आप ‘अद्वैत’ को कोई सिद्धांत समझते हैं? जब तक ‘मैं’ है, तब तक दुनिया और दूसरा भी है, यही द्वैत है। अद्वैत तब होता है जब ‘मैं’ ही अपने मिथ्यात्व को देख ले। तब न कहने वाला बचता है, न कहने को कुछ। अद्वैत कोई विचार नहीं, अस्तित्व का अनुभव है। यह अहंकार के समाप्त होने का नाम है, जहाँ सिर्फ़ बोध शेष रह जाता है।
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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, बचपन से ही या कहूँ हमेशा से ये 'अद्वैत' शब्द सुनते आ रहे हैं। इसकी एग्ज़ैक्ट डेफिनेशन आप क्या दोगे?
आचार्य प्रशांत: द्वैत के दो सिरों में से एक पर जो होता है, वो है जिसने अभी सवाल पूछा। वही कहता है कि दूसरा है। "ये दीवार है," ये आप कहेंगे। "वो माइक है," ये आप कहेंगे। जब तक आप हैं, तब तक दूसरा है। ऐसा हो सकता है कि इस ब्रह्मांड में सिर्फ़ आप हों?
प्रश्नकर्ता: ब्रह्मांड तो बहुत सारी चीज़ें हैं, बहुत सारे इंसान।
आचार्य प्रशांत: उसको हटाइए। ऐसा हो सकता है कि आप हों और ये कुर्सी न हो? या आप हों और आपके खड़े होने के लिए कोई ज़मीन न हो? ऐसा हो सकता है?
प्रश्नकर्ता: नहीं, ऐसा तो नहीं हो सकता।




