ज़हर से भरी हवा

Acharya Prashant

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ज़हर से भरी हवा
आप साँस ले-लेके मर रहे हो। साँस लेके जिया जाता है। आपको मजबूर किया गया है कि आप साँस लेके मर जाओ, और आपके भीतर क्रोध नहीं उठ रहा। आप खड़े होकर के गर्जना नहीं कर रहे कि ये कैसे हो रहा है? कौन ज़िम्मेदार है? दुनिया की जो सबसे प्रदूषित राजधानी है, वो दिल्ली है। यह प्रदूषण विकास से नहीं हो रहा है। यह आंतरिक दूषण है, जो बाहरी प्रदूषण के रूप में दिखाई दे रहा है। छोटी सी बात ये है, कि इट ऑल स्टार्ट्स विदइन। और जो चीज भीतर से शुरू होनी है, आप बाहर, बाहर, उसमें लगे हुए हो। उससे क्या हो जाएगा? यह सारांश प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन के स्वयंसेवकों द्वारा बनाया गया है

प्रश्नकर्ता: 100, 200, 300, 400, 500, 1000; ये केवल संख्या नहीं हैं, ये मानक है कि आपकी हवा में कितना ज़हर घुल चुका है। एक विशालकाय हाथी आपके लिविंग रूम में आकर बैठ गया है और आप चुटकुले सुनने में मग्न हैं। प्रदूषण की समस्या पर जब बात होती है तो उसे बड़ा सेकेंडरी इशू मान लिया जाता है। जब तक कोई आपदा नहीं आती, जब तक चीज़ें घर तक चलकर नहीं आ जाती, और बहुत सारे केसेज़ में तो घर तक चलकर आने के बाद भी उसे नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है, और ये एक एटीट्यूड की तरह हो गया है।

बहुत से सवाल ये एटीट्यूड उठाता है और इन्हीं सवालों का जवाब देने के लिए आज हमारे साथ मौजूद हैं, आचार्य प्रशांत। आचार्य प्रशांत, बहुत-बहुत स्वागत है आपका एनडीटीवी के इस ख़ास प्रोग्राम में। आप एक दार्शनिक हैं, बेस्ट सेलिंग ऑथर हैं, गीता और वेदांत की टीचिंग्स को जनमानस तक फैला रहे हैं।

आचार्य जी, आज जब हम इस एपिसोड को शूट कर रहे हैं, वर्ल्ड एनवायरमेंट डे है। आपको मोस्ट इंपैक्टफुल एनवायरमेंटलिस्ट का अवार्ड भी मिला है। मैं जानना चाहती हूँ, आपकी जो पूरी जर्नी रही एनवायरमेंट के प्रति, क्लाइमेट चेंज की दिशा में जो आपने काम किया है, वो कैसी रही? कहाँ से शुरू हुई और आज के संदर्भ में उसे कैसे देखा जाना चाहिए, और लोग उससे क्या कुछ इंस्पिरेशन ले सकते हैं?

आचार्य प्रशांत: देखिए, सरोकार तो ‘मैं’ से होता है। मैं जो हूँ, मेरी जो दशा है, उस पर भीतरी स्थितियों का भी असर पड़ता है और बाहरी स्थितियों का भी। आपका मन ख़राब है, उल्टे-पुल्टे आपको विचार आ रहे हैं, भावनाएँ बेकाबू हो रही हैं, गुस्सा है, अवसाद है। तो भी आप यही कहते हो न, "मैं ठीक नहीं हूँ।" फिर शारीरिक तल पर कुछ हो जाए, बुखार आ गया है या दर्द हो रहा है कुछ, तो भी आप यही बोलते हो, "मैं ठीक नहीं हूँ।" इसी तरीके से अगर आपकी हवा ज़हरीली हो गई है, तो भी तो आप यही कहोगे न, "मैं ठीक नहीं हूँ।"

तो जो यात्रा होती है अध्यात्म की, उसका सरोकार ‘मैं’ से है और ‘मैं’ पर असर तो इन तीनों का ही पड़ रहा है। आध्यात्मिक आदमी ये कैसे कह देगा कि मेरा नाता बस भीतरी जगत से है? भाई, भीतरी जगत का भी ‘मैं’ पर असर पड़ता है। शारीरिक जगत का भी ‘मैं’ पर असर पड़ता है, और जिसको आप बाहरी जगत बोलोगे, उसका भी अपने ऊपर असर पड़ता है न। तो ठीक वैसे जैसे हमें अपने मन का देखना होता है, अपने तन का हाल देखना होता है। उसी तरीके से हम जो पानी पी रहे हैं, हम जो हवा ले रहे हैं, हम जो खाना खा रहे हैं, हमें उसका भी तो हाल देखना होता है। तो वो अध्यात्म के अंतर्गत ही आता है।

तो पर्यावरण की चिंता और अंतःकरण की चिंता, ये दोनों अध्यात्म की ही बातें हैं। इनमें आपस में कोई भेद नहीं है।

वास्तव में, अगर कोई आध्यात्मिक होगा तो उसे पर्यावरण की चिंता करनी पड़ेगी। क्योंकि अध्यात्म का मतलब ही है ख़ुद से सरोकार रखना, ख़ुद से। और ख़ुद से सरोकार रखना, तो मैं अगर ज़हर लगातार खा रहा हूँ या पी रहा हूँ, तो क्या उसका ख़ुद से सरोकार नहीं है? तो पर्यावरण की भी फ़िक्र करनी पड़ेगी न।

प्रश्नकर्ता: हम दोनों ही मास्क लगाकर नहीं बैठे हुए हैं। एक्यूआई भले ही कुछ भी हो, लेकिन अगर ब्रायन जॉनसन बाहर से आते हैं और वो एक इंटरव्यू करते हैं, तो वो मास्क लगाकर बैठते हैं और वो ये चिंता व्यक्त करते हैं कि इतनी ज़्यादा समस्या हो गई है, एयर पॉल्यूशन की भारत में कि इस पर ध्यान देने की सख़्त आवश्यकता है। और तब ख़बरें और ज़्यादा बनती हैं, क्योंकि कोई व्यक्ति बाहर से आया है और उसने एक बात कह दी है। लेकिन अपनी ही ज़मीन पर, अपनी ही धरती पर, तमाम ऐसे लोग हैं जो इस दिशा में काम कर रहे हैं लगातार, तब भी उन चीज़ों को इतना महत्त्व नहीं मिल रहा है, इतनी जगह नहीं मिल रही है।

एनवायरमेंट को शुरुआत से लेकर, पाँचवी कक्षा में जब हमने एनवायरमेंटल स्टडीज़ पढ़ी, तो वो एक एक्स्ट्रा सब्जेक्ट के तौर पर हमको पढ़ा दिया गया और अच्छे नंबर आ जाते थे; इसमें पूरे नंबर मिल जाएँगे। मैंने केमिस्ट्री की पढ़ाई की, मुझे एक सेमेस्टर में एक्स्ट्रा सब्जेक्ट के तौर पर एनवायरमेंटल साइंस मिल गया। आसान सी चीज़ है, और मुझे लगता है वो एटीट्यूड, पता नहीं मेरे ओपिनियन में कैरी फॉरवर्ड हुआ है। आपको क्या लगता है, क्या हम नम हो गए हैं? हमें पता है ये जब हम ज़हर की बात करते हैं, ये व्याप्त है, हवा ज़हरीली है। कई आँकड़े ऐसे आते हैं। कई रिपोर्ट्स आती हैं, लगातार चेताती हैं, चेतावनी देती हैं; लेकिन हम टस से मस होने के लिए तैयार नहीं हैं।

आचार्य प्रशांत: बाहरी लक्षण है, समस्या भीतरी है। इतनी भीतरी है कि किसी बाहरी आदमी को आकर शोर मचाना पड़ता है। वो यूँ ही मास्क लाकर नहीं बैठे थे, ब्रायन जॉनसन। यूँ ही वो बातचीत कर रहे थे, कहीं पर बीच में उठकर ऐसे ही नहीं चले गए थे, वो एक संदेश देना था। इट वाज़ टू मेक अ वेरी पावरफुल विज़ुअल स्टेटमेंट। और थोड़ा सा हमें इस पर लज्जा आनी चाहिए कि हमें हमारा हाल बताने के लिए किसी विदेशी को इस हद तक जाना पड़ता है।

हम क्यों अपने हाल से इतने अनभिज्ञ हैं?

देखिए, उस पर वापस चलते हैं। मैं जो हूँ, ‘मैं,’ मुझ पर मेरी भीतरी दशा का असर पड़ता है। मेरी शारीरिक दशा का असर पड़ता है और मेरे बाहरी माहौल का असर पड़ता है। तीनों का असर पड़ता तो मुझ पर ही है न। तो कहीं से भी असर पड़ रहा हो, मुझे उस असर के प्रति संवेदनशीलता, जागरूकता, सावधानी, सतर्कता तभी होगी न जब सबसे पहले मैं अपना ख़्याल रखना चाहूँ।

ऐसे समझिए, मैं हूँ, मुझ पर यहाँ कोई बैठा है, वो असर डालता है। आप बैठी हैं, आप असर डालती हैं। वहाँ वो बैठे हैं, वो असर डालते हैं। असर कोई भी डालता हो, तीनों असर डालते मुझ पर ही हैं। तो किसी भी दिशा से प्रभाव आ रहा हो, मैं उसके प्रति सतर्कता, सावधानी तभी दिखाऊँगा न जब मैं ख़ुद से प्यार करता हूँ। नहीं तो ये आके मुझे थप्पड़ मार जाए, कि आप मार दें थप्पड़, कि वो थप्पड़ मार दे; क्या फ़र्क़ पड़ता है कहीं से भी थप्पड़ पड़ रहा है, मैं कोई आत्मसम्मान रखता ही नहीं। और ये बड़े कीमती शब्द पर आ गए हम, आत्मसम्मान।

अपनी फ़िक्र वो करेगा न, जो अपना मूल्य जानता हो। इसलिए मैं कह रहा हूँ कि ये समस्या आंतरिक है। हम अपना मूल्य नहीं जानते, तो हम फिर अपनी फ़िक्र भी नहीं करते हैं।

हम अभी यहाँ बैठे हुए हैं, ये जानी बात है कि दिल्ली का हर व्यक्ति अपनी उम्र के 12 साल गँवा रहा है वायु प्रदूषण की वजह से, 12 साल। अंतरराष्ट्रीय मानक जो है पीएम 2.5 का, वो है 5µg/m³, और दिल्ली का है लगभग 100µg/m³, 18 से 20 गुना ज़्यादा अंतरराष्ट्रीय मानकों से। वही बात हमें पता है, साधारण-सा ये एक आँकड़ा है और हर जगह उपलब्ध है। हम सब जानते हैं, बीच-बीच में अख़बार में भी छप जाता है।

आँकड़ा छपने से क्या होगा? मुझे साफ़ दिख भी रहा हो, ये आके मुझे थप्पड़ मार गया। जब मुझे अपनी क़द्र ही नहीं है, भीतर ही कोई गरिमा ही नहीं है, कोई आत्मसम्मान ही नहीं है। तो मुझे साफ़ दिखाई भी दे रहा हो, दुनिया चिल्ला-चिल्ला के ही बता रही है, तू पिट रहा है, तू लात खा रहा है, तू थप्पड़ खा रहा है, मुझे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ेगा न। हम में उस चीज़ की कमी है; आत्मसम्मान की।

एक बात बताइए आप। आप बहुत अच्छे से अगर जानती हों कि आपके पास जीने के लिए कोई बहुत माक़ूल, सशक्त, उचित कारण है, तो क्या आप जान गँवाना बर्दाश्त करेंगी?

प्रश्नकर्ता: नहीं।

आचार्य प्रशांत: और अगर आपको पता हो कि आपकी ज़िंदगी बस ऐसी ही है थाली का बैंगन, लुढ़कता पत्थर, कभी इधर चले गए, कभी उधर चले गए, पेड़ से टूटा हुआ पत्ता हवा बहा ले गई, ऐसे ही है बस। जैसे इतने लोग आए, गुज़र गए, वैसे ही एक टिड्डी दल आता है न, इतनी टिड्डियाँ होती हैं, कौन गिनती करता है कितनी मरी, कितनी बची? बरसाती कीड़े आते हैं, उनकी जान की क्या कीमत है? कौन गिनती करता है, पाँव के नीचे कितने आ गए?

अगर मेरे पास ख़ुद का कोई ज्ञान नहीं है, ख़ुद को मैंने ज़रा जाना नहीं है, और इस कारण मेरे पास जीने के लिए कोई ताक़तवर ठोस वजह नहीं है, तो मैं अपनी ज़िंदगी की कीमत क्यों करूँ? अगर मैं 12 साल पहले मर रहा हूँ एयर पॉल्यूशन से, तो मर जाने दो।

प्रश्नकर्ता: पर मृत्यु से डर तो सबको लगता है।

आचार्य प्रशांत: आज आ रही हो तो डर लगे न। आप तीस के हो, चालीस के हो। आपको बताया जाता है कि अस्सी जीने वाले सत्तर ही जियोगे। आप कहोगे, "ठीक ही है।" हाँ, आपको ये बोला जाए, "कल मर जाओगे," तो फिर आप थोड़े परेशान हो सकते हो। या कोई डॉक्टर बोल दे, "तीन महीने बचे हैं," तो भी थोड़े परेशान हो सकते हो। लेकिन सत्तर और अस्सी में कहाँ फ़र्क़ पता चलता है, इतना तो हम घपला ऐसे भी कर लेते हैं। किसी को ₹100 लौटाने होते हैं, आप मजे में ₹80 लौटा के आ जाते हो और कहते हो, "एप्रोक्सिमेटली ठीक ही तो है।"

तो ज़िंदगी में हम हर चीज़ में तो थोड़ा-बहुत घपला कर ही लेते हैं। तो अस्सी साल जीने थे, सत्तर साल ही जियोगे, थोड़ा-सा घपला हो गया। चलो, वो तो रोज़ होता है, क्या हो गया। इतना तो दस-बीस प्रतिशत तो चलता रहता है, कहीं घूस दे दी, कहीं मिलावट हो गई दस-बीस प्रतिशत। दस-बीस प्रतिशत तो चलता रहता है।

आत्मसम्मान की बहुत कमी है। जो आदमी जानता होगा, वो कौन है; जो आदमी जानता हो, किस लिए जी रहा है, वो अपनी ज़िंदगी का ये अपमान बर्दाश्त नहीं करेगा कि मर रहा है और किस लिए मर रहा है, कि साँस लेता जा रहा है और मरता जा रहा है। ये कितनी बेइज़्ज़ती की बात है।

प्रश्नकर्ता: द लाइफ़ फोर्स।

आचार्य प्रशांत: आप साँस ले-लेके मर रहे हो। साँस लेके जिया जाता है। आपको मजबूर किया गया है कि आप साँस लेके मर जाओ, और आपके भीतर क्रोध नहीं उठ रहा। आप खड़े होकर के गर्जना नहीं कर रहे कि ये कैसे हो रहा है? कौन ज़िम्मेदार है? आप कह रहे हो, जैसी ज़िंदगी चल रही है, ढुलमुल, लुचुर-पुचुर चलती रहे। क्या होता है? कुछ नहीं होता।

अभी हमने सिर्फ़ बात करी है ये हवा, वायु प्रदूषण की। अभी उसमें जब आप जोड़ोगे, कितने और तरीके के प्रदूषण होते हैं, तो आपको पता चले कि आपकी तो एक भारतीय होने के नाते ज़िंदगी ही प्रदूषण ने खा रखी है पूरी। लेकिन क्या फ़र्क़ पड़ता है ज़िंदगी में वैसे भी कुछ रखा नहीं था। इतने सारे तो हम लोग हैं, मर भी गए तो क्या होता है।

बीस लाख लोग भारत में प्रतिवर्ष सिर्फ़ वायु प्रदूषण से मरते हैं। क्या फ़र्क़ पड़ता है, इतने सारे तो हैं। क्या फ़र्क़ पड़ता है; गरिमा नहीं है, आत्मसम्मान नहीं है। जो हमारा देश है न, हमें इस चीज़ की बहुत ज़रूरत है। हमारे पास अहंकार हो सकता है बहुत सारा हो, "तूने मुझे ऐसा बोल दिया, तुझे मार दूँगा।" आत्मसम्मान नहीं है। आत्मसम्मान और अहंकार बहुत अलग-अलग बातें होती हैं।

प्रश्नकर्ता: कई रील्स ऐसी आती हैं, कई वीडियोज़ ऐसी आती हैं। मैंने अभी ब्रायन जॉनसन का एक एग्जांपल लिया। लेकिन कोई विदेशी टूरिस्ट आ रहा है, भारत की वो तस्वीर दिखा रहा है जो सच्ची है। मतलब आप उसमें ये नहीं कह सकते कि कहीं से ऐसी बना के बस दिखा दिया। और आप कमेंट सेक्शन देखते हैं, आप उनमें भारतीयों के रिएक्शन देखते हैं।

आचार्य प्रशांत: राष्ट्रवाद सारा छलक रहा है वहाँ पर।

प्रश्नकर्ता: तो उसमें हमें दिखता नहीं, वो गुस्सा दिखता है। लेकिन हम सच्चाई एक्सेप्ट करने के लिए तैयार…।

आचार्य प्रशांत: धन्यवाद देना चाहिए, तूने हमें आईना दिखाया। उसने कोई कृत्रिम रूप से कुछ गढ़ा तो नहीं है। उसने झूठमूठ का कोई चित्र, कोई चीज़ तैयार तो नहीं करी है, वो तो आईना ही तो दिखा रहा है।

प्रश्नकर्ता: आईना दिखाने से हमें हमेशा परेशानी होती है।

आचार्य प्रशांत: उसने कुछ झूठ दिखा दिया होता, कुछ नकली दिखाया होता, तो आप चिढ़ लेते। कोई आपको सच्चाई दिखा रहा है, तो उसका तो शुक्रिया अदा करो।

प्रश्नकर्ता: नहीं, फिर नीचे बहुत कोसा जाता है।

आचार्य प्रशांत: आप ऊँचे हो ही नहीं। उसने कुछ दिखा दिया, इससे नीचे थोड़ी हो गए। उसने तो आपको ये दिखाया है कि आप पहले ही नीचे हो। वहाँ नाली के बगल में ठेला लगा हुआ है, और वहाँ पर जाके आप कह रहे हो, "भैया, थोड़ी और पानी पूरी देना, थोड़ा उसमें सोंठ वाला और डाल दो।" वो ठीक, वो बज-बजाती नाली है। उसके बगल में है, आप ये कर रहे हो। कोई विदेशी आके यही दिखा देता है कि ये नाली देख लो, और नाली के बगल में ठेला देख लो। और यहाँ पर ये भीड़ लगी हुई है। “भैया, थोड़ा-सा और, इसमें ये मीठी चटनी वाला और दे देना।”

प्रश्नकर्ता: हमारे यहाँ पर प्रकृति के स्वरूप की पूजा की जाती है और तमाम जगह इसका मेंशन है। तमाम बातें आती हैं: पेड़ की पूजा, वायु की पूजा, अलग-अलग एलिमेंट्स की पूजा। लेकिन जब बात आती है, मैं संरक्षण कह दूँ आज के टाइम पर; अब तो संरक्षण ही कहना होगा क्योंकि इस तरह दशा ख़राब है। फिर ये चीज़ें इस तरह बढ़ती रहती हैं, तो फिर हम कहाँ कि अपने आप के साथ धोखा कर रहे हैं, बार-बार, बार-बार।

आचार्य प्रशांत: हाँ, वही है। जो इस तरीके से प्रदर्शित करके पूजा नहीं करते, वो प्रकृति के प्रति कहीं ज़्यादा संवेदनशील हैं लोग।

प्रश्नकर्ता: जिद्दु कृष्णमूर्ति की बात याद आती है, जितना ज़्यादा जो आंतरिक अंधेरा होगा, दरिद्रता होगी, उतना ज़्यादा दिखावा होगा।

आचार्य प्रशांत: आप नदियों की पूजा करते हैं, अपनी नदियों का हाल देखिए। और यूरोप चले जाइए या किसी और जगह, जहाँ नदी को बस नदी माना जाता है बहता पानी, अ वाटर बॉडी। उनकी नदियों का हाल देखिए। आप कहते हो, “माँ है,” उसका हाल देखिए। वो कहते हैं, “माँ नहीं है, बहता पानी है।” उसका हाल देखिए।

वहाँ ऐसा है कि आप नदी में से पानी पी लीजिए, और यहाँ ऐसा है कि आप वो छू भी दें, तो आपको चर्म रोग हो जाए। जो हमारी सबसे दो पवित्र नदियाँ हैं: गंगा और यमुना। मैं उत्तर प्रदेश की नहीं बात कर रहा। मैं बिहार की नहीं बात कर रहा। बंगाल की नहीं बात कर रहा। कह रहा हूँ, पूरे भारत का दो तिहाई जो अनट्रीटेड सीवेज है, वो सिर्फ़ गंगा नदी में जाता है पूरे भारत का। और यमुना, दिल्ली का 60% वो यमुना में जाता है; और ये तो हमारी सबसे पवित्रतम नदियाँ हैं।

प्रश्नकर्ता: आप हमेशा, हर बार छठ पूजा के दौरान, आप किसी भी रिलिजियस प्रोसेशन के दौरान।

आचार्य प्रशांत: और छठ पूजा के दौरान, आप ये भी देखते हो कि यमुना में ऐसे झाग आया हुआ है, इतना सारा। और ऐसे महिलाएँ खड़ी हुई हैं और सूर्य को अर्घ दे रही हैं। ये क्या चल रहा है? आप पूजा करते हो, प्रकृति की सचमुच? हम प्रकृति की पूजा करते हैं?

प्रश्नकर्ता: ये बहुत ही दुख होता है, वो दृश्य देखकर बार-बार। और हर बार वो अख़बारों में आते हैं, वो न्यूज़ पर चलते हैं, लेकिन फिर वही आई गई बात हो जाती है।

आचार्य प्रशांत: देखिए समस्या के मूल तक जाना पड़ेगा।

प्रश्नकर्ता: और इंडिविजुअल लेवल पर जब हम बात करते हैं आंतरिक चेतना की, किसी के अंदर अगर वो जग रही है और वो उस दिशा में काम कर रहा है। फिर बात आ जाती है कलेक्टिव की।

आचार्य प्रशांत: नहीं, भीतर भी नहीं जग सकती है ठीक से। जब तक मैंने कहा, पर्यावरण को मात्र पर्यावरण की तरह देखेंगे, अंतःकरण की तरह नहीं देखेंगे।

एनवायरमेंट भी एक इंडस्ट्री बन चुका है, क्लाइमेट भी एक इंडस्ट्री बन चुका है, और उससे कोई बहुत अच्छे परिणाम आ नहीं रहे हैं। भारत की बात कर रहा हूँ मैं। हम पूज रहे हैं बिना समझे। पूजने से पहले पूछना पड़ता है कि बात क्या है।

इतनी पूजा जो करते हैं हम भक्ति वग़ैरह में, उससे अच्छा थोड़ी जिज्ञासा कर ली होती, तो इतनी दुर्दशा नहीं होती।

भारत में नदियों के, विशेषकर प्रदूषण का, एक बहुत बड़ा जो कारण है वो रिलिजियस है। तो उसमें हो जाता है: इंडस्ट्रियल आउटपुट, हाउसहोल्ड सीवेज। और जो तीसरा कारण आता है, विशेषकर गंगा के संदर्भ में, वो आता है: रिलिजियस एक्टिविटी। क्यों? क्योंकि ये जो हमारी पूजा है पूरी, जो हमारी धार्मिकता है पूरी, उसमें ज्ञान कहीं नहीं है, उसमें समझदारी कहीं नहीं है; उसमें मान्यता है, आस्था है। बहुत सारा अंधविश्वास है, समझदारी कहीं भी नहीं है।

और वही अध्यात्म जो समझदारी के केंद्र में होता है, वही आत्मसम्मान देता है। बिना अध्यात्म के, फिर बोल रहा हूँ, स्वाभिमान हो सकता है बहुत सारा, जो कि बस अहंकार का फैलाव है, वास्तविक आत्मसम्मान नहीं हो सकता। आत्मसम्मान का मतलब होता है, सच्चाई को सम्मान। आत्मसम्मान का मतलब होता है, झूठ में नहीं जिऊँगा। आत्मसम्मान का अर्थ होता है कि ऊँचे से ऊँचे हो जाने की संभावना मुझ में है, अतः मैं अपना सम्मान करता हूँ, ये आत्मसम्मान है।

जो आदमी कह रहा है, “मुझमें क्या ख़ास रखा है? मैं तो ऐसे ही हूँ। आसमानी ताक़तों की कठपुतली हूँ मैं। संयोग की धूल हूँ मैं। मैं तो कुछ नहीं हूँ, ऐसे ही हूँ। वो अपना क्यों सम्मान करेगा? वो कल मरता, वो आज मर जाए, उसको फ़र्क़ नहीं पड़ता।”

प्रश्नकर्ता: एक तरफ़ हम डेवलपमेंट की बात करते हैं, जब कोर क्वेश्चन होता ही है। और दूसरी तरफ़ हम नई इन्वेंशंस की बात करते हैं, बढ़ती जीडीपी की बात करते हैं, डेवलपमेंट की बात करते हैं। और फिर इस तरह का हाल हम लगातार देखते रहते हैं। हमारे एंबिशंस, हमारी महत्वाकांक्षाएँ हमें किस गर्त में लेकर जा रही हैं? और इंडिविजुअल लेवल पर, सोसाइटी के लेवल पर और फिर पॉलिसी के लेवल पर आपका क्या ओपिनियन है? क्या कुछ सुधार किया जा सकता है? बिल्कुल, मैं सिलसिलेवार ढंग से थोड़ा जानना चाहती हूँ।

आचार्य प्रशांत: नहीं, मैं नहीं कहता कि ये सब हमारी एंबिशंस का, या डेवलपमेंट का, या जीडीपी का परिणाम है कि आज भारत इतना प्रदूषित है। न तो हमने ऐसा कोई डेवलपमेंट कर लिया है, न आम भारतीय कोई बहुत एंबिशियस होता है, और न हमारा पर कैपिटा जीडीपी किसी गिनती में आता है। भारत का जो प्रदूषण है, वो औद्योगिक या आर्थिक कारणों से नहीं है। सुनने में जैसा भी लगे, पर उसका मूल कारण आध्यात्मिक है।

देखिए, समझिए, कितना हमने जीडीपी कर लिया कि दुनिया के 100 सबसे प्रदूषित शहरों में 94 भारत के हैं। इतना आपने जीडीपी कर लिया है? इतना हमारा इंडस्ट्रियल आउटपुट है कि दुनिया के 100 शीर्ष स्थानों में से 94 हमने झटक लिए। हम इतने ज़बरदस्त तरीके से पैसा बना रहे हैं, हम इतने एंबिशियस हैं? भारत आर्थिक रूप से इतना अग्रणी हो गया है कि 100 में से 94 भारत के शहर हैं। और दुनिया की जो सबसे प्रदूषित राजधानी है, वो दिल्ली है। ये हम क्या ख़ुद को बता रहे हैं कि “वो भारत विकास कर रहा है, इसलिए प्रदूषण हो रहा है।”

ये प्रदूषण विकास से नहीं हो रहा है, ये आंतरिक दूषण है जो बाहरी प्रदूषण के रूप में दिखाई दे रहा है।

मानिए, बात कहाँ विकास हुआ है? कौन सा विकास हुआ है? कितना पर कैपिटा हमारा जीडीपी है? यहाँ तो 0.1 फीसदी अमीर लोग हैं, जो बस अमीर हो रहे हैं। उनका विकास हो रहा है। बाक़ी तो पूरा देश और ग़रीब ही होता जा रहा है। विकास हुआ कहाँ है? जब विकास ही नहीं है, तो विकास से कहाँ से प्रदूषण हो गया? ये प्रदूषण विकास से नहीं आ रहा है, ये प्रदूषण भीतरी गंदगी से आ रहा है।

एक आदमी चलते हुए थूक रहा है, इसमें विकास का क्या रोल है? एक आदमी है, जो चल रहा है सड़क पर और थूक रहा है। विकास हो या न हो, ये आदमी घटिया है। ये आदमी वो है, जिसमें स्वयं के प्रति ज़रा गरिमा नहीं है। आप चल रहे हो किसी पब्लिक प्लेस में, एक आदमी आता है आपको ऐसे कंधे से मार के चला जाता है। हुआ होगा आपके साथ, और महिला होने के नाते तो आपने और ऐसा झेला होगा। ये आदमी कौन है?

ये आदमी वो है जिसे अपनी हस्ती की गरिमा का ज़रा भी ख़्याल नहीं है। तो ये दूसरों के पर्सनल स्पेस में भी घुसा चला जाता है। आप जहाँ रहते होंगे, वहाँ होता होगा, आसपास या आंटी, अंकल लोग होते हैं। कुछ भी पूछने चले जाते हैं, “बेटा, शादी कब कर रहे हो?” ये भी पूछ लेंगे, “बेटा, सेक्स किया कि नहीं? बेटा, बच्चा कब कर रहे हो?” ये कैसे कर लेते हैं? क्योंकि इन्हें अपनी गरिमा का ख़्याल नहीं है, तो इन्हें आपकी भी गरिमा का ख़्याल नहीं है।

वेदांत में गरिमा के लिए एक ही शब्द है: सत्य, आत्मा। जिसके पास वो होती है, मात्र उसके पास गरिमा होती है, क्योंकि वो बिल्कुल निजी चीज़ होती है। वो ऐसी चीज़ होती है जिसे ज़माना छू नहीं सकता। हमारे पास ऐसा कुछ भी नहीं है, जिसे दुनिया स्पर्श नहीं कर सकती। हमारा सब कुछ ऐसा है, जिसे दुनिया ने अपने गंदे हाथों से मैला कर रखा है। हम भीतर से बिल्कुल मैले हो चुके हैं, इसीलिए बाहर कुछ भी मैला करने में हमें कोई संकोच नहीं होता, मैला देख के हमें कोई दुख नहीं होता। ये हमारी हालत है। देखिए, बहुत सारे भारत जैसे ही देश हैं आर्थिक तौर पर, यदि आप प्रति व्यक्ति आय वग़ैरह की बात करें। तो बहुत साफ़ हैं।

प्रश्नकर्ता: क्या ऐसा? अगेन, उधर अगर स्पिरिचुअल अवेयरनेस की बात हो या स्पिरिचुअलिटी की बात हो, हम गढ़ माने जाते हैं।

आचार्य प्रशांत: तो अब आप ख़तरनाक क्षेत्र में जाने को तैयार हो रही हैं। चलें?

प्रश्नकर्ता: चलें।

आचार्य प्रशांत: चलिए, मैं बताता हूँ। तुम्हारी मुक्ति का, तुम्हारी ऊँचाई का, तुम्हारी सच्चाई का संबंध किसी और लोक से है यहाँ से नहीं है। तुम बस अपना एक कमरा साफ़ रख लो, जिसमें तुम अपनी अंधभक्ति वग़ैरह चलाते रहो। तुम्हारा मोहल्ला गंदा है, कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। तुमने अपने छोटे से कमरे में अपना भजन पूजन कर लिया है, तो मृत्यु के बाद देवयान आएगा और तुमको स्वर्गलोक ले जाएगा। ये जो हमारी अंधभक्ति से उठती लोकधार्मिक व्यर्थ मान्यताएँ हैं, इन्होंने हमें बर्बाद किया है।

भारतीयों के घर गंदे नहीं होते, आप ग़ौर करिएगा। रसोइयाँ गंदी नहीं होती, ग़ौर करिएगा। हमारे जो सार्वजनिक स्थान हैं, न वो गंदे होते हैं। क्यों? क्योंकि ऊँचे से ऊँचा दर्शन भारत के पास है, लेकिन गिरी से गिरी मान्यता भी भारतीयों में पाई जाती है। और गिरी से गिरी मान्यता ये है कि “मुझे अपना बस ठीक रखना है, बाक़ी तो थूकते चलो, कुछ करो।” अस्पतालों में देखिए, दीवारों पर लोगों ने क्या कर रखा है। वो क्या धोखे से हो गया उनसे? हम किसी पर्यटन स्थल पर जाते हैं, कोई बहुत पुरानी इमारत हो सकती है, गुफा हो सकती है। और वहाँ पर हम जाकर खुरेद कर आ जाते हैं, “पिंकी लव्स मोनू।” ये आदमी गंदा है। इसका रिश्ता ग़रीबी से नहीं है, इसका रिश्ता संस्कार से है।

हमारे जो लोकधार्मिक संस्कार हैं, उनमें गरिमा, आत्मसम्मान की बहुत कमी है। पिंकी को कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता, कोई आके उसकी पीठ पर हाथ मल गया, क्योंकि ये रोज़ हो रहा है।

आत्मा अत्यंतिक निजता का नाम है, एक तरह से वो एक्सट्रीम इंडिविजुअलिटी की बात है। हमारी रहने ही नहीं दी जाती। आप शादी कब करोगे कोई और तय कर रहा है। कौन सा आत्मसम्मान बचा आपके पास? बताइए। आपकी सास आप पर दबाव डाल रही है, “तुम बच्चा कब पैदा करोगे? तुम करियर क्या लेके चलोगे?” वो तुम्हारे बाप ने तय करा है। कौन सा आत्मसम्मान बचा?

और जब हमें हर तरफ़ से गंदगी ही गंदगी मिल रही है, हर कोई हक़ रख के बैठा है कि आएगा और हमारी ज़िंदगी पर थूक के चला जाएगा। तो फिर हम भी सड़कों पर थूकते हैं। हम अपनी नदियों को गंदा करते हैं। हम हवाओं को गंदा करते हैं। नॉइज़ पॉल्यूशन की तो अभी हम बात ही नहीं कर रहे। एक घर में शादी होगी, पूरे गाँव को सोने नहीं देगा वो आदमी। क्यों? क्योंकि निजता जैसी तो कोई बात होती ही नहीं न। सब कुछ सार्वजनिक है, सब कुछ पब्लिक है। क्यों? क्योंकि मेरा सब कुछ आया ही पब्लिक से है, मेरा अपना कुछ है ही नहीं। ये है आत्मसम्मान की कमी।

मेरे विचार कहाँ से आ रहे हैं? संस्कारों से आ रहे हैं। मेरी भावनाएँ कहाँ से आ रही हैं? हॉरमोनस् से आ रही हैं। मेरी मान्यताएँ कहाँ से आ रही हैं? परंपरा से आ रही हैं। मेरा अपना क्या है? जब अपना कुछ है ही नहीं, तो आत्मसम्मान भी नहीं है। आत्मसम्मान तो तब हो न जब पहले आत्म हो। आत्म है ही नहीं, तो कुछ भी होता रहे हमें बर्दाश्त हो जाता है। हम झेल लेते हैं, और इसको हम कह देते हैं कि “हम तो बड़े सहिष्णु हैं, संतोषी हैं।” न सहिष्णु हैं, न संतोषी हैं।

प्रश्नकर्ता: कैसे बन सकते हैं, कुछ बेहतर?

आचार्य प्रशांत: सबसे पहले तो कुछ ऐसा, थोड़ा बहुत ही सही, आंशिक ही सही, पाइए तो जो पूरी तरह अपना है; फिर उसकी रक्षा में आप जी जान लगा दोगे। जो सचमुच अपना होता है न, इंसान उस पर किसी को थूकने नहीं देता। हमारे पास कुछ अपना नहीं है।

बस सरकार की है, बैठे हुए हैं बस में, बस नोच डाली। आप देखेंगे, राज्य परिवहन वग़ैरह की बसें होती हैं। लोग बैठे होते हैं, उन्हें करने को कुछ नहीं तो पेन लेके सामने की पहली सीट फाड़ देंगे, और फिर उस पर उँगली डाल-डाल के उसको नोच रहे हैं। रेलवे में बैठे हुए, वहाँ मूंगफली के छिलके फैला दिए। ऐसी थोड़ी हर चीज़ गंदी हो गई है।

रेलवे स्टेशन पर महिलाएँ होंगी, वो ठीक पटरी के बीच बैठा करके बच्चों को शौच करा रही होंगी। क्यों करा रही होंगी? क्योंकि जो शौचालय है, उसमें जो पिछला आदमी गया था, उसको इतनी तमीज़ नहीं थी कि पानी डाल के आ जाए। तो वो फिर कहती है, “वहाँ जाना भी क्या है, यहीं बैठ जा तू।” हो गया। गरिमा की कमी, आत्मसम्मान की कमी।

प्रश्नकर्ता: और सुविधाओं की?

आचार्य प्रशांत: फिर बोल रहा हूँ, भारत जितने ग़रीब देश और भी हैं दुनिया में, इतने गंदे नहीं हैं। 100 में से 94, फिर भूलिएगा नहीं। 100 में से 94 दुनिया के सबसे गंदे शहर भारत में हैं। और जो बाक़ी छह भी हैं न, वो हमारे ही भाई बंधु हैं अड़ोसी पड़ोसी, वो भी कोई दूर के नहीं हैं। वो भी हमारे चचेरे ममेरे भाई बहन हैं। कौन? पाकिस्तान, बांग्लादेश। और कोई नहीं है गंदा। ये सब हमारे ही लोकधर्म, हमारी ही संस्कृति का फैलाव है। ये बहुत ज़्यादा दुखद है, इसलिए कि ऊँचे से ऊँचा दर्शन भी हमारा है और उसके होते हुए हमने अपनी ये दुर्गति बना ली।

प्रश्नकर्ता: हम देवभूमि उत्तराखण्ड जाते हैं, जो कहा जाता है, और मतलब पहाड़ों का हाल तो पूछिए मत। जिस तरह से चीज़ें, और फ़र्क़ नहीं पड़ रहा, वही जो बिल्कुल इंडिफरेंस की बात आ रही है।

आचार्य प्रशांत: पहाड़ तो हम जाते ही हैं ख़ासकर पहाड़ को नोचने, खसोटने, लूटने; मैं कहूँगा, बलात्कार करने। अभी मुश्किल से दस दिन पहले मैं लौटा हूँ। तो वहाँ एक जगह मलबा गिरा पड़ा था। लैंडस्लाइड होगी तो आप क्या उम्मीद करोगे? उसमें क्या होगा? पत्थर होगा, मिट्टी होगी। यही तो होगा। वो लैंडस्लाइड हुई पड़ी है, उसमें प्लास्टिक है। लैंडस्लाइड हो रही है, उसमें बिसलेरी की बोतलें दिखाई दे रही हैं। हम जैसे पर्वतों पर जाते ही हैं, पर्वतों को बर्बाद करने के लिए। जहाँ टूरिस्ट पहुँच गया, वो जगह बर्बाद हो गई क्योंकि हम गंदे हैं न, हमसे सफ़ाई बर्दाश्त नहीं होती।

मैं आपसे एक सवाल पूछता हूँ। कोई ऑफिस हो जहाँ सब भ्रष्ट हों, सब बिल्कुल काले, दागदार, गंदे लोग। वहाँ एक आदमी है जो ईमानदार है साफ़-सुथरा है। उसके प्रति बाकियों का क्या रवैया रहता है? “अजी हाँ, ये बड़े आए ईमानदारी दिखा रहे हैं।” और वो सब के सब पूरी कोशिश क्या करते हैं कि वो भी कैसा हो जाए?

प्रश्नकर्ता: उनके जैसे।

आचार्य प्रशांत: वो भी गिर जाए, गंदा हो जाए। ये हमारा रवैया पहाड़ों के प्रति है। कुछ भी साफ़-सुथरा, पवित्र, प्रिस्टाइन कैसे हो सकता है? हमें उसे गंदा करना है, क्योंकि हम गंदे हैं। भीतर से ये भीतरी गंदगी जब तक नहीं हटेगी, भारत से प्रदूषण की समस्या नहीं हटेगी। बात ग़रीबी की नहीं है। बहुत और ग़रीब देश हैं, आप चले जाइए लैटिन अमेरिका चले जाइए, अफ्रीका चले जाइए, वहाँ सफ़ाई मिलती है। श्रीलंका भी कोई अमीर देश तो नहीं है न।

यदि आप प्रति व्यक्ति आय देखें, खोज लीजिएगा। मैंने कभी देखा नहीं, लेकिन कोलंबो, मुंबई और दिल्ली की आप प्रति व्यक्ति आय देखें, तो ऐसा नहीं है कि कोलंबो बहुत आगे होगा। या तो एक ही स्तर पर होगा, नीचे भी हो सकता है। बहुत साफ़ शहर है। इसी तरीके से भारतीय टूरिस्ट अब जाया करते हैं: वियतनाम जाते हैं, थाईलैंड जाते हैं, कंबोडिया जाते हैं, बाली जाते हैं। ये कोई बहुत अमीर जगह हैं? पर साफ़ हैं। ये कोई विकसित देश नहीं हैं, भारत से ज़्यादा विकसित हैं लेकिन ये कोई पश्चिमी यूरोप जैसे देश तो है नहीं। अमेरिका नहीं है। लेकिन फिर भी बहुत-बहुत साफ़ है।

तो बात उतनी ग़रीबी की नहीं है, ग़रीब हो के भी साफ़ हुआ जा सकता है। बात आत्मसम्मान की है और हमारा आत्मसम्मान इसलिए छिना हुआ है, क्योंकि हमारे पास निजता, इंडिविजुअलिटी नहीं है। हमारे पास कुछ भी अपना होता न, तो हम उसे साफ़ रखते। हम भीतर से पूरे तरीके से एक डस्टबिन बने हुए हैं, जिसमें पूरी दुनिया आकर अपना कचरा डालती है।

किस नाते डालती है? “मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूँ तो तुम वो काम करो जो मैंने करा।” लो उसने अपना कचरा डाल दिया न तुम्हारी ज़िंदगी में। “ये हमारा पूरा घराना है, इसके संस्कार तुम्हें स्वीकार करने पड़ेंगे।” लो उन्होंने अपना सारा कचरा डाल दिया न तुम्हारी ज़िंदगी में। “तुम फलाने धर्म की हो, फलानी परंपरा की हो, तो तुम्हें हमारी मान्यताएँ स्वीकार करनी पड़ेंगी।” लो उसने अपना कचरा डाल दिया तुम्हारी ज़िंदगी में। पूरी दुनिया, पूरी हमारी कौम और पूरा हमारा अतीत अपना कचरा हमारे भीतर डाले हुए है और इसको हम बोलते हैं, हमारी महान विरासत।

जब भीतर से हम इतने गंदे हैं, तो बाहर कुछ भी गंदा करने में फिर हमें कोई अफ़सोस नहीं होता। ये असली बात है।

प्रश्नकर्ता: फिर क्या सिविक ड्यूटी और फिर गवर्नमेंट पॉलिसीज़ इस दिशा में, इन सब की बात बेईमानी हो जाती है?

आचार्य प्रशांत: आप बनाते रहिए, गवर्नमेंट पॉलिसीज़। पॉलिसीज़ ख़ुद थोड़ी काम कर लेंगी, वो भी इंसान ही करते हैं काम। इतनी तो पॉलिसीज़ बन गईं, उनसे क्या हो गया? कुछ हो रहा है? पॉलिसी इतनी बनती जा रही है देश उतना और गंदा होता जा रहा है। सफ़ाई आप दिखा दो, कहाँ है?

ले दे के बात इंसान पर आती है। पॉलिसी बनाने वाला भी इंसान है, पॉलिसी एक्ज़िक्यूट करने वाला भी इंसान है और पॉलिसी को फ़्लाउट करने वाला, तोड़ने वाला भी इंसान ही है। और जो तोड़ने वाले हैं न, वो 99.9% वही हैं। तो आप कोई भी पॉलिसी बना लो, कैसे चल जाएगी? और ज़्यादा पॉलिसी बनाओगे, तो लोकतंत्र है आपकी सरकार और गिरा दी जाएगी।

प्रश्नकर्ता: मैं आपसे जानना चाहती हूँ, जब एनवायरमेंट की दिशा में आज आपको अवार्ड भी मिला, और एनवायरमेंट की दिशा में काम किस तरह से, एनवायरमेंट की दिशा में आपकी संस्था, आप काम कर रहे हैं। उसके बारे में थोड़ा।

आचार्य प्रशांत: जिन्होंने अवार्ड दिया, मैंने उनसे कहा कि देखो, अगर बाहरी सक्रियता, एक्टिविज़्म के लिए तुम मेरा नाम सोच रहे हो, तो ये अवार्ड वग़ैरह मुझे मत देना। पर अगर तुम्हें ये दिखाई देता है कि तुम्हें नदियों की गंदगी गिनने से पहले इंसान की गंदगी गिननी पड़ेगी, तो तुम मेरी बात सुन पा रहे हो। तुम्हें अगर ये दिखाई देता है कि एयर क्वालिटी नापने से पहले तुम्हें इंसान की क्वालिटी नापनी पड़ेगी, तो तुम्हें मेरी बात समझ में आ रही है।

तुम्हें अगर ये दिखाई देता है कि सी लेवल कितना बढ़ गया क्लाइमेट चेंज से, या कि भूजल स्तर कितना गिर गया एक्सेसिव एक्सप्लॉइटेशन से, ये नापने से पहले तुम्हें इंसान के दिल का स्तर नापना पड़ेगा। तो तुम्हें कुछ मेरी बात समझ में आई है। शायद उन्हें मेरी बात समझ में आई होगी। मैंने कहा, तुम सारी बाहरी चीज़ें नाप रहे हो, बाघ कितने बचे? तुम ये क्यों नहीं नाप रहे कि उस इंसान में हिंसा कितनी बची, जिसने सबसे पहले बाघ मार दिए थे। हिंसा अगर अभी उतनी ही बची हुई है, तो बाघों को तुम कितने दिन तक बचा लोगे? इंसान भीतर से उतना ही गंदा है, तो तुम नदियों को साफ़ कैसे रख लोगे?

प्रश्नकर्ता: तो फिर जो ये एक्टिविज़्म है, हमारे चारों तरफ़ अभी?

आचार्य प्रशांत: इंडस्ट्री है। बहुत तगड़ी इंडस्ट्री है।

प्रश्नकर्ता: कैसे थोड़ा-सा?

आचार्य प्रशांत: बिलियन डॉलर इंडस्ट्री है। बहुत फंडिंग आती है, बहुत फंडिंग आती है सारे बाहरी काम करने के लिए। और उन कामों से होना धोना कुछ नहीं है। कुछ हो रहा है? आपको लग रहा है? अगर आप उनसे पूछो कि इतना आया, उस पर आरओआई क्या है? बिल्कुल मैक्रो तरीके से बताओ कि दुनिया में तुमने क्या बचा लिया?

क्योंकि एक छोटी-सी बात है, जो वो सुनना नहीं चाहते। वो छोटी-सी बात ये है, कि इट ऑल स्टार्ट्स विदिन। और जो चीज़ भीतर से शुरू होनी है, आप बाहर, बाहर, उसमें लगे हुए हो। उससे क्या हो जाएगा?

प्रश्नकर्ता: बहुत-बहुत धन्यवाद। आपने एक नया पर्सपेक्टिव दिया इस पूरी एनवायरमेंटल डिबेट को। और मुझे लगता है कि हमारे दर्शक जो देख रहे हैं इसे, उन्हें भी एक नया पर्सपेक्टिव मिला होगा। और शायद हम और डीपली, जैसा आपने कहा, “इट ऑल स्टार्ट्स विदिन।” सब अंदर से शुरू होता है। आंतरिक गंदगी का मैनिफ़ेस्टेशन है बाहर वाली गंदगी।

बहुत-बहुत शुक्रिया अपने दर्शकों को भी, कि जो अंत तक हमारे साथ बने रहे। हम इसी तरह के मुद्दे लाते रहेंगे। इन्हीं ज़रूरी विषयों पर बात करते रहेंगे। आचार्य प्रशांत, हमारा साथ देने के लिए बहुत-बहुत शुक्रिया। मिलते हैं बहुत जल्द, एक बार फिर से।

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
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