काम से बर्नआउट क्यों होता है?

Acharya Prashant

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काम से बर्नआउट क्यों होता है?
मामला ख़तरनाक हो जाता है, अगर कोई कह रहा है कि फलाना काम करते-करते मेरा मन थक गया है। इससे यह पता चलता है कि वो काम आपके लिए हार्दिक था नहीं। दिल से जो काम किया जाता है, उसमें तो आनंद होता है। दिल से मेरा आशय कामना नहीं, बोध है। समझो कि तुम कौन हो, और तुम्हारे लिए ज़िंदगी में ज़रूरी क्या है? सही काम क्या है? उस दिशा में आगे बढ़ो। काम वो चुनना, जिसमें कभी रिटायर न होना पड़े। उसके बाद बर्नआउट नहीं होगा, काम ही मनोरंजन बन जाएगा। यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।

प्रश्नकर्ता: मेरा नाम उत्कर्ष है और मैं सेकंड ईयर बीटेक का स्टूडेंट हूँ। सर, मैं दो दिन पहले न्यूज़ पढ़ रहा था। तो एक पॉपुलर सिंगर है। मैं देख रहा हूँ कि वो अपने करियर के पीक पर थे इस टाइम पर और उन्होंने रिटायरमेंट लिया। रीजन इसके पीछे उन्होंने बोला, कि मैं बोर हो गया था। सुनने में ये भी आ रहा है, कि वो बर्नआउट हो गए थे और मेंटल हेल्थ जो एक्सपर्ट्स हैं वो ये सजेस्ट करते हैं कि अब आप करियर ब्रेक ले लो।

एक सिमिलर एग्ज़ाम्पल है जो स्टैंड-अप कॉमेडियन है। उनके मेंटल हेल्थ एक्सपर्ट ने भी ये सजेस्ट किया कि आप पाँच साल के लिए ब्रेक ले लो और रिसेट करो।

सर, मैं आपकी वीडियोज़ देखता हूँ, सेशंस अटेंड करता हूँ। तो आपसे ये सीखा है कि सही काम होता है जो आपकी कमजोरियाँ गलाता है। काम साधना है। तो मैं इन दोनों चीज़ों को कैसे समझ सकता हूँ? अगर वो सही काम कर रहे हैं तो उन्हें बर्नआउट क्यों हो रहा है? ये वाली चीज़।

आचार्य प्रशांत: तो अगर विरोधाभास, कॉन्ट्राडिक्शन दिख रहा है, तो दो बातों में से कोई एक बात गड़बड़ होगी। कौन-सी गड़बड़ है? तुम ख़ुद अनुमान लगाओ, मैं क्या बताऊँ इसमें?

सही काम तो वो होता है कि मौत भी आ रही हो तो आदमी कहता है कि थम जाओ, अभी काम पूरा करना है। बर्नआउट क्या चीज़ होती है? बर्नआउट बहुत बड़ा शब्द था। बहुत प्रचलित। मेरे भी कैंपस के दिनों में, आईआईटी में उतना नहीं आईआईएम में बहुत ज़्यादा। बर्नआउट हो जाता है। यहाँ हो जाता है, गोल्डमैन सैक्स में हो जाता है, लेहमैन में हो जाता है। वो क्यों हो जाता है? इसीलिए हो जाता है।

आप कोई वहाँ दिल का काम थोड़ी कर रहे होते हो। कोई दूसरा आपको ठेल रहा होता है और आप स्वयं को ठेल रहे होते हो। ठेलना समझते हो न? जैसे ठेला चलाया जाता है। ठेले का अपना तो कोई इंजन नहीं होता न, कोई बाहर से ही उसको धक्का दे रहा होता है। उसमें होता है बर्नआउट। उसमें होता है।

दिल से जो काम किया जाता है, उसमें तो आनंद होता है। शरीर थक सकता है, बिल्कुल थक सकता है। अब आप मुझे खड़ा रखो आधी रात तक तो मेरी टाँगें थक जाएँगी, गला थक जाएगा। वो अलग बात है। लेकिन अभी हम बात कर रहे थे न कि देह और चेतना मनुष्यों के लिए अनिवार्य नहीं है कि साथ-साथ चलें। बिल्कुल ऐसा संभव है कि देह थक गई हो और चेतना अभी भी ताज़ी हो, बिल्कुल संभव है।

अगर चेतना भी थक रही है, तो ये मामला देह की थकान से ज़्यादा गंभीर है। देह को तो आराम चाहिए होता है क्योंकि देह पर तो सब भौतिक नियम लागू होंगे। ठीक है न? नीचे आग होगी उसको ऐसे रखोगे, तो साफ़ बताया जा सकता है कि कितनी देर में ये जल ही जाएगा, फफोले पड़ेंगे, ये सब होगा। एक फिज़िक्स की इक्वेशन की तरह उसको सॉल्व कर सकते हो। देह तो फिज़िकल है, लेकिन चेतना, उस पर तो बोध और प्रेम का नियम चलता है। उस पर जड़ता के नियम नहीं चलते, उस पर इनर्शियल लॉज़ नहीं लागू होते।

तो कोई ये कहे कि मैं जो काम कर रहा था, वो करने के कारण अब मेरे घुटने खराब हो गए हैं। कोई प्लेयर है। अभी भारत की एक शीर्ष बैडमिंटन खिलाड़ी रिटायर हुई। उन्होंने कहा, मुझे अर्थराइटिस है, मेरे जोड़ों में समस्या आ गई। मैं बैडमिंटन नहीं खेल सकती। ये बात समझने वाली है, वो रिटायर होंगी।

कौन जीता अभी? अभी सिनर और जोकोविच (टेनिस खिलाडी) का मैच चल रहा है। अब ये बोलें कि मैं अब 40 का होने जा रहा हूँ और अब शरीर की समस्या है, तो समझ में आती है बात कि 22-23 साल का अल्काराज़ (टेनिस खिलाडी) है उसके सामने आप एक 38-40 साल के आदमी को खड़ा करोगे तो दिक़्क़त आने वाली है। ठीक है?

तो शारीरिक कारणों से कोई रिटायर हो रहा हो, वो ठीक है, क्योंकि शरीर तो मिट्टी है, भौतिक है। शरीर ने जवाब दे दिया, वो अलग बात है। लेकिन मामला ख़तरनाक हो जाता है अगर कोई कह रहा है कि फलाना काम करते-करते मेरा मन थक गया है। ख़तरनाक क्यों कह रहा हूँ? क्योंकि इससे ये पता चलता है कि वो काम आपके लिए शायद हार्दिक था नहीं। और और ख़तरनाक इसकी तब हो जाता है, जब हमें पता चलता है कि जो काम हार्दिक नहीं था, उस पर भी इस समाज ने आपको बहुत सम्मान और प्रसिद्धि और संपन्नता भी दे दी।

तो ये समाज कैसा है, जो पता नहीं कर पाता कि कौन-सा व्यक्ति हार्दिक काम कर रहा है और कौन-सा व्यक्ति स्वयं को बस ठेल रहा है। सोचो, कोई व्यक्ति हार्दिक काम कर नहीं रहा और आप उस पर दिलो-जान लुटाए जा रहे हो, पैसे भी लुटाए जा रहे हो। इससे आपके बारे में भी तो यही पता चलता है न कि आप ख़ुद भी अपना दिल जानते नहीं।

मैं कोई आक्षेप नहीं लगा रहा हूँ इन व्यक्तियों पर। मैं उनके निजी जीवन को बिल्कुल नहीं जानता। मुझे नहीं मालूम उनके पास क्या कारण है, और ये बहुत संभव है कि असली कारण वो न हो जो वो पब्लिक में बता रहे हैं। बिल्कुल हो सकता है कि उनके पास असलियत में कोई ज़्यादा गहरा, कोई वैध, लॉजिकल, वैलिड कारण हो। तो मैं इन व्यक्तियों पर कोई आक्षेप नहीं कर रहा। मैं उनको जानता भी नहीं। न उनको कुछ कहने का मेरे पास अभी हक है, न मुझे सूचना है। मुझे कोई जानकारी भी नहीं है कि सचमुच चल क्या रहा है। ठीक है? तो इसको आप पर्सन-सेंटर्ड कमेंट्री मत बना लेना। एक जनरल बात कर रहा हूँ।

आप लोग यहाँ बैठे हुए हो। सब अधिकांश आईआईटी के आप छात्र हो।

काम वो चुनना, फिर बोल रहा हूँ, जिसमें कभी रिटायर न होना पड़े। 35–40 की तो बात छोड़ दो, 60 के हो जाओ, 80 के हो जाओ, तो भी रिटायर न होना पड़े।

काम ऐसा नहीं होता है कि काम करा जल्दी से कि भाई, 2 साल में इतना पैसा बनाना है, बना ले और उसके बाद फुट ले। ये नहीं होता। मुझे तो उस तरह की एंटरप्रेन्योरशिप भी समझ में नहीं आती, जिसमें आप स्टार्ट आउट करते हो ताकि जल्दी से आईपीओ आ जाए और फिर आप एग्ज़िट कर लो। आपने प्रेम से, हृदय से कुछ बनाया, तैयार किया, इसलिए कि अब आप उसको बेच खाओ? ये क्या रिश्ता है फिर आपका और आपकी कृति का।

अगर कर्ता का कर्म से कोई प्यार ही नहीं है, तो कर्म उसने कितनी बेचैनी और कितनी घृणा के साथ करा होगा। लगातार यही ख़्याल रहा होगा कि कितनी जल्दी इसको बेच खाऊँ।

बिकाऊ मत बन जाना कि कैंपस में जिसने आकर के सबसे ज़्यादा सीटीसी दिखा दी, उधर ही भाग गए; या जिसने दिखा दिया फॉरेन प्लेसमेंट वहाँ निकल लिए; या स्टॉक ऑप्शंस जिसने दिखा दिए, उधर चल दिए। ये सब खूब होता है। अभी होता है कैंपस में ऐसा नहीं होता है?

श्रोता: होता है, सर।

आचार्य प्रशांत: हमेशा की बात है। इसके विपरीत जाने को भी नहीं कह रहा हूँ कि जो बिल्कुल पैसा न दे, वहीं चले गए। मैं ये कह रहा हूँ कि दिल पहले आना चाहिए। और दिल से मेरा आशय कामना नहीं, बोध है। समझो कि तुम कौन हो और तुम्हारे लिए ज़िंदगी में ज़रूरी क्या है? सही काम क्या है? उस दिशा में आगे बढ़ो। उसके बाद बर्नआउट नहीं होगा, उसके बाद काम ही मनोरंजन बन जाएगा।

काम ही मनोरंजन बन जाएगा, इसका मतलब ये नहीं है कि फिर बैडमिंटन खेलने नहीं जाओगे या मूवी देखने नहीं जाओगे। जाओगे, पर काम से भाग कर नहीं जाओगे। ये नहीं कहोगे कि काम ने इतना थका दिया, चलो अब मूवी देखने चलते हैं। ऐसे नहीं कहोगे। काम थका नहीं दे रहा है, काम और ज़्यादा ताज़गी और ऊर्जा दे रहा है। जब थके होते हैं, तो काम की तरफ़ चले जाते हैं, चौकन्ने हो जाते हैं, जग जाते हैं, सचेत हो जाते हैं। ऐसा काम चलना चाहिए ज़िंदगी में कि कोई रोकने भी आए कि बहुत हो गया, तो तुम कहो, नहीं हाँ, बहुत तो हो गया, ठीक है नहीं करेंगे। और जैसे ही वो हटे, फिर से शुरू कर दो।

कितने ही उदाहरण हैं जहाँ पर जिन्हें जिस काम पर प्रेम आ गया था, वो करते-करते बहुत शांति से जान दे दी। एक महिला वैज्ञानिक हैं, जिन्हें दो नोबेल पुरस्कार मिले हैं। कौन हैं?

श्रोता: मैरी क्यूरी।

आचार्य प्रशांत: उनकी मृत्यु कैसे हुई थी? कैसे हुई थी? रेडिएशन से हुई थी। वो ये थोड़ी करती थीं कि अरे, अब मैं बोर हो गई हूँ। डांस कहाँ कर सकती हूँ और पार्टनर कहाँ है? उनकी लैब उनकी पार्टनर है। और ऐसे समय में, जब महिलाओं को विज्ञान में इतना काम करने की सुविधा भी नहीं थी, सौ साल पहले की बात कर रहे हैं हम।

मैं अभी मैच की बात कर रहा था न। क्या हुआ?

श्रोता: जोकोविच ब्रोक, और अगेन ऑन द वर्ज ऑफ़ ब्रेकिंग सिनर।

आचार्य प्रशांत: अच्छा, अब सिनर ब्रेक कर रहे हैं। अभी कितना? 4–4?

श्रोता: 0–40।

आचार्य प्रशांत: नहीं, गेम में कितना है?

श्रोता: 4–3, जोकोविच इज़ लीडिंग।

आचार्य प्रशांत: 4–3 जोकोविच इज़ लीडिंग। ठीक, ठीक, ठीक।

ये मैच देखने के लिए मुझे मेरे एक बैचमेट ने याद दिलाया, आईआईटी के। आज वो मालूम है क्या कर रहा है? उसने एक दवाई बनाई है वो उसका अपने ऊपर परीक्षण कर रहा है। आज के ही दिन। मैं अपने बहुत कम बैचमेट्स से संपर्क में रहता हूँ, इससे हूँ। कोई भी दुष्प्रभाव हो सकता है। पहले भी कर चुका है, जो परिणाम चाहिए थे नहीं मिले। अब फिर से कर रहा है। सब काम-वग़ैरह छोड़ के एक दवाई है, जिसको तैयार करने में लगा हुआ है।

कुछ भी हो सकता है क्योंकि दवाई, दवाई है। अभी अनटेस्टेड है, कौन जाने क्या हो जाए। पर मैं उसको ये नहीं कह रहा, बिल्कुल कि सावधानी बरत। नहीं कहूँगा। अंजाम क्या हो सकता है, वो भी जानता है। मैं भी जानता हूँ। पर मैं उसको नहीं कहने वाला कि सावधानी बरत। मैं भी ऐसी ज़िंदगी जी रहा हूँ, उसको पता है। वो यूएस में रहता है, अभी इंडिया आया था दो महीने यहाँ था। मैं उससे जब भी मिलने जाता था, तो रात के 2:00 बजे जाता था क्योंकि उससे पहले मुझे फुर्सत नहीं होती थी। उसको भी मेरी ज़िंदगी पता है। पर वो कभी मुझे नहीं कहेगा कि अब थम जा, आराम कर ले, या धीमा हो जा।

काम से प्यार क्या होता है? मैं भी जानता हूँ, वो भी जानता है। अजीब लगेगा अगर मैं उसको कहूँ कि रिटायर हो जा, या वो मुझे कहे। और उसके पास कोई फंडिंग वग़ैरह नहीं है। अपनी ही नौकरियाँ करते हुए वहाँ पर उसने जितनी सेविंग्स की थीं उन्हीं से सब कुछ कर रहा है। अपनी ही उसने लैब बनाई है, उसी में उसने लोग भी एंप्लॉय किए हैं। अपनी ही रिसर्च है और ऐसे फ़ील्ड में रिसर्च कर रहा है, जिस फ़ील्ड में वो एजुकेटेड भी नहीं है। वो मैकेनिकल इंजीनियर है। फिर यूएस में जाकर एमएस वग़ैरह की है उसने, और काम किस फ़ील्ड में कर रहा है?

श्रोता: मेडिकल।

आचार्य प्रशांत: तो सारी पढ़ाई ख़ुद बैठकर की है। इसलिए नहीं कि डिग्री मिल जाएगी, इसलिए क्योंकि उसको लग रहा है कि यही काम है जो करना है। कोई फंडिंग भी नहीं, कुछ नहीं।

ज़िंदगी में एक जुनून होना चाहिए। तुम जैसे जी रहे हो, उसको देखकर अगर कोई भी तुमको पागल नहीं कह रहा, तो तुम गलत जी रहे हो।

जो सबकी नज़रों में एक सही और संतुलित ज़िंदगी जी रहा है, उसकी ज़िंदगी तो बर्बाद ही जा रही है। और फिर कह रहा हूँ, आपने जिन दो व्यक्तियों का नाम लिया था, मैं उनके बारे में बिल्कुल जानकारी नहीं रखता और मुझे उनके विषय में टिप्पणी करने का न कोई अधिकार है और न कोई सूचना है।

प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी। हम इतना इनसेंसिटिव हो गए हैं। हमारे जो इमोशंस हैं, वो 10 सेकंड रील पर खाली आ गए हैं। 10 सेकंड में हम एक रील देखते हैं। उसके बाद जब रील स्क्रोल करेंगे, हमारे इमोशन सडनली चेंज होते हैं। तो कोई भी न्यूज़ होगी, कुछ सडन डिमाइस हो गया, या फिर तुरंत उसके बाद स्क्रोल की, कुछ मतलब हैप्पीनेस ऐसा कुछ स्प्रेड हो गया।

और जैसे कैंपस का भी मैं एग्ज़ांपल देती हूँ। रिसेंट जब से मैं आई हूँ, 2.5 इयर्स हो गए मुझे यहाँ पर पीएचडी जॉइन किए हुए। और तब से मैंने देखा, यहाँ पर नाइन सुसाइड्स हो चुके हैं। मतलब, इतना ये नाइन सुसाइड्स हुए हैं उस 2.5 ईयर के स्पैन में जो मैंने ख़ुद देखे। और फिर मैं देखती हूँ कि सेंसिटिविटी बिल्कुल भी नहीं बची है।

मतलब जैसे आज सुसाइड हुआ और उसके बाद में फिर फेस्ट हो रहे हैं और स्टूडेंट्स जा भी रहे हैं, एंजॉय भी कर रहे हैं। उस दिन उसके एक दो दिन तक रहता है, बहुत ज़्यादा रहता है। कि हाँ, ठीक है, ये हो गया, ये हो गया। नहीं होना चाहिए था। लेकिन फिर वो भी नहीं होना चाहिए था जो बाद में हो रहा है। तो ये सेंसिटिविटी हमारी किधर जा रही है? हम कैसे उस चीज़ को लेकर आगे…?

आचार्य प्रशांत: देखो, सेंसिटिविटी दूसरों के लिए बाद में होती है, अपने लिए पहले होती है। हमें अपने लिए ही कहा है कि दूसरों के लिए सेंसिटिव हो जाएँगे।

जो चले गए, उनका चला जाना बहुत-बहुत दुखद है। आप कह रहे हैं, आईआईटी कानपुर कैंपस में नौ सुसाइड्स ढाई साल में। सारी आईआईटी मिलाकर के हर साल दर्जन-दो दर्जन, बहुत बड़ा आँकड़ा है, ये भाई: 10, 15, 20, इतने स्टूडेंट्स आत्महत्या करते हैं। ये बहुत दुखद है। और इससे भी ज़्यादा दुखद है कि जो लोग भले चंगे दिखते हैं, जो लोग कैंपस की सक्सेस स्टोरीज़ कहलाते हैं, एक बहुत दूसरे तरीके से वो भी सेल्फ आर्म कर रहे होते हैं।

अब ये जो बात है, इसको उस पीछे वाले सवाल से जोड़ कर देखो। आप अगर कैंपस में तैयार हो रहे हो, एक ऐसी ज़िंदगी जीने के लिए जिस ज़िंदगी आपका दिल नहीं और प्यार नहीं, तो क्या आप सचमुच जीने जा रहे हो? बोलो। वो भी तो एक तरह की मृत्यु ही तो हुई न। जी सकते थे और जीने की जगह बस सर्वाइव करना चुना।

कैसी ज़िंदगी जिसमें आज़ादी न हो, बोध न हो, चेतना न हो, प्रेम न हो। वो कोई ज़िंदगी है? जो चले गए, उनका चले जाना दुखद है। जो बचे हुए हैं उनका बिना प्रेम के, डर के, आज़ादी के जीना भी दुखद है। ट्रैजेडी सिर्फ़ मृत्यु में ही नहीं होती। ग़ौर से देखो, तो ज़िंदगी ज्यादा बड़ी ट्रैजेडी हो सकती है। वो ट्रैजेडी आप अपने साथ न होने दें। बस ये आख़िरी बात। धन्यवाद।

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
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