पिंजरे में कैद चिड़िया नहीं हो तुम

Acharya Prashant

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पिंजरे में कैद चिड़िया नहीं हो तुम
स्वतंत्रता केवल बाहरी प्रतिबंधों से मुक्त होने का नाम नहीं है, बल्कि आर्थिक, सामाजिक और मानसिक निर्भरता से ऊपर उठने का साहस भी है। दूसरों की राय, सुरक्षा के नाम पर लगाए गए बंधन और सामाजिक भय तभी प्रभावी होते हैं जब व्यक्ति उन पर निर्भर हो। गरिमा और आत्मनिर्भरता व्यक्ति को अपने निर्णय लेने की शक्ति देती हैं। शांति, सम्मान और स्वतंत्र जीवन के लिए कभी-कभी सुविधा, सुरक्षा और सामाजिक स्वीकृति की कीमत भी चुकानी पड़ती है। यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।

प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी। मेरा प्रश्न औरतों को लेकर है। जैसे कि हम लोग कहीं भी निकलते हैं, हम लोगों को बोल दिया जाता है, टाइमली आओ। जैसे अभी 9:30 बज रहे हैं, मेरे घर से मैसेज आ रहा है, “बहुत दूर है घर, जल्दी आ जाओ। अकेले आना है तुम्हें, इतना देर रहना नहीं है क्योंकि फिर तुमको कौन प्रोटेक्ट करेगा?”

इस तरह के क्वेश्चन। जैसे किसी मॉल में चले गए, कुछ एक मॉल के तो लिए हम लोगों को एकदम मना किया हुआ है, “यहाँ मत जाओ, यहाँ किडनैप होती है। लड़कियाँ किडनैप कर दी जा रही हैं।” शायद यहाँ पर किसी को, सबको पता हो या डायरेक्ट-इनडायरेक्ट, मैं नहीं बोल सकती। मतलब हर तरह से हम लोगों को रोक दिया जाता है।

कुछ करने की सोच भी लें तो घर के लोग रोक देते हैं। घर के लोग अगर थोड़ा-सा भी हिम्मत दिखा दें, तो बाहर तो दुनिया जैसे बैठी है कि ये मत करो, वो मत करो। अरे, मेट्रो सिटी में तुम लोग अपने-आप को बता रहे हो कि तुम लोग मेट्रो सिटी के हो। बहुत लाइबल हो, बहुत तुम लोगों में समझ है। लेकिन हर वक़्त औरतों के ऊपर, ये मत करो, ऐसे कपड़े मत पहनो। अच्छा, सत्संग में जाने वाली औरतें घर में आके गुटखा, पान-पराग खाती हैं तो वो बहुत सभ्य हैं। लेकिन अगर क्लब में जाकर दो या छोटा-सा मतलब पैग वग़ैरह वो ले ले, “इससे दूर रहो।” क्यों? “क्योंकि ये तो दारू पीती है।” अरे, गुटखा बहुत अच्छी चीज़ है! दारू पी रही है, वो ख़राब है, और गुटखा बहुत अच्छी चीज़ है?

तुम्हारे दाँत सड़े हुए हैं, तुम मुस्कुरा नहीं रही हो। तुम बस एक स्माइल पास कर रही हो, होंठ दबाकर, कि बस मुझे बोलना है और हँसना है, लेकिन मेरे दाँत नहीं दिख जाएँ। मतलब इस तरह के एनवायरमेंट में रहने से आदमी सोच नहीं पाता है कि वो क्या करे, क्या नहीं। “बच्चे जवान हो रहे हैं। तुम जींस पहन रही हो, कैसे पहन सकती हो?” मैंने कहा, क्या हो गया, बच्चे अपनी जगह जवान हो रहे हैं। मैंने मेरा बचपन, जवानी, दोनों खोकर उनको बड़ा किया है। अब मैं मेरी ज़िंदगी नहीं जिऊँ? “नहीं, तुम ये कैसे कर सकती हो? उनकी शादी में मुश्किल होगी।”

इस तरह की बातों से मैं इतनी परेशान हूँ कि मैं कुछ कर ही नहीं सकती। कोई करे तो क्या करे? मतलब घिरे हुए हैं, खाली क्वेश्चन ही क्वेश्चन, ये मत करो, वो मत करो, यहाँ मत जाओ, ये मत करो। बहुत परेशान। नहीं, लेकिन घर के लोग रोक देते हैं। बोलते हैं, नहीं, यहाँ पर देखो क्या हो रहा है; और घर में आओ तो घर की निंदा शुरू, ये मत करो, वो मत करो। बच्चे बड़े हो गए हैं। तुम अपने-आप को ऐसे मत समझो, इस टाइप का कुछ। तो मुझे क्या करना चाहिए इसके लिए?

आचार्य प्रशांत: नहीं देखिए, रोक कोई तभी सकता है जब आपके कर्म का जो परिणाम है, उसको भुगतना पड़े। तब उसको आपको रोकने का हक़ मिल जाता है उसकी नज़र में; कि आपने कुछ किया और जो उसका नतीजा आया, वो किसी और को भुगतना पड़ा। तो फिर वो कहता है कि अब मेरे पास एक वाजिब वजह है कि मैं टोका-टाकी कर सकता हूँ। क्योंकि काम तुम करोगे, भुगतना हमें पड़ेगा। जो पूरे तरीके से स्वतंत्र है, अनाश्रित है, उसको कोई क्यों टोकेगा?

पर अगर स्थिति ऐसी रही हो कि तुम कहीं जाते हो, मुसीबत में फँस जाते हो, और फिर मुसीबत से निकालने के लिए हमें बुलाते हो, तो फिर दुनिया को टोकने का या राय देने का या बंधन लगाने का हक़ मिल जाता है। जहाँ तक ये वाली बात है कि घर इतने बजे जल्दी आ जाओ; पहली बात तो ये है कि समाज ऐसा होना चाहिए, लोगों की चेतना ऐसी होनी चाहिए, और क़ानून-व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए कि महिलाओं के ख़िलाफ़ आपराधिक घटनाएँ घटें नहीं। लेकिन कितना भी अच्छा समाज बना लीजिए, कुछ-न-कुछ तो उसमें अपराध का स्तर रहेगा ही। कभी-न-कभी, ज़्यादा नहीं तो कम घटनाएँ घटेंगी ही।

ये जो घटनाएँ हैं, महिला को सीखना होगा कि इन्हें सोख ले, अपने दम पर इनको झेल जाए। ये आज़ादी की क़ीमत है। ये आज़ादी की क़ीमत है, क्योंकि अगर हम शत प्रतिशत सुरक्षा माँगेंगे, तो फिर हम स्वतंत्र नहीं हो सकते। कुछ-न-कुछ खतरा, कुछ-न-कुछ असंभावित तो बना रहेगा। कभी भी, कहीं भी कुछ अप्रत्याशित घट सकता है, और जो घट सकता है, महिला को कहना होगा कि ठीक है, ये इतनी बड़ी बात नहीं है, ये मैंने झेल लिया। मैंने झेल लिया।

फिर कोई कहेगा कि इतने बजे नहीं आओगे, तो फलानी चीज़ तुम्हारे साथ बुरी हो सकती है। तो आप कहोगे कि पहली बात तो ये कि मेट्रो सिटी है, जो आप बोल रहे थे, लॉ एंड ऑर्डर ठीक है। आप जिस तरह की घटना की आशंका कर रहे हो, वैसी घटना घटने की संभावना बहुत कम है। लेकिन अगर वैसी घटना घट भी जाती है, तो मैं अपने दम पर झेल लूँगी। चिंता मत करो, चिल्लाऊँगी नहीं, किसी को सहायता के लिए पुकारूँगी नहीं। जो भी होगा, अपने ऊपर ले लूँगी।

अब कोई नहीं टोक सकता आपको। चिंता मत करो, अगर बुलाना भी होगा तो एजेंसिज़ को बुला लेंगे। खतरे की बात है, तो पुलिस को बुला लेंगे और किसी पर बोझ नहीं बनेंगे, किसी पर बोझ नहीं। जब किसी पर बोझ नहीं बनेंगे, तो फिर किसी को टोका-टाकी का हक़ भी नहीं है।

तो सबसे ज़रूरी चीज़ ये है कि बोझ न बना जाए, सबसे ज़रूरी है मनुष्य की स्वतंत्र गरिमा। मैं एक इंसान हूँ, किसी पर आश्रित नहीं, न आर्थिक रूप से, न सामाजिक रूप से।

जैसे मेरी उम्र का कोई भी वयस्क पुरुष जीता है, वैसे ही मैं भी जी सकती हूँ। और अगर मैं वैसे जी सकती हूँ, तो फिर कोई क्यों हस्तक्षेप करे मेरे मसलों में।

देखिए, समस्या हमें इससे नहीं होती कि किसी ने हमें बोल दिया कि हमारी बात सुनो, हमसे दबकर रहो, हमारी आज्ञा मानो। वास्तविक समस्या हमें इस बात से होती है कि हम भीतर से मजबूर होते हैं उनकी ये बातें मानने के लिए। ये मजबूरी हटनी चाहिए। ये मजबूरी हट गई, तो उसके बाद कोई बोलता रहे बाहर से, हमें क्या फ़र्क़ पड़ता है? और जब आपको फ़र्क़ पड़ना बंद हो जाएगा, तो लोगों का बोलना भी कम हो जाएगा। लोग बोलते भी इसीलिए हैं, क्योंकि उनको पता है कि इसको बोलेंगे तो ये दबेगी, झुकेगी, इस पर अंतर पड़ेगा। भले ही ये क्रोध में प्रतिक्रिया करे, पर इसका क्रोध भी यही बताता है कि इस पर अंतर पड़ा है।

जिस बात से आपको कोई फ़र्क़ नहीं पड़ेगा, क्या उस बात पर आपको क्रोध भी आएगा? क्या आप शिकायत भी करोगे? नहीं। पर देखिए, अभी आपको क्रोध आ रहा है, आप शिकायत कर रहे हो। उसकी वजह समझिए। एक वजह तो है उसकी कि दुनिया ऐसा-ऐसा बोलती है, एक वजह तो ये है। और दूसरी वजह ये है कि दुनिया जो बोलती है, उससे हम पर फ़र्क़ पड़ता है। फ़र्क़ पता है क्यों पड़ता है? क्योंकि कहीं-न-कहीं हम डिपेंडेंट हैं, परतंत्र हैं, आश्रित हैं। इसीलिए जब कोई हमें कुछ बोलता है, तो हमें वो बात उसकी सुननी पड़ती है।

ज़्यादा बुरा ये नहीं कि किसी ने कुछ कह दिया, ज़्यादा बुरा ये कि हमें सुनना पड़ा। और सुनना क्यों पड़ा? क्योंकि कठपुतली की डोर किसी और के हाथ में है। तो अपनी डोर किसी और के हाथ में मत दीजिए।

और जो दुनिया आपके ऊपर बड़े-से-बड़ा पहरा लगाती है कि तुम लड़की हो, महिला हो, कोई तुम्हारे साथ बुरा कर देगा, और बुरे से बुरा यही कहा जाता है कि कोई आकर के तुम्हारे शरीर को गंदा कर जाएगा, तुम्हारे साथ शारीरिक हिंसा कर जाएगा, रेप वग़ैरह की बात होती है, तो ये सुनने में जैसा भी लगे, ठीक है? पर इसको थोड़ा समझने की कोशिश करिएगा। मैं जहाँ से बोल रहा हूँ, मेरी बात को समझिएगा। कह देना चाहिए कि वैसा कुछ हो भी गया, तो कोई बात नहीं हम झेल लेंगे। इतनी बड़ी बात नहीं है देह, कि उसके लिए ज़िंदगी को हम बंधक या ग़ुलाम बना दें। देह इतनी भी बड़ी बात नहीं है।

पहली बात तो ये है कि रेप हो जाएगा, इसकी संभावना 0.001% है। और दूसरी बात ये कि अगर इतनी छोटी-सी संभावना के लिए एक इतने इम्प्रोबेबल इवेंट के लिए, मैं ज़िंदगी भर अपनी आज़ादी को छोड़ दूँ, तो ये घाटे का सौदा है। ऐसी कोई घटना घटेगी नहीं, पर अगर घटती भी है तो दुनिया वालों तुम चिंता मत करो मैं झेल लूँगी। मुझे नहीं लगता कि फिजिकल चेस्टिटी या शारीरिक प्योरिटी, तन की पवित्रता इतनी बड़ी बात है कि मैं उसके लिए अपनी ज़िंदगी की आज़ादी ही छोड़ दूँ।

शरीर है, ठीक है, हम कोई नहीं चाहता कि किसी के शरीर को आकर कोई छुए और ऐसा कभी होना भी नहीं चाहिए। बिल्कुल कभी नहीं होना चाहिए कि कोई आकर आपके शरीर पर हमला कर रहा है किसी भी दृष्टि से, चाहे सेक्सुअली या नॉन-सेक्सुअली। किसी के शरीर पर कोई आकर के क्यों घात करे या स्पर्श करे, बिल्कुल नहीं होना चाहिए। लेकिन शरीर है, और शरीर पर ख़तरे भी रहते हैं कई तरह के। उन ख़तरों से बचने के लिए हम शरीर को रुई में लपेटकर थोड़ी रख लेंगे। हम ये थोड़ी कहेंगे कि न कहीं आएँगे, न जाएँगे। सौ अपने ऊपर बंदिशें लगाएँगे, क्योंकि हमें शरीर को पवित्र रखना है। बात आ रही है न समझ में?

अरे भाई, आप सड़क पर जा रहे होते हो, पीछे से कुत्ते भौंक देते हैं। तो इसमें आप गंदे थोड़ी हो गए। कितनों के साथ हुआ है कि चल रहे हैं, चल रहे हैं ऊपर से कोई पक्षी आकर बीट कर गया, सर पर, कंधे पर। होता है कि नहीं होता है? तो इससे आप गंदे थोड़ी हो गए; आप ये थोड़ी कहोगे, अब धिक्कार है मेरे जीवन पर, कोई आकर मेरी पवित्रता भंग कर गया। अरे, वो कोई पागल कुत्ता था, कौवा था कुछ आकर के कोई आपके ऊपर टट्टी कर गया। तो इससे आपकी प्योरिटी थोड़ी खराब हो गई।

एक पागल जीव कुछ भी कर सकता है। उसकी वजह से हम ये थोड़ी कहेंगे कि हम घर से बाहर ही नहीं निकलेंगे, क्योंकि घर से बाहर निकलो तो कौवा बीट कर जाएगा। हाँ, हम कोशिश पूरी करेंगे और समाज भी ऐसा होना चाहिए कि इस तरह के कौवे-कुत्ते सब ये नियंत्रण में रहें। लेकिन फिर भी कभी-न-कभी कुछ-न-कुछ अपघटना हो जाती है। और हो जाए, तो हो गई न वो, आकर नहा लो, दोबारा कपड़े बदल लो, बाहर निकलो, अपना काम देखो। ज़िंदगी बड़ी है, खूबसूरत है, ज़िंदगी में ऊँचे और बड़े काम करने हैं। कुत्तों और कौवों के डर से घर में थोड़ी घुसे रहोगे।

प्रश्नकर्ता: जैसे बहुत-सी औरतें होती हैं, हाउसवाइफ़ वो कुछ नहीं कर पाती हैं। उनको पीहर का भी सपोर्ट नहीं होता और ससुराल का भी नहीं। तो वो डिपेंड कैसे होंगी? क्योंकि उनके सामने अगर, मतलब, बच्चों में अगर खाली लड़कियाँ हैं, तो घरवाले तो वैसे ही टॉर्चर करते हैं, “यार, इसकी तो लड़की है। ये कैसे आगे बढ़ेगी? इसकी लड़की की ज़रूरत होगी। उनको पढ़ाना होगा।”

आचार्य प्रशांत: देखिए शरीर माँ-बाप से आ जाता है, खाना-पीना घरवाले दे सकते हैं। रहने के लिए कमरा, बैठने की कुर्सी, सोने का बिस्तर घरवाले दे सकते हैं। चेतना कोई नहीं देता। लड़की सौ तरह से आश्रित हो सकती है पर अगर वो बड़ी हो गई है, तो चेतना तो उसकी अपनी है न। वो आश्रित होना बर्दाश्त क्यों कर रही है? मनुष्य है न, और ये दो टाँगें भी हैं, तो निकलो न बाहर। या टाँगें ही किसी ने बाँध ली हैं? इतना तो नहीं होता। ऐसा तो नहीं होता कि टाँग और हाथ बाँध के खंभे से कहीं ऐसे... ऐसा तो नहीं होता।

तो ये कहने से बहुत लाभ नहीं होगा। आपकी बात तथ्यात्मक तल पर सही है फ़ैक्चुअल है पर यूज़फ़ुल नहीं है। मैं अगर एक लड़की हूँ और मैं कहूँ कि मुझे कोई एन्करेज नहीं करता, मुझ पर सब दबाव डालते हैं, मुझ पर बंदिश लगाते हैं, तो ये शिकायत करती रहूँ अगर मैं, तो हाउ इज़ इट यूज़फ़ुल टू मी? प्लीज़ टेल मी। इसमें कुछ यूटिलिटी है, इस शिकायत में? या यूटिलिटी इसमें है कि अब तुम 15 की हो, या 25 की हो, या 35 की हो, शिकायत कब तक करती रहोगी? ये दो हाथ हैं, और ये दो टाँगें हैं, और यहाँ इंटेलिजेंस है। बाहर निकलो, ख़तरे उठाओ, दम दिखाओ, और दुख झेलो, संघर्ष करो। क्या होगा? धूल-मिट्टी फाँकनी पड़ेगी, फाँको। या फिर ग़ुलामी बर्दाश्त करते रहो, तुम्हारी मर्ज़ी है। तुम्हारी मर्ज़ी है, ये तो अब चुनाव की बात है।

हम अपने ही शोषकों से उम्मीद करें कि वो हमें आज़ाद कर देंगे, ये बात तो मतलब थोड़ी ज़्यादा हो गई न। अगर आपको इतना ही निश्चित हो गया है कि कोई आपको सहारा, समर्थन नहीं देने वाला, तो आप वहाँ टिके किस लिए हुए हो? जहाँ निश्चित हो जाए कि पिंजरा है, दीवारें नहीं हैं, कैदखाना है और लोग नहीं हैं, शोषक हैं। अगर आपको इतना दिख ही गया है और बिल्कुल निश्चित ही हो गया है, तो अब मेरा सवाल ये है कि तुम वहाँ कर क्या रहे हो? मेरा सवाल ये है कि इतना जब दिख गया, तो अब तुम वहाँ बैठे किस लिए हुए हो? उठो, निकलो। निकलते क्यों नहीं हो?

अब न निकलने में कई बार स्वार्थ आड़े आ जाता है। क्योंकि पिंजरे में सुरक्षा भी होती है, और पिंजरे में खाना-पीना भी आराम से मिल जाता है और पिंजरे में धूप वग़ैरह भी नहीं झेलनी पड़ती। तो स्वार्थ छोड़ने पड़ेंगे, स्वार्थ छोड़ने पड़ेंगे। सुरक्षा त्यागनी पड़ेगी, बेइज़्ज़त होना बर्दाश्त करना पड़ेगा। ये जो चीज़ होती है न, “सब हमें सम्मान दें, सब हमें सम्मान दें।” तैयार रहना पड़ेगा कि अब लोग इज़्ज़त नहीं देंगे। भाई, ग़ुलामी को बहुत इज़्ज़त मिलती है, आज़ादी को तो गालियाँ मिलती हैं। जो आज़ादी की दिशा बढ़ेगा उसे तैयार होना चाहिए, लोग गालियाँ देंगे। ठीक है? लोग देंगे, गालियाँ तो देंगे। हम लोगों से आज़ाद हैं, तो लोगों की बातों से भी आज़ाद हैं, नहीं फ़र्क़ पड़ता।

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। मेरा एक क्वेश्चन है। जैसे आपने कहा कि अतीत को भूलकर आगे बढ़ना चाहिए। जिस बच्चे के साथ अनगिनत बार चाइल्ड मोलेस्टेशन हुआ होता है, उसका कहीं-न-कहीं जो लोगों के ऊपर ट्रस्ट करने का रहता है, वो हमेशा के लिए डगमगा जाता है। फिर लाइफ़-लॉन्ग के लिए वो किसी के ऊपर, अगर कोई अच्छा इंसान भी आएगा तो भी उसको लगेगा, “नहीं, ये उसी स्वार्थ के लिए कुछ-न-कुछ कर रहे हैं मेरे लिए।” तो एक तो ये बात है।

और दूसरी बात है कि जैसे आपने उस दिन शांति की बात करी थी, कि शांति के लिए आपको कितनी भी कीमत लगाना पड़े। जैसे कि मेरा ख़ुद का फ़्लैट छोड़कर अभी मैं गवर्नमेंट क्वार्टर्स में आ गई हूँ। उसमें मेरा हाउस रेंट अलाउंस 11000 कट रहा है। बावजूद उसके, क्योंकि मुझे सुबह जहाँ पर मैं पहले फ़्लैट में रह रही थी, एयरपोर्ट के पास, वहाँ पर ऊपर वाली…क्योंकि मैं सिंगल मदर हूँ, अकेली हूँ, तो बहुत सारे लोग जान-बूझकर परेशान करते थे। मुझे सुबह उठना होता था ऑफ़िस में, उसके लिए डिस्टर्बेंस काफ़ी होती थी।

अब मुझे एक चीज़ अंदर होती है कि मैं क्या इनटॉलरेंट बहुत हो गई हूँ कि मुझे इन सब चीज़ों से, छोटी-छोटी बातों से परेशानी हो रही है? या फिर मैंने शांति के लिए जो क्वार्टर में शिफ्ट हुई हूँ, ये एक गुड डिसीज़न है, हालाँकि हाउस रेंट अलाउंस कट रहा है, फिर भी? तो वो एक जगह पर मैं… क्योंकि मुझे लग रहा है कि नहीं, क्या मुझे वापस घर जाना चाहिए? या फिर मैं कुछ ज़्यादा ही… वो हो गई हूँ?

आचार्य प्रशांत: मैं समझ ही नहीं पाया, मुझे माफ़ करिएगा। एचआरए वग़ैरह कहाँ से आ गया? क्या शिफ्ट हुई हैं आप?

प्रश्नकर्ता: मैं ये बोल रही हूँ कि आंतरिक शांति के लिए क्या जो ये कीमत है जो मैं अभी।

आचार्य प्रशांत: कोई भी कीमत छोटी है।

प्रश्नकर्ता: हाँ तो फिर वही जवाब मिल गया।

आचार्य प्रशांत: आंतरिक शांति के लिए जो कीमत बनती है, वो दे दीजिएगा।

प्रश्नकर्ता: थैंक यू।

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
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