
प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। आज नियत कर्म की हमने बात करी और उसके संदर्भ में ही पूछना चाहूँगा, कि आपने समझाया कि नियत कर्म वही, सही कर्म वही, जो मुक्तिबद्ध हो। तो अगर इसको हमने और आपने कहा, जब भी ज़िंदगी में सवाल हो कि क्या कर्म करना है, तो उसको इसी तराज़ू में तौलें कि क्या वह कर्म आपको मुक्ति की तरफ़ लेकर जा रहा है या बंधन की तरफ़।
तो अगर मैं इसको नौकरी के संदर्भ में देखता हूँ कि पहली बात तो क्या काम करना चाहिए? नौकरी करनी कौन-सी चाहिए? और उसके बाद किस तरह से उस काम को, उस नौकरी को करना चाहिए? तो वो कैसे मैं उसको कंटेक्स्चुअलाइज़ करूँ, कि अक्सर जब हम नौकरी करते हैं तो एक कर्ता-भाव तो रहता ही है।
आचार्य प्रशांत: तुलनात्मक तरीके से करना पड़ेगा देखिए। सबसे पहले तो यह कि एक न्यूनतम राशि आपको चाहिए शरीर चलाने के लिए और जो साधारण ज़रूरतें होती हैं ज़िंदगी की, वो पूरी करने के लिए। ठीक है न? अगर आप नौकरी से वो पैसा नहीं लाओगे तो कहीं और से लाओगे। कहीं और से लाने का मतलब होता है कि या तो किसी से माँगा जाए, या अपना पुराना जमा हो, या किसी को लूटा जाए। ठीक है?
तो अब बात इसकी नहीं है कि आप जो नौकरी कर रहे हो, वह सीधे-सीधे आपको मुक्ति तक पहुँचा देती है कि नहीं। अब इसमें सवाल एक जवान आदमी के लिए इस अवस्था में आमतौर पर यही रहता है कि साँपनाथ है एक तरफ़ और नागनाथ है एक तरफ़, तो दोनों में कम ज़हरीला कौन है?
आप घर पर बैठे हो और आपको एक नौकरी का प्रस्ताव मिल रहा है। आपको दिख रहा है कि उस नौकरी में मुक्ति जैसा तो कुछ ज़्यादा है नहीं। साधारण नौकरी है, कुछ भी है। वह लोग स्टील के पाइप बनाते हैं। उस नौकरी से क्या लेना-देना? उसके मुक्ति से क्या लेना-देना? वो आपको वहाँ से तनख़्वाह दे देंगे। लेकिन आपको यह भी पता है कि अगर आप घर बैठे हो तो आपको पिताजी का पैसा लेना पड़ेगा।
मुक्ति की ओर जाना माने बंधनों को कम करना, यही न? तो ऐसी स्थिति में यह देखना पड़ता है कि ज़्यादा बड़ा बंधन क्या है।
पिताजी का पैसा लेना एक बंधन है और दफ़्तर में एक साधारण काम करके बॉस से पैसा लेना भी एक बंधन है। ऐसे में तो तुलनात्मक रूप से यही देखना पड़ेगा कि ज़्यादा बड़ा बंधन कौन-सा है। जो थोड़ा हल्का बंधन हो, उसको स्वीकार करना पड़ेगा। फिर एक कदम और आगे बढ़ाना पड़ेगा। फिर एक कदम और आगे बढ़ाना पड़ेगा।
शायद एक दिन ऐसी पहुँच जाना पड़ेगा जहाँ एकदम न्यूनतम बंधन की स्थिति आ जाए और आप कह दें कि जिस वजह से मुझे पैसा चाहिए ही होता है, मैं उस वजह को ही एकदम और कम कर देता हूँ। जब वह वजह ही नहीं बचेगी जो पैसा माँगती थी, तो पैसे की ज़रूरत भी कितनी बचेगी? जब पैसे की ज़रूरत नहीं बचेगी, तो पैसे के लिए किसी की ग़ुलामी भी क्यों करनी पड़ेगी?
तो यह जो नौकरी का मसला होता है, यह थोड़ा-सा इस हिसाब से जटिल होता है कि ऐसी नौकरियाँ इस दुनिया में कोई नहीं हैं कि जहाँ पर कोई आकर के आपको आपकी व्यक्तिगत मुक्ति के लिए पैसे देगा। ठीक है? ऐसी जॉब प्रोफ़ाइल तो थोड़ा कहीं भी सर्च करेंगे तो मुश्किल होगा।
तो वहाँ बस यही देखना होता है कि एक जगह पर आप फ़ूड प्रोसेसिंग में थे, तो सड़ा-गला माल बेच रहे थे। किसानों से सस्ती क़ीमत में लेते थे, मान लीजिए आलू, और फिर उसको पचास गुने ज़्यादा दाम पर आप पैकेजिंग करके और उसमें नाइट्रोजन भरकर फुला के बेच देते थे, चिप्स का पैकेट।
तो देखना है कि एक यह काम है। एक इस काम का बंधन है, पाप है। यह स्वीकार करूँ या कोई दूसरा काम है? उसमें मान लीजिए, आप कहीं पर जाकर के कुछ बन रहे हैं, टीचर बन रहे हैं किसी कॉलेज में। वहाँ पर भी आप उनको जो तैयारी करा रहे हैं, प्लेसमेंट की करा रहे हैं। लेकिन फिर भी आपके पास मौका है कि आप उनसे ज्ञान की दो बातें बोल लें। है न?
तो आपको देखना है कि इन दोनों में कम बंधन किधर है। आप कॉलेज में भी हैं, तो ऐसा नहीं कि आप अपने सब छात्रों को मुक्ति की ओर ही अग्रसर कर देंगे। ऐसा नहीं कि वह भी कोई एकदम पूर्ण रूप से शुद्ध नौकरी है। लेकिन साँपनाथ और नागनाथ में थोड़ा देखना होता है कि। यह दुनिया है भाई, यहाँ ऐसे बैठे-बिठाए मुक्ति के रास्ते नहीं खुल जाते। बड़ी लंबी यात्रा करनी पड़ती है, धीरे-धीरे करके एक-एक बंधन काटना पड़ता है।
और बंधन काटने का मतलब होता है, जो बंधा हुआ है उसी को काटना। इतना साहस एक मुश्त पैदा करना कि सब कुछ एक साथ खट साफ़ कर दो। वह होता नहीं है। चलो, एक बार में नहीं कर सकते तत्काल; लेकिन गति अधिक से अधिक रखनी चाहिए। यह न हो कि जो दूरी पाँच साल में तय हो सकती थी, वो चालीस साल में भी तय न कर पाएँ। जीने के लिए ही कितने साल हैं? तो बहुत धीरे-धीरे अगर मुक्ति की यात्रा करोगे, तो कुछ उसमें रखा नहीं है। एकदम तुरंत कुछ नहीं होता, लेकिन यह भी नहीं करना चाहिए कि सत्तर वर्षीय गोल बना लो। कोशिश यह करनी चाहिए कि जवानी शेष रहते ही काम हो जाए। चलो, पच्चीस में नहीं हो सकता, तो पैंतीस की उम्र तक हो जाए।
प्रश्नकर्ता: जब तक नौकरी वो कर रहे हैं, उसको करते समय भी जो अंदर एक कर्ता-भाव बहुत सक्रिय रहता है, “यह काम मैं कर रहा हूँ। यह रोल मैं सही से निभा रहा हूँ।” उसको काटने के लिए और कम करने के लिए दिमाग में क्या मॉडल बिठा सकते हैं?
आचार्य प्रशांत: नहीं कर्ता इससे नहीं होता कि “यह काम मैं कर रहा हूँ, सही से कर रहा हूँ।” कर्ता तब बनता है जब उस काम को वह भोगने के लिए कर रहा हो। आप कोई काम अच्छे से कर रहे हैं, तो एक तथ्य की तरह यह स्वीकार करने में कोई भूल नहीं हो गई कि काम आपने ठीक करा है। कई बार तो आप नहीं भी स्वीकार करना चाहें, तो आपका जो परफ़ॉर्मेंस मैट्रिक है वो आपको बता देगा कि आपने काम ठीक से करा है।
तो क्या उसको बोलोगे? “नहीं, मैंने नहीं ठीक करा है”? भाई, आप कोई काम कर रहे हो, कुछ भी कर रहे हो। आप वज़न उठा रहे हो। आपने कितना वज़न उठाया, वो तो सामने लिख के आ जाएगा कि कितना वज़न उठाया। और आपसे इतना अपेक्षित था वज़न उठाना, आपने उससे चार किलो ज़्यादा ही उठा दिया है। तो ये तो स्पष्ट ही है न कि आप अच्छे से कर रहे हो। उसमें कोई बुराई नहीं हो गई। आपने कह दिया कि “मैं यह काम अच्छे से कर रहा हूँ।” ठीक है?
बुराई तब होती है जब आपने अच्छे से करा है। अब इस अच्छे से करने के कारण कोई कुछ देगा, फिर मैं उससे जाकर के फलानी चीज़ भोगूँगा। और फिर लौटकर के आऊँगा, और कल और वज़न उठाऊँगा, और यही तो मेरी ज़िंदगी है ऐसे गोल-गोल वज़न उठाओ, पैसे पाओ, भोगो; फिर अगले दिन आओ, फिर वज़न उठाओ, फिर भोगो। तब गड़बड़ हो जाती है।
आपके पाँच नंबर आए हैं किसी परीक्षा में, किसी के दो नंबर आए हैं। अब पाँच, दो से बड़ा होता है यह तो एक तथ्य है न? इसमें झूठमूठ की विनम्रता दिखाने की क्या ज़रूरत है? इसमें झूठमूठ का क्या? है हाँ, मेरे पाँच आए हैं। उससे दो से, 5 > 2,फ़ैक्ट की बात है। लेकिन “मेरे पाँच आए हैं, तो इससे मुझे फ़ाइव-फ़िगर सैलरी भी मिलेगी डॉलर” यह गड़बड़ हो गई थोड़ी। और अभी भी गड़बड़ नहीं हुई है। फ़ाइव-फ़िगर सैलरी भी, वहाँ भी वो भी ठीक है। चलो, फिर मैं उस डॉलर का ऐसा करूँगा, फिर मैं वैसा करूँगा, फिर यहाँ पर ऐश काटूँगा, यह तब बात अपने ही पतन की हो जाती है।
प्रश्नकर्ता: बेसिकली, मैं उस कॉन्टेक्स्ट में पूछ रहा था कि अहम् उसको पकड़ लेता है, कि मुझे मतलब अपने आप को और वो बढ़ा लेता है।
आचार्य प्रशांत: देखिए, अहम् जो है न, अहम् होता है एक अपूर्णता। अहम् को कुछ नहीं पकड़ना, अहम् को सिर्फ़ खाना है। वो अपूर्ण है न। उसका पेट खाली है, अपूर्ण है, खाली है। वो काम नहीं पकड़ता,
उसे काम से एक पैसे का कोई मतलब नहीं होता। उसको काम के अंजाम से मतलब होता है, और अंजाम बिना काम के मिल जाए, वह हँसते-हँसते ले लेगा। आपको कोई बोले पेपर देने मत जाओ, 96% ऐसे ही आ जाने हैं। और देने जाओगे तो पता है कि 80 से ऊपर लाओगे नहीं, आज तक नहीं लाए। आप कहोगे, नहीं, मुझे तो देना है पेपर।
आपको परीक्षा देनी होती है, परीक्षा-परिणाम चाहिए होता है? परिणाम चाहिए होता है। परिणाम ऐसे ही मिल रहा हो तो परीक्षा कौन देना चाहता है? तो यह बिल्कुल मत सोचिएगा कि अहम में कर्ता-भाव बहुत है, बहुत कुछ करना चाहता है। करने से उसको मैं कह रहा हूँ, उसे दो पैसे का मतलब नहीं है, कुछ भी करने से। उसकी नियत सिर्फ़ एक है, क्या? ठूसना। क्योंकि वो क्या है? खाली, होलो, अपूर्ण।
तो उसको तो चाहिए, माल चाहिए भीतर डालना है अपने। और भीतर है एकदम एक अनंत कुआँ, खाई जिसमें डालते रहो, डालते रहो, डालते रहो, वह नहीं पूरा होता।
करने में कोई बुराई नहीं है। किस उद्देश्य से कर रहे हो, यह बता दो, बस।
आज का पूरा श्लोक ही यही है। क्या बोला है उन्होंने? कर्म और अकर्म को लेकर क्या बोला है? “कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः।” कर्म तो बेहतर है अकर्म से। करना तो पड़ेगा ही, करने में क्या बुराई हो गई? बस करने की?
श्रोता: दिशा सही होनी चाहिए।
आचार्य प्रशांत: यह भी जो अभी वर्तमान अध्यात्म चल रहा है, उसमें ये बहुत है कि डुअरशिप नहीं होनी चाहिए। वो बात थोड़ी भ्रामक हो सकती है। कंज़्यूमरशिप नहीं होनी चाहिए। डुअरशिप का अर्थ तो रिस्पॉन्सिबिलिटी भी हो सकता है, तो क्यों न हो डुअरशिप? अगर कर्ता-भाव का अर्थ है कर्तव्य-परायणता, यदि; मैं नहीं कह रहा कि कर्ता-भाव का सदा अर्थ कर्तव्य-परायणता ही होता है, अर्थ सदा नहीं होता। पर कर्ता-भाव का अर्थ कर्तव्य-परायणता भी तो हो सकता है न?
मैं रिस्पॉन्सिबल हूँ। आइ एम द डूअर, सो, आइ एम रिस्पॉन्सिबल फ़ॉर एवरी पोर्टफ़ोलियो आइ हैव। वहाँ तक ठीक है। डुअरशिप से कहीं ज़्यादा घातक है?
श्रोता: कंज़्यूमरशिप।
आचार्य प्रशांत: हाँ, भोग, भोग की लालसा नहीं होनी चाहिए। कर्म यदि निष्काम है, तो मुझे बताओ क्या उसमें बुराई हो गई? कर्म में क्या बुराई हो गई? कर्म तो हमें चाहिए। युद्धस्व का मतलब क्या है? कर्म ही तो मतलब है न? तो कर्म तो हमें चाहिए। कोई यह न कह दे, कि अरे, देखिए, आप तो सबको कर्ता बनने को बोल रहे हैं, क्योंकि युद्ध होगा तो योद्धा भी होगा और योद्धा माने कर्ता, तो यह सब मत कराइए।
नहीं, ये सब नहीं। डुअर बन जाइए, कंज़्यूमर मत बनिए, यही निष्काम कर्म है। करता हूँ पर भोगता नहीं हूँ।