ज़्यादातर लोग बाहर जी-तोड़ मेहनत करते हैं। लेकिन उनकी भीतरी दुनिया खाली, खोखली, कुछ नहीं, क्योंकि वो सारी मेहनत भीतर के केन्द्र को बदलने के लिए नहीं की गई होती है। वो जो आप बाहर खूब सारी मेहनत करके खूब सारे पैसे कमा रहे हैं, वो सिर्फ़ इसलिए कमा रहे हैं, क्योंकि आप अपनी आन्तरिक असुरक्षा को बचाए रखना चाहते हैं। आप भीतरी तौर पर एक डरे हुए आदमी हैं, इसीलिए बाहरी तौर पर आप बहुत मेहनत करते हैं। तो करते रहो बाहर कितनी भी मेहनत, आन्तरिक प्रगति कुछ नहीं होगी।
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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, चिन्तन और कार्य में क्या अन्तर है?
आचार्य प्रशांत: चिन्तन और कार्य में कोई अन्तर नहीं होता, बिलकुल कोई अन्तर नहीं होता, लेकिन चिन्तन भी अपनेआप में काम होता है, एकदम होता है। लेकिन कार्य, गति को ही नहीं माना जा सकता। बहुत हिले, बहुत हिले लेकिन हिल-डुल करके वापस वहीं आ गए जहाँ थे, तो कोई कार्य नहीं हुआ।
फिज़िक्स आपने पढ़ी है, उसमें भी वर्क की परिभाषा क्या होती है? फ़ोर्स इनटू डिस्प्लेसमेंट (बल गुणा विस्थापन), तो वो तो हो गया फिज़िकल वर्ल्ड में, फिज़िक्स में। साईकिक वर्ल्ड में, अन्दरूनी दुनिया में भी, काम किसी चीज़ को तभी मानेंगे जब उसमें डिस्प्लेसमेंट शामिल हो, काहे का डिस्प्लेसमेंट? जो आपका केन्द्र है, द सेन्टर शुडबी डिस्प्लेस्ड (केन्द्र की विस्थापना होनी चाहिए)। तो अगर आपके चिन्तन से आपका सेंटर डिसप्लेस हो रहा है तो, तो कम हुआ, नहीं तो बस थकान हुई, खाया-पिया कुछ नहीं, गिलास तोड़ी बारह आना ।




