बागी Gen Z: डेटिंग ऐप्स, कुंडली और इश्क़ वाला लव

Acharya Prashant

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बागी Gen Z: डेटिंग ऐप्स, कुंडली और इश्क़ वाला लव
डेटिंग ऐप, कुंडली मिलान और “मेरी पसंद” जैसी धारणाएँ अक्सर प्रेम नहीं, बल्कि डर, सामाजिक कंडीशनिंग और अहंकार से संचालित होती हैं। परंपरा के दबाव में किया गया चुनाव और केवल व्यक्तिगत पसंद पर आधारित चुनाव, दोनों ही भ्रमित हो सकते हैं। सच्चा प्रेम तब संभव होता है जब व्यक्ति स्वयं को जाने और ऐसा संबंध चुने जो उसके बंधनों, भय और अहंकार को चुनौती देकर उसे भीतर से मुक्त करे। यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, मेरा नाम आशना है और मेरा जो सवाल है, वह डेटिंग ऐप से रिलेटेड है। अभी एक डेटिंग ऐप एक फीचर लेकर आया है जिसमें राशि के थ्रू आप अपना पार्टनर चुन सकते हैं। तो मेरा सवाल यह है कि हमें डेटिंग ऐप की ज़रूरत ही क्यों है? और साथ ही साथ, जब हम आमने-सामने ही सहजता से बात नहीं कर पाते हैं, तो फिर डेटिंग ऐप पर पीछे से छुप-छुपकर बात क्यों करते हैं? आपने हमेशा समझाया है कि प्यार जो है, सच्चा प्रेम जो है, उसकी बुनियाद जो है, वह सच्चाई होती है। तो फिर ये कुंडली वग़ैरह मिलाना, इसके पीछे क्या मनोविज्ञान है? क्या हम सचमुच सच्चा प्यार ढूँढ़ रहे हैं या मतलब हमारे फ़ैसलों का दोष किसी और पर डालने का ये बहाना है एक?

आचार्य प्रशांत: ये राशि कौन है? मुझे नहीं मालूम, आपकी दुनिया है बहुत अजीब है। सवाल सुनकर थोड़ी देर के लिए तो मैं सकते में आ जाता हूँ कि जवाब शुरू कहाँ से करूँ। कहते हैं, प्यार में कोई तीसरा बीच में नहीं आना चाहिए। आपका कुछ नाम है, आपका नाम है आशना। ठीक है उसका नाम है राहुल। ये बीच में राशि कौन आ गई? क्या आशना राशि को बर्दाश्त करेगी? क्या करना चाहिए?

श्रोता: नहीं।

आचार्य प्रशांत: ये दो के बीच में तीसरा कौन आ गया? और देखो, कितनी व्यर्थ शुरुआत करनी पड़ रही है जवाब की, क्योंकि मुझे समझ में नहीं आता मैं जवाब क्या दूँ। कैसी तो आपने दुनिया बनाई है, और राशि तो आई ही आई, अपनी फूफी कुंडली को भी साथ लाई। अब कोई मुझे बताए, ये कुंडली कौन है?

हम कौन हैं? हम कैसे लोग हैं? हम क्या कर रहे हैं? हम ज़िंदा हैं या बस बेहोशी में चल रहे हैं? यह क्या चला रखा है हमने? सूर्य, नक्षत्र, चाँद, तारे, आकाश गंगाएँ, सारी वो एक निश्चित नियम पर चलते हैं, वो नियम आपको विज्ञान बता देता है। वहाँ तक बिल्कुल ठीक है। वो गणनाएँ विज्ञान की हैं, वो बिल्कुल ठीक बात है। आप गणना करके बिल्कुल बता सकते हो कि किस दिन, उदाहरण के लिए, पृथ्वी और मंगल ग्रह के बीच में दूरी सबसे कम होगी। ठीक है? आप बता सकते हो।

व्यापक तौर पर आप कहोगे वो क्षेत्र फ़िज़िक्स का है, और और ज़्यादा उसको पिनपॉइंट करके कहोगे कि, साहब, ये जो है, ये एस्ट्रॉनॉमी है, कॉस्मोलॉजी है। ये काम विज्ञान का है, बिल्कुल हम जान सकते हैं कि किस तरीके से अपनी धुरी पर, अपनी कक्षाओं में, अपने ऑर्बिट्स में, ये जितनी सेलेस्टियल बॉडीज़ होती हैं, या आकाशीय पिंड, ये कैसे गति करते हैं बिल्कुल जाना जा सकता है, क्योंकि उसके नियम हैं, भाई। वैज्ञानिक नियम हैं, इक्वेशंस हैं, आपने पढ़ी हुई हैं। जिन्होंने बहुत आगे तक नहीं पढ़ा, उन्होंने भी केप्लर लॉ के नियम पढ़े होंगे। हम जानते हैं, वहाँ पर मामला क्या रहता है।

यहाँ तक तो ठीक है मामला। अब उसके आगे यह कहाँ से आ गया कि जब बृहस्पति यहाँ होगा और शुक्र यहाँ होगा, तो आपका भाग्य फिर यहाँ होगा? उसका आपकी ज़िंदगी से कुछ ताल्लुक है यह बात कहाँ से आ गई? और कैसे आ गई? और कोई लेना-देना नहीं, कोई ऊटपटाँग बिल्कुल, न सिर, न पैर। एक इंसान की ज़िंदगी पर चाँद का क्या असर पड़ जाएगा, और वहाँ शनि का क्या असर पड़ जाएगा? हाँ, ख़ूबसूरत ग्रह है शनि, देखने में सबसे बढ़िया लगता है, सबसे सुंदर। रात में आप देखोगे आसमान को, तो सैटर्न ही लगेगा। वहाँ तक तो बात ठीक है। पर वो शनिचर वहाँ आसमान में क्या कर रहा है, इससे आपकी ज़िंदगी में शनिचर लग गया? ये क्या है? ये क्या है? और मैं क्या जवाब दूँ इसका?

जवाब आप दीजिए कि आप इन बातों को मानते क्यों हो? मेरे लिए तो इन बातों का खंडन करना भी एक तरह का अपमान है अपने प्रति। कोई बात कुछ दम रखती हो तो मैं उसका खंडन भी करूँ। जो बात बिल्कुल बेतुकी, बिना सिर-पैर की है, जिसमें न कोई तुक, न तर्क, न अर्थ, उस बात का मैं खंडन भी क्या करूँ? आप बताओ न मुझे, आप इन बातों को मान कैसे लेते हो? और उनको मानने के पीछे आपके पास न वैज्ञानिक कारण है, न धार्मिक कारण है।

बताता हूँ आपको, इन बातों को मानने के पीछे आपके पास बस मनोवैज्ञानिक कारण है। और मनोवैज्ञानिक कारण है डर, आप डरे हुए हो। विज्ञान तो कहता ही नहीं कि ऐसा कुछ हो सकता है। अध्यात्म भी नहीं कहता कि ऐसा कुछ हो सकता है कि राहु-केतु आकर के आपकी दुकान में आग लगा देंगे, या आपका धंधा गिरा देंगे। धर्म भी यह नहीं कहता। विज्ञान भी नहीं कहता, धर्म भी नहीं कहता। ऐसा बस डर कहता है, ऐसा बस अज्ञान कहता है। और हम में से ज़्यादातर लोग न विज्ञान पर चलते हैं, न धर्म पर चलते हैं। बस डर पर चलते हैं, इसलिए ये सब चीज़ें चल रही हैं।

कोई आपसे कहे कि सिद्ध करो कि ऐसा कुछ नहीं होता, आपको जवाब देना ही नहीं चाहिए। आपको कहना चाहिए, “तुम सिद्ध करोगे कि ऐसा कुछ होता है। तुम सिद्ध करोगे ऐसा कुछ होता है, यहाँ पर सिद्ध करके दिखाओ सबूत, तथ्य, तर्क, प्रमाण के साथ, कि बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि, राहु, केतु; इनसे एक इंसान की ज़िंदगी पर कोई फ़र्क़ पड़ सकता है। लो, सिद्ध करके दिखाओ।” तुम दिखाओ न, क्योंकि दावा तुम्हारा है। ये बेतुका, बेसिर-पैर का, ऊटपटाँग, अनर्गल दावा तुम कर रहे हो, तो तुम सिद्ध करोगे कि ऐसा कुछ हो सकता है। हम काहे को कुछ सिद्ध करें?

आप मुझसे कहो, उदाहरण के लिए, कि सिद्ध करो कि कपाड़पोटा मीठा नहीं होता। मैं सिद्ध कर ही नहीं पाऊँगा। बताओ क्यों? क्योंकि कपाड़पोटा कुछ है ही नहीं। तो एक ही जवाब आपको दे सकता हूँ, तुम सिद्ध करो कि कपाड़पोटा मीठा होता है। मैं कैसे साबित करूँ कि कपाड़पोटा मीठा नहीं होता? वैसे ही ये सवाल आ जाता है कि, “नहीं, आप ज़रा साबित करके दिखाइए। ये कुंडली वग़ैरह से कुछ नहीं होता।” कपाड़पोटा मीठा नहीं होता। तुम साबित करो न कि कुछ होता है। तो साबित करने के लिए क्या करेंगे? कहेंगे, “आपको पता है? हमारी मौसी के दादा की बेटी की फूफी का चाचा का पड़ोसी को बताया गया था कि फलाने दिन की फलानी रात को, जब चाँद निकलेगा और चाँद के नीचे तारे टिमटिमाएँगे, तब तुम्हारे व्यापार में एक घाटा हो जाएगा।” और हो गया।

अगर ऐसा कुछ होता, तो तुझे इतनी दूर जाकर काहे को बताना पड़ता, अपनी ज़िंदगी से बता दे। और अपनी ही नहीं, फिर सबकी ज़िंदगी से बता दे। क्योंकि अगर नियम है, तो सबके ऊपर लागू होगा, फिर कोई अपवाद नहीं होगा। फिर यह नहीं होगा कि सौ में से कोई एक मामला उठाया और उसकी डुगडुगी बजा रहे हैं। कह रहे हैं, “देखो, वहाँ पर हमें पंडित जी ने बताया और ऐसा हो गया।” यह भी तो बताओ कि पंडित जी ने सौ लोगों को बताया, उसमें से निन्यानवे के साथ कुछ नहीं हुआ। एक के साथ तो तुम बता दो, तब भी हो जाएगा।

सौ लोगों को पकड़ो और सौ के सौ को एक ही बात बता दो कुछ भी, “एक साल में तेरी शादी हो जाएगी।” ऐसी सड़क पर निकल पड़ो। जो मिले, उसी को बोलो, “एक साल में…” जिनकी हो गई, उनको भी बोलो। सौ में से एक तो तुम्हारा पड़ ही जाएगा। और बस ये सबको बता देना कि, “ये देखो, यूँ ही चलते-चलते बस हमने उसका मुखमंडल पढ़ लिया और घोषणा कर दी कि ऐसे-ऐसे हो जाएगी। आज से हमारा नाम है ‘भविष्यम् सरकार’।” बस, हो गया। और जहाँ डर होगा वहाँ प्रेम हो सकता है क्या? डर और प्रेम साथ चल सकते हैं?

तो जहाँ कुंडली मिलाकर के काम हो रहा है, वहाँ तो पहले ही पता है कि इस रिश्ते में कभी प्रेम नहीं होगा। हाँ, दहेज हो सकता है; हाँ, मान्यताएँ हो सकती हैं; हाँ, वर्जनाएँ हो सकती हैं; हाँ, संस्कार क़िस्म की कुछ चीज़ें हो सकती हैं; हाँ, आसक्ति भी हो सकती है; हाँ, कामनाएँ हो सकती हैं; हाँ, लेन-देन हो सकता है, प्रेम नहीं हो सकता।

क्योंकि जिस रिश्ते की शुरुआत ही अज्ञान और डर से हुई है, उसमें प्रेम तो कभी भी नहीं होगा। होगा ही नहीं।

भारत हो और प्रेम हो, बड़ा मुश्किल है। कहते हुए दर्द हो रहा है क्योंकि स्वयं भी भारतीय हूँ। जहाँ डर इतना ज़्यादा हो वहाँ प्रेम कैसे आएगा? प्रेम तो सबसे पहले निर्भयता माँगता है। जहाँ दहेज भी कुंडली मिलाकर के लिया जाता है, वहाँ आप उम्मीद करते हो कि प्रेम होगा? हा हा हा…! और जेन-ज़ी थोड़ा आगे निकल गई है, वो कुंडली बाद में मिलवाती है पहले हॉबीज़ एंड इंटरेस्ट्स एंड पैशंस मिलवाती है डेटिंग ऐप्स पर। ये नए तरीके की कुंडलियाँ हैं, ये कुछ आगे नहीं बढ़ गए। भीतर जो मनोवैज्ञानिक मशीन काम कर रही है, ये वही है बिल्कुल पुरानी। पुराने लोग भी प्रेम के अलावा कुछ और मिलाते थे। जो आपकी जेन-ज़ी है वो भी प्रेम के अलावा कुछ और मिलाती है।

अच्छा चेहरा पसंद आ रहा है कि नहीं आ रहा है? अच्छा पॉलिटिकल ओपिनियंस मैच कर रहे हैं कि नहीं? आमतौर पर तो सेक्सीनेस से काम चल ही जाता है। पर कोई इंटेलेक्चुअल हो, तो वह थोड़ा आगे जाकर पूछेगा कि, “किताबें कौन-सी पढ़ते हो?” तो उसके लिए चैटजीपीटी है। “Chat, tell me five books to sound intellectual.” और फिर उसने यह भी पूछ लिया आगे कि, “अच्छा, फलानी तुमने पढ़ी है? मेरी भी पसंदीदा है। इसमें तुम्हें क्या पसंद है?” “Chat, give me a quick summary of फलानी book.” खट से चिपका दिया।

जो काम पिछली पीढ़ी कुंडलीबाजी में कर रही थी, वो आपकी पीढ़ी एस्ट्रोबाज़ी, ऐप्स चलती हैं उसकी भी। कई बार तो एस्ट्रो और डेटिंग ऐप्स एक में ही रहती हैं कि डेटिंग करने जाओ, वहीं पर बटन है, “Match Astro”। सब कुछ एक साथ हो जाएगा। वो बोलेगा, “लाल छड़ी मैदान खड़ी, और एस्ट्रो में, बनी रहूँगी पापा की परी।” कुछ भी नहीं बिगड़ा, दोनों हाथों में लड्डू हैं। परंपरा भी नहीं छूटी और मॉडर्न भी कहला गई।

“आधुनिक होने के लिए अंधविश्वास त्यागना ज़रूरी थोड़ी होता है।” क्या ग़ज़ब की बात कही है! चलो, जल्दी से इस पर एक पोस्टर बना दो, इंस्टा पर डाल दो, “आधुनिक होने के लिए अंधविश्वास त्यागना ज़रूरी थोड़ी होता है।” वाह!

प्रेम न कुंडली ऐप में है, न एस्ट्रो ऐप में है, न डेटिंग ऐप में है। वो चीज़ दूसरी होती है। पुरानी पीढ़ी बंधक थी बाहर से; आपकी पीढ़ी बंधक है भीतर से।

पुरानी पीढ़ियों का शोषण बाहर वाले कर जाते थे। आपकी आज की नई पीढ़ी को शोषित होने के लिए किसी बाहर वाले की ज़रूरत ही नहीं, आप ख़ुद अपना शोषण कर लेते हो। आपकी लाइक्स, डिसलाइक्स, ओपिनियंस, वाइब्स काफ़ी हैं आपका शोषण करने के लिए। वो जब आप इठला के, इतरा के बोलती हैं न, “यू नो, दिस इज़ हू आई एम।” तो यह आप नहीं बोल रही हैं। यह भीतर की बहुत सड़ी हुई, बदबूदार कोई चीज़ बोल रही है, और वो आत्मशोषक होती है। बाहर से कोई आपका एक्सप्लॉइटेशन, शोषण कर रहा हो तो दिखाई दे जाता है। विद्रोह करना आसान हो जाता है। पर जब आप स्वयं ही अपने शोषक हो जाओ, तो ग़ुलामी बहुत गहरी हो जाती है।

आपकी जो पीढ़ी है, वो अपनी एक्सप्लॉइटर ख़ुद है। वह कहते हैं, “हम किसी की नहीं सुनते, हम तो बस अपनी सुनते हैं।” यह जो तुम अपनी सुनते हो न, यह अपनी सुनना ही सबसे बड़ी ग़ुलामी है। क्योंकि जिसको तुम कह रहे हो “मैं”, जिसको तुम कह रहे हो “अपनी बात सुनना”, वह तुम्हारी बात नहीं है। वह भी पूरे तरीके से शारीरिक और सामाजिक बात है, जिसको तुमने कह दिया कि, “यह तो मेरी बात है।”

“मैं किसी बाहर वाले की नहीं सुनती, मैं तो रिबेल हूँ।” काहे का रिबेलियन? वही बाहर वाले, जो बाहर से तुम्हारे ऊपर चढ़े रहते थे, अब वो सूक्ष्म रूप से तुम्हारे भीतर प्रवेश कर गए हैं, वो तुम्हारे भीतर रहकर तुम्हें नियंत्रित करते हैं। पुरानी पीढ़ी के गुरु होते थे, वो कहा करते थे, “अरे, समाज से दबकर रहो और भगवान से डरो, और परंपरा के पीछे चलो।” ये बातें आज की पीढ़ी को अब पुरानी लगती हैं। कह रहे हैं, “हाँ, हम बाहर किसी से क्यों दबकर रहें? किसी से क्यों डरकर रहें?” तो अभी जो फ़ैशनेबल गुरु लोग हैं, वो बताते हैं, “मैं तो अपने मन की करूँगा, मैं किसी की नहीं सुनता, मैं तो अपने मन की करता हूँ।” और यह पुरानी ग़ुलामी से ज़्यादा भीषण ग़ुलामी है। यह फ़ैशनेबल और ट्रेंडिंग रिबेलियन है, जो दो कौड़ी का नहीं है, ज़्यादा घातक है।

अहंकार रिबेल बनकर बैठ गया है भीतर। अहंकार ने टी-शर्ट पहन ली, और उस पर क्या लिख दिया है? “आई एम अ रिबेल।” हम किसी की नहीं सुनते। तुम तो अपनी ज़िंदगी अपने हिसाब से चलाना। तुम किसी की मत सुनना।” यह ज़्यादा घातक बात है, पुरानी बातों से भी ज़्यादा घातक ये नई बात है, और ये ख़ूब चल रही है।

पुरानी पीढ़ी कहेगी, “आयोजित विवाह करो।” ठीक? कुंडली मिलाकर। अच्छा ही करा कि उनकी बात को ठुकराना शुरू कर दिया, ठीक किया। चलो, ठीक किया। लेकिन आपकी पीढ़ी क्या कह रही है? “जो हमें पसंद आएगा, हम तो उसके साथ रहेंगे।” अच्छा, चलो, सुनने में तो अच्छी लगी ये बात, लेकिन ये तो बता दो कि पसंद करने का तुम्हारा पैमाना क्या है? यह तो बता दो।

तुमने कह दिया, माँ-बाप की पसंद पर नहीं चलेंगे। चलो, ठीक किया। काहे को कोई आज़ाद आदमी किसी और की पसंद को जीवन भर अपने ऊपर लादकर रखे? चलो, ठीक किया, तुमने कह दिया, समाज की नहीं सुनते, माँ-बाप की नहीं सुनते। पर यह तो बता दो, अब किसकी सुन रहे हो? अब तुम कह रहे हो, “हम अपनी पसंद की सुन रहे हैं।” और तुम्हें पसंद करने की तमीज़ है? मुँह देखो अपना। जल्दी से मुँह देखो अपना। तुम्हें पसंद करने की तमीज़ है? अपनी पसंद माने क्या? किसकी पसंद?

तुम्हारे शरीर की पसंद। तुम्हारी कंडीशनिंग, मीडिया की पसंद। वो सारी चीज़ें, जो तुम्हारे भीतर घुसकर बैठ गई हैं। जो टीवी सीरियल तुमने देखे, जो वेब सीरीज़ तुमने देखीं, जो तुम्हारा परिवेश रहा चारों ओर, जो तुम्हारा पीयर ग्रुप रहा और जो तुम्हारे हार्मोनल उबाल आ रहे हैं, उनकी पसंद। तुम्हारी कोई पसंद नहीं है, क्योंकि तुम तो अभी हो ही नहीं। तुम क्या प्रेम करोगे, प्रेम करने के लिए पहले होना तो पड़ता है। तुम्हारे मुँह से तो तुम्हारे हार्मोन्स बोल रहे हैं। तुम्हारे मुँह से तो वो के-पॉप बोल रहा है।

दस साल पहले जिस क़िस्म के लड़कों को लड़कियाँ कहती थीं, “ये देखो, कितना बेकार है, ऐसे कैसे फ़ेमिनिन-सा लगता है।” आज वो तुम्हारी पसंद हो गए। और तुम कह रहे हो, “मेरी पसंद है।” तुम्हारी पसंद है? तुम्हारी पसंद है सचमुच?

तुम हो कहाँ, कुछ भी पसंद या नापसंद करने के लिए? पहले अपनी हस्ती को पैदा तो कर लो। तुम तो अभी पैदा ही नहीं हुए।

तुम किसको पसंद करने लग गए कि इसके साथ जिएँगे, मरेंगे, ब्याह करेंगे, कुछ और करेंगे? पसंद में और प्रेम में ज़मीन-आसमान का अंतर होता है। पसंद तो मशीन भी कर सकती है, पसंद तो पागल भी कर सकता है। पसंद तो शराबी भी कर सकता है। प्रेम सबके बूते की बात नहीं होती है। पसंद तो किसी को भी कोई आ जाता है। बारह-चौदह की उम्र आई नहीं कि लड़के को लड़की, लड़की को लड़का पसंद आना शुरू हो जाता है। पसंद में क्या रखा है? दो कौड़ी की चीज़ है पसंद।

कोरियन कल्चर न हावी हुआ होता, अफ्रीकन कल्चर हावी हो गया होता, तो आपको सब जितने भी हमारे श्याम-घनश्याम हैं, वही पसंद आने लग जाते। काला रंग अपने अलग-अलग शेड्स में बड़ी डिमांड में आ जाता। क्यों? के-पॉप की जगह ए-पॉप पॉपुलर हो गया होता, अफ्रीकन पॉप। वो सारी लड़कियाँ ढूँढ़ रही होतीं, “कोई मिले मेरा घनश्याम।” श्याम माने काला, घनश्याम माने घना काला। और फिर बोलतीं, “मेरी पसंद, मेरी पसंद। नहीं डैडी, हाउ कैन यू इंटरफ़ेयर इन माय पर्सनल, प्राइवेट लाइफ़? ये मेरी पसंद है। मेरा घनश्याम!”

तुम्हारी पसंद का कोई मूल्य है? जैसे पेड़ से टूटा हुआ पत्ता हवाओं में बह रहा है, संयोगों के झोंके ले रहा है। अपनी कोई हैसियत नहीं, अपनी कोई हस्ती नहीं। कभी किधर को हवा चली, तो उधर बह गया। कभी कहीं जाकर गिर गया। कभी किसी की गोद पर बैठ गया।

इसका मतलब यह नहीं है कि माँ-बाप आपके लिए बेहतर फ़ैसला कर देंगे। मैं अरेंज्ड मैचेस के पक्ष में नहीं बोल रहा हूँ। जो अरेंज्ड के सामने सर झुका दे, वो डरपोक। और जो अपनी पसंद के पीछे-पीछे चल दे, वो पागल। अब मैं इन दोनों में किसको ऊपर रखूँ? मेरी तो आफ़त हो जाती है, मैं जवाब क्या दूँ? कुछ लगे हुए हैं, हम डरपोक हैं। डरपोक हैं। पापा ने सेटिंग कर दी, उधर ही जाना है। “पापा, पापा...” और दूसरे हैं, वो विद्रोही बन रहे हैं। कह रहे हैं, “नहीं, हम भी विद्रोही हैं। हमारी स्पिरिचुअलिटी भी रिबेलियन की है। तो हम तो चलते हैं मेरी पसंद।”

ये तुम्हारा एक्सेंट भी उधार का है। भारत पर अंग्रेज़ न चढ़े होते, पुर्तगाली चढ़े होते, तो तुम पुर्तगाली एक्सेंट में आज बोल रहे होते। तुम्हारा अपना क्या है? तुम्हें गोरा रंग भी पता है न क्यों पसंद आता है? भारत में कोई परंपरा नहीं है कि गोरा रंग ही श्रेष्ठ होता है। हमारे यहाँ तो श्याम वर्ण को, नील वर्ण को, सबको ऊँचा माना गया है। तुम्हें गोरा रंग ही क्यों पसंद है? “पसंद! मेरी पसंद!”

तो लड़की को कहते न, “अरे गोरी, कहाँ जा रही हो?” गोरे ही क्यों पसंद आते हैं? क्योंकि भारत को कॉलोनाइज़ अंग्रेज़ों ने करा। वहाँ भी अगर अफ्रीकन आ गए होते, तो क्या होता? अभी ब्लैक स्टॉक सबसे ऊपर होते। तो तुम्हारी पसंद माने क्या? किसकी पसंद? तुम हो ही नहीं। तुम तो प्रभावों का एक पुतला हो, संस्कारों का एक पिंड हो। तुम्हारी अपनी, निजी, वास्तविक कोई हस्ती कहाँ? उसको ही आत्मा बोलते हैं। वह है कहाँ?

और पसंद हमारी इतनी छिछली होती है कि सबको पता होता है कि हम क्या पसंद करेंगे। कोई अगर चाहे कि आपको पसंद आ जाए, तो उसके लिए बड़ी मुश्किल नहीं है। कोई तय ही कर ले कि आपको पटाना है, तो वो ऐसी स्थितियाँ निर्मित कर देगा कि आप उसे कर लें पसंद ख़ुद ही। और बोलें, “नहीं, उसने मुझे नहीं पटाया, वो मेरी पसंद है।” क्योंकि आपकी पसंद आपकी है ही नहीं, वो सार्वजनिक है। पूरी दुनिया जानती है आप क्या पसंद करोगे। तो पूरी दुनिया के लिए बहुत आसान है आपके सामने पसंद-योग्य बनकर आ जाना।

लड़का-लड़की ही नहीं, नेताजी और बाबाजी भी जानते हैं आपको क्या पसंद है। वो भी आपके सामने वही सब ले आते हैं जो आपको पसंद है। तो बाबाजी को आप दान-दक्षिणा दे देते हो, और नेताजी को वोट दे देते हो, और लड़का-लड़की जी को दिल दे देते हो। क्योंकि सबको पता है कि आपको क्या पसंद है। क्योंकि आपको जो पसंद है, उसमें निजता कहीं है ही नहीं। वो सोशल है, सार्वजनिक है। सब जानते हैं।

सोचो, हम कितने प्रेडिक्टेबल हैं। कोई भी हमें पूर्वानुमानित कर सकता है। कोई भी जान सकता है कि क्या कर दूँ, तो सामने वाला लट्टू हो जाएगा। लड़के भी जानते हैं, लड़कियाँ, महिलाएँ सब; आप लोग जानती हैं कि नहीं जानती हैं, अच्छे से ईमानदारी से बताना कि क्या कर दें कि सामने वाला भी नाचना शुरू कर दे। अच्छे से पता है कि नहीं? अरे, है कि नहीं? और ये सोचते हैं, “मुझे वो पसंद आ गई।” तुम्हें वो पसंद नहीं आ गई। उसने पूरी व्यवस्था रची थी बड़ी आसानी से कि तुम उसे पसंद कर लो।

महिलाओं के लिए बहुत आसान होता है कि कोई उन्हें पसंद कर ले। ज़्यादा कुछ करना ही नहीं है। वो दो-चार छोटे-मोटे काम हैं, वो कर दें, लड़के तुरंत उन्हें पसंद कर लेंगे। और फिर कहेंगे, “वो तो मेरी पसंद है। बाप से लड़ जाऊँगा, वो मेरी पसंद है।” बाप से लड़ जाओ, पर इस मुद्दे के लिए नहीं।

प्रेम क्या होता है? आप जवान हो। ठीक है, प्राकृतिक बात है, विपरीत लिंगी से आपका आकर्षण होगा। अच्छी बात है, बढ़िया। प्रकृति में हम क्या कह दें कि कुछ बुरा है, जो है, सो है। हम होते कौन हैं उसे बुरा घोषित करने वाले। दो व्यक्तियों में परस्पर आकर्षण होता है एक उम्र में आकर के। हम क्या जाएँ और कहें कि शुभ है, कि अशुभ है, कि यह है, कि वह है। वह हो रहा है, अपने आप हो रहा है।

प्रश्न यह है कि उस आकर्षण को ड्राइव करने वाला कौन है? समझ रहे हो? स्त्री और पुरुष में जो परस्पर आकर्षण होता है, वह वैसा नहीं होता जैसा लोहे और चुंबक में होता है। नहीं, बिल्कुल वैसा नहीं होता। यहाँ लोहे के पीछे भी कोई है और चुंबक के पीछे भी कोई है। प्रश्न यह है कि वह कौन है? हाँ, ठीक है जवान हो गए हो, तो लड़कियों की तरफ़ जाओगे। प्रश्न यह है कि लड़की चुनने वाला कौन है? शरीर तो इतना ही कह रहा है। शरीर की प्राकृतिक रूप से तो बस इतनी ही माँग है कि कोई विपरीत लिंगी चाहिए। ठीक है। पर यह तो बता दो कि दुनिया में इतनी लड़कियाँ हैं, वह कौन बैठा है पीछे शरीर के, जो चुनाव कर रहा है? उसका क्या नाम है? और क्या वो चुनाव करना जानता है?

और यही प्रश्न मैं लड़कियों से पूछूँगा। हाँ, ठीक है, जीवन में पुरुष प्रवेश करेंगे, बिल्कुल; पर क्या तुमको तमीज़ है ये चुनने की कि कौन होगा वो पुरुष? चुनने वाले का नाम बताओ। क्या नाम है उसका? अहंकार। द ईगो।

आपको लगता ऐसा है कि जैसे यह शारीरिक आकर्षण है। नहीं, आकर्षण ज़रूर शरीर से शुरू हुआ है पर साथी का चुनाव करने वाला अहंकार होता है। और जब भी वह चुनाव करेगा, तो चुनाव ऊटपटाँग ही बैठेगा। अध्यात्म यह नहीं कहता कि स्त्री-पुरुष दूरी बनाकर रहें। वह पूछता है, “किसको चुना है?” ठीक है, जीवन में स्त्री को ले आओ। पर कौन-सी स्त्री को लाए हो? और कौन-सी स्त्री को लाए हो, वो इस पर निर्भर करेगा कि तुम कौन हो। आत्मज्ञान है कुछ? स्वयं को जानते हो? स्वयं को जानते हो?

गिरा हुआ आदमी, जिसको गिरा हुआ ही रहना है, वह जाकर जो सबसे गिरी हुई औरत होगी उसको चुन लेगा। क्योंकि अगर वो थोड़ी-सी भी ऊँची स्त्री को अपने जीवन में ले आया, तो उसके गिरे हुए अहंकार को ख़तरा हो जाएगा। ऐसे चुनता है अहंकार। इसी तरीके से एकदम डरी हुई महिला, एकदम डरी हुई महिला, किसी ऐसे पुरुष को चुन लेगी जो उसको सुरक्षा तो दे दे पर कभी उसका डर न हटाए। क्योंकि अगर डर हट गया तो रिश्ता टूट जाएगा, रिश्ता बना ही इसीलिए था क्योंकि महिला डरी हुई थी। रिश्ते की बुनियाद में ही डर था, जिस दिन महिला का डर चला गया वो रिश्ता भी चला जाएगा। तो महिला कहेगी, “मुझे ऐसा पुरुष चाहिए जो मुझे अपनी छाँव में ले ले, सुरक्षा दे दे। पर डर नहीं हटना चाहिए, डर हटा तो रिश्ता भी गया।”

डर का जो मूलभूत कारण है अहंकार, वो नहीं हटना चाहिए। अब देखो, इस तरीके से तो हम चुनाव करते हैं ज़िंदगी में। इस तरीके से तो हम ज़िंदगी में अपने साथी का चुनाव करते हैं। फिर हम कहते हैं कि, “अरे, रिश्तों में इतना क्लेश क्यों है?” और क्या होगा? तुमने चुना कैसे है, यह देखो न। चुनने वाला कौन है, यह देखो न। बहुत सारे तो पुरुष खुलेआम कहते हैं, बेधड़क, “भाई, हमें न कोई बहुत पढ़ी-लिखी और बड़े विराट व्यक्तित्व वाली, दमदार, तेज़ बीवी चाहिए ही नहीं। हमें तो चाहिए सीधी-साधी, आज्ञाकारिणी, सुशीला।”

ये देख रहे हो, ये कौन चुन रहा है। यहाँ तो शरीर भी नहीं चुनने वाला। यहाँ अहंकार कह रहा है कि ज़्यादा तेज़ लड़की अगर ज़िंदगी में आ गई, तो हमारी पोल खोल देगी। हमसे दबकर नहीं रहेगी, हमारे अहंकार को चुनौती दे देगी। तो वो पहले ही कह देते हैं कि, “बहुत पढ़ी-लिखी भी मत लाना। कमाने का काम हमारा है। हम पढ़े-लिखे हैं। दसवीं पास हो, तो भी चलेगा। पर ज़रा दब्बू होनी चाहिए।” ये शरीर भी नहीं चुन रहा।

हम अक्सर कहते हैं कि जेन-ज़ी हार्मोनल डिसीज़न्स ले लेती है। नहीं साहब, आपके डिसीज़न्स हार्मोनल भी नहीं हैं, इगोइक हैं। इगोइक हैं। और बुरे दोनों हैं। हार्मोन्स भी अगर उन्हीं पर चल रहे हो, तो तुम्हारा कोई कल्याण नहीं होगा। और अहंकार भी तुम्हें नचा रहा है तो भी नहीं होगा। लेकिन इन दोनों में भी अगर कभी मुठभेड़ होती है, तो अहंकार हार्मोन को भी दबा देता है। कोई बहुत आकर्षक लगने वाली स्त्री तुम्हारी ज़िंदगी में आए लेकिन वो बड़ी विदुषी हो। दुनिया घूमी हो उसने, तुमसे ऊँची नौकरी करती हो। तेज़तर्रार हो, अपनी बात रखना जानती हो। न डरती हो, न सहमती हो और सेक्सी भी ख़ूब हो।

तुम कहोगे, “होगी सेक्सी, मुझे नहीं चाहिए।” तुम अपने हार्मोन्स को भी ओवरराइड कर दोगे। तुम कहोगे, “भाई, इतनी तेज़ है कि चाहिए ही नहीं ज़िंदगी में। भले ही ये कितनी भी आकर्षक हो, कितनी भी कामिनी हो, नहीं चाहिए।”

अहंकार साथी को भी वैसे ही चुनता है, जैसे वह ज़िंदगी में सारे काम करता है, आत्मरक्षा के लिए। और प्रेम का मतलब होता है उसको चुनना जो तुम्हें तोड़ दे।

अब कैसे होगा प्रेम परंपरा और पसंद के साथ, बताओ? पहले चलती थी परंपरा, अब चलती है पसंद। प्रेम न परंपरा का नाम है, न पसंद का नाम है। प्रेम तो एक पागलपन का नाम है, जिसमें अहंकार स्वयं ही कह रहा है कि, “संगति उसकी मिले जो मेरे बंधन तोड़ दे, जो मेरे पूर्वाग्रह तोड़ दे, जो मुझे उन जगहों से उठा दे जहाँ मैं चिपककर बैठा हुआ हूँ, जो मेरी ज़ंजीरें काटकर मुझे आकाश में खुला छोड़ दे।” प्रेम का अर्थ होता है, जो ऊँचे से ऊँचा संभव हो सके उसकी संगति कर लेना, चाहे उसके लिए जो क़ीमत देनी पड़े। यह होता है प्रेम। अहंकार प्रेम करेगा ही नहीं।

अगर उसको डरा रखा है, तो वह कहेगा, “मैं चलूँगा परंपरा पर।” और अगर उसको ढील दे रखी है, तो कहेगा, “मैं चलूँगा पसंद पर।” पर प्रेम अहंकार के बूते की बात नहीं है। प्रेम न पुरानी पीढ़ी जानती थी, न नई पीढ़ी जानती है। क्योंकि प्रेम पीढ़ियों के बदलने से नहीं आ जाता, प्रेम कोई कालचक्र की वस्तु नहीं है कि समय बदलेगा, तो मानव प्रेमपूर्ण हो जाएगा। ऐसा नहीं होता। काल बदलता रहता है, मनुष्य अप्रेमी का अप्रेमी ही रहता है। पाँच हज़ार साल पहले भी हम प्रेम नहीं जानते थे। सौ साल पहले भी नहीं जानते थे। पिछली पीढ़ी भी नहीं जानती थी, और आज की पीढ़ी भी नहीं जानती है।

कैसे ज्ञानियों ने प्रेम को गाया है। वो है प्रेम

“सीस उतारे भूँई धरे, तब बैठे घर माहिं। यह तो घर है प्रेम का, खाला का घर नाहिं।”

किसका सर? शरीर का सर नहीं काटना है अहंकार का सर, और उसके लिए बड़ी हिम्मत चाहिए। इसलिए मैंने कहा था जहाँ डर है वहाँ प्रेम नहीं हो सकता, जो डरा है वो सर काटना बर्दास्त नहीं कर पाएगा। बात आ रही है समझ में? अवसर बीत नहीं गया, जब तक आप हो तब तक अहंकार है। और जब तक अहंकार है तब तक प्रेम की उसकी प्यास है। समस्या बस ये है कि वो चुनता है बस आत्मरक्षा को प्रेम से ज़्यादा।

चुनाव बदला जा सकता है, अभी ज़िंदा हो आप। आत्मरक्षा को छोड़िए, प्रेम को चुनिए।

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
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