स्वतंत्रता केवल बाहरी प्रतिबंधों से मुक्त होने का नाम नहीं है, बल्कि आर्थिक, सामाजिक और मानसिक निर्भरता से ऊपर उठने का साहस भी है। दूसरों की राय, सुरक्षा के नाम पर लगाए गए बंधन और सामाजिक भय तभी प्रभावी होते हैं जब व्यक्ति उन पर निर्भर हो। गरिमा और आत्मनिर्भरता व्यक्ति को अपने निर्णय लेने की शक्ति देती हैं। शांति, सम्मान और स्वतंत्र जीवन के लिए कभी-कभी सुविधा, सुरक्षा और सामाजिक स्वीकृति की कीमत भी चुकानी पड़ती है।
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प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी। मेरा प्रश्न औरतों को लेकर है। जैसे कि हम लोग कहीं भी निकलते हैं, हम लोगों को बोल दिया जाता है, टाइमली आओ। जैसे अभी 9:30 बज रहे हैं, मेरे घर से मैसेज आ रहा है, “बहुत दूर है घर, जल्दी आ जाओ। अकेले आना है तुम्हें, इतना देर रहना नहीं है क्योंकि फिर तुमको कौन प्रोटेक्ट करेगा?”
इस तरह के क्वेश्चन। जैसे किसी मॉल में चले गए, कुछ एक मॉल के तो लिए हम लोगों को एकदम मना किया हुआ है, “यहाँ मत जाओ, यहाँ किडनैप होती है। लड़कियाँ किडनैप कर दी जा रही हैं।” शायद यहाँ पर किसी को, सबको पता हो या डायरेक्ट-इनडायरेक्ट, मैं नहीं बोल सकती। मतलब हर तरह से हम लोगों को रोक दिया जाता है।
कुछ करने की सोच भी लें तो घर के लोग रोक देते हैं। घर के लोग अगर थोड़ा-सा भी हिम्मत दिखा दें, तो बाहर तो दुनिया जैसे बैठी है कि ये मत करो, वो मत करो। अरे, मेट्रो सिटी में तुम लोग अपने-आप को बता रहे हो कि तुम लोग मेट्रो सिटी के हो। बहुत लाइबल हो, बहुत तुम लोगों में समझ है। लेकिन हर वक़्त औरतों के ऊपर, ये मत करो, ऐसे कपड़े मत पहनो। अच्छा, सत्संग में जाने वाली औरतें घर में आके गुटखा, पान-पराग खाती हैं तो वो बहुत सभ्य हैं। लेकिन अगर




