
प्रश्नकर्ता: नमस्कार, आचार्य जी। मेरे दो प्रश्न हैं, सर। अभी हाल ही में देश में कुछ आतंकवादी हिंसक घटनाएँ हुई हैं, उनसे रिलेटेड। इसमें काफ़ी लोग मारे भी गए हैं, अभी जो घटना हुई है। ऐसी घटनाएँ हमें हिला देती हैं अंदर से, लेकिन कुछ समय बाद ही फिर सब ऐज़ इट इज़ नॉर्मल हो जाता है।
मेरा प्रश्न ये है, आचार्य जी, कि ऐसी क्रूरता इंसान में जन्म कैसे लेती है? और हम ऐसी घटनाओं के कुछ समय बाद ही असंवेदनशील कैसे हो जाते हैं?
आचार्य प्रशांत: दखिए, सबसे पहले तो ये समझना होगा कि अगर ये सब जो किया गया है, जैसी कि संभावना है; धर्म के, मज़हब के नाम पर किया गया है, इस्लाम के नाम पर किया गया है। तो ये निश्चित रूप से धर्म का सबसे विकृत संस्करण है। जहाँ धर्म का मतलब ये बन जाए कि जाकर लोगों को मारना है, उसे धर्म तो कहना ही नहीं चाहिए, वो कोई और चीज़ बन चुका है। ठीक है?
तो ये अच्छे से इसको स्वीकार किया कि हाँ, देखो, जब धर्म के नाम पर परंपराएँ चलने लगती हैं और कट्टरता चलने लगती है, और धर्म का मतलब समझ की जगह मान्यता हो जाता है, तो उसके क्या नतीजे निकलते हैं। एक तो ये आप देखिए, और ये देखना ज़रूरी है क्योंकि वो ख़तरा दुनिया के सभी धर्मों के ऊपर है, ठीक है न।
दुनिया में जो सबसे बड़ा नरसंहार हुआ है धर्म के नाम पर, वो होलोकॉस्ट है। बल्कि ऐसा कहना चाहिए कि दुनिया में जो सबसे बड़ा नरसंहार हुआ है, वो धर्म के नाम पर हुआ है। साठ लाख लोग मारे गए थे और चुन-चुनकर मारे गए थे कि एक ख़ास धर्म के हैं तो उनको ही मारा जाएगा। ठीक है न? ईसाइयों ने मारा था, किसको? यहूदियों को। और उसका मूल कारण मालूम है? वो नफ़रत शुरू कहाँ से होती है? वो नफ़रत यहाँ से शुरू होती है कि क्राइस्ट को यहूदियों ने मारा था। लो! और वही चीज़ लगभग आप अभी भी देख रहे हो, जो आपको इज़राइल और गाज़ा में दिखाई दे रही है। वहाँ भी जो मूल बात है, वो जियो-पॉलिटिकल बाद में है, धार्मिक पहले है।
तो दुनिया की गिरी से गिरी चीज़ बन सकता है धर्म; गिरी से गिरी चीज़। आपको जानवर से नीचे गिरा दे, ये ताक़त है अगर धर्म विकृत हो गया तो। उससे कहीं अच्छा है कि आदमी कह दे कि भाई, मुझे धर्म से कुछ लेना-देना ही नहीं। मुझे तो कई बार लगता है कि बहुत बड़ा समाधान ये है कि ये जो ज़्यादातर लोग हैं, जो धर्म की गहराई में जाना नहीं चाहते, ये धर्म को त्याग ही दें, तो शायद ये बेहतर इंसान बन पाएँगे; कट्टरता, नफ़रत इन सब चीज़ों से, हिंसा से तो बच जाएँगे कम से कम।
ये इसका एक पहलू है, ये समझो। अब दूसरी बात पर आओ।
आपको सचमुच बुरा, लोगों की जान गई इससे लग रहा है, सचमुच? अभी पिछले तीन-चार दिनों में ही कई घटनाएँ हुई हैं, जहाँ पर ट्रक जाकर के बिल्कुल बेलगाम गाड़ियों में घुस गया और मर गए दस-बारह। आपने सवाल नहीं पूछा इस बारे में मुझसे। सवाल नहीं पूछा आपने। रोज़ भारत की सड़कों पर भ्रष्टाचार के कारण इन गड्ढों में जितने लोग मर रहे हैं, आपने सवाल पूछा नहीं मुझसे। आपको आदमी की जान की इतनी ख़ास क़ीमत है तो आप सवाल क्यों नहीं पूछ रहे हो? बताओ न।
ये जो दिल्ली में AQI है, इससे आम दिल्लीवासी अपनी उम्र के दस साल-पंद्रह साल खो रहा है। आपने सवाल पूछा नहीं मुझसे।
प्रश्नकर्ता: यूज़्ड टू हो गए, सर।
आचार्य प्रशांत: नहीं, नहीं, नहीं, बात ज़्यादा गहरी है। समझो। एक तरह की ही मौत पर इतना क्यों भड़क रहे हो? समझ में आ रहा है न? इंसान की जान तो इंसान की जान है। इंसान की जान जहाँ भी जा रही हो, उसकी बात करो न।
पहाड़ों पर हर महीने दो-चार बार होता है कि यात्रियों से भरी बस जाकर खाई में गिर गई, पचास मर गए। हमने तो नहीं सुना कि तुम उठकर सवाल पूछ रहे हो। पचास जान चली गईं, पूछ रहे हो? और अगर जानों का जाना ही इतना बुरा लगता है तो जो सबसे बड़ा नरसंहार है, वो तो नारी-संहार है। उस पर तो हमने कोई सवाल ही नहीं सुना आज तक, कि भारत की आबादी में ये 5 करोड़ महिलाएँ चली गईं (सोर्स: स्टेट ऑफ़ वर्ल्ड पॉप्युलेशन 2020)। कहाँ चली गईं? इन्हें किसने मार डाला? कोई सवाल नहीं पूछता।
आदमी की जान की इतनी क़ीमत है, सबसे पहले तो ये पूछो कि भारत की 5 करोड़, 5 करोड़ नहीं तो कम से कम 3 करोड़; अब सेंसस हो तो पूरा आँकड़ा ठीक-ठीक सामने आए, सेंसस ही नहीं हो रहा। पर आप पुराने सेंसस को भी उठा लो, पुरानी जनगणना को, वहाँ भी आँकड़े साफ़ हैं। और कोई सवाल आप नहीं पूछ रहे हो कि “करोड़ों हत्याएँ किसने करीं?” वहाँ सवाल क्यों नहीं पूछते? बोलो न।
या ऐसा है कि एक पक्ष मज़हबी उन्माद फैला रहा है तो पलटकर हमें भी फैलाना है। बोलो, ये करना है? इस तरह के सवालों के पीछे कहीं छुपा हुआ मंसूबा ये तो नहीं है, कि उधर वाला है, मुसलमान है, इस्लाम की तरफ़ से मज़हबी उन्माद है और मूर्खता है भयानक, और हिंसा है, तो हमें भी तो करना है न। क्योंकि मूर्खता के तल पर गिरने के लिए जी बहुत मचल रहा है, हम भी मूर्ख बनना चाहते हैं।
पुलिस किस लिए है? सेना किस लिए है? लॉ-एंड-ऑर्डर की पूरी व्यवस्था और पॉलिटिकल सिस्टम किस लिए है? किस लिए है? इस तरह की घटनाओं को रोकने के लिए।
ये सामाजिक घटनाएँ ही नहीं हैं न, ये तो संगठित अपराधी और आतंकवादी संगठन हैं, जो कि पहले से ही पता है, घोषित तौर पर असामाजिक हैं। तो इनसे कौन निपटेगा? इनसे क़ानून-व्यवस्था निपट लेगी। लेकिन समाज के भीतर जो मानव-जीवन के लिए हमारे मन में उपेक्षा है, उससे तो हमें निपटना पड़ेगा न, कि नहीं निपटना पड़ेगा?
ट्रेन जाकर दूसरी ट्रेन पर चढ़ गई, और ये सब अभी बीते हुए कुछ दिनों की बातें हैं। ट्रेन जाकर दूसरी ट्रेन पर चढ़ गई, उतने ही लोग मरे, आपने कोई सवाल नहीं पूछा। गंदा पानी पी-पीकर यहाँ सैकड़ों मौतें हो रही हैं लगातार, आपने कोई सवाल नहीं पूछा।
मैं व्हॉटअबाउट्री नहीं कर रहा, मैं तो बस ये कह रहा हूँ कि जान और जान की क़ीमत बराबर होनी चाहिए। आदमी तो आदमी है। तो अगर एक मनुष्य की जान चली गई और आपको इतना दुख हो रहा है, तो इसी तरह से मनुष्यों की जान जिन दूसरी जगहों पर जा रही है, वहाँ आपको बराबर का दुख क्यों नहीं होता? मैं चाहता हूँ आपको दुख हो, क्योंकि मनुष्य की जान क़ीमती है। पर हमें कोई दुख नहीं होता।
दुनिया भर में एयर-पॉल्यूशन से जितनी मौतें नहीं होतीं, उससे कई गुना ज़्यादा सिर्फ़ एक शहर में हो रही है भारत के! भूलना नहीं, मुझे वहीं जाना है, इसलिए याद आ रहा है बार-बार। दुनिया में किसी जगह पर सड़कें उतने क़त्ल नहीं करतीं जितना भारत में होता है! भूलना नहीं। पर आप तो कभी सवाल ही नहीं उठाते।
तो फिर मुझे शक होता है कि आप वास्तव में किसी की जान जाने से दुखी हैं, या आपका इरादा कुछ और है।
जो अपराध कर रहे हैं, उनसे निपटने के लिए उन्हीं जैसा मत बन जाना। उनको मुँहतोड़ जवाब यही है, कि तुम कुछ भी करते रहो, हमें हमारी जगह से नीचे नहीं गिरा पाओगे।
और तुमसे निपटने के लिए हमारे पास पुलिस है, फ़ौज है; पूरी एक सभ्य, सुसंस्कृत व्यवस्था है, जो तुमसे निपट लेगी।
हिटलर को हराने के लिए एलाइड फ़ोर्सेज़ को ह्यूमन राइट्स वायलेशन्स नहीं करने पड़े थे। जर्मन्स लंदन में भी रहते थे, आपको पता है? और जब लंदन पर लगातार बॉम्बिंग हो रही थी, ब्लिट्ज़क्रिग, तो लंदनवासी भी उख्ता गए, गुस्सा गए। उन्होंने जाकर जर्मनों की दुकानों को खटखटाना शुरू कर दिया, पत्थर मारने शुरू कर दिए। लंदन की पुलिस ने उनको रोक दिया। उन्होंने कहा, कि वो वहाँ बैठकर के यहूदियों को मार रहा है, हम यहाँ बैठकर जर्मनों को थोड़ी मारेंगे! हमें थोड़ी हो जाना है हिटलर जैसा। और हिटलर जैसा हुए बिना हिटलर को हराया गया, यही तरीका है जीतने का। हराएँगे उनको पर उनके जैसा होकर नहीं।
रावण को हराने के लिए राम, और राम हो गए। रावण को हराने के लिए राम रावण थोड़ी बन गए थे। रावण अधर्मी था, तो रावण को हराने के लिए क्या राम भी अधर्मी हो जाएँ? नहीं हुए।
युद्ध-नीति अलग बात होती है, सामरिक सोच अलग बात होती है। सामरिक सोच श्रीकृष्ण ने दिखाई है महाभारत के युद्ध में, बिल्कुल। ‘अश्वत्थामा हतः इति नरो वा कुंजरो वा;' हम जानते हैं ये सब। भीष्म से क्या कहा, जानते हैं। कर्ण की क्या बात थी, वो भी जानते हैं। लेकिन केंद्र नहीं बदल दिया अर्जुन का। अर्जुन को ये नहीं कहा, कि अर्जुन, तू भी दिल से दुर्योधन हो जा दुर्योधन को हराने के लिए। क्या ऐसा कहा कभी श्रीकृष्ण ने, कि अर्जुन, दुर्योधन को हराना है तो तू भी दिल से दुर्योधन हो जा? उल्टा किया। वो बोले, अर्जुन, अगर दुर्योधन को हराना है तो तेरे पास ज्ञान ही ज्ञान होना चाहिए। मैं कहा करता हूँ बार-बार, दुर्योधन को अर्जुन के बाण ने नहीं, श्रीकृष्ण के ज्ञान ने हराया था। तो और ज़्यादा समझदार होने की जगह, और ज़्यादा ज्ञानवान होने की जगह, आप प्रतिक्रिया में और ज़्यादा दुर्योधन जैसा ही हो जाना चाहते हो। ये कहाँ की अक़्ल है?
सोचो न, क्या संभव है ऐसा कि श्रीकृष्ण बोलें अर्जुन को, कि दुर्योधन है, वो छली है, वो कपटी है, तो उसको हराने के लिए तू भी भीतर से दुर्योधन जैसा ही हो जा? ऐसा किया क्या? उल्टा किया, बोले, रुको, युद्ध से पहले अगर काँप रहे हो तुम, तो तुमको उच्चतम ज्ञान देता हूँ। तुमको गीता बताता हूँ।
हार्ट-अटैक कैपिटल इंडिया है, डायबिटीज़ कैपिटल इंडिया है। सौ तरीके से हम बीमार हैं, सौ तरीके से हम मर रहे हैं। जो ज़िंदा भी हैं, भारत में हमारी जो औसत आयु होती है, वो पश्चिम से दस-पंद्रह साल कम है। और अभी तो मैं बस औसत आयु की बात कर रहा हूँ, लिटरेसी वग़ैरह वो हटाओ, वो अलग बातें हैं। आम भारतीय विकसित मुल्कों की अपेक्षा दस-पंद्रह साल कम जीता है। उसका हमें कोई अफ़सोस नहीं हो रहा। साहब, जवान मौतें हमारी सबसे ज़्यादा कहाँ होती हैं वो अच्छे से समझिए, सड़कों पर। और बच्चे मर रहे हैं कुपोषण से, और मर नहीं भी रहे तो स्टंटेड हैं, पूर्ण शारीरिक विकास भी नहीं पा रहे (सोर्स: यूनिसेफ़)। इन बातों का भी कभी दुख मना लिया करो।
हम बैठते हैं न तन्मयता के साथ, गीता के एक-एक श्लोक पर तीन-तीन घंटे, तो क्यों बैठ रहे हैं? समझ में नहीं आ रहा? अर्जुन को गीता मिली, तो इतनी बड़ी फिर कौरव सेना टिकी थी क्या? हाँ, तो आपको भी जब गीता मिल रही है, चिंता मत करिए कोई दुर्योधन आपको हरा नहीं पाएगा, मत चिंता करिए।
आपको जो चीज़ हराएगी, वो यही है कि आपको गीता से ज़्यादा प्रतिक्रिया प्यारी है। सोचो, उपदेश दिया जा रहा है अर्जुन को गीता का और वहाँ से दुर्योधन ने चिढ़ाना शुरू कर दिया, या दुर्योधन ने वहाँ से दिखा कि कोई कुकृत्य कर रहा है बैठकर के। और अर्जुन ने कहा, हटाओ गीता-वीता, मैं जा रहा हूँ दुर्योधन को निपटने, कपटी, पापी; इसने जो किया है, वही इसको पलटकर मारूँगा इसके मुँह पर। गीता हटाइए।
क्या हम वही नहीं कर रहे हैं?
शस्त्र भी तभी काम आता है जब पहले शास्त्र हो।
महाभारत यही सिखाती है न, अर्जुन का शस्त्र नहीं काम आ रहा था। हैं सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर गांडीवधारी, लेकिन हाथ काँप रहे हैं, चल ही नहीं रहा। पता ही नहीं चल रहा है, करना क्या है। शस्त्र नहीं काम आ रहा, शास्त्र चाहिए पहले। जब शास्त्र होगा, तो फिर शस्त्र का भी सही इस्तेमाल हो जाएगा।
गिरिए मत। गिरे हुओं से निपटना है तो और उठिए। और उठने का मतलब ये नहीं होता कि गुफ़ा में जाकर समाधि ले ली। उठने का मतलब होता है, कि अब मैं अर्जुन हो गया। पहले मैं साधारण अर्जुन था, अब मैं गीता-ज्ञानी अर्जुन हूँ, अब जीतूँगा।
ये सब ज़लील हरकतें, कायरतापूर्ण हरकतें, आतंकवाद से बड़ा कुछ काम हो सकता है कायरता का। अरे, लड़ना है तो सामने आओ। सड़क पर जाकर के यूँ तुम, कोई चला जा रहा है, जिससे लेना एक-न देना दो, बेगुनाह, तुमने उसकी जान ले ली पंद्रह लोग मार दिए। इससे बड़ी कोई कायरता होगी क्या? तो कायरों से निपटने के लिए हम कायर थोड़ी बन जाएँगे।
जो घुस गए हैं तहख़ानों में, जो चेतना के पाताल-लोक में पहुँच गए हैं, उन पर एरियल बॉम्बिंग करेंगे। बंकर बस्टर्स बम आते हैं न, वो चेतना के पाताल में घुस गए हैं, वहाँ उन्होंने तहख़ानों में बंकर बना लिए हैं। हम और उठेंगे, वी विल ओन द स्काई। चेतना का आकाश समझते हो न? सत्य; आत्मा। वहाँ से करिए बमबारी।
ये मत करिए कि कोई ज़मीन के नीचे घुस गया है, बिल्कुल गिर गया है भीतर से, तो मैं भी उसी के जितना गिर जाऊँगा। नहीं। युद्ध ज़रूर करिए पर चेतना की ऊँचाई से करिए।
प्रश्नकर्ता: बहुत-बहुत धन्यवाद।