FOMO सोने नहीं देता, YOLO जीने नहीं देता - क्या करे Gen Z?

क्या सचमुच FOMO और YOLO सिर्फ़ Gen Z की समस्या हैं, या ये मनुष्य के पुराने डर के नए नाम हैं? जब भीतर खालीपन हो, तो बाहर की हर चीज़ छूटती हुई लगती है। फिर जीवन एक दौड़ बन जाता है, जहाँ “और चाहिए” कभी ख़त्म नहीं होता। समस्या वस्तुओं की कमी नहीं, उस अहंकार की है जो हमेशा अधूरा महसूस करता है। जब तक स्वयं को नहीं जानोगे, तब तक हर चाह एक नई बेचैनी बनती रहेगी।
यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।
प्रश्नकर्ता: गुड इवनिंग सर। माय नेम इज़ युवराज शाह। करेंटली, आई एम अ सेकंड ईयर सिविल इंजीनियरिंग स्टूडेंट। सर, हम जेनज़ीज़ में न आजकल एक शब्द बहुत ज़्यादा प्रचलित है, फोमो करके। “फोमो” अर्थात “फियर ऑफ मिसिंग आउट।” मतलब सर, हम हमेशा हमारी लाइफ़ को बाक़ी लोगों से कंपेयर कर रहे होते हैं और इससे अननेसेसरिली इन्फ्लुएंस हो जाते हैं कि ये अपने स्टार्टअप पर काम कर रहा है, ये अपनी स्किल्स को आगे बढ़ा रहा है, ये घूमने जा रही है, वो कर रहा है, ये कर रहा है। तो सर, इसके चक्कर में हम हमारी लाइफ़ के पर्पस से भटक जाते हैं।
और सर, ये शब्द से हम बाहर आए नहीं होते कि एक और शब्द आ जाता है, “योलो” करके, मतलब “यू ओनली लिव वन्स।” मतलब मुझे ज़िंदगी के सारे सुख-दुख एक साथ प्राप्त करने हैं। “आई वांट एवरीथिंग इन लाइफ़” और मुझे वो अभी चाहिए। तो सर, आप ही बताएँ, मतलब इसमें से कौन-सी फिलॉसफ़ीज़ पर लाइफ़ जीनी चाहिए?



