
प्रश्नकर्ता: सर, आपने तो बहुत सारी बातें बोलीं कि वुमेन एम्पावरमेंट, नारी सशक्तिकरण, सब कुछ बोला आपने। जैसे, फ़ॉर एग्ज़ाम्पल, सर, कि अगर कोई माँ-बाप अपनी बेटियों को एकदम अच्छा, हेवी एजुकेशन और बहुत अच्छे लेवल पर ले जाते हैं। अल्टीमेटली शादियाँ तो करनी होती हैं लोगों को।
मैं एक लाइव एग्ज़ाम्पल दे रही हूँ, सर मेरी एक फ्रेंड का। उसकी शादी हुई उसके घर में, उसकी भाभी हाउसवाइफ़ थी और वो वर्किंग थी। उसमें होता क्या था? उसकी भाभी हर दिन अपनी सास को तेल लगाती थी, सर। बस बैठकर ऐसे हाथ से सहला रही है। उससे उनके दर्द नहीं निकलते थे, लेकिन जो मेरी फ्रेंड है, वो दिन भर ऑफ़िस करके शाम में घर आती थी, और उसको ताना दिया जाता था कि “वो तो अपनी सास की सेवा करती है, तुम क्या करती हो?”
तो आप कितनी भी लड़कियों को पढ़ा लीजिए, एजुकेशन दे दीजिए, उस मजबूरी वाले फ़ेज़ में न वो कहीं न कहीं अपनी जो भी फ़्रीडम है, जो सशक्त होती है न, सर वो सशक्त, ये सारी चीज़ें ख़त्म हो जाती हैं। उस पर आपका क्या राय है, सर?
आचार्य प्रशांत: नहीं, मैं देख रहा हूँ कि आपने कितने सारे अपने अंधविश्वास बता दिए बिना ये देखे कि आप जो बता रही हैं, वो अंधविश्वास के अलावा कुछ नहीं है।
“शादी तो लेकिन करनी ही होती है न, सर। जैसे साँस लेनी होती है न, सर। उसके बाद वो जब आती है तो लोग उसे ताना मारते हैं। ताना जब पड़े तो बुरा तो लगना होता है न, सर। बुरा मानना तो ज़रूरी है न, सर।”
अरे, मत मानो न बुरा। मारने दो जो ताना मार रहा है, आप पता नहीं क्या-क्या मारते हो तो मैं बुरा मान जाता हूँ क्या? आपके सामने जो खड़ा हुआ है, इनके सामने जो खड़ा हुआ है सोचो, सोचो, आँखें कैसे मुंद जाती हैं इनके सामने जो खड़ा हुआ है, उससे कह रही हैं, “पर शादी तो ज़रूरी होती है न, सर।” तो मैं कौन हूँ?
आप ख़ुद बेड़ियाँ चुने क्योंकि उनमें आपको आपके स्वार्थ दिखाई दे रहे हैं, उसके बाद आप खड़े होकर मजबूरी का रोना रोएँ तो कोई सहानुभूति नहीं मिलनी चाहिए।
और एक बात याद रखिएगा, कोई किसी के सामने दबना मंज़ूर नहीं करता, हमेशा सौदा किया जाता है। अगर कोई किसी से दब रहा है तो सिर्फ़ एक वजह होगी, जिससे दब रहा है उससे कोई स्वार्थ पूरा कर रहा है, नहीं तो कोई नहीं दबेगा। कोई नहीं दबेगा। कुछ न कुछ पाने का लालच है तभी दब रहे हो।
श्रोता: गुमने का डर।
आचार्य प्रशांत: कहीं नहीं गुम हो जाओगे, ये प्रकृति माँ है। आपको बता करके तो इसने आपको पैदा भी नहीं किया। कहाँ गुम हो जाओगे? क्यों डर रहे हो कि जगत में मेरा क्या होगा? किसने कहा है? तो ये आपका डर जो है न, आपका अज्ञान, ये है आपका दुख। ये मत कहिए कि मजबूरी होती है, दबना और डरना तो ज़रूरी होता है न। कुछ ज़रूरी नहीं होता, शरीर के लिए ज़रूरी बस मौत होती है और चेतना के लिए ज़रूरी बस मुक्ति होती है और कुछ ज़रूरी नहीं होता।
दो यही चीज़ें हैं जो अनिवार्य हैं, जिनको आप टाल नहीं सकते: शरीर की नियति है मृत्यु, चेतना की नियति है मुक्ति। इसके अलावा आप कुछ भी बोल दो कि “विवश हूँ, हेल्पलेस हूँ, मजबूर हूँ” आप झूठ बोल रहे हो। आप कोई स्वार्थ का सौदा कर रहे हो और उसको मजबूरी का नाम दे रहे हो। मजबूर तो पूरा हिंदुस्तान था। भगत सिंह मजबूर थे क्या? बाक़ी जितने निकल के नहीं गए बाहर, “मजबूर हैं हम क्या कलें, मम्मी ने मना किया है।” रोते रहो मजबूरी का रोना, जिन्हें करना है वो कर लेते हैं। “मैं क्या कलती मुझे वो ज़बलदस्ती मेली शादी कल दी।”
अरे जवान हो, मज़बूत हो; उठो, भाग जाओ। और मुझे बिल्कुल नहीं समझ में आ रहा इसमें इतनी ताली बजाने की क्या बात है? क्योंकि ये बहुत ज़ाहिर-सी बात है, ये सहज बात है। आप आकर मेरे ऊपर चढ़ोगे, मैं भाग जाऊँगा। इसमें मैंने उल्लेखनीय, विशिष्ट क्या कर दिया कि ताली बजे। किसी लड़की का उसके घरवाले शोषण कर रहे हैं तो भागेगी नहीं तो और क्या करेगी। ताज्जुब तो इस बात पर होना चाहिए कि आज तक भागी कैसे नहीं।
उसको बुलाओ यहाँ मंच पर, जो दबी हुई है चाहे किसी से भी, पति से, पिता से, घर से, समाज से, किसी से भी दबी हुई है और फिर भी दबना स्वीकार कर रही है। उसको यहाँ बुलाओ, उसका इंटरव्यू लो। बोलो, आप महान हैं, आप रेयर हैं, आप विरल हैं। और जैसे-जैसे उसे पूछते जाओगे न, उसका इंटरव्यू लेते हुए, निकलकर आएगा कि कोई बहुत गंदा, घटिया सौदा करके बैठी हुई है। यूँ ही कोई नहीं दबता। अपने आप को ये सांत्वना देना बंद कर दीजिए कि आप मजबूर हैं। कोई मजबूर नहीं होता।
बुरे से बुरा क्या होगा? आज़ादी के लिए पंख फैलाओगे, फड़फड़ा के उड़ जाओगे तो मरना पड़ेगा, तो ठीक है। ठीक है अगर यही आख़िरी मजबूरी है, तो ये भी ठीक है। ये भी ठीक है, कोई बात नहीं। लेकिन ग़ुलामी नहीं मंज़ूर है। न जाने कितने थे जो शान से मरे, तब आज हमें राजनीतिक आज़ादी भी मिली है। मजबूरी का रोना रोने लग जाते, तो कुछ भी ज़रूरी नहीं था; न गांधी का सत्याग्रह, न लाजपत राय को सिर पर लाठी खानी ज़रूरी थी। कुछ भी ज़रूरी नहीं था।
भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु, ज़रूरी था; इतनी-सी बात कह रहे थे उनसे, इतनी-सी बात कह रहे थे अंग्रेज़। क्या बोल रहे थे? बोल रहे थे, “तुमसे कुछ नहीं चाहिए, बस छोड़ देंगे बाहर जाकर के दोबारा ये बम वग़ैरह मत फोड़ना। इतना आश्वासन दे दो, हम छोड़ देंगे। हम तुम्हें जानते हैं।”
चंद्रशेखर आज़ाद, न जाने कितने; आप-आप थोड़ा इतिहास पढ़िए, आप भौंचक्के रह जाएँगे। कितने ही युवा स्वतंत्रता सेनानी थे जिनको अंग्रेज़ों ने ये तक कहा कि “हम तुम्हारा सम्मान करते हैं, तुम युवा हो, हम तुमको लंदन में पढ़ने के लिए भेजेंगे अपने ख़र्चे पर। और हम तुम पर कोई दबाव नहीं बना रहे, तुम्हें जैसे जीना होगा जीना। तुम्हें जो विचारधारा रखनी है रखो, बस सशस्त्र क्रांति मत करना। तुम मुँह से कुछ बोलना भी चाहते हो तो बोल लेना। तुम अख़बार में लिखना चाहते हो, लिख लेना। बस ये मत करना कि तमंचा चला रहे हो, बम फेंक रहे हो।” उन्होंने कहा, नहीं। अंग्रेज़ों ने कहा, “फिर जान जाएगी तुम्हारी, हमें तुम्हें फाँसी देनी पड़ेगी।” बोले, नहीं। मजबूरी कौन-सी चिड़िया है? बोलो, मजबूरी क्या होती है? तो क्या मजबूरी का रोना रो रहे हो?
आख़िरी धमकी कोई आपको यही दे सकता है न, क्या? कि जान ले लूँगा तुम्हारी। कह दो देखो, अगर बात मुक्ति और मौत की है तो मुक्ति के लिए तो मौत भी मंज़ूर है। अगर यही आख़िरी शर्त है। हम मरना नहीं चाहते, भाई। हमारा मरने का कोई इरादा नहीं है, हम जीना चाहते हैं। लेकिन अब अगर हाल यहाँ पहुँच गया है कि आख़िरी शर्त सामने आ गई है, और आख़िरी शर्त यही है कि आख़िरी मूल्य चुकाओ, तो आख़िरी मूल्य चुका देंगे। कोई शौक़ नहीं है हमको वीरगति लेने का, कोई शौक़ नहीं है शहीद होने का, लेकिन अब अगर और कोई राह बची ही नहीं है आख़िरी यही है कि जान ही दे दो, तो वो भी ठीक है। मजबूरी क्या है? कोई मजबूरी नहीं है। ग़ुलाम हमें तब बनाओगे न, जब हम ज़िंदा रहेंगे। ग़ुलाम तब बनाओगे न, जब जिएँगे।
मछली के बारे में क्या कहते हैं कबीर साहब हमारे? गीता-प्रतिभागी बताएँगे, “एक सनेही माछरी, दूजा अलप सनेह।” सनेह माने प्रेम; मछली, एक मछली ही है जो प्रेम जानती है। उदाहरण दिया है, रूपक के तौर पर बनाया है। एक मछली ही है जो प्रेम जानती है। “एक सनेही माछरी, दूजा अलप सनेह।” अलप माने अल्प, कम। बोले, बाक़ी सब प्रेम जानते नहीं, उनका प्रेम छोटा है। “ज्यों ही जल से बिछड़े, झट से त्यागे देह।”
वो कहती है, “जिऊँगी तो सागर में आज़ाद जिऊँगी। यही प्रेम है मेरा, इसी सागर से मुझे प्रेम है।” सागर उसकी मुक्ति है। जहाँ चाहे, वहाँ जाती है। कहती है, जैसे ही मुझे तुम सागर से बाहर निकालोगे, मैं जिऊँगी ही नहीं, निकाल लो बाहर। तुम ये नहीं कर पाओगे कि मुझे ग़ुलाम भी बना लो और ज़िंदा भी रख लो। ये नहीं हो पाएगा। मुझे ज़िंदा रखना चाहते हो, तो मुझे आज़ाद जीने दो। हमारा-तुम्हारा साथ चल सकता है, लेकिन ग़ुलामी में नहीं चलेगा।
हमारा-तुम्हारा रिश्ता सिर्फ़ एक बुनियाद पर हो सकता है, मैं तुम्हारी स्वतंत्रता का सम्मान करूँ और तुम मेरी स्वतंत्रता का सम्मान करो। अब ठीक है।
ये ताने खाना, दब जाना, झुक जाना, तलवों में तेल लगाना, ये किस कोटि की बातें हैं, और क्यों इन्हें झेलना पड़ रहा है? और मैं कह रहा हूँ तलवों में नहीं, पूरे शरीर में तेल लगाओ, बेशक लगाओ लेकिन प्रेम से लगाओ मजबूरी से नहीं। मजबूर करोगे तो एक बूँद पानी भी नहीं देंगे, हाँ, प्यार में अपनी जान भी दे देंगे। मजबूरी में किया गया काम न प्रेम होता है, न कर्तव्य होता है, न धर्म होता है। वो सिर्फ़ एक बिके हुए ग़ुलाम की ग़ुलामी होता है।
प्रेम, कर्तव्य, धर्म, ये बड़े ऊँचे शब्द हैं, और इनका संबंध स्वतंत्रता से है। जो स्वतंत्र होता है, वही प्रेम कर सकता है। जो स्वतंत्र होता है, कर्तव्य-पालन और धर्म-पालन सिर्फ़ वही कर सकता है। जो बेड़ियों में जकड़ा हुआ है, आप उसको आज्ञा दे रहे हो, “चल ये कर, चल वो कर,” और वो आपकी आज्ञा का पालन कर रहा है तो आप ये थोड़ी कहोगे कि वो अपना धर्म निभा रहा है। झूठी बात।
और ये महिलाओं ने खूब पुराण पकड़ा है एक, कि “नहीं, हम आज़ाद तो जीना चाहते हैं, पर मैं क्या करूँ देवदास मैं मजबूर थी। मुझे ज़बरदस्ती पकड़ करके वहाँ बाँध दिया गया। मैं पारो हूँ।” मजबूर थी? इतनी बड़ी हवेली में है तू। वो हवेली न होती, झोपड़ी होती पारो, तो तू मजबूर न होती। तू मजबूर नहीं थी पारो, तूने सौदा किया है। और सौदा करने में और ज़्यादा रुचि तब हो जाती है, जब भीतर डर का भाव हो कि जल्दी से बिक जा, नहीं तो आगे पता नहीं क्या हो। जल्दी झुक जा, नहीं तो न जाने क्या हानि हो जाए।
अरे, क्या हानि हो जाएगी? क्या हो जाएगा? साफ़-साफ़ बताओ, स्पष्ट बताओ। नहीं झुकोगे तो क्या हो जाएगा?
प्रश्नकर्ता: सबसे पहले तो, आचार्य जी, आपके कारण मेरे जीवन में बहुत बड़ा बदलाव आया। हम बहुत छोटे जगह से हैं और हमारी परवरिश बहुत ही मतलब बस माँ-बाप कहे वही करना है। जब मेरी शादी हुई तो बहुत कम उम्र में मेरी शादी हुई। और माँ-बाप ये कहते हैं, अगर शादी तुम नहीं करोगी तो हम अपनी जान दे देंगे। तो इसमें फिर क्या करें, आचार्य जी? मैं तो अपनी जान देने के लिए तैयार हूँ। बट, जब माँ-बाप अपनी जान देने पे आ जाएँ, तो क्या करें?
आचार्य प्रशांत: जिसकी जान इतनी सस्ती हो कि किसी पर दबाव बनाने के लिए दी जा सकती हो, तो हो गया सस्ती चीज़ थी। दुख की बात है, शोक-संदेश है। अब क्या कर सकते हैं?
एक प्रश्न पूछ रहा हूँ आपसे, कितने तो आप लोग नादान होती हैं, एकदम मासूम होकर खड़ी हो जाती हैं। आँकड़े उठाइएगा, बार-बार बोलता हूँ, फैक्ट्स आर द डोर टू ट्रुथ। आँकड़े उठाइएगा और बताइएगा भारत में कितनी महिलाएँ हैं जो दहेज-हत्या में मरती हैं, व्यर्थ की प्रसूति में मरती हैं? और कितने महिलाओं के माँ-बाप हैं जो दबाव बनाने के लिए मरते हैं? कौन दे रहा है जान? पर आप हैं नादान।
प्रश्नकर्ता: पर उस समय आप नहीं थे, आचार्य जी। काश, उस टाइम आपको मैं सुनती, तो फिर ये दिन नहीं आता। बस, आप मेरे लिए क्या बोलूँ, जैसे विवेकानंद।
आचार्य प्रशांत: सब आके बोलते हैं, “आचार्य जी, आप पहले क्यों नहीं आए?” मुझे बड़ा अपराध-बोध हो जाता है, गलती हो गई, देर हो गया। लेट कर दिया, आई ऐम सो सॉरी। मैं प्रागैतिहासिक हूँ, मैं न जाने कब से हूँ। मैं मिस्टिकल बात नहीं कर रहा। मैं तब भी था, मैं तब भी जितनों से हो सकता था बात कर रहा था, बोल रहा था। पर आप सुनते कहाँ हो? खैर, वो दूर की बात है। वो व्यक्तिगत लाने की कोई ज़रूरत भी नहीं है। लेकिन ये बात बहुत अच्छे से समझ लो, कोई आप पर दबाव बनाने के लिए ये सब नाटक करे न “नस काट लूँगा”, “ये कर लूँगा”, “वो कर लूँगा” तो थोड़ा आँकड़े देख लिया करो।
माँ-बाप के दबाव में आकर के ये जो लड़कियाँ ब्याही जाती हैं न, मरती ये हैं, माँ-बाप नहीं मरने वाले। ये मेरा व्यक्तिगत मत नहीं है, ये ठोस आँकड़े हैं। उसको तो पकड़ कर के ब्याह दिया। अब उसके साथ जो कुछ होगा, वो माँ-बाप झेलेंगे क्या? आमतौर पर ऐसे मामलों में अजनबियों के साथ ही ब्याह दिया जाता है। पहली ही रात से अजनबी जो कुकृत्य शुरू करेगा, वो माँ झेलेगी? और ऐसी शादियों में अक्सर दहेज का भी योगदान होता है। वो जूते खाना, वो गालियाँ खाना, वो सब माँ-बाप करेंगे अब?
प्रश्नकर्ता: पर मेरी शादी बिना दहेज की हुई थी, आचार्य जी।
आचार्य प्रशांत: दुल्हन ही दहेज है, सच्ची बात है। अच्छी बातें हुई थी तो, पर मतलब क्यों, अब ये बात क्यों की? या तो कह दीजिए कि मेरी शादी अच्छी चल रही है।
प्रश्नकर्ता: हाँ, अच्छी है।
आचार्य प्रशांत: तो सब ठीक है। फिर मेरा उसमें क्या काम है?
प्रश्नकर्ता: नहीं, आचार्य जी, आपके कारण ही अच्छी चल रही है। बस, आपका जो मेरे जीवन में महत्त्व है वो बस मैं समझ सकती हूँ।
आचार्य प्रशांत: वैसे आपको एक बात बताऊँ, मेरे कारण शादियाँ बहुत-बहुत अच्छी चल सकती हैं। बहुत सारी हज़ारों-लाखों में अच्छी चल भी रही हैं, पर सिर्फ़ तब, जब दोनों लोग मेरे साथ हों।
प्रश्नकर्ता: जी, मेरे हसबैंड भी आपको बहुत।
आचार्य प्रशांत: बस इसीलिए। जहाँ पर स्थिति ये बनती है कि कोई एक जना सुनता है, साथ रहता है, वहाँ फिर तनाव आता है। वहाँ तनाव आता है, और विशेषकर अगर पत्नी सुन रही है और पतिदेव उचटे हुए हैं तो फिर वो सब इल्ज़ाम लगते हैं कि घर तोड़ते हैं और ये सब। शादी बहुत-बहुत अच्छी चलेगी, धर्म का काम ही है रिश्तों को ऊँचाई देना, रिश्तों को वास्तविक प्रेम देना, ये धर्म का ही काम है। लेकिन उसके लिए फिर दोनों ओर से सहभागिता होनी चाहिए।