तुम ट्रेन पकड़ने जा रहे हो और तुम दौड़ रहे हो। बीच-बीच में रुक जाते हो और मोटिवेशनल वीडियो देखते हो? ऐसा होता है क्या? वहाँ तुम्हें मोटिवेशन नहीं चाहिए होता, वहाँ तुम्हें घड़ी चाहिए होती है। तथ्य काफ़ी है। मोटिवेशन उनको चाहिए, जो कोई काम बिल्कुल अंधे होकर कर रहे हैं। भीतर से कोई ललक है ही नहीं, लेकिन डर के मारे वो काम करना भी पड़ रहा है। मोटिवेट होकर भी क्या होगा? तुमने काम ही ग़लत उठा लिया है, क्योंकि काम अगर सही होता है, तो काम ही जान बन जाता है। फिर मोटिवेशन नहीं चाहिए होता।
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प्रश्नकर्ता: नमस्ते, प्रशांत जी। तो मेरा ये सवाल था कि आपने आइआइटी निकाला है, आइआइएम निकाला है, आप सिविल सर्विसेस में भी रहे हैं, तो आपके जीवन में ऐसा कौन सा टर्निंग पॉइंट था जिससे आपने सोचा कि यार, अब मुझे ये सब से सैटिस्फ़ैक्शन नहीं मिल रहा है, या क्या चीज़ थी जिसने आपको मोटिवेट किया टू गो इन टू द वेदान्तिक कल्चर और लोगों को गाइड करने के लिए?
आचार्य प्रशांत: नहीं, ऐसा कोई विशेष टर्निंग पॉइंट या कोई ख़ास घटना नहीं थी। दुनिया जैसी है, तुम्हारी और मेरी शक्लें जैसी हैं ये तो साफ़-साफ़ दिखती हैं न? कोशिश न करो तब भी दिखती हैं। तो बस ये जो हमारे आस-पास की दुनिया है इसी को देखकर के ये स्पष्ट था कि जैसा चल रहा है मामला ऐसा चलने नहीं दिया जा सकता। बदलाव लाना पड़ेगा। बस यही है। कोई ख़ास दुर्घटना नहीं हुई थी जीवन में। ब्रेकअप के बाद स्पिरिचुअल नहीं हो गया था।
प्रश्नकर्ता:




