
प्रश्नकर्ता: 124 जो चैप्टर है (बुक: ट्रुथ विदाउट अपॉलोजी)। उसमें जो है न, “टु रियली रेज़ अ चाइल्ड, यू मस्ट फ़र्स्ट रेज़ योरसेल्फ।” तो मेरे पैरेंटिंग के बारे में एक क्वेश्चन था। मैंने वो सुना है, मतलब बहुत देखती हूँ कि बैड पैरेंटिंग और गुड पैरेंटिंग क्या होती है। तो गुड पैरेंटिंग में वो बोलते हैं कि वो बच्चे जो होते हैं, उनको जो करना है वो करके देना चाहिए, उसी से सीखती हूँ।
मेरी दो साल की बच्ची है अभी, तो वो कभी-कभी ऐसी हरकत करती है कि मेरा हाथ उठ जाता है, बाद में मुझे वो बहुत बुरा लगता है। तो हमें उस स्टेज में क्या करना चाहिए अगर वो कुछ गलती कर रही है? आई नो दिस इज़ स्टूपिड क्वेश्चन।
आचार्य प्रशांत: नहीं-नहीं, नॉट स्टूपिड। आप बोलिए।
प्रश्नकर्ता: बाद में बहुत बुरा लगता है अगर मैंने उस पर हाथ उठा दिया तो।
आचार्य प्रशांत: आपको जैसा लग रहा है न, उसकी हरकत को देख के उसको ऐक्शनेट मत करिए, उसको बता दीजिए कि “तुम जो कर रहे हो,” अब दो साल की है इतना तो लैंग्वेज समझने लगी है, “ये तुम जो कर रही हो, मेरा मारने का मन हो रहा है।” बस ये बोलिए, मारिए मत। पर आपको जो लग रहा है, बता दीजिए। ठीक है? ये भी एक तरह का अवलोकन है, कि भाई, मेरा मारने का मन कर रहा है। मारिए मत।
प्रश्नकर्ता: मतलब मैं जब भी उसको मारती हूँ, बाद में मुझे बहुत बुरा फील होता है।
आचार्य प्रशांत: आपको बुरा फील होता है, दूसरे इतने छोटे होते हैं।
प्रश्नकर्ता: जब हम थोड़ा-सा चिल्ला के बात करते हैं।
आचार्य प्रशांत: शांत कराना कोई आख़िरी उद्देश्य नहीं होता न। शांति तो, मतलब कोई एकदम डर जाए तो शांत हो जाएगा, कोई सदमे में आ जाए तो भी शांत हो जाएगा। बहुत सारी चीज़ें होती हैं जिनमें हम शांत हो जाते हैं, कोई बेहोश हो जाए तो भी शांत हो जाता है। शांत कराना उद्देश्य नहीं होता। लेकिन आपको गुस्सा आ रहा है, वो कुछ ऐसा कर ही रही है, उसको बता दीजिए कि “बेटा, आप जो कर रहे हो, गुस्सा तो बहुत आ रहा है, बहुत गुस्सा आ रहा है।” फिर उसी से पूछिए, “अच्छा बताओ, मुझे गुस्सा क्यों आ रहा है?” एंगेज करिए न उसको।
भाई, आपको भी तो सफ़रिंग हो रही है न, वो पता नहीं क्या कर रही है, आपको गुस्सा आ रहा है। हाँ तो उसका पनिशमेंट ये है कि आप अपनी सफ़रिंग उसको रिवील करिए, “मुझे बहुत गुस्सा आ रहा है। अब तुम बताओ, मुझे गुस्सा क्यों आ रहा है?”
प्रश्नकर्ता: क्योंकि मैं अकेली हूँ, मतलब घर में उसे जो पालती हूँ, घर में कोई बड़ा नहीं है। तो इसीलिए मुझे लगता है थोड़ा शायद कभी-कभी अकेले खेल करती हो, इसीलिए थोड़ा ज़्यादा।
आचार्य प्रशांत: नहीं वो कई बच्चे होंगे, घर में हो तो भी वो शरारत तो करनी ही होती है, वो तो अभी उनका सेंटर ही वैसा है कि वो करेंगे इधर-उधर का। उनको एंगेज करिए न। आपकी जो उसके लिए उम्मीद है, वो उसको बताइए। नहीं तो एक अजीब-सी बात है, वो कुछ कर रही है, आपने थप्पड़ मार दिया, उसको समझ में भी नहीं आया कि आपने थप्पड़ क्यों मार दिया। तो थप्पड़ मारने से क्या मिला? कम से कम उसको समझ में तो आए कि आपको गुस्सा आ रहा है और क्यों आ रहा है। वो ख़ुद ही बताए, “अच्छा बैठो मेरे साथ। तुमने अभी ये किया, तुमने ग्लास तोड़ दी। तो बताओ, मुझे कैसा लगेगा? तुम बताओ।” उसको ही बताने दीजिए कि “हाँ, मैंने जो किया है, उस पर गुस्सा तो आपको आएगा।” तो अब एक ज़्यादा एंगेजिंग रिलेशनशिप बनी न।
प्रश्नकर्ता: थैंक यू आचार्य जी। ऐक्चुअली ये बुक आपकी पढ़ रही थी।
श्रोता: नमस्ते आचार्य जी, मेरा नाम नेहा है। मैं यहाँ पर एक नॉट-फ़ॉर-प्रॉफ़िट ऑर्गनाइज़ेशन में काम करती हूँ, इन एच.आर. टीम, और ये मेरी बेटी है अनिका। मेरे हज़बैंड, ही वर्क्स फ़ॉर ओरैकल। तो हम लोग काफ़ी टाइम से आपके सत्र सुन रहे हैं, पिछले डेढ़ साल से। और मैं आपको थैंक यू कहना चाहती थी कि थैंक यू सो, सो मच, कि आपकी वजह से मुझे जीवन को नए तरीके से देखने का मौका मिला, और आत्मवलोकन और नेति-नेति का भी आपने मार्ग बताया। सो, थैंक यू सो मच फ़ॉर दैट।
प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी। ये बेटी को अपने किस तरह का मतलब साहित्य पढ़ के सुनाएँ?
आचार्य प्रशांत: कुछ भी ऐसा जिसमें ज़िंदगी के क़रीब जाया जाता है। परीकथाएँ नहीं, कल्पनाएँ नहीं। जो यथार्थ है ज़िंदगी का। ये फेम ऑल है, हमें दिखती तो सिर्फ़ यही है न चमक-दमक, पर जब आप जो बिग पिक्चर है उसको देखें कि ये सारा माल आ कहाँ से रहा है, तो उसमें हो सकता है कि आपको कहीं पर चाइल्ड लेबर दिखाई दे जाए, आपको कार्बन-एमिशन दिखाई दे जाए, आपको ऐनिमल-एक्स्प्लॉइटेशन दिखाई दे जाए। कई किस्म का पॉल्यूशन दिखाई दे जाए।
अब हम एक काम कर सकते हैं कि मॉल में बच्चे को हमने कोई कुछ एंटरटेनमेंट दिलवा दिया। और हम एक काम ये कर सकते हैं कि बात-बात में बच्चे के तल पर, आसान तरीके से, सरल करके उससे पूछा, “अच्छा, ये चीज़ कहाँ से आती होगी? कैसे बनती होगी? अभी ये इतनी अच्छी यहाँ पर रोशनियाँ हैं, जहाँ पर ये चीज़ें बन रही होंगी, वहाँ पर क्या हाल होगा? क्या वहाँ भी सब इतना साफ़ और इतना प्रकाशित होगा? क्या होगा?” उसके तल पर जितने में उसको समझ में आ सके, इसी तरह सब छोटी-छोटी बातें।
जैसे, खाने के ये नीचे फूड कोर्ट है। वहाँ पर हर तरह का खाना है, मांस भी है, नॉन-वेज बहुत सारा है वहाँ का। तो पूछना, कि “ऐसे जो दिख रहा है, पैकेज कर दिया है उसके ऊपर, वो सब कर दिया है सीज़निंग, गार्निशिंग ये सब कर दिया है, तो ऐसा दिख रहा है; लेकिन ये किसी की बॉडी थी, तो उसको कैसा लग रहा है?”
तो सच्चाई, फ़ैक्ट्स के तौर पर जितना बच्चे के सामने आएगी, उतना अच्छा रहेगा।
प्रश्नकर्ता: क्योंकि चमक-दमक से बहुत प्रभावित होते हैं बच्चे। मतलब ये भी होती है।
आचार्य प्रशांत: अच्छा है, उसी चमक-दमक से शुरुआत करें। कि “अच्छा, ये चीज़ अट्रैक्टिव लग रही है न बेटा आपको? ये चमक रही है, तो ये (आँखों की ओर इंगित करते हैं) खींच रही है न? अब चलो, देखते हैं इसके पीछे क्या है।” उसको हतोत्साहित करने के लिए नहीं, उसको बताने के लिए कि जब हमको कोई चीज़ अच्छी लग ही रही है, तो क्यों न हम उसको पूरी तरह से जानें? बस यही।
प्रश्नकर्ता: राइट, धन्यवाद।
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, इन्हीं (बच्चों की ओर इंगित करते हैं) से रिलेटेड पूछना था सवाल। जैसे हम लोग अभी 44, 42 हैं। इन लोगों को भी तीन-चार साल, छह-सात साल स्कूल जाते हो गए हैं। तो अपने एकेडमिक्स देखे हैं, इनका भी आजकल क्या चलता है, तो रियल लाइफ़ से रिलेटेबिलिटी थोड़ी समझ में नहीं आती। जैसे कि आई.आई.टी. की प्रिपरेशन के बारे में अगर सोचें तो बहुत उसमें समय चला जाता है। मेहनत तो लगती है, लगनी भी चाहिए। सेम आई.पी.एस. सोचें, कैट सोचें, फिर उसको रियल लाइफ़ से अगर रिलेट करते हैं कि आगे किस तरह की जॉब्स हैं, तो वो चक्र में कुछ समझ में नहीं आता कि क्या पढ़ाएँ। मतलब लाइन चलिए, फिर भी बाद में सोच सकते हैं, आज से इनको ऐसा क्या पढ़ाएँ?
आचार्य प्रशांत: देखिए, जो कुछ भी इनको स्कूल्स में पढ़ाया जा रहा है न, वो ठीक है, वो गलत नहीं है। और इनफ़ैक्ट, आज जो सब सिलैबी हैं और पढ़ाने के तरीके हैं, मल्टीमीडिया मोड्स हैं, वो हमारे समय में तो थे भी नहीं। तो ले-देकर, मोर ऑर लेस, इनको जो कंटेंट मिल रहा है स्कूल में, वो ठीक है। बायस्ड है कहीं-कहीं पर टेक्स्टबुक्स में गड़बड़ कर देते हैं, मिलावट कर देते हैं। पर फिर भी जो हमारा एजुकेशन सिस्टम है, वो इनको एक साथ लैंग्वेज़ेस पढ़ा दे रहा है, हिस्ट्री पढ़ा रहा है, जियोग्राफ़ी, साइंस। मतलब जो पूरा विद्या का, वर्ल्डली अफ़ेयर्स का जो क्षेत्र है, वो तो इनको पता चल ही रहा है।
आगे चलेंगे तो इनको पॉलिटी, इकोनॉमिक्स, ये सब भी हमारा सिस्टम पढ़ा ही देगा। वो सब चीज़ें घर पर थोड़ी जान पाते कभी। तो वो सब ठीक है। ठीक है, कम्प्लीट नहीं है।
समस्या ये नहीं है कि इनको जो एजुकेशन मिल रही है, वो गलत है, वो इनकम्प्लीट है गलत नहीं है, इनकम्प्लीट है।
क्योंकि उसमें कहीं भी ये नहीं रहता कि अब भाई त्रिशा को पता चले कि ये पढ़ाई हो ही क्यों रही है।
प्रश्नकर्ता: यही सवाल रहते हैं कि ये कहाँ-कहाँ?
आचार्य प्रशांत: हाँ, ये हिस्ट्री मैं क्यों जानूँ? इसका सेल्फ़ से क्या रिलेशन है? इसी तरह से कि भाई, समझ रहे हैं न, कि मुझे ये लैंग्वेज अब क्यों पढ़ाई जा रही है? ये सब बातें हैं।
हम बड़े हो रहे हैं तो एक क्लास से दूसरी क्लास में जाते हैं, इस बात का मतलब क्या है? तो ये चीज़ें हैं जो आपको घर पर करनी पड़ेंगी। क्योंकि ये चीज़ें स्कूल हमें ऑफ़र नहीं कर रहा है। जो हमें स्कूल दे रहा है, वो अच्छा है, उसकी अपनी वैल्यू है। लेकिन कुछ चीज़ें स्कूल नहीं दे रहा है, वो आपको घर पर देनी पड़ेंगी, किसी और व्यवस्था से, इनफ़ॉर्मल व्यवस्था से देनी पड़ेंगी। अच्छा होता कि स्कूल में ही मिल जाती, पर स्कूल में अभी उतनी दूरदृष्टि नहीं है कि क्यों करें ये सब। आपको घर पर करना पड़ेगा।
जैसे “लाइफ़ एजुकेशन” आप कहेंगे, या “एजुकेशन ऑफ़ द सेल्फ़।” वो आपको इनको घर पर देनी पड़ेगी, वो बातों से होगी, किताबों से होगी, घर में डिस्कशन्स होने चाहिए। इतना सारा अच्छा विज़डम-लिटरेचर है, वो हर एज-ग्रुप के लिए मिल जाएगा आपको। इसके लिए तो बहुत सारा है इनके लिए भी मिलने लग जाता है, इस एज में भी आने लग जाता है। आपको उनसे बात शुरू करनी पड़ेगी।
प्रश्नकर्ता: कोई एक टॉपिक ऐसा बता दें जो इनकी बुक्स में इंक्लूड किया जा सके, इनको बहुत पढ़ने का शौक़ है, तो टॉपिक क्या पढ़ाया जाए?
आचार्य प्रशांत: इनकी बुक्स में मतलब किस सब्जेक्ट में?
प्रश्नकर्ता: कोई भी मतलब ऑफ़ एजुकेशन, स्कूल से बाहर। मतलब जो ख़ुद से कोई।
आचार्य प्रशांत: स्टोरीज़ दैट डील विद प्रकृति, जिसको हम “नेचर” बोलते हैं। तो अब फ़ॉर एग्ज़ाम्पल, “योसेफ फेबल्स” हैं, यहाँ पर भी होंगी। तो अब उस पर अगर डिस्कशन शुरू हो जाएगा तो बहुत दूर तक जाएगा। या अगर आपको भारतीय कथाओं में रुचि है ज़्यादा, तो पंचतंत्र, हितोपदेश हैं, जातक-कथाएँ हैं बुद्ध की। तो देयर इज़ अ लॉट।
और अगर घर में माहौल ऐसा है कि इनके दिमाग तक टॉक्सिक कंटेंट नहीं पहुँच रहा घर में, और बस आधे एक घंटे रोज़ाना किसी अच्छे टॉपिक पर मज़ेदार चर्चा हो जाती है, तो उससे ज़्यादा चाहिए भी नहीं। ये वो थोड़ी है कि अब इतने घंटे बैठ के मैथ्स, साइंस या इंग्लिश की प्रैक्टिस करनी है। वन आवर इज़ सफ़िशिएंट, प्रोवाइडेड डन विद ड्यू केयर ऐंड मेड एंगेज़िंग। कहानियाँ, सिद्धांत।
या अगर इनकी हिस्ट्री शुरू हो गई है तो हिस्ट्री में तो इनके चैप्टर छोटे-छोटे होंगे। अब उनकी जो बारीकियाँ हैं, अगर आप घर में बैठ के डिस्कस करें। अब तो मतलब ए.आई. के समय पर तो कुछ भी इनके हिस्ट्री बुक में है, तो उससे रिलेटेड और कई बातें, जो कि बुक नहीं बताएगी, क्योंकि वो सब्जेक्टिव बातें हैं, वो आप इनको बता सकते हैं।
सिविक्स शुरू हो गया? आपको पढ़ाने लग गए हैं फ़ंडामेंटल राइट्स, ये सब पढ़ाने लग गए? डायरेक्टिव प्रिंसिपल्स? ये आ गया ये सब? अभी नहीं आया, ये आएगा अगले साल से आ जाएगा।
इसी तरह से लिटरेचर होगा आपके पास, इंग्लिश लिटरेचर होगा, उसमें स्टोरीज़ होंगी, पोएम्स होंगी। और कौन-सी लैंग्वेज स्कूल में अभी आप पढ़ रहे हो?
श्रोता: हिंदी और तेलुगु।
आचार्य प्रशांत: तो तीन तरह का लिटरेचर पढ़ रहे हो आप। ये भी पढ़ रहे होंगे, इनको भी कहानियाँ तो इनको भी होंगी। वही कहानियाँ स्कूल में एक तरह से पढ़ाई जाती हैं। आप उन्हीं कहानियों को ले लो, जो इनके सिलेबस की हैं आप वही कहानियाँ ले लो और उनको घर में इन-डेप्थ ट्रीटमेंट दो। समझ रहे हो न?
न तो हिस्ट्री है, या अभी इकोनॉमिक्स तो आई नहीं होगी, पॉलिटी भी अभी नहीं आई है। प्रमोटिंग क्रिटिकल थिंकिंग ऐंड ऐन इनवर्ड आई। इतना अगर घर पर हो रहा है।
प्रश्नकर्ता: थैंक यू।
आचार्य प्रशांत: ये परेशान हो गए, कह रहे बर्डन बढ़ा रहे हैं, घर को भी स्कूल बना रहे हैं।
प्रश्नकर्ता: ये जानते नहीं आपको न अभी।
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, नमस्ते। और मैं आज आपसे मिलने के लिए बहुत ही परेशान होकर भी आई हूँ, क्योंकि मुझे नहीं मालूम था कि आप आज यहाँ पर आएँगे। तो मैं 1:30 को बस में आके यहाँ पर अभी तक हूँ, आपसे मिलने। और मैं जैसे आप बोलते हैं कि छोटे से गाँव से एक ग्रेजुएशन करी हूँ, और मेरे को इतना भी नॉलेज नहीं है, कुछ भी। जैसे-तैसे करके ग्रेजुएशन ख़त्म करके मैं चार्टर्ड की प्रिपरेशन कर रही थी। तभी आपको अच्छे से सुनने लगी, और अभी तक मेरा प्रिपरेशन तो वैसे नहीं हो पा रहा है। पर आप जो सिखा रहे हैं और आप जो बता रहे हैं, उसमें बहुत ज़्यादा ही मुझे प्रेम है।
और मैं संस्था में भी जॉइन करना चाहती हूँ, पर मैं सी.ए. भी करना चाहती हूँ। और मेरे पास उतना भी कुछ नॉलेज नहीं है कि मैं हिंदी भी अच्छे से नहीं। जब से आपको सुनने लगी हूँ, तभी मैंने हिंदी भी पढ़ना सीखा, और अभी हिंदी में प्रॉपर अच्छे से पढ़ सकती हूँ। पर इंग्लिश मैं नहीं बोल पा रही हूँ। मेरे अंदर बहुत सारे जो शिक्षा को लेकर कमी है। तो मुझे मार्ग दिखाइए कि मैं अविद्या और विद्या कैसे जीवन में लाऊँ?
आचार्य प्रशांत: क्या करते हो अभी?
प्रश्नकर्ता: अभी सी.ए. की प्रिपरेशन कर रही हूँ, पर आपको ज़्यादातर ही सुन रही हूँ।
आचार्य प्रशांत: तो जो आप कर रहे हैं, बिल्कुल ठीक कर रहे हैं। आप अगर सी.ए. की प्रिपरेशन कर रहे हैं, तो अच्छे से करिए। आपको पता होना चाहिए, लेकिन आप सी.ए. क्यों बनना चाहते हैं, ठीक है? थोड़ा उसका आगा-पीछा भी सोचिए, सी.ए. बन जाएँगे, फिर किस तरफ़ को जाना है, क्या काम करना है, वो सब देखते चलिए अभी से। ठीक है?
प्रश्नकर्ता: और आपसे बहुत सारा प्रेम है, आचार्य जी। और मैं चाहती हूँ कि मैं सी.ए. करूँ, पर मेरा माइंड हर वक़्त कहता है कि नहीं, मैं संस्था में जॉइन कर लूँ।
आचार्य प्रशांत: सी.ए. करके संस्था में आ जाना, संस्था में सी.ए. की भी ज़रूरत रहती है। आप सी.ए. करके आ जाना। ठीक है? या कभी लगे कि सी.ए. से मन उचट रहा है, तो भी संस्था खुली है, दरवाज़े आपके लिए खुले हैं, आप आ जाना।
रही बात लैंग्वेज की, तो अगर कोई रीडिंग कर रहा है और सुन रहा है किसी भाषा को, तो बहुत तेजी से सीखता है। तो आप अगर हिंदी सुन रही हैं या इंग्लिश सुन रहे हैं या पढ़ रहे हैं, आप बहुत तेजी से सीख रहे हैं। बहुत तेजी से।
प्रश्नकर्ता: और मैं क्या विद्या-अविद्या से क्या रिलेटड मैं कर सकती हूँ?
आचार्य प्रशांत: अविद्या तो आप कर ही रही हैं। क्या है अविद्या आपकी?
प्रश्नकर्ता: चार्टर्ड अकाउंट।
आचार्य प्रशांत: आपका सी.ए. वाला काम है। विद्या भी आप कर ही रहे हैं। आपके कितने साल बचे हैं सी.ए. के?
प्रश्नकर्ता: अभी तो मेरे, आचार्य जी, शुरुआत ही है।
आचार्य प्रशांत: शुरू हुआ है। तो बस, अभी तो अविद्या का तो पूरा आपके सामने क्षेत्र खुला ही हुआ है। जाइए, उसको पूरा आप फतह करिए, है न? और ये रही विद्या (किताब की ओर इंगित करते हुए)।
प्रश्नकर्ता: और आचार्य जी, आप बताए थे कि हमारे जीवन में रोशनी बनकर जो आएँगे और जो हमारे कचरे सब जो हैं वो हमें दिखाएँगे, वही आप हैं। और आपने बहुत कुछ सिखाया, बहुत धन्यवाद, आचार्य जी, आपको।
आचार्य प्रशांत: जमकर पढ़ाई करिए, पूरा समय सही कामों में लगाइए।
जहाँ कहीं भी अपनी कमज़ोरियाँ दिखें, तो उनको बहुत बर्दाश्त मत करिए, उनको हटाइए।
ठीक है?
प्रश्नकर्ता: जी।