जब 'मोह-माया' कहते हैं, तो मोह से आशय होता है कि भीतर एकदम कोहरा फैल गया है, और माया से आशय होता है कि बाहर अब कुछ साफ़ दिखाई नहीं दे रहा। मोह माने जादू, जैसे किसी ने आपकी बुद्धि पर पर्दा डाल दिया हो। और जब बाहर सब धुंधला दिखाई देने लगता है, तो उसको कहते हैं — माया। आमतौर पर बाहरी चीज़ों को माया माना गया है, इसीलिए भीतर वाली माया को मोह कह दिया गया; नहीं तो मोह भी माया ही है।
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प्रश्नकर्ता: नमस्ते सर। मेरा एक फ्रेंड है, तो उससे बात होती है तो वो हर चीज़ में ‘मोह-माया’ कहता है, कि ‘ये सब मोह-माया है।’ तो फिर एक दिन मैंने पूछा, ‘माया है क्या? मोह है क्या?’ तो वो चुप हो गया, कुछ बोला ही नहीं। फिर उसने मुझसे पलटकर पूछा, कि ‘मोह क्या है?’ तो उस चीज़ में मैं भी कुछ नहीं बता पाया ऐक्युरेट। तो आपसे जानना था कि मोह और माया है क्या एक्ज़ैक्टली?
आचार्य प्रशांत: मोह माने जादू। मोह माने, जैसे किसी ने आपकी चेतना, आपकी बुद्धि पर पर्दा डाल दिया हो, उसको मोह कहते हैं। और माया चूँकि पारंपरिक रूप से बाहरी चीज़ों को बोला गया, तो इसलिए जब बाहर सब धुंधला दिखाई देने लगता है, तो उसको कहते हैं माया।
अंदर धुंध का छा जाना है, मोह। मोह है मन पर धुंध का छा जाना, जैसे किसी को नशा हो गया हो। मोह माने एक आंतरिक नशा, भ्रम की स्थिति, एक अचेतन आंतरिक स्थिति। इसको कहते हैं मोह, चार्म, डिल्यूज़न। जैसे परवश हो गया हो मन; ये मोह है, एनचैंटमेंट।
समझ में आ रही है बात?




