
प्रश्नकर्ता: मैं हमारे जो युवा हैं, उनके जो प्रश्न रहते हैं, उनके मन में जो विचार रहते हैं, उनकी जो उलझनें हैं, उसको लेकर पूछना चाहती हूँ कि अक्सर ये होता है कि हमारी जब सुबह होती है, तब हम लोगों के बीच में रहते हैं। हमारा सोशल मीडिया होता है। बट जब एक वक़्त आता है, जब हम खुद को अकेला महसूस करते हैं, तो उस अकेलेपन को किस तरह से कम कर सकते हैं? क्या कुछ उस पर विचार है?
आचार्य प्रशांत: देखिए, हमें अकेलापन नहीं अनुभव होता। हमें एक मान्यता, एक आशा का दर्द अनुभव होता है।
एक सवाल पूछ रहा हूँ। आप छह घंटे, आठ घंटे सोते हो। उस वक़्त कोई अकेलापन लगता है क्या? कोई लगता है अकेलापन? पर जैसे ही जगते हो, एक आशा, कामना, मान्यता रहती है कि मेरे पास कोई या कुछ होना चाहिए। ये अभी सोते वक़्त नहीं थी। सोते वक़्त अहंकार दूसरी अवस्था में चला गया था, सुषुप्ति में था। सुषुप्ति में था, तो लोनलीनेस या अकेलापन भी नहीं था।
अब वो जागृत है और एक मान्यता सक्रिय हो गई है। वो मान्यता उसने कहाँ से उठाई, वो आप सोचिएगा। पर सक्रिय हुई है ये मान्यता कि मेरे पास कोई या कुछ होना चाहिए। और मेरे पास कोई या कुछ क्यों होना चाहिए? क्यों होना चाहिए? क्योंकि मैं अकेला हूँ, अधूरा हूँ। मैं अधूरा हूँ, तो इसलिए मेरे पास कुछ होना चाहिए, जो मुझे पूरा कर दे। ठीक है?
लोनलीनेस इसी भाव का नाम है न, मैं अधूरा हूँ, मुझे कोई मिल गया, तो मैं पूरा। जो मिल गया, वो व्यक्ति हो सकता है, वस्तु हो सकती है, विचार भी हो सकता है, कुछ भी हो सकता है, कोई भी विषय। पर परिभाषा तो यही है न अकेलेपन की, लोनलीनेस की। अब ये छोटी-सी बोतल है, ये अहंकार है, इसकी अपने बारे में मान्यता ये है कि मैं इतना ही भरा हुआ हूँ। थोड़ा है, थोड़े की ज़रूरत है। मैं इतना हूँ, अब मुझे इतना चाहिए। अब कोई इसमें रुपए भरेगा, कोई कार भरेगा, कोई घर भरेगा, कोई लड़की भरेगा, कोई लड़का भरेगा, कोई विदेश-यात्रा भरेगा, कोई डिग्री भरेगा, कोई ज्ञान भरेगा, कोई चुनाव लड़ेगा, कोई कुछ करेगा। पर ये खालीपन है, ये खालीपन है। और इसी खालीपन को मान्यता देने को, इसी खालीपन को सच मान लेने को अकेलापन कहते हैं।
अकेलापन दूसरे की कमी से नहीं आता। अकेलापन इस भाव से आता है कि मैं अधूरा हूँ।
क्योंकि अगर आप अधूरे नहीं हैं, तो दूसरे को लाकर के यहाँ भरने की फिर कोई ज़रूरत भी नहीं है। दूसरे को लाकर भरने की ज़रूरत ही मूल रूप से इसलिए पैदा होती है, क्योंकि अहंकार की परिभाषा में ही ये भाव है कि मैं अपूर्ण हूँ। मैं अधूरा हूँ, मैं अधूरा हूँ, मैं अधूरा हूँ। और जब तक आप भीतर उस अधूरेपन को पालते रहेंगे, तब तक आप बाहर भिखारी ही बनकर दौड़ते रहेंगे, “तू मेरे साथ आ जा, तू मुझे कुछ दे दे, तू मेरा घर भर दे, तू मेरी ज़िंदगी भर दे।”
मज़ेदार बात क्या है? ये (पानी की बोतल को इंगित करते हुए) भरने नहीं वाला। बताओ, क्यों नहीं भरने वाला? क्योंकि इसकी परिभाषा है कि तू ऐसा है। अगर ये भर गया, तो ऐसा नहीं रहेगा, अगर ये ऐसा नहीं रहेगा तो मर जाएगा। ये है ही तभी तक, जब तक ये अधूरा है। अहंकार सिर्फ़ तब तक है, जब तक वो आधी बोतल है, अगर किसी तरीके से पूरी बोतल हो गया तो वो मर जाएगा। अहंकार माने आधी बोतल। पूरी बोतल माने मर गया अहंकार, हो गई मुक्ति।
तो आप बाहर से कुछ भी ले आ लो, इसमें कितना भी डाल दो, ये भरने वाला नहीं है, नहीं है, नहीं है। तो अकेलापन रहेगा, रहेगा, रहेगा। और अकेलापन अपने आप में कोई बीमारी नहीं है, बीमारी है आंतरिक अज्ञान। वो आंतरिक अज्ञान जब तक है दुनिया का हर आदमी अकेला है, और बहुत खा जाता है वो अकेलापन। आपने कहा न कि आप जब दिन में काम में रहती हैं, दूसरों के साथ रहती हैं, तो अकेलापन उतना नहीं पता चलता। और जब अकेले होते हैं, तो अकेलेपन का अनुभव होता है। इससे एक बदतर हालत बताऊँ?
उससे बदतर हालत ये है कि आप सौ लोगों से घिरी हुई हैं। और ये सौ लोग आपके परिवार के हो सकते हैं, प्यार के हो सकते हैं, दोस्त हो सकते हैं, यार हो सकते हैं, और आप तब भी अकेली हैं। क्योंकि ये अकेलापन जाने का नहीं है। अभी ये बीमारी की आरंभिक अवस्था है कि जब लोनलीनेस लगी तो लोगों के पास चले गए, तो थोड़ी देर के लिए लोनलीनेस दूर हो गई। ये अभी बीमारी का शुरुआती चरण है। यही बीमारी, अगर आप इसका उपचार नहीं करेंगी, उपचार यहाँ (अपने भीतर) होगा, इसका नहीं करेंगी उपचार, तो ये बीमारी ऐसी हो जाएगी कि आप अपने सबसे निकट मित्रों के साथ हो सकती हैं और तब भी अकेलापन अनुभव होता रहेगा।
और ख़ौफ़नाक बात बताऊँ? जो आपको जीवन में सबसे प्यारा है, आप उससे गले लगे हुए हैं और तब भी अकेलापन अनुभव हो रहा है। ये भी हो सकता है और होता है, और अब क्या करोगे? किसी को बता भी नहीं सकते। क्योंकि किसको बताओगे? जो तुम्हारा सबसे प्यारा है, उसी को बताओगे और उसी की मौजूदगी में तो अकेलापन है। वो अपमान मानेगा, भाग जाएगा। वो कहेगा, “ये गले मिलने की बात नहीं है। ये तो गला दबाने की बात हो रही है, भागो यहाँ से।”
बात आ रही है समझ में?
क्योंकि अकेलेपन का प्राथमिक संबंध बाहर की किसी चीज़ के होने या न होने, मिलने या न मिलने से नहीं है। अकेलेपन का प्राथमिक संबंध भीतर की इस भावना से है कि मैं अधूरा हूँ। हमारे सारे रिश्ते इसी अधूरेपन से निकलते हैं, इसीलिए व्यर्थ जाते हैं। हमारी सारी चाहतें, हमारा सारा श्रम, हमारे सारे लक्ष्य इसी अधूरेपन से निकलते हैं, इसीलिए व्यर्थ जाते हैं।
क्या सचमुच मैं अधूरा हूँ? अब यहाँ से शुरुआत करनी चाहिए। अकेलेपन के जो शिकार हैं, उन्हें ये सवाल पूछना चाहिए, “क्या सचमुच मैं अधूरा हूँ?” मुझे कैसे पता मैं अधूरा हूँ? अच्छा, कैसे पता? हाँ, भाव उठता है लगातार कोई कमी, कुछ खोखला-सा, एक वॉइड यहाँ अनुभव होता रहता है। पर वो क्या चीज़ है? वो कहाँ से आ गई? कहीं ऐसा तो नहीं कि मुझे बता दिया गया है कि ज़िंदगी में इतने लोग लेकर के आओ, और वो लोग नहीं हैं तो मैं अपने आप को अकेला मान रही हूँ? कहीं ऐसा तो नहीं?
कहीं ऐसा तो नहीं कि मनोहर कहानियाँ ज़्यादा पढ़ ली हैं या फ़िल्में ग़लत क़िस्म की देख ली हैं? कहीं ऐसा तो नहीं कि परिवार और परवरिश ही ऐसे थे जिसमें कहा जाता था कि अगर कोई अकेला चल रहा है तो अशुभ है? लोगों को जोड़ों में ही बुलाना। अरे, तो फिर प्रकृति चार टाँगें देकर पैदा करती न! दो नाक होनी चाहिए थी।
कहीं ऐसा तो नहीं कि अकेलापन अहंकार के ऊपर थोपी हुई मान्यताओं से और बढ़ रहा है? कहीं ऐसा तो नहीं कि अपने आसपास के लोगों को देखती हूँ, वो सब झुंड में हैं, गिरोह बनाकर घूम रहे हैं। या कम से कम जोड़ा, वो गिरोह की शुरुआत होती है। और मुझे लग रहा है, मैं ही ऐसी रह गई अभागी। इसका भी जोड़ा, उसका भी झुंड, उसका दल, उसका गिरोह, और मैं? मुझे भी गैंग चाहिए। कहीं ऐसा तो नहीं?
आप क्यों मान रहे हो कि अकेलापन स्वाभाविक है? वो स्वाभाविक कम है शारीरिक है थोड़ा और बाक़ी सामाजिक है। आपको दुनिया ने ऐसा होना सिखा दिया है कि तुम अधूरे हो।
ये पूरा कॉन्सेप्ट ही झूठा है, इसको यहाँ से निकाल के इस बोतल को बाहर फेंक दीजिए। ये जो आपको इनर मॉडल दिया गया है, ये इनएक्युरेट है। ये ग़लत है। यहाँ कोई अधूरापन नहीं है। और आप सोचो कि बाज़ार का कितना बड़ा स्वार्थ होगा आपके भीतर इसी मॉडल को स्थापित रखने में। क्योंकि अगर आपके पास ये अधूरापन है और आपने इसको मान्यता दे रखी है, तो आप दिन-रात क्या करोगे, मालूम है? आप खरीदोगे। बाज़ार चाहती है कि आप अकेला अनुभव करो। अकेला आदमी ज़्यादा शॉपिंग करता है, ज़्यादा खाना खाता है।
आप भीतर से जितने व्यथित होते हो, उतना ज़्यादा आप कहीं शॉपिंग मॉल में भटकते नज़र आते हो। उतना ज़्यादा आप टूरिज़्म के लिए भागते हो, उतना ज़्यादा आप पार्टिज़ की तरफ भागते हो। बाज़ार चाहेगा कि आप इस मॉडल को एक इनर वैलिडिटी देते रहें। मत दीजिए, ये अमान्य है, इसको ठुकरा दीजिए।
आपको पूरापन चाहिए। इस वाक्य को ऐसे पढ़िए, मुझे अधूरापन नहीं चाहिए।
यहाँ तक साथ हैं? ऐसे कहिए, “अधूरापन नहीं चाहिए।” अधूरापन हटाने के दो तरीके हो सकते हैं, एक तो ये कि इसको भरने की कोशिश करते रहो जीवन भर। ये इतनी खाली है बोतल। अधूरापन नहीं चाहिए न? नहीं चाहिए न? लगता है चाहिए।
श्रोता: नहीं चाहिए।
आचार्य प्रशांत: ठीक है। अधूरापन नहीं चाहिए, तो एक तरीका तो ये है कि इसको उम्र भर भरने की कोशिश करते रहो। यही आम आदमी करता है, अपने अधूरेपन को हर तरीके से भरने की कोशिश। एक और तरीका भी है। बताओ क्या?
दूसरा तरीका ये है कि यही थी न खाली? (बोतल को फेंक देते हैं)। बताओ, कहाँ है अधूरापन? कहाँ है अधूरापन?
आपको पूरापन नहीं चाहिए, आपको अधूरापन अखरता है। समझो, तुम्हें पूरापन नहीं चाहिए, तुम्हें अधूरापन अखरता है। अधूरापन हटाने के लिए या तो व्यर्थ कोशिश करते रहो जीवन भर इसको भरने की, शादी हो जाए, बच्चे हो जाएँ, पैसा आ जाए, इज़्ज़त मिल जाए। तो ये तरीका है इसको भरने का, या तो उम्र भर लगे रहो इसमें व्यर्थ।
दूसरा तरीका ये है कि इस मॉडल को ही ठुकरा दो। कह दो, “अधूरापन हटाने की ज़रूरत तो तब पड़ेगी न, जब अधूरापन होगा। कोई अधूरापन नहीं है। मैं इस मॉडल को ही अस्वीकार करती हूँ।” कैसे अस्वीकार किया जाता है? जो भीतर अधूरा बैठा है, उसको जान करके। वही आत्मज्ञान है, उसके बिना लोनलीनेस नहीं जाती। जैसे-जैसे आप इसको जानना शुरू करते हो, ये अहंकार है, जैसे-जैसे इसको जानना शुरू करते हो आप वैसे-वैसे आपको दिखने लगता है, ये कितना फ़र्ज़ी है। जब ये फ़र्ज़ी है, तो ये दिल से बाहर आ जाता है, यहाँ पहुँच जाता है। अब आप अधूरे ही नहीं हो, तो पूरे होने की ख़्वाहिश कैसी।