
प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। मेरा नाम सागर है। मैं पिछले डेढ़ साल से सत्रों से जुड़ा हुआ हूँ। मेरा सवाल जो है, वो हाल ही में इंडिगो एयरलाइंस में जो केऑस हुआ, उसके बारे में है। उस केस में हमने देखा कि कहने को तो नियम और कम्प्लायंस फ़ॉलो किए गए थे, लेकिन नुक़सान जो है, पैसेंजर्स को झेलना पड़ा। और ये इकलौता मामला नहीं है हर बार ऐसा ही होता है; और बाद में जो मैटर है वो कम्पेंसेशन और अपॉलजी के नाम पर निपटा दिया जाता है।
और ये चीज़, एविएशन हो, रेलवेज़ हो, या फिर कंस्ट्रक्शन, यहाँ तक कि एआई भी हो, जहाँ पर सिर्फ़ लोगों पर ही नहीं, एनवायरनमेंट पर भी इम्पैक्ट होता है। तो ऐसे में इन कंपनियों का या फिर जो सब्सक्राइब्ड सर्विस प्रोवाइडर्स हैं, अपने सब्सक्राइबर्स के प्रति, एनवायरनमेंट के प्रति कुछ तो एथिकल रिस्पॉन्सिबिलिटी होनी चाहिए। क्योंकि ये जानते हैं कि मामला बिगड़ने वाला है, फिर भी ये बिगड़ने देते हैं।
आचार्य प्रशांत: मैं इसमें क्या बोल सकता हूँ? मैं कौन हूँ इस पर कुछ बोलने वाला? मेरा क्या इनसे। 60-65% शेयर है इंडिगो का, इसलिए वो ये सब कुछ कर पा रहे हैं। और इतना तभी हो पाता है जब समाज खुला हुआ न हो, जहाँ बंदिशें लगी होती हैं, जहाँ सीमाएँ बनी होती हैं, और उन सीमाबद्ध क्षेत्रों में किसी का प्रवेश अनुमत होता है और किसी का नहीं; तभी इस तरह की जो मोनोपॉलिस्टिक डॉमिनेंस है वो संभव हो पाती है।
जब इतना बड़ा किसी भी क्षेत्र में; भारत में तो हर क्षेत्र में टेलीकॉम में है, सीमेंट में है, एविएशन में है और कई।
श्रोता: स्पोर्ट्स।
आचार्य प्रशांत: स्पोर्ट्स में है। तो जब भी किसी क्षेत्र में इस तरीके की किसी की सत्ता-वर्चस्व हो जाता है, तो फिर आप उसमें रेगुलेटर किसी को बना भी दो, तो रेगुलेटर के पास बहुत दम नहीं रह जाता। क्योंकि अब आप अगर जो सर्विस प्रोवाइडर है उसका हाथ मरोड़ोगे, तो जो पूरा की नेशनल इन्फ्रास्ट्रक्चर है, वही उस सर्विस प्रोवाइडर ने दबा रखा है। आप सर्विस प्रोवाइडर को सज़ा दोगे, तो जो नेशनल इन्फ्रास्ट्रक्चर है उसको सज़ा मिल जाएगी।
आप इंडिगो को सज़ा दे दो, आप बोल दो “कल से इंडिगो की उड़ानें बंद।” तो भारत की दो-तिहाई उड़ानें बंद हो जाएँगी। तो कौन-सी रेगुलेटरी अथॉरिटी अब इंडिगो को सज़ा दे सकती है?
लेकिन जहाँ मामला ईमानदारी का होता है, जहाँ एक लेवल-प्लेइंग ग्राउंड होता है, जहाँ समाज ने ही दीवारें नहीं खड़ी कर रखी होतीं, वहाँ इतनी बड़ी डॉमिनेंस किसी एक प्लेयर की होने ही नहीं पाती है; हो ही नहीं सकती। ये सब तभी हो पाता है जब समाज ही ऐसा हो।
अब उदाहरण के लिए जैसे जाति की बात है। वो क्या है? वो यही तो है कि एक क्षेत्र कुछ लोगों के लिए आरक्षित है; एक दूसरा क्षेत्र है वो किसी और के लिए आरक्षित है; एक तीसरा क्षेत्र वो किसी और के लिए आरक्षित है। यही तो मतलब है न, यही तो चला है पूरे सदियों से इतिहास में, जाति का यही तो मतलब रहा है: “ये वाला काम तुम लोग करोगे, ये तुम करोगे, ये तुम करोगे, ये तुम करोगे।” तो समाज ही ऐसा रहा है जिसने इस तरह की सीमाओं को प्रश्रय दिया है। समाज ही ऐसा रहा है।
आप फलाने परिवार से हो, तो आप राजनेता बनोगे। तो अब इसमें फ़ेयर-प्ले नहीं है, अब इसमें ये नहीं हो सकता कि जो भी कोई आना चाहे, जो भी कोई एंट्री करना चाहे, वो कर सकता हो। आप अगर अभिनेता के घर से हो, तो आपके लिए फ़िल्म-इंडस्ट्री में काम पाना बहुत आसान हो जाता है अपेक्षतया। आप राजनेता के यहाँ से हो, तो देखिए आपके बच्चों का जो करियर है वो राजनीति में पहले से ही निश्चित हो जाता है।
तो एक व्यक्ति को या एक इकाई को या एक संस्था को अपनी प्रतिभा, अपने श्रम, अपने मेरिट के दम पर प्रवेश करना बड़ा मुश्किल पड़ता है। आप शिकायत कर सकते हो, “इंडिगो ने ऐसा कर दिया, वैसा कर दिया;” पर आप इंडिगो की टक्कर में अपनी कोई एयरलाइन थोड़ी खड़ी कर लोगे। एंट्री-बैरियर हैं बहुत बड़े-बड़े, और एंट्री-बैरियर सिर्फ़ कैपिटल के नहीं हैं, बहुत सारा जो एंट्री जो बैरियर है वो सिस्टमेटिक है और पॉलिटिकल है।
जब भी कभी समाज खुला हुआ नहीं होगा, समाज न्यायसंगत नहीं होगा, तब आप पाओगे कि किसी भी क्षेत्र में ताक़त, सत्ता कुछ मुट्ठीभर लोगों या इकाइयों के हाथ में जा रही है। और जिनके हाथ में जाएगी, आप उनका कुछ आसानी से बिगाड़ नहीं पाओगे, वो कब्ज़ा करके बैठ जाएँगे। समझ में आ रही है बात ये है?
प्रश्नकर्ता: पर सर, ये जो मोनोपॉली जैसे-जैसे हर एक क्षेत्र में बढ़ती जाती है, तो जब ऐसे कोई मामले आते हैं, तो मान लीजिए इस केस में 10,000 लोगों को कुछ इफ़ेक्ट हुआ, तो वो लोग उस वक़्त परेशान हो जाएँगे। तो ऐसे में हर बार हर तबका इफ़ेक्ट होता रहता है, और वो लोग उस वक़्त के लिए अपना भड़ास निकाल लेते हैं। और अभी ऐसे आगे जाते-जाते ऐसा हो जाएगा कि हर दिन ये न्यूज़ आती-जाती रहेगी, और जब तक बात अपने दरवाज़े पर नहीं आती है, बात सिर्फ़ न्यूज़ बनकर रह जाती है। और इसी चीज़ में, किसी लेवल पर आकर घुटन टूटना चाहिए न। लोग कितना मतलब ऐसे इसको कॉकरोचेस की तरह सह लेंगे, कभी तो टिपिंग प्वाइंट आएगा।
आचार्य प्रशांत: ये कुछ नहीं है, उड़ानें रद्द होने से क्रांति नहीं होने वाली है। आप कहाँ की बातें कर रहे हो? कुल-मिलाकर कितनी उड़ानें रद्द हो गईं? कुछ हज़ार उड़ानें, किसी दिन 500, किसी दिन 800, कुल-मिलाकर कुछ हज़ार, ए फ्यू थाउज़ेंड। उसमें कितने यात्रियों पर बहुत असर पड़ गया और वो भारत की आबादी के अनुपात में कितने हैं? उन पर कुछ नहीं होने का। वो सब मध्यम वर्ग, उच्च-मध्यम वर्ग है। इनके पास अपने स्वार्थ होते हैं। कुछ थोड़ी-बहुत जमा पूँजी होती है, कुछ सुविधाएँ होती हैं जो उन्होंने इकट्ठा कर ली होती हैं। ये उसी से चिपक कर रहते हैं। ये जाकर के एयरपोर्ट पर थोड़ा शोर-शराबा कर देंगे, उसकी रील बन जाएगी, वायरल हो जाएगी। इससे ज़्यादा कुछ नहीं करने वाले।
मेरे लिए बात सुनने में ही बड़ी विचित्र है कि फ्लाइट कैंसिल हो गई तो जो पैसेंजर्स थे उन्होंने क्रांति कर दी! ऐसे होती हैं क्रांतियाँ?
प्रश्नकर्ता: नहीं मतलब एक बार होती तो ठीक है, पर अभी हर मामला ऐसे ही।
आचार्य प्रशांत: अरे, तुम 500-5000 फ्लाइट कैंसिल कर दो, यहाँ तो भी कुछ न क्रांति होने की। जो वर्ग है न जो फ्लाइट पर चलता है, इसको अब कुछ मिल गया है। पहले तो सभी ग़रीब थे भारत में, ठीक है? जो लोग आज फ्लाइट पर चल रहे हैं, यही वो हैं जो दस साल पहले तक ट्रेन में चलते थे, और उससे दस साल पहले ट्रेन के भी जनरल डिब्बे में चलते थे, और उसके और दस-बीज साल पहले चले जाओ तो बस में भी लटककर चलते थे। ये वही हैं सब, जो अब फ्लाइट में चल रहे हैं। तो इनको यही बहुत बड़ी बात लगती है कि हमें एयरपोर्ट में घुसने को मिल गया, ज़्यादातर; अपवाद होंगे कुछ। ज़्यादातर लोगों के लिए यही बहुत बड़ी बात है, एयरपोर्ट पर आ गए!
हाँ, फ्लाइट कैंसिल होती है तो सबको बुरा लगता है। तो बुरा लगेगा तो एक-दो घंटा थोड़ा बुरा मानेंगे, ये करेंगे-वो करेंगे, फिर रिफ़ंड आ जाएगा या एयरलाइन कह देगी कि होटल का बन्दोबस्त कर दिया है, आप रात में होटल में रह लीजिए, फ़्री-मील्स ले लीजिए, ये सब हो जाएगा और फिर स्वार्थ की चक्की लगातार चल रही है। एयरपोर्ट गए थे कहीं पहुँचने के लिए, अब वहाँ एयरपोर्ट पर ही धरना देकर थोड़ी बैठेंगे। अगली कहीं इधर-उधर से कोई फ्लाइट मिलेगी, उसको लेकर चले जाएँगे जहाँ जाना था, वहाँ अपने स्वार्थों की चक्की दोबारा चलाएँगे। यहाँ ऐसी क्रांति-वग़ैरह कुछ नहीं होने की।
तुम्हारी छूट गई क्या? तुम क्यों परेशान हो इतना?
प्रश्नकर्ता: मतलब एक घुटन-सा होता है, हर एक मामले को देखने पर।
आचार्य प्रशांत: घुटन तुम्हें क्या हो रही है? हमारी परसों की फ्लाइट है, मुंबई जा रहे हैं, वहाँ बुलाया है आईआईटी वालों ने। अब जा रहे हैं, तो ये पूरा सब लावलश्कर भी जाना है: इक्विपमेंट सारा , लोग जानें हैं एक दर्जन। तो सोचो संस्था के कितने पैसे लग रहे होंगे अब यहाँ से मुंबई जाने में, कि फ्लाइटें तो सारी कैंसिल हो रही हैं। उसका फ़ायदा उठाकर बाकियों ने कोई ₹50,000 का टिकट कर रखा है, कोई ₹80,000 का टिकट कर रखा है, ट्रेन भी सब दनादन बुक चल रही हैं।
ये लोग लगाकर बैठे थे कि तत्काल में कराएँगे। मैंने कहा, तुम्हारे सोते रह जाओगे, तत्काल के भरोसे पहुँच भी नहीं पाएँगे। तत्काल कराने के लिए उठेगा कौन तुम में से? ये सब होने के बाद भी बहुत अच्छे से पता है कि ये सब…।
हम बहुत मोटी चमड़ी के लोग हैं, और बाहरी स्थितियाँ कभी इतनी ख़राब नहीं होने वाली कि तुम बाहरी स्थितियों के कारण क्रांति कर दो। आग थोड़ा भीतर होनी चाहिए। बाहर जब भी कुछ बुरा होगा, तुम अपने आप को बोलोगे, “पर ये उतना बुरा तो नहीं है न जितना बुरा हो सकता था। फ्लाइट मिस ही हुई है, क्रैश थोड़ी हो गई। जो मेरे साथ हो रहा है बुरे से बुरा, उससे बुरा भी तो कुछ हो सकता था। सदा अपने नीचे वालों को देखा करो, संतोष बना रहता है।” ये हमारा सूत्र है। हमारा ऐसे कुछ नहीं होता।
जब जीवन में गीता आती है न, तो जीवन में गरिमा आती है। फिर इंसान कहता है कि “मैं आकाश हूँ, मुझे धरती पर ये तिलचट्टा और केंचुआ क्यों बनाया जा रहा है? मुझे मिट्टी में क्यों गाड़ा जा रहा है?”
फिर उठती है क्रांति भीतर से। नहीं तो दिन भर आप पदलित ही तो रहते हो, जहाँ जाते हो वहीं आपकी गरिमा का ह्रास होता है। सरकारी दफ़्तर में काम कराने चले जाओ, वहाँ भी यही होगा। प्राइवेट ऑपरेटर्स के पास जाओ, वहाँ भी वही होगा। खड़े हो ट्रैफ़िक में, पीछे कोई बेवजह हॉर्न मार रहा है। ये इंडिग्निटी ही तो है, ये सीधे-साधे बदतहज़ीबी है। आप खड़े हुए हो और सामने लाल बत्ती है, कोई पीछे से हॉर्न मार रहा है। ये सब होता रहता है, हमारी बहुत मोटी चमड़ी हो गई है, हमें कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता।
तो ये बहुत छोटी बात बोली मैंने। बहुतों को तो बुरा लगेगा भी नहीं, वो ख़ुद ही हॉर्न मार रहे होते हैं। न जाने क्या-क्या हो रहा होता है हमारे साथ, दिन-रात हो रहा होता है। जिसे स्वार्थों की लत लग गई, वो अपने टुच्चे स्वार्थों की पूर्ति के लिए भी किसी से भी लात खाना स्वीकार कर लेता है। स्वार्थ और गरिमा एक साथ नहीं चलते। क्रांति बस वही कर सकता है जो निष्काम हो, निस्वार्थ हो।
प्रश्नकर्ता: तो सर, हम जैसे जी रहे हैं, हम लोगों तक गीता पहुँचाने का प्रयास। मतलब, जैसे कि आप ख़ुद ही कहते हैं, कि हम लोगों तक लाना ही एक गुनाह है गीता लाना।
आचार्य प्रशांत: देखो मैंने तुम्हें बहुत समझा दी, अब तुम्हें इतनी समझ आ गई होगी कि तुम्हें क्या करना है, है न?
डोंट मिस द रियल फ्लाइट।