21 साल की उम्र, फिर भी आज़ादी नहीं?

Acharya Prashant

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21 साल की उम्र, फिर भी आज़ादी नहीं?
व्यक्ति और उसके माता-पिता दोनों अक्सर प्रेम के नाम पर एक-दूसरे पर अधिकार जताते हैं, जबकि संबंधों में निर्णय सम्मान, समझ और स्वतंत्रता पर आधारित होने चाहिए। वयस्क होने के बाद जीवन के महत्वपूर्ण फैसले स्वयं लेने की क्षमता विकसित करना आवश्यक है। सच्ची परवरिश निर्भरता नहीं, आत्मनिर्भरता पैदा करती है। पारिवारिक दबाव का बड़ा हिस्सा प्रेम से नहीं, बल्कि भय, सुविधा, अपेक्षाओं और स्वार्थ से संचालित होता है। स्वस्थ संबंध वहीं संभव हैं जहाँ दोनों पक्ष एक-दूसरे की चेतना, स्वतंत्रता और गरिमा का सम्मान करें। यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।

प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी। मेरा नाम भूवी चौधरी है। मेरा क्वेश्चन यह है कि जब हम लाइफ़ में कोई डिसीजन लेते हैं और हमारे पेरेंट्स के डिसीजन उनसे कंट्राडिक्ट करते हैं, तो मोस्ट ऑफ़ द टाइम हमें उनकी बात माननी पड़ती है। तो हम उन्हें कैसे समझा सकते हैं कि व्हाट इज़ आवर पर्सपेक्टिव? एंड हम क्या, हम उन्हें कैसे समझाएँ? मेरे बात से बहुत सारी लड़कियाँ रिलेट करेंगी कि लड़कियों को नहीं चांस मिलता अपने करियर डिसाइड करने का, रिलेशनशिप्स या मे बी फ्रेंडशिप्स ऑल्सो समटाइम्स। तो हम कैसे अपने पेरेंट्स को कन्विंस करें?

आचार्य प्रशांत: आप मेरे साथ यहाँ बैठे हो। कुछ हद तक मैं आपके पेरेंट्स की उम्र का ही हूँ, आसपास। आपसे मेरा एक संवाद हो रहा है, डायलॉग हो रहा है। आप मुझसे कुछ कहना चाहते हो, मुझे कन्विंस करना चाहते हो, तो आप कैसे करोगे?

प्रश्नकर्ता: पेरेंट्स यूज़ुअली सुनते नहीं हैं।

आचार्य प्रशांत: अब मैं नहीं सुन रहा, तो मैं इस लायक नहीं हूँ कि मैं इस कुर्सी पर बैठूँ। ख़त्म बात। नहीं तो आप यहाँ मेरे सामने बैठे हो एक डिस्कशन के लिए, एक संवाद के लिए, संवाद के लिए। इसलिए थोड़ी बैठे हो कि मैं यहाँ बैठ गया और आप क्या चाह रहे हो? आपके मुद्दे क्या हैं? आपकी जिज्ञासाएँ क्या हैं? ज़िंदगी में क्या चल रहा है? मैं सुनूँ ही नहीं, और मैं माइक लेकर के यहाँ पर घंटे भर तक कुछ बोलता रहूँ। बोला मैंने ही ज़्यादा है, पर क्या मुद्दे भी मेरे थे? कुछ इनका मुद्दा था, फिर इनका मुद्दा था, अब आपका मुद्दा है।

और आपकी उम्र अठारह से तो ऊपर की होगी? तो आप वयस्क हो, भाई। यह मेरी आध्यात्मिक और नैतिक ही नहीं, कानूनी ज़िम्मेदारी भी है कि मेरे सामने एक वयस्क बैठा हुआ है, मैं उसका सम्मान करूँ। उससे मेरा रिश्ता कुछ भी हो सकता है। चाहे टीचर का हो, चाहे पेरेंट का हो। अभी मैं टीचर बनकर बैठा हूँ। हो सकता है मैं किसी इतनी ही बड़ी लड़की का पेरेंट भी होता। क्या फ़र्क़ पड़ता है? मैं भी एडल्ट हूँ, वो भी एडल्ट है। मैं भी एडल्ट हूँ, वो भी एडल्ट है और एडल्ट से एडल्ट की बातचीत गुणवत्ता के एक स्तर की होनी चाहिए। आप बात समझ रहे हो?

मैं अगर ऐसा हूँ कि मैं आप पर अपने आप को थोपने आया हूँ, मुझे आपकी ज़िंदगी से, आपकी रुचि से, आपके करियर से, आपकी पसंद-नापसंद से या आपकी उथल-पुथल से कोई लेना ही देना नहीं है, तो आप मुझसे बात कर ही क्यों रहे हो? आप क्यों बात कर रहे हो? बिल्कुल यह होना चाहिए कि आप यहाँ से उठ के चल दो या चुप बैठ जाओ। कह दो कि भैया, आपको जो बोलना है बोल लो, वैसे भी आप किसी की सुनते तो हो नहीं। आप बोल लो, हम चले जाएँगे, आपसे हमारा कोई संवाद संभव नहीं है।

आप आठ साल के नहीं हो, आप बारह साल के भी नहीं हो। आप एडल्ट हो, आप एनआईटी की छात्रा हो।

दुनिया में किसी की हिम्मत नहीं होनी चाहिए आपकी चेतना का अनादर करने की।

आप वोट दे सकती हो। आप इस देश के शासक को चुन सकती हो। और अगर आप इक्कीस की हो गई हैं, तो आप स्वयं चुनाव भी लड़ सकते हो। इक्कीस की हो गए हो? हो गए हो। ये जाकर के विधायिका में बैठ सकती हैं, ये जाकर के वो क़ानून बना सकती हैं जिस पर इस देश को चलना पड़ेगा। और उसके बाद हम कहें कि मेरे घर वाले, या यार-दोस्त या कोई और मेरी बात नहीं सुनता। यह मजबूरी कैसी है? और क्यों मानूँ मैं इस मजबूरी को?

सड़क पर गाड़ी चलाने का आपका हक़ है। आप कल को किसी कंपनी में जाएँगे वहाँ पर आपको ज़िम्मेदारी का एक पद दिया जाएगा, वह ज़िम्मेदारी निभाने का आपका हक़ है। आप जो करना चाहो, क़ानून की दृष्टि से आप मुक्त हो, और अध्यात्म की दृष्टि से भी आप मुक्त हो। तो आप फँस कहाँ गए बीच में? न आपको क़ानून रोक रहा है और न आपको सत्य रोक रहा है, तो आपको रोक किसने रखा है? और क्यों आप अपनी ही नज़रों में आज़ाद नहीं हो?

प्रश्नकर्ता: सर, यूज़ुअली इट इज़ नॉट एग्ज़ैक्टली लाइक इफ़ यू आर लीगली अलाउड टू डू समथिंग, आपके पेरेंट्स उस चीज़ को अलाउ करें।

आचार्य प्रशांत: मैं जो बोल रहा हूँ, वो आप अलाउ करोगे तब मैं बोलूँगा? आप कौन हो मुझे अलाउ या डिसअलाउ करने वाले? रोक के दिखाओ मुझे। और कभी मैं तुम्हारी उम्र का ही था। ये बात जो भी कह रहा हूँ, और ये तेवर कोई आज के नहीं हैं। बल्कि अब तो ढलने लगा हूँ। अब तो आपसे वही कह रहा हूँ जो आपकी उम्र में किया करता था। यूँ ही कोई बस सैद्धांतिक, काग़ज़ी, थ्योरिटिकल बात आपसे नहीं कर रहा हूँ। आपकी उम्र में, कम उम्र में, आपसे आपकी ही उम्र के आसपास, आज़ाद जिया हूँ और ऐसे-ऐसे मूक विद्रोह किए हैं कि ज़्यादातर लोग कल्पना भी न कर पाएँ।

यह परमिशन क्या चीज़ होती है? “पर परमिशन तो लेनी पड़ती है न।” यह क्या है? क्यों? मातृत्व की, पेरेंटिंग की भी सार्थकता इसी में होती है कि हमने अब एक ऐसी औलाद खड़ी कर दी है जो सक्षम है, सबल है और अपने जीवन के निर्णय स्वयं ले सकती है।

अगर पेरेंट्स ने सचमुच अच्छी पेरेंटिंग करी है, तो एक उम्र के बाद उन्हें अपनी संतान के जीवन में हस्तक्षेप नहीं करना होगा।

और अगर पेरेंट्स ने खराब पेरेंटिंग करी है कि तीस तीस, पैंतीस पैंतीस साल के भी हो गए हैं, तो उनको बच्चा-बच्चा बोला जा रहा है और तय करा जा रहा है कि तुम कब शादी करोगे, किस दुकान में बैठोगे, बच्चा कब पैदा करोगे। तो तुमने इतनी खराब पेरेंटिंग करी है, तो अब तुम्हारी बात काहे को सुने? अगर तुमने अच्छी पेरेंटिंग करी है, तो तुम ख़ुद ही औलाद ऐसी खड़ी करोगे कि जिसको अठारह-बीस के बाद बैसाखियों की ज़रूरत नहीं रह जाएगी। और अगर तुमने औलाद ऐसी पैदा करी है जो तीस साल में भी अपनी टाँगों पर नहीं चल पा रही, तो इसका मतलब तुम खराब पेरेंट्स हो। और अगर तुम खराब पेरेंट्स हो, तो भी तुम्हारी बात क्यों सुनी जाए?

कुल मिलाकर के अभिभावकों का जो भी काम है, वह उनकी संतान की एक अवस्था के बाद समाप्त हो जाता है। वह काम अब साक्षी होने का रह जाता है। आपने वृक्ष अब खड़ा कर दिया है, जाइए अब वहाँ दूर से बैठकर उसको निहारिए। हाँ, कभी संतान ही स्वयं आकर के कहे कि, "पापा, मम्मी, आपसे एक बात करनी थी, आपकी सलाह चाहिए," तो ज़रूर तुम उन्हें अपने अनुभव से, अपने विवेक से जो भी उचित सलाह है, वह दो, बिल्कुल दो। पर ये चलन मेरी समझ में नहीं आता कि तू इक्कीस की हो गई है कि पच्चीस की हो गई है, पर मेरी परमिशन के बिना तू कुछ नहीं करेगी। यह प्रेम की बात नहीं है और इसमें कोई गरिमा भी नहीं है।

पुरानी कहावत है कि जब बाप का जूता बेटे को आने लग जाए, तो दोनों अब दोस्त-मित्र की तरह व्यवहार करें। अब यह न रहे कि मैं बाप, तू औलाद, बेटा। ऐसा कुछ नहीं। यही बात माँ-बेटी पर भी लागू होती है।

और देखो, कुछ बातों के लिए न दूसरे का इंतज़ार नहीं करते, भूलना नहीं कि हैं तो हम सब इंसान ही। जब आप पेरेंट्स-पेरेंट्स और ये सारी बात करते हो, आप यहाँ जितने लोग बैठे हो शारीरिक दृष्टि से तो सब पेरेंट्स बनने के योग्य ही हो। और आज से अगर सौ साल पीछे चले जाएँ, तो आपकी उम्र में लोग बाकायदा पेरेंट्स बन जाते थे। पंद्रह-पंद्रह, सत्रह-सत्रह साल की लड़कियों को बच्चे हो रहे होते थे। अब बताओ, पंद्रह साल की लड़की माँ बन गई है, तो क्या देवी हो गई? और सोलह साल का लड़का बाप बन गया है, तो क्या भगवान हो गया?

अच्छा, उन लोगों को छोड़ो सौ साल पहले के, उनका क्या पता, अपने आप को तो जानते हो। ईमानदारी से अपनी आंतरिकता से, अपनी असलियत से, अरे सीधे कह रहा हूँ अपनी हैसियत से तो परिचित हो। जानते हो न भीतर से कैसे हो। अब कल को तुम माँ या बाप बन जाओ और बोलो कि मैं भगवान हूँ तू मेरी बात मानेगा; तुम्हें पता है तुम कौन हो। तुम कौन हो, ये तुम्हारे दोस्तों से पूछो।

कोई भी साधारण, गिरा हुआ प्राणी बच्चा पैदा कर लेता है तो भगवान हो जाएगा? और यह बात मैं पिछली पीढ़ी के अभिभावकों के लिए नहीं बोल रहा। तुम लोगों के लिए बोल रहा हूँ, भाई। तुम ही कल को औलाद पैदा कर लोगे तो तुम देवी-देवता हो जाओगे क्या? और जब नहीं हो जाओगे तो बच्चों पर क्यों चढ़ रहे हो कि मुझे भगवान मानो और मेरे आदेश का पालन करो? तुम्हें पता नहीं तुम कैसे हो?

आप कल को माँ बन जाएँ, तो क्या बच्चे को बोलें कि, "तू जो करेगा, मेरे से पूछ के करेगा।" मान लो बच्चा हो गया इक्कीस साल का। उसको बोलो, "ये जो करेगा, मुझसे पूछ के करेगा।" हमें अपनी ज़िंदगी तो जीनी आई नहीं कभी और बच्चों की ज़िंदगी पर चढ़ जाएँ। यह कहाँ का इंसाफ़ है? पूछ रहा हूँ। छोटे से छोटे काम भी विशेषज्ञ की सलाह से करता है आदमी। हाँ या ना? तो ज़िंदगी तो बहुत बड़ा काम है, ज़िंदगी तो बहुत बड़ा मुद्दा है।

आप लोग कोई जीवन के विशेषज्ञ हो कि आपका अगर बच्चा पैदा हो जाए, तो आप उससे कहो कि तू अपने जीवन के सारे फैसले हमसे पूछकर लेगा? आप कहाँ के विशेषज्ञ हो? और जैसे आप विशेषज्ञ नहीं हो वैसे ही पीछे की सारी पीढ़ियाँ भी विशेषज्ञ नहीं थीं। यह बहुत बेकार की लोक-धार्मिक चाल है कि किसी को बिल्कुल ईश्वर मान लो, देवता मान लो, उसके पाँव पर चढ़ जाओ, उसकी आज्ञा सदा शिरोधार्य हो, कामनाओं का उल्लंघन मत कर देना। किसका? वो है कैसे? उन्होंने किया क्या है? क्या ऐसा विशिष्ट है वहाँ पर? सवाल पूछ रहा हूँ।

और यही बात मैं आपसे कहा करता हूँ, मेरे ऊपर भी लगाओ। मैं आपसे उम्र में बड़ा हूँ या अनुभव बड़ा है या मेरे नाम के साथ कुछ तमगे जुड़ गए हैं, तो मैं इसलिए थोड़ी सम्मान के लायक हो जाता। मैं आपसे अभी बात कर रहा हूँ, आपको बाद में कुछ दम दिखे, अपने लिए कुछ फायदा दिखे, तो मेरी बात सुनो। नहीं तो उठकर चले जाओ।

यह बात दुनिया के हर रिश्ते पर लागू होती है। हमें लेबलों से थोड़ी प्रभावित हो जाना है कि किसी रिश्ते पर क्या लेबल लगा हुआ है। किसी नाम से थोड़ी डर जाना है कि किसी ने टी-शर्ट पहन रखी है, उस पर लिखा है "ताऊ जी"। कहोगे, “ये ताऊ जी हैं, तो इनके आगे तो दंडवत होना ही पड़ेगा।” ऐसा कुछ भी नहीं है।

गीता पर हमारा कार्यक्रम चलता है उसमें एक तरफ़ है कठोपनिषद, जहाँ पर जो ज्ञान का शिखर है वो किसको मिला हुआ है? एक आठ-दस साल के लड़के को। और वो लड़का कौन है? जो अपने बाप से भागकर आया है। बाप को कहते हैं, वो महापंडित था, दान का यज्ञ वग़ैरह कर रहा था। तब भी नकली काम कर रहा था बाप। और बेटे ने सवाल उठा दिया, तो बाप ने क्रुद्ध होकर कहा, "जा, तुझे यम को दिया।"

ऐसे बाप से बेटा भला नहीं क्या? और बेटा, वो कठोपनिषद में नचिकेता वो दस साल का है। और दूसरी तरफ़ हम गीता समागम में पढ़ रहे हैं अष्टावक्र गीता। वहाँ बहुत बड़े राजा आ गए हैं, और उनके सामने खड़े हुए हैं ग्यारह, बारह, चौदह साल के अष्टावक्र।

तो उम्र से क्या हो जाता है? उम्र की क्या बात है? अनुभव से क्या हो जाता है? कोई पागल आदमी हो, पागल पड़ा हुआ है, तो पागल रहते हुए भी वह बच्चे पैदा कर सकता है। पागलों के बच्चे नहीं होते क्या? और कोई बेहोश आदमी है वो पूरी ज़िंदगी बेहोश पड़ा रहे, तो भी उसकी उम्र बढ़ जाएगी, तो उम्र के बढ़ने से क्या होता है?

कोई कहे, "मैंने औलादें पैदा करीं। मैं महान हो गया।" नहीं हो गए, औलादें तो पागल भी पैदा कर देते हैं और पशु भी पैदा कर देते हैं। कोई कहे, "मेरी उम्र इतनी है।" तो उम्र बढ़ती है, उम्र तो तुम बेहोश पड़े रहो, तो भी बढ़ जाएगी। तो उससे क्या हो गया?

बात इसकी है कि तुममें समझ कितनी है, ज्ञान कितना है, विवेक कितना है? तुमने अपने ही जीवन में कौन से साहसिक प्रयोग किए हैं? तुमने ख़ुद ही अगर एक बँधा हुआ जीवन जिया है, तो तुम अपनी औलादों को भी विवश करोगे वही बँधा हुआ जीवन जीने के लिए। और जब औलादें, विशेषकर लड़कियाँ, तुम्हारी बात नहीं मानेंगे तो तुम कहोगे, "अरे, ये देखो, इसके ज़्यादा पर लग गए हैं, अभी इसके पर काटे देते हैं।" या फिर ताने मारोगे। कहोगे, "ये देखो, हमने ही पढ़ाया-लिखाया, हमारा एहसान नहीं मानती है। बहुत चली है पंछी बनकर उड़ने के लिए।"

ये सब कुछ नहीं। न ये तुम अपने साथ होने देना, न अपने बच्चों के साथ कभी करना। ये बात से समझ लो। तुमने बच्चे पैदा कर भी दिए तो भगवान नहीं हो गए तुम। आ रही है?

अब कुछ बातें आपके लिए। जो ये आप लोग रोया करते हो न कि पेरेंटल प्रेशर है, और ये है वो है। कुछ ऐसा नहीं है कि आपमें प्रेम इतना छलछला रहा है कि प्रेम के कारण आप अपने अभिभावकों के सामने झुक जाते हो।

प्रेम की नहीं, स्वार्थ की बात होती है। अगर इतना ही प्रेम होता तो भारत में इतने वृद्धाश्रम नहीं होते।

बात इतनी-सी है कि जब अभी बीस पच्चीस साल के हो कमाते नहीं हो, तो पता है कि छाया भी घरवालों से ही मिलनी है, रुपया-पैसा भी घरवालों से मिलना है, और शादी-ब्याह भी घरवाले ही करके देंगे। हमारे यहाँ ज़्यादातर लोग इस लायक नहीं होते कि अपनी शादी ख़ुद कर पाएँ। वो जब तीस पैंतीस के जाते हैं, तो मम्मी के पास जाते हैं और ऐसे आँचल खींचकर बोलते हैं, "माँ, मुझे देखना माँ, कुछ कर दे मेरे लिए, माँ।" ये हमारे यहाँ के ज़्यादातर जवानों की हालत है। उनकी माँ उनका ब्याह न कराए, तो उनका होगा भी नहीं कभी।

प्रेम के लिए गहराई चाहिए, साहस चाहिए, जो ज़्यादातर युवाओं में होता नहीं है। तो ये सब स्वार्थ से बँधे होते हैं घर से। और अगर पता हो लड़के को कि नालायक हूँ और बाप के पास जायदाद है, तब तो वह बाप की बात का उल्लंघन कर ही नहीं सकता। और फिर कहेगा, "मैं अपने पापा की सारी बातें इसलिए मानता हूँ क्योंकि वो मेरे प्यारे पापा हैं न।" बेटा, पापा के पास इतनी प्रॉपर्टी नहीं होती न, तो तू इतना-सा नहीं गिनता अपने पापा को।

तो जब तुम बोलते हो न कि पेरेंट्स का बहुत प्रेशर है, वो प्रेशर पेरेंट्स का नहीं होता है, वो स्वार्थ का होता है। और जिस दिन तुम्हारा स्वार्थ पूरा हो जाता है, उस दिन तुम पेरेंट्स की सुनना बंद भी कर देते हो। न जाने कितने बूढ़े माँ-बाप आते हैं जो कहते हैं कि, "हम ही ने ये किया, वो किया, ये सब करा। अब जाकर के बोस्टन बैठ गया है या कैलिफ़ोर्निया में बैठ गया है। एक साल में एक बार भी मिलने नहीं आता। महीने में, पंद्रह दिन में कभी फ़ोन पर बात हो गई तो बहुत है।”

तो ये प्रेम की नहीं बात है। जैसे ये अभिभावकों की ओर से स्वार्थ की बात है ठीक उसी तरीके से ये संतानों की ओर से भी स्वार्थ की बात है। ये रिश्ता ही कैसा है, जिसमें दोनों ओर से बस स्वार्थ ही स्वार्थ है?

रिश्ते सही बनाना सीखो, जानो कि प्रेम कहते किसको हैं। फिर माँ-बाप का संतान के प्रति भी प्रेम होगा और संतान भी माँ-बाप से प्यार कर पाएगी। और तब फिर ऐसे सवाल नहीं पैदा होते।

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
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