आपको सचमुच बुरा, लोगों की जान गई इससे लग रहा है; सचमुच? और अगर जानों का जाना ही इतना बुरा लगता है तो जो सबसे बड़ा नरसंहार है, वह तो नारी-संहार है; वहाँ सवाल क्यों नहीं पूछते? या ऐसा है कि एक पक्ष मज़हबी उन्माद फैला रहा है, तो पलट कर हमें भी फैलाना है? उनसे निपटने के लिए हमारे पास पुलिस है, फ़ौज है, पूरी एक सभ्य, सुसंस्कृत व्यवस्था है, जो उनसे निपट लेगी। जो अपराध कर रहे हैं, उनसे निपटने के लिए उन्हीं जैसा मत बन जाना। रावण को हराने के लिए राम, और राम हो गए। रावण को हराने के लिए राम रावण थोड़ी बन गए थे।
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प्रश्नकर्ता: नमस्कार, आचार्य जी। मेरे दो प्रश्न हैं, सर। अभी हाल ही में देश में कुछ आतंकवादी हिंसक घटनाएँ हुई हैं, उनसे रिलेटेड। इसमें काफ़ी लोग मारे भी गए हैं, अभी जो घटना हुई है। ऐसी घटनाएँ हमें हिला देती हैं अंदर से, लेकिन कुछ समय बाद ही फिर सब ऐज़ इट इज़ नॉर्मल हो जाता है।
मेरा प्रश्न ये है, आचार्य जी, कि ऐसी क्रूरता इंसान में जन्म कैसे लेती है? और हम ऐसी घटनाओं के कुछ समय बाद ही असंवेदनशील कैसे हो जाते हैं?
आचार्य प्रशांत: दखिए, सबसे पहले तो ये समझना होगा कि अगर ये सब जो किया गया है, जैसी कि संभावना है; धर्म के, मज़हब के नाम पर किया गया है, इस्लाम के नाम पर किया गया है। तो ये निश्चित रूप से धर्म का सबसे विकृत संस्करण है। जहाँ धर्म का मतलब ये बन जाए कि जाकर लोगों को मारना है, उसे धर्म तो कहना ही नहीं चाहिए, वो कोई और चीज़ बन चुका है। ठीक है?
तो ये अच्छे से इसको स्वीकार किया कि हाँ, देखो, जब धर्म के नाम पर परंपराएँ चलने लगती हैं और कट्टरता चलने लगती है, और धर्म का मतलब समझ की जगह मान्यता हो जाता है, तो उसके क्या नतीजे निकलते हैं। एक तो ये आप देखिए, और ये देखना ज़रूरी है क्योंकि वो ख़तरा दुनिया के सभी धर्मों के ऊपर है, ठीक है न।




