भारत में यह मान्यता रही है कि अध्यात्म बुढ़ापे का काम है। लेकिन जहाँ भी स्वामी विवेकानंद की मूर्ति खड़ी होगी, उस जवान आदमी का तेज गवाही देता होगा कि अध्यात्म बुढ़ापे का नहीं, जवानी का काम है। जवानी अगर, जो सबसे ऊँचा काम हो सकता है, उसको नहीं दी, तो और क्या काम आएगी? उन्होंने युवाओं से कहा, ज़रा चुनौती स्वीकार करना सीखो, प्रतिस्पर्धा करना सीखो। बल ही जीवन है और दुर्बलता ही मृत्यु है। उचित ही है कि युवा दिवस मनाया जाता है उन्हीं के नाम पर।
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आचार्य प्रशांत: बल ही जीवन है और दुर्बलता ही मृत्यु है। बात को बिना लाग-लपेट के सीधे-सीधे लाकर के उन्होंने लोगों के सामने रख दिया। कहा, कि देखो अपने जीवन को, कितनी शक्ति, कितना बल दिखाई दे रहा है। और अगर न तुम्हारे तन में बल है, न तुम्हारे मन में बल है, तो तुम मिथ्या ही, झूठ-मूठ ही अपने आप को धार्मिक या आध्यात्मिक कह रहे हो, ताक़त दिखाओ। और हम बात कर रहे हैं बीसवीं शताब्दी के मुहाने पर खड़े हिंदुस्तान की; ताक़त ज़रा कम ही देखने को मिलती थी। सामान्य जनों की तो क्या कहें, युवा वर्ग भी लचर, कांतीहीन, बिना किसी रीढ़ का दिखाई देता था।
अपनी इसी बात पर ज़ोर देने के लिए यहाँ तक कह गए, कि ये जो तुम भगवद्गीता का पाठ करते दिखाई देते हो, तुम्हारे लिए तो इससे कहीं ज़्यादा ज़रूरी है कि तुम जाकर फुटबॉल सीखो।
ज़रा चुनौती स्वीकार करना सीखो, प्रतिस्पर्धा करना सीखो, प्रतिपक्षी से आगे निकलना सीखो। और ये सब अगर तुम नहीं कर रहे तो गीता तुम पर व्यर्थ ही गई न।
गीता रटने से क्या होगा, श्रीकृष्ण का उपदेश सशक्त लोगों के लिए, बहादुरों के लिए, बाँके जवानों के लिए है। वो कह रहे हैं, "लड़ जाओ!" उनके लिए थोड़े ही है श्रीकृष्ण का उपदेश, जिनके बाजुओं में धनुष उठा पाने भर की भी ताक़त नहीं। उनसे श्रीकृष्ण कह भी दें, कि "लड़ जाओ," तो लड़ेंगे कैसे? वो कहेंगे, "उठ ही नहीं रहा, बहुत भारी है धनुष।"







