प्रदूषण केवल जानकारी की कमी से नहीं, बल्कि गलत इरादों, सुविधा-प्रियता और गैर-जिम्मेदारी से पैदा होता है। लोग प्रदूषण के बारे में जानते हुए भी उसे बढ़ाते हैं क्योंकि ज्ञान अपने आप में पर्याप्त नहीं है। नदियों, हवा और पर्यावरण को सचमुच स्वच्छ बनाने के लिए पहले मन और नीयत को स्वच्छ करना आवश्यक है। बाहरी गंदगी अक्सर भीतर की अव्यवस्था और असंवेदनशीलता का ही विस्तार होती है।
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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मेरा एक क्वेश्चन है। जो ये रिवर की बुक में मैंने एक चीज़ सीखी। जो ये लोग हैं न, मेरे प्रयागराज में एक संगम है, वहाँ पर बहुत सारा पॉल्यूशन होता है, उसके अंदर बहुत सारी पन्नी पड़ी रहती हैं। उसके अंदर बहुत सारी पन्नी पड़ी रहती हैं और वो अंदर तैरती रहती हैं पूरा। पूरा ऐसा पॉल्यूशन होता रहता है।
आचार्य प्रशांत: तुम्हें रोकना है। तुम्हें समझना है वो सारा जो बाहर का पॉल्यूशन है, वो भीतर की गंदगी से आता है। भीतर की गंदगी तुम्हें हटानी है, तभी बाहर का पॉल्यूशन रुकेगा। ठीक है? नियम-कायदे होने चाहिए, उनसे मदद मिलती है। लेकिन सिर्फ़ नियम-कायदों से पॉल्यूशन अगर रुकता होता, तो सबसे तगड़े नियम-कायदे तो वेस्ट में हैं और वो दुनिया के सबसे बड़े पॉल्यूटर्स हैं। नियम-कायदों से बस इतना होता है कि जहाँ नियम बना होता है, वहाँ पॉल्यूशन नहीं करते, अपना पॉल्यूशन आप जाकर कहीं और कर देते हो इनडायरेक्टली। ठीक है?




