मृत्यु डरावनी होती ही इसीलिए है, क्योंकि वह एक अधूरी कहानी का अंत होती है। जब कोई अपना चला जाता है, तो हम रोते हैं कि अभी सोचा था इनके साथ यह बातें करेंगे, नहीं कर पाए। अभी सोचा था, इनको साथ ले वहाँ घूम आएँगे, नहीं घूम पाए। बहुत कुछ संभव था, जो हो नहीं पाया। मृत्यु का कष्ट है ही अधूरेपन में, तो मरने से पहले ही पूरे हो जाओ। मरो मरो हे जोगी मरो, मरो मरण है मीठा — मुक्त हो जाओ।
यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।
प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी, मेरा प्रश्न डर से संबंधित है। मैं दो साल से जुड़ी हुई हूँ आपसे। और जीवन में पहले, सोलह साल पहले, मेरी छोटी बहन की डेथ हो गई थी सडन। तो उसके बाद मैंने अपना स्किल्ड-बेस्ड एजुकेशन कम्प्लीट किया और अपना काम शुरू किया, जॉब वग़ैरह सब किया। उसके पहले मैं बस एक हाउसवाइफ़ थी, घर और बच्चे, यही मेरा काम था।
और अभी छह साल पहले मेरे हज़बैंड की डेथ हो गई सडन। तो उसके बाद मतलब बाहरी संघर्ष, भीतरी संघर्ष, इसके बीच में भगवद्गीता और कठोपनिषद् जीवन में आए और उसकी खोज करते-करते मैं गीता-सत्रों से जुड़ गई। तो दोनों ही इंसिडेंट्स ऐसे थे कि संघर्ष मैंने बहुत किया, बाहर संघर्ष किया, भीतर भी संघर्ष। और बुरा परिणाम, अच्छा परिणाम, अच्छा परिणाम ये रहा कि मैंने अपने आप को आगे बढ़ाया। बुरा तो मतलब ये है कि खो दिया। लेकिन अब कभी सोचती हूँ वो बुरे परिणाम के बारे में तो बहुत डर लगता है, क्योंकि अभी भी हैं मेरे अपने, जिनसे मेरा स्नेह का रिश्ता है मेरा। तो वो डर जाता नहीं है मृत्यु का बिल्कुल भी, अपनों के लिए। और वो किसी के भी हाथ में नहीं है, क्योंकि सडन मैंने दो अपने खोए हैं। तो वो जो सडन चीज़ होती है, वो कभी-कभी बहुत हॉन्टेड करती है मुझे।




