FOMO सोने नहीं देता, YOLO जीने नहीं देता - क्या करे Gen Z?

Acharya Prashant

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FOMO सोने नहीं देता, YOLO जीने नहीं देता - क्या करे Gen Z?
क्या सचमुच FOMO और YOLO सिर्फ़ Gen Z की समस्या हैं, या ये मनुष्य के पुराने डर के नए नाम हैं? जब भीतर खालीपन हो, तो बाहर की हर चीज़ छूटती हुई लगती है। फिर जीवन एक दौड़ बन जाता है, जहाँ “और चाहिए” कभी ख़त्म नहीं होता। समस्या वस्तुओं की कमी नहीं, उस अहंकार की है जो हमेशा अधूरा महसूस करता है। जब तक स्वयं को नहीं जानोगे, तब तक हर चाह एक नई बेचैनी बनती रहेगी। यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।

प्रश्नकर्ता: गुड इवनिंग सर। माय नेम इज़ युवराज शाह। करेंटली, आई एम अ सेकंड ईयर सिविल इंजीनियरिंग स्टूडेंट। सर, हम जेनज़ीज़ में न आजकल एक शब्द बहुत ज़्यादा प्रचलित है, फोमो करके। “फोमो” अर्थात “फियर ऑफ मिसिंग आउट।” मतलब सर, हम हमेशा हमारी लाइफ़ को बाक़ी लोगों से कंपेयर कर रहे होते हैं और इससे अननेसेसरिली इन्फ्लुएंस हो जाते हैं कि ये अपने स्टार्टअप पर काम कर रहा है, ये अपनी स्किल्स को आगे बढ़ा रहा है, ये घूमने जा रही है, वो कर रहा है, ये कर रहा है। तो सर, इसके चक्कर में हम हमारी लाइफ़ के पर्पस से भटक जाते हैं।

और सर, ये शब्द से हम बाहर आए नहीं होते कि एक और शब्द आ जाता है, “योलो” करके, मतलब “यू ओनली लिव वन्स।” मतलब मुझे ज़िंदगी के सारे सुख-दुख एक साथ प्राप्त करने हैं। “आई वांट एवरीथिंग इन लाइफ़” और मुझे वो अभी चाहिए। तो सर, आप ही बताएँ, मतलब इसमें से कौन-सी फिलॉसफ़ीज़ पर लाइफ़ जीनी चाहिए?

आचार्य प्रशांत: माने तुम ही स्पेशल हो? मैं जेनज़ी हूँ, मुझे फोमो हो गया, योलो हो गया। हमें नहीं होता था? तुम ही इतने ख़ास हो? हमें भी तुम्हारे बराबर का ही होता था। तुम्हारी कोई मोनोपोली है सारी बुराइयों पर, नालायकियाँ हमने भी बराबर की करी हैं। और मुझसे पीछे की जो पीढ़ी है, क्या उन्हें नहीं होता था फोमो? बैठे हुए हैं, पूछो, आपको हुआ कि नहीं हुआ? “फियर ऑफ मिसिंग आउट।” तो तुम क्यों आ गए फोमो पर अपना विशेषाधिकार लेकर के, कि जेनज़ी ने पेटेंट कराया है फोमो का। इंसानी फ़ितरत है बेटा, तुम पहले नहीं हो जिसे हो रहा है।

टीनएज के क्रश की तरह जो पैदा हुआ है, उसको होगा। मूर्ख बनने पर किसी की मोनोपोली तो नहीं होती, या होती है? पाँच हज़ार साल पहले भी फोमो था। पर पाँच हज़ार ही क्यों बोल रहा हूँ? क्योंकि उसके पीछे का हमें लिखित इतिहास मिलता नहीं है। पाँच हज़ार साल पहले का भी मुश्किल से मिलता है, काफ़ी मामला तो फिर अनुमान पर चलता है पर कुछ-कुछ मिल जाता है। जैसे हम आज हैं, जिसको आप बोलते हो “चैतन्य मनुष्य,” हम लगभग पिछले पचास हज़ार साल से ऐसे हैं। कुछ वैज्ञानिक कहते हैं लगभग एक लाख साल, एक रेंज होगी। ठीक है, इवोल्यूशन है, धीरे-धीरे। तो पाँच हज़ार साल का तो लिखित प्रमाण उपलब्ध है कि आज तुम जैसे हो फोमो, योलो, पाँच हज़ार साल पहले भी ऐसे ही थे।

दुर्योधन का और क्या हो रहा था? ये जितना तुम पुरानी कहानियों में पढ़ते हो, चाहे वो भारत की हों, चाहे ग्रीस की हों, चाहे चीन की हों, उनमें तुम्हें फोमो-योलो नहीं दिखाई देता? और अगर तुम जो केव कार्विंग्स हैं, जो प्रिमिटिव आर्ट है आदिमानव की, और जो भित्ति-चित्र वग़ैरह हैं, तुम उनको जाकर देखोगे और पीछे चले जाओ, दस हज़ार, बीस हज़ार, तीस हज़ार साल पीछे चले जाओ तो कुछ मिलते हैं प्रमाण। वो पत्थरों से उकेरने लग जाते थे, कई बार पत्थरों को ही, कई बार हड्डियों को ही। तो तुम पाओगे, वहाँ भी बराबर का फोमो है। और वहाँ तो और ज़्यादा होता था।

ये जो मिस्र की ममियाँ हैं, ये और क्या हैं? और क्या हैं? वो मर गया है और उसके शरीर को बिल्कुल लेप लगाकर के पैक करके रख देते थे। कहते, “अभी इसने ठीक से भोगा नहीं है दुनिया को, इसकी रूह, इसकी जीवात्मा लौट के आएगी, इसको प्रिज़र्व करके रखो, ताकि वो फिर आए तो उसको अपना घर तैयार मिले।” बात आ रही है समझ में? और ये जो योलो है, इससे निपटने के लिए तो पूरी दुनिया में इंसान ने ऐसे-ऐसे उपद्रव किए, ऐसी मान्यताएँ इजाद कीं कि तुम हक्के-बक्के रह जाओ। अब मैं लंबा बोलूँगा, चलो, यहाँ बैठ जाओ। “यू ओनली लिव वन्स,” भाई!

तो जब डर लगता था कि “यू ओनली लिव वन्स,” तो बोले, कुछ करते हैं, इलाज करते हैं। तो दुनिया भर में फिर पुनर्जन्म, रीइन्कार्नेशन को लाया गया। उसको लाने की वजह ही यह डर था कि यह जो ज़िंदगी है, ये तो पूरी पड़ेगी नहीं। बात आ रही है समझ में? ये एक नेचुरल प्रोग्रेशन है, इसको समझो।

डर उठता है, कुछ है बाहर जो मुझे मिल नहीं रहा। मैं अहंकार हूँ, मैं ईगो हूँ, मैं खाली हूँ, किसी भी तरह से बाहर की चीज़ें ला-लाकर मुझे अपनी ज़िंदगी को भरना है। और मैं अपने आसपास देख रहा हूँ, मुझे लग रहा है, “अरे, उनको नीली शर्ट मिल गई, उनको सैंडल मिल गई, उनके पास चश्मा है। मेरे पास नीली शर्ट नहीं है, मेरे पास सैंडल नहीं है, मेरे पास चश्मा भी नहीं है। और मैं कैसा हूँ? मैं रिक्त हूँ, मैं होलो हूँ; मैं खाली हूँ, मुझे चाहिए, मुझे चाहिए।” यह फोमो है, फोमो।

और जब आप कहते हो कि मुझे चाहिए, तो आपको दिखाई देता है टाइम इज़ रनिंग आउट, द क्लॉक इज़ टिकिंग। समय की तीर एक ही दिशा में बढ़ रहा है। और आपके पास और कम, और कम समय बचता जा रहा है, और भीतर फोमो चीख रहा है। तो फोमो से फिर आता है योलो। हम जो हैं, ईगो की परिभाषा से आया फोमो, और फोमो से आया योलो। और फिर इस योलो से आ गया पुनर्जन्म। कि भाई, एक जन्म में तो बात बनेगी नहीं, तो एक काम करो दिल को बहलाने के लिए ख़ुद को बता दो, अभी दस–बारह, पचास, दस लाख जन्म और होने हैं। बात आ रही है समझ में?

एक गाना भी है, “तेरा प्यार है इतना प्यारा, इतना प्यारा, तेरे मिलन की ललक में हमें आना पड़ेगा दुनिया में दोबारा।” काहे कि उसको भोगना है। अब उम्र बीत रही होगी, मांसपेशियाँ साथ नहीं दे रहीं, टेस्टोस्टेरोन गिर रहा है, तो कह रहे हैं, “हमें आना पड़ेगा दुनिया में दोबारा। तू रुक जा, ऐसे नहीं छोड़ दूँगा तुझे, आऊँगा, लौट के आऊँगा।” ये और क्या है? यह योलो ही है।

योलो सिद्धांत नहीं है, वो चीख है, वो कराह है, वो वेदना है; जन्म हुआ था पर व्यर्थ चला जा रहा है। ज़िंदा हूँ, पर जीवन को जानता नहीं, और घड़ी टिक, टिक, टिक, टिक। अभी किसी दिन शरीर बिखर जाएगा और ज़िंदगी कोई पूछे, कि “क्या थी?” तो हम कहेंगे, कोरा कागज़। पता ही नहीं चला कि यह कहानी है क्या, दूसरे की लिखी पटकथा हम जीते रहे, अपनी कहानी कभी लिख ही नहीं पाए। कोई हमसे पूछे, कि “तुम्हारी किताब में क्या है?” कहेंगे, बस कोरे कागज़। “तो जी कैसे रहे थे?” किसी और ने स्क्रिप्ट दे दी, किरदार निभा रहे थे। यह योलो है।

ईमानदारी की बात यह होती कि आप कहते कि जीवन यदि व्यर्थ जा रहा है तो मैं जानना चाहूँगा कि ये जीवन कहते किसको हैं। ईमानदारी की बात होती कि आप उनके पास जाते, जिन्होंने पूरी ताक़त से अपने आप को जानने के लिए ज़िंदगी का सामना करा, जिन्होंने झूठी मान्यताओं में मुँह नहीं छुपाया, जो खुलकर जिए और अपने प्रयोगों से कुछ जान पाए। आप उनके पास जाते और पूछते, कि “बताओ, बताओ, बताओ, जीवन किस लिए है? मुझे लग रहा है फिसल रहा है मेरे हाथों से।” तो वो बोलते, “जीवन छोड़ दो, तुम जीव ही नहीं हो, यही बात जानने की है, “न मे जीवः ज्ञातः, स जीवनमुक्त उच्यते।’” पर तुम गए नहीं कभी वहाँ।

वो तरीका वास्तविक धर्म का होता, यदि आप मुट्ठियों से फिसलते जीवन को जानने के लिए ज्ञानियों के पास जाते। पर नहीं, आपने लोकधर्म का मार्ग चुना।

आपको जब दिखाई दिया कि ज़िंदगी बीत रही है, तो आपने कह दिया, “अब मैं आऊँगा। मेरी रूह बाहर घूम रही है, वो किसी के गर्भ में घुस जाएगी, मैं दोबारा आ जाऊँगा।” ये क्या बेईमानी करी अपने ही साथ। और इस बेईमानी की कोई ज़रूरत नहीं है, क्योंकि धर्म उपलब्ध था आपको बताने के लिए कि आपकी सच्चाई, यथार्थ है क्या। आपने जानना नहीं चाहा। आ रही है बात समझ में?

जो इंसान अपना जीवन बर्बाद कर रहा होगा, उसके लिए ज़रूरी हो जाएगा यह मानना कि आगे भी ज़िंदगी है। और जो इंसान अपना जीवन बर्बाद कर रहा होगा, उसके लिए यह मानना भी ज़रूरी हो जाएगा कि पीछे भी ज़िंदगी थी जन्म से पहले। बताओ क्यों? वो कहेगा, “मैं अभी दुख भोग रहा हूँ। मैं गंदा आदमी तो नहीं, मैं दोषी तो नहीं, मैं पापी तो नहीं। मैं मान कैसे लूँ कि मैं बहुत ही गंदा आदमी हूँ? मेरा दावा यह है कि मैं दोषी नहीं, तो ज़रूर अगर मैं अभी दुख भोग रहा हूँ तो इसका कारण पिछला जन्म है।

बेईमान आदमी के लिए ये अगले-पिछले जन्म में मान्यता रखना अनिवार्य हो जाता है। ईमानदार आदमी कहेगा, “ज़िंदगी आज व्यर्थ हो रही है, तो सार्थक भी उसे आज ही करूँगा, भविष्य की बाट नहीं जोहूँगा।” और पुनर्जन्म भविष्य से भी आगे के भविष्य का नाम है। सरदर्द मुझे आज है, तो ये थोड़ी कहूँगा कि एक साल बाद उसका उपचार कराऊँगा। दर्द आज है, दर्द आज मिटाऊँगा; यह ईमानदारी है।

बात आ रही है समझ में?

जिस योलो की बात कर रहे हो, वो निकलता है फोमो से। और फोमो कहाँ से निकलता है? अहंकार से। और अहंकार कहाँ से निकलता है? तुम्हारे शरीर से। जो भी पैदा हुआ है, “मैं-भाव” के साथ ही पैदा हुआ है, “आई-एम-नेस।” अहंकार शरीर से निकलता है। पैदा होने से पहले जो गर्भस्थ शिशु होता है, “मैं-भाव” उसमें भी होता है। इसीलिए गर्भ में भी जो शिशु है, अगर तुम उसको मारो, तो ये बात ठीक नहीं होती; जैसे एक बीस साल के लड़के या लड़की में होता है, “मैं-भाव,” “मैं हूँ,” वैसे ही गर्भ में भी जो लड़की है, कन्या है, उसमें भी होता है।

किसी ज़िंदा युवती की हत्या कर दो, तो तुम फिर भी मान लेते हो कि यह अपराध हुआ, नैतिक भी, क़ानूनी भी। पर लड़की गर्भ में है उसकी भ्रूण-हत्या कर देते हो, तुम्हें लगता है अभी तो पैदा ही नहीं हुई थी मार भी दिया तो क्या हो गया? वो पैदा हो चुकी है भाई, बस अभी वो पेट के अंदर है। पैदा तो वो हो चुकी है, क्योंकि उसमें अहंकार आ गया है। अहंकार माने घमंड नहीं होता, अहंकार माने अपने होने का भाव, “मैं हूँ।” आ रही है बात समझ में?

तो यह गड़बड़ी लेकर के पैदा होते हो। कौन-सी गड़बड़? “मैं हूँ।” आप कहोगे, “ये गड़बड़ क्यों है, मैं तो हूँ। तो इसमें गड़बड़ क्या हो गई?” इसमें गड़बड़ यह हो गई कि जब आप कहते हो “मैं हूँ,” तो उससे आशय यह होता है, “मैं हूँ और समष्टि से विभक्त हूँ।” आई एग्ज़िस्ट ऐज़ अ सेपरेटेड एंटिटी फ्रॉम द रेस्ट ऑफ इट ऑल।” मैं हूँ और यह जो समूची चारों तरफ़ प्रकृति है, मैं उससे अलग हूँ। क्योंकि मैं उससे अलग हूँ, इसीलिए उसकी व्यवस्था मुझे नहीं चला सकती, मुझे अपनी व्यवस्था ख़ुद चलानी पड़ेगी।

प्रकृति अपनी व्यवस्था चला रही है न। चाँद-सूरज को चलाने के लिए आपकी ज़रूरत तो नहीं पड़ती। गुरुत्वाकर्षण को चलाने के लिए आपकी ज़रूरत नहीं पड़ती। विज्ञान के इतने नियम हैं, वो बिना आपके हस्तक्षेप के काम कर लेते हैं। नोवा, सुपरनोवा बन रहे हैं, ख़त्म हो रहे हैं; ब्लैक होल लील ले गए न जाने क्या, प्रकाश को भी खा गए। आपसे पूछकर तो प्रकाश को नहीं खा गए। बिग बैंग आपसे हस्ताक्षर कराकर तो नहीं हुआ था। प्रकृति अपना काम-धंधा जानती है। पर अहंकार आपको बोलता है, “प्रकृति सब चला सकती है, मुझे नहीं चला सकती। प्रकृति पूरा ब्रह्मांड चला सकती है पर ख़ुद को तो मैं ही चलाऊँगा। यू सी, आई एम स्पेशल, आई एम डिस्टिंक्ट।

ये होती है ईगो और यह झूठ है, क्योंकि जिस प्रकृति में सब कुछ चल जाता है तुम्हारे हस्तक्षेप के बिना, उसमें तुम भी चल जाओगे, तुम्हारे ही जीवन में तुम्हारे हस्तक्षेप के बिना, और मौज में चलोगे, आनंद में जिओगे।

अहंकार कहता है, “नहीं, ये मेरी गाड़ी है, इसको मैं चलाऊँगा। आई विल बी द डूअर, द मूवर, द शेकर, द ओनर।” वो झूठी बात है, अहंकार एक झूठ है। बात आ रही है समझ में? और इसीलिए वो लगातार डरा हुआ रहता है। जब झूठ बोलते हो तो डर लगा रहता है न कहीं झूठ पकड़ा न जाए। अहंकार कहता है, “जैसे बाहर की व्यवस्था हमेशा से चलती रही है, वैसे ही मैं भी हमेशा के लिए हूँ।” और यह बात झूठ है और डरा रहता है। इसीलिए मौत से इतना डरता है क्योंकि जो चीज़ असली होती है वो ख़त्म नहीं हो सकती, रूप बदल सकती है बस।

पूरे यूनिवर्स में एक भी एटम ऐसा नहीं है जिसको आप ख़त्म कर सकते हैं। उसका आप रूप बदल दीजिए, किसी भी तरह से ट्रांसफॉर्म कर दीजिए, वो अलग बात है। पर अहंकार जानता है, वो ख़त्म हो जाएगा। इसीलिए मौत से इतना घबराता है, तो फिर वो अपने आप को बचाने के लिए, अपने आप को सुरक्षा देने के लिए, कवच की, संगति की, साथी की तलाश में रहता है। कुछ ऐसा मिल जाए, जिसका उपयोग करके, जिसका शोषण करके, अपने आप को ढक लूँ, बचा लूँ; बाहर ऐसा क्या है जिसको खाकर के मैं अमर हो जाऊँ। और वो अमर हो नहीं सकता क्योंकि वो एक झूठ है, तो इसीलिए फिर दुनिया में जो कुछ है, वो सब कुछ खा जाना चाहता है। उसे कोई इंसान मिलेगा, उसे खा जाना चाहेगा। उसे जानवर मिलेगा, खा जाएगा। जंगल मिलेगा, खा जाएगा। रुपया-पैसा मिलेगा, खा जाएगा। अपने एक-एक रिश्ते को खा जाएगा। धर्मग्रंथों को भी खा जाएगा।

वो सब कुछ खा जाएगा अपने झूठ को बचाने के लिए। उसकी पहली प्राथमिकता होती है आत्मरक्षा, और वो कितनी भी कोशिश कर ले सफल हो नहीं सकता; *हेंस, इट ऑलवेज़ फील्स इट इज़ मिसिंग आउट, * यह है फोमो। वो कितनी भी कोशिश कर ले, वो अपने आप को न सुरक्षित कर पाता, न शांत कर पाता, न तृप्त कर पाता, न पूर्ण कर पाता। हमेशा उसके लिए प्रतीक्षा बाक़ी रह जाती है, वो सतत इंतज़ार में है। इसीलिए आप लोग इतना भविष्य की ओर देखते हो आशा और कामना से भरे हुए, क्योंकि अहंकार का अर्थ ही है परपेचुअल वेटिंग।

जो चाहता है उसे कभी नहीं मिल सकता, इसीलिए उसे लगातार भविष्य की ओर देखना पड़ेगा। अपनी मौत के क्षण में भी उसे भविष्य की ओर देखना पड़ेगा, क्योंकि मिल तो उसे कभी कुछ सकता नहीं। क्यों नहीं मिल सकता? बाय डेफिनेशन भाई, झूठ है वो। तुम झूठ को सच कैसे बना दोगे? वो झूठ सच नहीं बन सकता, पर उस झूठ के भयानक दुष्परिणाम ज़रूर होते हैं, उन्हीं दुष्परिणामों में ये पूरी श्रृंखला है: फोमो, योलो, रीइन्कार्नेशन, पाखंड तरह-तरह के, उनसे जुड़े हुए शोषण। बात आ रही है समझ में?

और यह कहने आए थे, “वो तो हम जेनज़ी, अब एक नई स्पीशीज़ बन के उभरे हैं, होमो सेपियंस। ये तो जेनज़ी है न, तो ये हमारे जैसे थोड़ी हैं।” जहाँ जाता हूँ, वोीं, “हमारी तो लिंगो भी दूसरी है।” भाई, लिंगो दूसरी होगी, लिंग तो तभी भी दो ही हैं तुम्हारे, इंसान ही हो कोई नई प्रजाति नहीं खड़ी हो गई है। आ रही है बात समझ में?

जितना अपने आप को अलग मानोगे, उतना तुम्हारा अहंकार और बढ़ेगा, वो यही चाहता है। उसकी परिभाषा ही यही है न, “आई एम डिस्टिंक्ट। आई एम डिवाइडेड, आई एम सेपरेटेड।” यह भी अहंकार बढ़ाने का तरीका है। “मैं तो जेनज़ी हूँ।” लगभग वैसे ही जैसे बुड्ढे लोग बोलते हैं, “अजी हमारे वक़्त में ऐसा होता था, हम अंग्रेज़ों के ज़माने के टेलर हैं।” “अरे, तुम्हें क्या पता पुराने लोग कैसे होते थे!” वोी अहंकार है, जो पुराने लोगों में इस तरह आता है। “अरे, हमारे ज़माने में तुम्हें पता भी है, सब आठ-आठ फुट के होते थे और छह सौ साल जीते थे!” सुना है न ये सब? “और पुराने लोगों का पराक्रम तुम्हें क्या पता। अरे, तुम्हारे कुछ है ही नहीं। घी-दूध खाते नहीं, नाड़ा तुम्हारा ठीक नहीं। ब्रह्मचारी होना पड़ता है, पुराने लोग होते थे, उनका तो ओजस्-तेजस् देखते!”

तो जैसे वहाँ अहंकार पुरानेपन की आड़ ले रहा है, वैसे ही यहाँ पर अहंकार नएपन की आड़ ले रहा है। “हम तो जेनज़ी हैं।” तो? कुछ और हो गए हो क्या? वोी पुरानी सड़ी-सी चीज़ है, हर बच्चा जो पैदा होता है उसमें मौजूद होती है। क्या बोलते हैं उसको? ईगो। और ईगो वो नहीं, जिसका साधारण, प्रचलित, लोकधार्मिक अर्थ आप जानते हैं। मैं ईगो को बहुत टेक्निकल शब्द की तरह इस्तेमाल कर रहा हूँ। ईगो माने “आई-एम-नेस।” वो जब तक रहेगी, जब तक उसे परखा नहीं जाएगा, जाना नहीं जाएगा, जब तक उससे कड़े सवाल नहीं पूछे जाएँगे, वो भीतर-भीतर ख़ुद को ही खाती रहेगी।

ईगो माने एक हॉलो एक ज़बरदस्त वैक्यूम, जो पूरे यूनिवर्स को सक कर सकती है, और फिर भी वो वैक्यूम ही रहेगी। ऐसी वैक्यूम है ईगो। उसे सब कुछ दे दो, तो भी कोई फ़र्क़ नहीं पड़ना, क्योंकि वो एक झूठ है। लगभग वैसे ही जैसे ज़ीरो से कुछ भी मल्टिप्लाई कर दो उसे ज़ीरो ही रहना है। आ रही है बात समझ में? तो फोमो, योलो लेलो, देलो, जो भी है तुम्हारा उसका समाधान बस आत्मज्ञान ही है और कुछ नहीं है। कुछ और नहीं है। जब तक देखोगे नहीं कि तुम कौन हो, भीतर से कोई चिल्लाता रहेगा, “और चाहिए, और चाहिए! मैं डरा हुआ हूँ। मैं एंबिशियस हूँ। मेरी लाइक्स हैं, मेरी डिसलाइक्स हैं।” भीतर से कोई चिल्लाता रहेगा। जो चिल्ला रहा है, वो दुख भी भोग रहा है। दुख भोगता जा रहा है, दुख का अनुभव करता जा रहा है, पर जान नहीं रहा है कि दुख सारा उसकी मौजूदगी से ही आ रहा है।

तेरा दुख तभी हट सकता है, जब तू हट जाए। तू ख़ुद अपनी राह का काँटा है, हट।

तुम जो मानते हो, जो कुछ तुमने सोख रखा है, सीख रखा है, जिन चीज़ों में तुम्हारा गहरे से गहरा यक़ीन है वोी अहंकार की ख़ुराक है। बिलीफ़्स, पैटर्न्स, लाइक्स, डिसलाइक्स, लीनिंग्स, आइडियोलॉजीज़, यही हैं भीतर जो चिल्लाते रहते हैं। यही हैं जो पूर्ति के लिए कलपते रहते हैं और इन्हें पूर्ति मिलने नहीं वाली।

तरह-तरह से रोओगे फोमो के लिए, बच्चे रहोगे तो कहोगे, “खिलौना नहीं है,” फोमो। थोड़े बड़े हो जाओगे, कहोगे, “साइकिल नहीं है,” फोमो। थोड़े और बड़े हो जाओगे, तो कहोगे, “वीडियो गेम नहीं है, मोबाइल नहीं है,” फोमो। थोड़े और बड़े हो जाओगे तो कहोगे, “गर्लफ़्रेंड नहीं है, बॉयफ़्रेंड नहीं है,” फोमो। थोड़े और बड़े हो जाओगे, कहोगे, “डिग्री नहीं है, जॉब नहीं है।” और बड़े हो जाओगे, “बीवी नहीं है, बच्चा नहीं है।” फोमो लगा ही रहेगा, उसके ऑब्जेक्ट्स बदलते रहेंगे बस।

न जाने कितने ऐसे होते हैं, जो अपने मरने के समय का भी प्रबंध कराते रहते हैं। न जाने कितने बादशाहों ने मरने से पहले अपने मक़बरे तैयार करवा दिए थे कम-से-कम डिज़ाइन में। बोल रहे, “पड़ोस का जो बादशाह था उसका इतना बड़ा मक़बरा है, हम पीछे कैसे रह जाएँगे? आई कांट अफ़ोर्ड मिसिंग आउट।” उसे मौत में भी फोमो है, मौत में भी फोमो है। और फोमो का बड़ा तार्किक परिणाम होता है, योलो। योलो बनता है भोग। “आई ओनली लिव वंस।” जैसे तुमने कहा कि जल्दी-से-जल्दी सब भोग लो, कंज़्यूम, कंज़्यूम, कंज़्यूम, कंज़्यूम और वोी कंज़म्प्शन आज तुम्हारे सामने क्लाइमेट कैटस्ट्रॉफ़ी बनकर खड़ा हुआ है।

तुम सोचते हो, क्लाइमेट कैटस्ट्रॉफ़ी तुम ईवी का इस्तेमाल करके, कोई और ग्रीन मेज़र्स लेकर के हटा लोगे? नहीं हटने वाली। जब तक मनुष्यता के भीतर से ये ईगो क्राइसिस हटाई नहीं जाती, जब तक हमारी मूल समस्या का समाधान नहीं होता, तब तक तुम क्लाइमेट चेंज से नहीं लड़ सकते। क्लाइमेट चेंज योलो की ही अभिव्यक्ति है। “आई ओनली लिव वंस, सो आई वांट मोर। आई वांट मोर, आई वांट मोर।”

और तुम्हारी सारी जो वांट्स होती हैं, वो कार्बन-इंटेंसिव होती हैं। ज़िंदगी में एक-एक जो तुम्हारी एंबिशन है, देखो उसका कितना बड़ा कार्बन फ़ुटप्रिंट होने वाला है। तुम अपनी कोई ऐसी महत्वाकांक्षा नहीं बता सकते, जिसका इतना बड़ा कार्बन फ़ुटप्रिंट न हो। वास्तव में जहाँ ईगो है, वहाँ एमिशन होगा ही होगा, बार-बार बोलता हूँ; ईगो, इमोशन और एमिशन, ये बिल्कुल साथ-साथ चलते हैं। तो यो बन जाता है फिर क्लाइमेट क्राइसिस।

फ़िज़िकली* बनता है क्लाइमेट क्राइसिस, साइकोलॉजिकली बनता है रिइन्कार्नेशन, रिबर्थ, पुनर्जन्म। माने दुनिया भर की जितनी नालायकियाँ हैं, सब फूट-फूटकर बाहर आती हैं; कारण बस एक है, अनपरखा अहंकार। अहंकार को कारण नहीं बोल रहा हूँ, क्योंकि अहंकार तो जन्मगत होता है। पैदा हुए हो तो ईगो होगी। चलो, पैदा हुए तो ईगो थी। दोष इसमें है कि तुमने परखा क्यों नहीं उसको। और अब यह बात मुझे लेकर आती है इस शैक्षणिक संस्थान पर। हम शिक्षा के नाम पर बस बाहरी बातें ही कब तक बताते रहेंगे? एजुकेशन का मतलब “लर्निंग अबाउट दिस, दिस, दिस” यही कब तक रहेगा? असली क्राइसिस तो यहाँ है, विदिन। कब वो एजुकेशन मिलेगी, जो हमें हमसे मिलवाएगी? वो कोर्सेज़, वो सब्जेक्ट्स, वो चैप्टर्स कब होंगे, जिनका शीर्षक हो, “आई, सेल्फ, मी?”

सब जानना ज़रूरी है, पर जान कौन रहा है, ये जानना ज़रूरी नहीं है? नहीं है? पूछ रहा हूँ। पर न तो स्कूल में बताया गया और न अब कॉलेज में बताया जा रहा है। तो नतीजे में वोी सब होगा, योलो, येलो, जो भी है तुम्हारा। क्लाइमेट क्राइसिस के लिए अनपढ़ लोग ज़िम्मेदार नहीं हैं, जो सबसे ज़्यादा पढ़े-लिखे हैं, वोी पृथ्वी को तबाह कर रहे हैं। क्योंकि उन्होंने सब कुछ पढ़ा है, ख़ुद को नहीं पढ़ा है। उनको नहीं पता उनकी एंबिशंस कहाँ से आ रही हैं, पर वो एंबिशियस बहुत हैं। पूछो कि, “अच्छा, तुझे क्यों चाहिए वो?” बता नहीं पाएँगे। उनके पास ड्रीम्स हैं। उनसे पूछो, “तुम्हारी ड्रीम्स तुम्हारी अपनी हैं क्या, या किसी और की बात को अपनी ड्रीम बना लिया है?” उन्हें नहीं पता। आ रही है बात समझ में कुछ?

अपने आप को देखना शुरू करो। फिर थोड़ा अटपटा लगता है, थोड़ा ग़ुस्सा भी आता है, थोड़ा ताज्जुब भी होता है और थोड़ी हँसी भी आती है। यही है ख़ुद को जानना। और जो यह जानने लग जाता है, वो बहुत तरह की बीमारियों से आज़ाद होने लग जाता है।

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
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