भारी लगते हैं, तो कोई ज़रूरी नहीं है इनको बोलना। जी तो सभी रहे हैं न, इंसान तो सभी हैं न। भूलना नहीं, शुरुआत किसी ऊँचे सिद्धांत या दर्शन से नहीं होती है; शुरुआत हमेशा अपनी 'बेचैनी' से होती है।

तुम उन्हें जो भी बोलना चाहो, प्रिमिटिव हैं, अनएजुकेटेड हैं। ठीक है, बेचैन हैं कि नहीं हैं?

प्रश्नकर्ता: उनको पता ही नहीं कि हम बेचैन हैं।

आचार्य प्रशांत: तो वो दिखाना पड़ेगा न। किसी को नहीं पता होता, सबके पास अपनी बेचैनी को छुपाने के साधन होते हैं। कोई एकदम मेट्रो को बिलॉन्ग करता है, तो उसके पास एंटरटेनमेंट है। किसी के पास पैसा है क्योंकि अच्छी नौकरी या बिजनेस है। किसी के पास कुछ है, किसी के पास कुछ है।

तो जो हालत एक इंसान की है, वह पूरी इंसानियत की है। द ह्यूमन बीइंग रिप्रेज़ेंट्स ह्यूमैनिटी। ठीक है? बस रूप का अंतर होता है, एक ही बीमारी सबको लगी हुई है अलग-अलग रूपों में। उसी बीमारी को अज्ञान, अविद्या, अहंकार, जो बोलना चाहो बोलो। और उसका जो प्रथम लक्षण होता है, वो होता है, बेचैनी। बेचैनी!

लोग रोते हैं कि नहीं रोते हैं? रोते हैं न? लोग नफरत करते हैं कि नहीं कभी-कभार एक-दूसरे से? लड़ लेते हैं कि नहीं? लोगों को गुस्सा आता है न? यही सब तो बेचैनी है। यही सब बेचैनी है। इस पर बात करो न! तुम्हें क्यों वहाँ पर जाकर संस्कृत सुनानी है किसी को?

प्रश्नकर्ता: नहीं, जैसे कि अब बेचैनी पर भी मैं बात करना चाहूँ किसी से, तो उतना सोचने की कैपेसिटी शायद… ।

आचार्य प्रशांत: ऐसा नहीं होता बेटा। अध्यात्म कोई बहुत ऊँची इंटेलेक्चुअल कैपेसिटी नहीं माँगता। ये भी एक अंधविश्वास है, झूठी मान्यता है कि विशेषकर अद्वैत उनके लिए है जो लोग इंटेलेक्चुअली शार्प हैं। और ये भी एक भ्रम है जो फैलाया गया है ताकि आम आदमी वास्तविक अध्यात्म से दूर रहे। भ्रम फैलाया गया है कि जो लोग साधारण बुद्धि के हैं, उनके लिए है 'लोक-धर्म'; और जो लोग बुद्धि से तेज हैं, उनके लिए है 'अद्वैत' या 'ज्ञान-मार्ग'। ये भी एक झूठ है जो फैलाया गया है। ऐसा कुछ नहीं है।

साधारण बौद्धिक क्षमता हो, तो भी इंसान साधारण तर्क तो समझ ही जाएगा न? कौन सा यहाँ पर कैलकुलस की भाषा में बात हो रही है। कौन सा हम कह रहे हैं कि जब तक तुमको क्वांटम फिज़िक्स नहीं आती, तब तक तुम स्वयं को नहीं जान सकते? ऐसी कोई शर्त है? है क्या?

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, हमारे वहाँ तो वोकैबलरी भी कम है।

आचार्य प्रशांत: कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। दुख है न? बेचैनी है न? उसको जिस नाम से भी इंगित करना चाहो, करो। और बिल्कुल ज़रूरी नहीं है कि वही साधन इस्तेमाल करो जो मैं कर रहा हूँ। मैं अगर कभी आऊँगा अरुणाचल, तो हो सकता है कि सबको बैठा लूँ और बस चुप हो जाऊँ, या कुछ खेलना शुरू कर दूँ, या इधर-उधर की बातें करूँ।

लोगों को कोई सिद्धांत पढ़ाना थोड़ी ही उद्देश्य है; लोग आईना देख सकें, ये उद्देश्य है। व्यक्ति देख सके कि वो क्या कर रहा है, अपनी नज़रों से साफ़ ख़ुद देख सके, यह उद्देश्य है। वह काम अगर श्लोक से होता है, तो श्लोक से करेंगे; संगत से होता है, तो संगत से करेंगे; शब्द से तो शब्द से; मौन से तो मौन से; कह के तो कह के; खेल के तो खेल के।

बच्चों के साथ पहले मैं जाता था, बहुत बार नहीं गया पर चार-पाँच दफा, सात दफे गया होगा। तो उनके साथ तो यही करना पड़ता था, खेलता था, नाचता था, कुछ करता था। मैं उनको ज्ञान देने लगूँ, तो वो सोना शुरू कर दें। तो मुझे फिर उन्हीं के जैसा बनना होता था, कभी कबूतर बनूँ, कभी खरगोश बनूँ, कभी कुछ बनूँ, कभी कविता सुनाऊँ, हँसाऊँ उनको। सब समझते हैं, बच्चे भी समझते हैं। ये मत सोचो कि पुराने लोग हैं, जनजातीय लोग हैं, तो इसलिए उनको समझने में असुविधा होगी। ऐसा नहीं है, समझाने का तरीका बदलना पड़ेगा।

प्रश्नकर्ता: उनको भी समझा पाएँगे, वो बिल्कुल…?

आचार्य प्रशांत: सब समझते हैं। सब साफ़ है, कोई दिक़्क़त नहीं है। इतने लाख लोगों का गीता परिवार है, तुम्हें क्या लग रहा है, उसमें सब क्या किसी विशिष्ट वर्ग के लोग हैं? हर तरह के लोग हैं, हर आय के भी, हर आयु के भी, लिंग के भी, प्रदेश के भी, देश के, विदेश के भी, इस भाषा के भी, उस भाषा के भी, हर जाति के, अलग-अलग धर्मों के। सब समझते हैं। सबके लिए है, चिंता मत करो।

प्रश्नकर्ता: धन्यवाद।

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
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