यह जो ‘मैं’ है, जिसे सेल्फ कहते हैं, यह अपने आप में बहुत तपती हुई और अशांत चीज़ है। यह निरुद्देश्य हो कैसे सकती है? जैसे किसी आदमी को एक-सौ-चार डिग्री बुखार हो और वो कहे कि मैं डिज़ीज़लेस हूँ। एक-सौ-चार डिग्री बुखार हो तो आपके पास एक धधकता हुआ उद्देश्य होना चाहिए। क्या? बुखार उतारना है भाई! इसी तरह से जब तक ‘मैं’ है, उद्देश्य होना चाहिए। और वो उद्देश्य होगा उस ‘मैं’ की शांति।
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प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, आज हमने पर्पज़लेसनेस के बारे में पढ़ा। मैं इस बारे में बहुत समय से सोचता हूँ, कि क्या कभी कोई काम पर्पज़लेस हो सकता है? क्या मैं कोई ऐसा काम कर सकता हूँ जिस पर कोई स्वार्थ ही नहीं हो? अगर मैं यहाँ बैठा हूँ तो मेरा एक पर्पज़ है। अगर मैं दूसरे के लिए कुछ करता हूँ तो उसमें भी तो एक पर्पज़ है, या स्वार्थ है, या वो मुझे अच्छा लगता है। क्या कभी कोई काम सेल्फलेस या पर्पज़लेस हो सकता है?
आचार्य प्रशांत: नहीं, हो सकता नहीं है, होना चाहिए भी नहीं है। जब तक सेल्फ है, तब तक तो पर्पज़ रहेगा ही। जब तक वो है जिसको आप सेल्फ बोलते हैं ‘मैं,’ तब तक पर्पज़ रहेगा ही। और वो पर्पज़ होगा उस ‘मैं’ की शांति। ये जो ‘मैं’ है, जिसे सेल्फ कहते हैं, ये अपने आप में बहुत तपती हुई और अशांत चीज़ है। ये पर्पज़लेस हो कैसे सकती है? और अगर ये हो गई पर्पज़लेस तो ये बड़ी गड़बड़ बात हो जाएगी न।
जैसे किसी आदमी को एक-सौ-चार डिग्री बुखार हो और वो कहे कि मैं




