मजबूरी एक झूठ है जिसे अहंकार स्वार्थ छुपाने के लिए गढ़ता है। जो दबता है वो किसी सौदे में दब रहा है। माँ-बाप की धमकी, समाज का दबाव - ये सब तभी काम करते हैं जब भीतर डर हो और डर तभी होता है जब कोई चीज़ पानी हो। आज़ादी के लिए आखिरी कीमत भी चुकाने की तैयारी ही असली जीवन है।
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प्रश्नकर्ता: सर, आपने तो बहुत सारी बातें बोलीं कि वुमेन एम्पावरमेंट, नारी सशक्तिकरण, सब कुछ बोला आपने। जैसे, फ़ॉर एग्ज़ाम्पल, सर, कि अगर कोई माँ-बाप अपनी बेटियों को एकदम अच्छा, हेवी एजुकेशन और बहुत अच्छे लेवल पर ले जाते हैं। अल्टीमेटली शादियाँ तो करनी होती हैं लोगों को।
मैं एक लाइव एग्ज़ाम्पल दे रही हूँ, सर मेरी एक फ्रेंड का। उसकी शादी हुई उसके घर में, उसकी भाभी हाउसवाइफ़ थी और वो वर्किंग थी। उसमें होता क्या था? उसकी भाभी हर दिन अपनी सास को तेल लगाती थी, सर। बस बैठकर ऐसे हाथ से सहला रही है। उससे उनके दर्द नहीं निकलते थे, लेकिन जो मेरी फ्रेंड है, वो दिन भर ऑफ़िस करके शाम में घर आती थी, और उसको ताना दिया जाता था कि “वो तो अपनी सास की सेवा करती है, तुम क्या करती हो?”
तो आप कितनी भी लड़कियों को पढ़ा लीजिए, एजुकेशन दे दीजिए, उस मजबूरी वाले फ़ेज़ में न वो कहीं न कहीं अपनी जो भी फ़्रीडम है, जो सशक्त होती है न, सर वो सशक्त, ये सारी चीज़ें ख़त्म हो जाती हैं। उस पर आपका क्या राय है, सर?




